देख नहीं सकती, अरे अंधी है क्या ?
जाने कैसे कैसे लोग सड़क पर उतर आते हैं ?
तेज रफ्तार फराटे दार भागती गाड़ी में से गर्दन निकाल उस नवयुवक के बोल सुनकर उसकी गाड़ी के धक्के से नीचे गिरी कंचन ने खुद को तो बहुत ही मुश्किल से संभाला ।
कंचन बड़बड़ाई मैं तो अंधी हूँ.. ‘बाबू’ लेकिन आप क्या है ?
आप तो अच्छा भला देख सकते थे ।
सड़क पर तो सही लोग उतरते, मगर आप जैसे रईसजादों को दिखाई ही कहां देते हैं ?
मगर उसकी करूण व्यथा, दर्द भरे बोल सुनने की फुर्सत किसके पास उसकी आवाज भागती गाड़ी में दफन ही होकर रह गई। एक तो इस बड़े शहर का ये नामी चौराहा भीड़भाड़ से भरा, वाहनों की आवाजाही का महत्वपूर्ण स्थल है। नवयुवक की आवाज सुनकर कंचन ने एक फीकी मुस्कुराहट फैंकी बड़बड़ाई हूं
ऽऽ अंधी, ‘अंधी, यह एक शब्द जो उसको भीतर तक भेद जाता था । जिस शब्द को सुन सुन कर वो आज अट्ठारह बर्ष की हो गई थी। बचपन में ही माता-पिता को खोकर निकटवर्ती रिश्तेदारों द्वारा अंधों के स्कूल पहुंचा दी गई। तब से ‘ब्लाइंड स्कूल’ ही उसका घर बन गया जहां उसको ब्रेल लिपि से पढ़ाई लिखाई सिखाई समझाई जाती ।
सड़क पर चलने समझने की पूरी ट्रेनिंग दी जाती। बस ट्रेनिंग स्कूल चौराहा पार कर दूसरी तरफ था। एक तरफ ब्लाइंड स्कूल दूसरे तरफ ट्रेनिंग स्कूल। वैसे तो सभी ब्लाइंड मिलकर साथ साथ जाते मगर आज किसी कारणवश कंचन को अकेले जाना पड़ा।
कंचन अभी जमीन से उठने की कोशिश ही कर रही थी। एक बारह बरस का बालक संजू ने उसे उठाने के लिए अपने नन्हे हाथों का सहारा दिया। बोला- दीदी आप को लगी तो नहीं न कहीं ।
बड़े ही खराब है ये अंकल लोग, बिना देखे सोचे समझे गाड़ी भगाते फिरते हैं। कोई मतलब नहीं कौन सड़क पार कर रहा ? कंचन ने नन्हे हाथों का सहारा ले उठकर बोली- भाई किस किस को दोष दूं जब ऊपर वाले ने ही मेरी किस्मत में अंधेरा लिख कर ही मुझे भेजा है।
कंचन के हाव-भाव से ही संजू महसूस कर लेता है वो देख नहीं सकती । मासूम और नम्र दिल संजू कहता है… दीदी आज से मैं आपका छोटा भाई आप मेरी बड़ी बहन बनेंगीं न ।
कंचन को ज़िन्दगी में पहली बार आत्मीयता का अहसास कराता एक मधुर रिश्ते का आमंत्रण उसका दिल खुशी से झूम उठता है। वो कहती हैं भाई मुझ अंधी के जीवन में पहली बार बहार आई भला मैं क्यूं स्वीकार नहीं करूंगीं तुमको ?
वो उत्साहित होकर कहती हैं। मेरा नाम कंचन है। और फिर और भी अपने विषय में सभी, बहुत कुछ उसको बताती है।
संजू उसको सड़क पार करने में मदद करता है और अपना नाम और अपने घर के विषय में भी बताता है। वो पास ही रहता और अभी स्कूल पढ़ने जा रहा है। संजू ब्लाइंड स्कूल में कंचन से मिलने का वादा कर उसको संभावित जगह पर छोड़ फिर अपने स्कूल की तरफ चला जाता है।
कंचन आज जब ट्रेनिंग स्कूल में सबको बताती है कि उसके साथ आज कैसी दुर्धटना होने से बच गई तो प्रबंधिका सबको सचेत करती हैं । आज के बाद सभी मिलकर समूह में सड़क पार करेंगे। अकेले कोई न आये जब तक ठीक से ट्रेनिंग न मिल जाये सबको ।
अब रोज संजू अपनी कंचन दीदी से मिलने ब्लाइंड स्कूल आने लगता है। दोनों भाई बहन का प्यार बढ़ने लगता है।अब तो कंचन जब तक नित्य संजू से मिल नहीं लेती उसको चैन नहीं मिलता। और संजू भी मौका मिलते ही ब्लाइंड स्कूल की ओर दीदी से मिलने की लालसा में दौड़ा चला आता।
कभी- कभी स्कूल की छुट्टी रहती तो घन्टों ब्लाइंड स्कूल में ही व्यतीत करता । संजू कंचन को अपने विषय में बताता है। वो अपने दादा जी और ‘माँ के साथ रहता है। पिता तो बचपन में ही भगवान के घर चले गए। उसके दादा मनोहर जी चिकित्सक और माँ नम्रता शास्त्रीय संगीत ज्ञाता जो शास्त्रीय नृत्य और गायन का स्कूल चलातीं हैं। उनका घर हवेली नुमा है बहुत बड़ा और उसके दादा जी बहुत ही रईस, रजवाड़ों के खानदान के हैं ।
कंचन उत्साहित होकर कहती हैं….. भाई इतने बड़े घर में तो मैं कभी भी नहीं गई ।इतने बड़े घर में कभी तुम खो तो नहीं जाते हो ।
संजू कंचन की बात पर हंसते हुए कहता है दीदी अगर मैं कभी खो गया तो आप मुझे ढूंढ लेना एक दिन मैं आपको अपने घर ले चलूंगा ।
इसी तरह भाई बहन को मिलते हुए काफी दिन हँसी खुशी से व्यतीत होते जाते हैं। दोनों जब तक दिनभर में एक बार मिल नहीं लेते दोनों को चैन ही नहीं मिलता।
लेकिन एक बार हफ्ते फिर दो हफ्ते गुजर जाते हैं। कंचन इंतजार करती रह जाती है । मगर उसका भाई संजू नहीं आता है। कंचन परेशान हो जाती है। एक अजीब सी आंशका मन को घेर लेती है। पता नहीं कहां चला गया ? कहीं बाहर जाना होता तो बता कर जरूर जाता। सोच- सोच कर कंचन का हृदय विचलित सा हो जाता है।
आज तो सुबह से ही उसे बुरे- बुरे ख्याल आ रहे थे। वो मन ही मन कहती हैं मुझ अभागी के इस कोरे जीवन में प्यार आत्मीयता तो ईश्वर ने लिखी ही नहीं है। पहले माता-पिता को जुदा कर दिया । फिर क़िस्मत से एक प्यारा सा भाई नसीब हुआ वो भी दूर चला गया।
कंचन ईश्वर से मन ही मन प्रार्थना करती है.. हे ! भगवान मेरे भाई की रक्षा करना वो किसी मुसीबत में न हो। उस पर अपनी मेहर बनाए रखना।
तभी स्कूल संचालिका रेवती जी जो कंचन को बहुत अच्छा मानती, सदा ही उसकी मदद को तत्पर रहती वहां आ जाती है। कंचन को परेशान देखकर कहती हैं, अरे- कंचन आज तुम इतनी परेशान क्यों दिख रही हो ? कंचन उनको सारी बातें बताती है। रेवती जी कंचन से संजू का अता पता जानकर शीध्र ही असली बात का पता लगाने उसे मिलवाने का वादा करतीं हैं। दो चार दिन में रेवती जी संजू का पता लगाकर कंचन को लेकर उनकी हवेली में पहुंच जाती है।
जैसे ही वो हवेली में प्रवेश करते हैं संजू अपने दादा जी के साथ घर के लान में शाल ओढ़े आरामदायक कुर्सी में बैठा मिलता है।और वो जैसे ही कंचन को आते हुए देखता है। दीदी, दीदी कहता तेजी से दौड़ता उससे लिपट जाता है। और फिर लड़खड़ाकर गिर पड़ता है। कमजोरी से उसका शरीर कांपने लगता है। उसके दादा मनोहर जी नौकर की मदद से उसे उठाकर कमरे में ले जाते हैं ।
साथ ही कंचन और स्कूल संचालिका भी भीतर आ जाती है। दादा जी बताते है संजू को डेंगू हो गया है दो दिन से थोड़ा आराम आया मगर खतरा अभी टला नहीं है। दादा मनोहर जी कंचन से कहते हैं बिटिया हमें तुम्हारे बारे में संजू ने सब बताया है।
मैं खुद दो एक दिन में तुमसे मिलने आने वाला था। संजू को हफ्ते भर से तो होश नहीं था। तभी संजू की माँ नम्रता भी आ जातीं है। वो कंचन से मिलकर बहुत खुश होती हैं । संजू माँ से जिद करता है वो दीदी को यहीं घर में रख लो । उनको जाने मत देना। नम्रता जी संजू को समझाती है कि वो एकदम से कंचन को यहां नहीं रख सकती इसके लिए पहले उनके ब्लाइंड स्कूल से इजाजत लेनी होगी। वो जल्दी ही कार्यवाही करके उनको घर ले आयेंगी ।
कंचन सारा दिन संजू के साथ व्यतीत कर शाम ढलते ही अपने ब्लाइंड स्कूल वापस आ जाती है।उसी रात संजू का स्वास्थ्य अचानक ज्यादा खराब हो जाता है। उसको बड़े अस्पताल में भर्ती करवाया जाता है। डाक्टर बताते हैं उसके प्लेटलेट्स बहुत गिर गये है। उसका शरीर कमजोर पड़ गया है।
ये शायद दवाई भी ठीक से नहीं खा रहा था। तुम्हारी नज़र बचाकर इधर उधर फैंक देता होगा। शरीर पर दवाई का असर नहीं है । संजू डाक्टर की सब बातें सुन लेता है। डाक्टर लाख कोशिश के बाद भी संजू को बचा नहीं पाते । संजू अपने अन्तिम समय में दादा जी और माँ से कहता है
“ माँ मेरे बाद मेरी आँखें मेरी कंचन दीदी को लगवा देना और उनको घर ले आना, ‘माँ मैं फिर दीदी की आंखों में जीवित रहूंगा, हमेशा आपके ही साथ रहूंगा ” !!!
नम्रता जी और मनोहर जी की सर पर तो जैसे दुःखों का पहाड़ ही टूट पड़ता है। इकलौता बच्चा जब आँखों के आगे ही दम तोड़ देता है। दादा मनोहर जी फूट-फूट कर रोने लगते हैं। माँ नम्रता का भी बुरा ही हाल रहता है । दादा जी संजू की इच्छा अनुसार उसकी आंखें आई बैंक में रखवा देते हैं।
संजू का अन्तिम संस्कार हो जाता है। फिर मनोहर जी ब्लाइंड स्कूल जाकर उचित कार्यवाही करके कंचन को अपने घर ले आते हैं। और निर्धारित समय में संजू की आंखें उसको लगवा देते हैं। इस दौरान कंचन बराबर अपने भाई संजू के बारे में सबसे पूछती है मगर कोई जवाब नहीं देता। वो सदा आशंकित मन से घिरी रहती है। एक अजीब सा अहसास होता रहता है उसको ।
आज कंचन के आंखों की पट्टी खुलने वाली होती है। डाक्टर के उसकी आँखों से पट्टी हटाते ही कंचन सबको देखती है। संजू के दादा,माँ अपने स्कूल की संचालिका रेवती जी मगर संजू को न देख उसकी आँखें उसे इधर उधर खोजने लगती है। एक अजीब सा अहसास लिए उसकी आँखों में जैसे ही आंसूओं की धारा भर आती है।
जिसे देख आँखों का डाक्टर कहता है बेटा इन आँसूओं को पोछ लो अब कभी इन आंखों में आंसू नहीं निकलने चाहिए। बहुत ही कीमती है ये आँखें तुम्हारी, बहुत संभाल कर रखना इनको । क्योंकि इसमें तुम्हारे भाई संजू का प्यार बसा हुआ है। जो तुमको उपहार के रूप में दे गया है।
कंचन कुछ समझ नहीं पाती वो कभी दादा जी को तो कभी माँ नम्रता की तरफ प्रश्न भरी नजरों से देखती है। उसको दुविधा में पड़ा देखकर नम्रता जी आगे बढ़कर अपने आँचल से कंचन की आंखों से आँसू पौछती हुई उसे अपने सीने से लगा लेती हैं । यह कहते हुए… बिटिया अब तो तेरी इन खुबसूरत आँखों में ही जिंदा है मेरा बेटा संजू….!!!!
लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया
29. 11. 25