इज्जतदार – सुदर्शन सचदेवा

आजकल की दुनिया चकाचौंध से भरी है—लाइटें, लाइक्स, फॉलोअर्स और दिखावे की दौड़। इसी दुनिया में रहता था राघव, जो एक छोटी-सी पारिवारिक दुकान संभालता था। दुकान साधारण थी, पर राघव की पहचान उसके पहनावे या मोबाइल से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से होती थी। मोहल्ले में लोग उसे “इज़्ज़तदार लड़का” कहते थे—क्योंकि उसके बोल में मिठास, व्यवहार में विनम्रता और दिल में सच्चाई थी।

लेकिन आज के दौर में इज़्ज़तदार होना आसान नहीं। लोग अच्छाई पर शक करते हैं और सच्चे आदमी को कमज़ोर समझते हैं। राघव भी इन्हीं हालात से रोज़ गुजरता था।

एक दिन सुबह दुकान खोलते ही उसने देखा कि एक बुज़ुर्ग औरत दुकान के बाहर चुपचाप बैठी है। चेहरा थका हुआ था, पैरों में दर्द साफ दिख रहा था। राघव ने आदर से पूछा, “मांजी, अंदर बैठ जाइए, पानी पीजिए।”

औरत ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, तुम हर रोज़ दूर से भी नमस्कार कर देते हो, इसलिए आज हिम्मत कर बैठ गई।”

राघव ने तुरंत कुर्सी निकाली और पानी दिया। थोड़ी देर बाद उसने पता लगाया कि वह औरत पास वाली कॉलोनी में रहती है, पर घर के लोग आजकल कम ध्यान देते हैं। अक्सर भूखी रह जाती है।

राघव ने बिना शोर किए उसे रोज़ सुबह नाश्ता देना शुरू कर दिया। उसने किसी को बताया नहीं—क्योंकि वह आजकल के सोशल मीडिया वाले दिखावे में विश्वास नहीं करता था।

कुछ दिनों बाद दुकान के सामने एक महंगी कार आकर रुकी। उसमें बैठा कबीर, मोहल्ले का नया-नवेला “इंफ्लुएंसर”, जो अक्सर लाइक्स के लिए वीडियो बनाता था। उसने बुज़ुर्ग औरत को नाश्ता लेते देखा और तुरंत मोबाइल निकाल लिया।

“दिखिए दोस्तों, ये है असली इंसानियत!”

वह चिल्लाते हुए लाइव वीडियो करने लगा।

राघव ने मोबाइल को हटाते हुए शांत स्वर में कहा, “भाई, इंसानियत कैमरे पर नहीं, दिल में अच्छी लगती है। इनके लिए वीडियो मत बनाइए।”

कबीर हंसा, “अरे यार, लाइक्स आएंगे, फायदा तुम्हें भी होगा। आजकल इज़्ज़त ऐसे ही मिलती है!”

राघव ने धीरे से जवाब दिया, “नहीं भाई, इज़्ज़त ‘दमदार वीडियो’ से नहीं, ‘इज़्ज़तदार काम’ से मिलती है।”

कबीर को यह बात अच्छी नहीं लगी और वह चला गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

कुछ हफ्तों बाद मोहल्ले में एक बड़ी गलती हो गई। रात को किसी ने कबीर की कार पर पत्थर मारा और शीशा तोड़ दिया। कबीर ने गुस्से में आरोप लगा दिया कि ये काम राघव के किसी जानने वाले का है। उसने राघव के बारे में सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल दी कि “ये बंदा जितना अच्छा दिखता है, उतना है नहीं।”

लोग अंधाधुंध मान भी गए—क्योंकि आजकल किसी की इज़्ज़त गिराने के लिए बस एक पोस्ट काफी है।

राघव के ग्राहक कम होने लगे। कुछ लोग उससे फुसफुसाकर बात करते। कुछ दूर से शक की निगाहों से देखते। मगर राघव ने कभी अपनी इज़्ज़त की सफाई नहीं दी। वह बस काम करता रहा, क्योंकि उसे पता था—सच्चाई की आवाज़ धीमी होती है, पर मजबूत होती है।

फिर एक रात, मोहल्ले में लगे सीसीटीवी कैमरे का वीडियो सामने आया। उसमें साफ दिखा कि कबीर की कार पर पत्थर मारने वाला एक शराबी राहगीर था, न राघव, न उसका कोई परिचित।

कबीर शर्मिंदा होकर राघव की दुकान पर आया।

“भाई, मुझसे गलती हो गई। गुस्से में पोस्ट कर दी। चाहो तो मैं पूरा वीडियो बनाकर सफाई दे दूं, लाइक भी मिलेंगे और तुम्हारी इमेज भी…”

राघव ने मुस्कुरा कर कहा, “कबीर, इज़्ज़त लाइक्स से नहीं टूटती, और न लाइक्स से बनती है। लोग चाहे तो सौ बार गलत समझ लें, पर सच्चे इंसान को समय एक दिन सही साबित कर ही देता है।”

कबीर चुप हो गया।

मोहल्ले में धीरे-धीरे बातें फैलीं, और लोग खुद ही राघव के पास आने लगे।

“तुम्हें तो हमने हमेशा सम्मान दिया है बेटा, गलती हमारी थी कि बिना सुने मान लिया।”

राघव ने किसी से शिकायत नहीं की, न कोई गुस्सा। उसकी विनम्रता ही उसकी असली ताकत थी।

कुछ महीनों बाद उसी बुज़ुर्ग औरत के घरवालों ने राघव को सम्मान समारोह में बुलाया। मोहल्ले वाले भी आए।

कार्यक्रम में जब राघव का नाम पुकारा गया, सब तालियों से गूंज उठे।

मंच पर खड़ी बुज़ुर्ग औरत ने भर्राए स्वर में कहा—

“बेटा राघव की इज़्ज़त कोई सोशल मीडिया नहीं बनाती, इसे उसका दिल बनाता है। आजकल के जमाने में सच्चे लोग कम हैं, और इज़्ज़तदार लोग उससे भी कम।”

राघव की आंखें नम हो गईं।

कहानी का अंत एक सरल वाक्य में छिपा है—

आज जब दुनिया दिखावे की दौड़ में भाग रही है, वहीं एक इज़्ज़तदार इंसान चुपचाप राह पर चलता है। उस पर उंगलियां उठती हैं, लोग गलत समझते हैं, पर अंत में वही जीतता है—क्योंकि इज़्ज़त उसके कर्मों में होती है, आवाज़ में नहीं।

सुदर्शन सचदेवा

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