इज्जतदार ( इंसान या वहशी जानवर ) – संगीता अग्रवाल

” पापा आ गये ..पापा आ गये !!” जैसे ही ऑटो रिक्शा चलाने वाले जीवन ने घर मे कदम रखा उसके दोनो बच्चे मचलते हुए बोले ।

” अरे मेरे बच्चो !” बोल जीवन दोनो बच्चो को गोद मे उठा लेता है । अपने बच्चो का हँसता चेहरा देख उसकी सारी थकान उतर जाती है।

” बेटा पापा थके हुए आये है और तुम दोनो उनकी गोद मे चढ़ गये । चलो उतरो नीचे पापा को हाथ मुंह धो खाना खाना है !” तभी जीवन की पत्नी सुशीला रसोई से निकलती बोली।

” नही हम पापा के साथ आइसक्रीम खाने जाएंगे ! ” जीवन की पांच साल की बेटी परी बोली।

” हाँ और खिलौने भी लेंगे !” तभी जीवन का सात साल का बेटा वंश बोला।

” हाँ हाँ सब लेंगे पर पहले खाना खाएंगे फिर आइसक्रीम खाने चलेंगे !” जीवन बोला।

दोनो बच्चे खुशी से ताली बजाने लगे जीवन भी उनका साथ दे रहा था । अपने परिवार को यूँ हँसता मुस्कुराता देख सुशीला की खुशी मे आँख सी भर आई । 

थोड़ी देर बाद सब खाना खा आइसक्रीम खाने निकल गये जीवन के ऑटो रिक्शा मे । वहाँ सबने अपनी पसंद की आइसक्रीम ली और मजे से खाने लगे ।

एक प्यारा सा परिवार है ये जिसमे एक मेहनती पति है जो अपने बीवी बच्चो की खुशी के लिए दिन रात मेहनत करता है । एक संतोषी पत्नी है जो पति की कम आमदनी मे भी बिन कोई शिकायत किये खुश रहती है और अपने परिवार को खुश रखती है साथ ही है दो प्यारे प्यारे बच्चे जिनकी हंसी से घर ग़ुलजार रहता है । 

” पापा अब खिलौने दिलाओ ना वो बड़ी सी बंदूक !” वंश आइसक्रीम खत्म करता बोला।

” हाँ पापा मुझे बार्बी डॉल !” परी भी आइसक्रीम की डंडी फेंकती बोली। 

” बेटा अब बहुत देर हो गई कल जब पापा वापिस आएंगे तो तुम दोनो के लिए खिलौने लेके आएंगे !” जीवन प्यार से दोनो को समझाता हुआ बोला। क्योकि आज उसकी कम कमाई हुई थी इसलिए वो आज खिलौनों मे पैसा खर्च नही कर सकता था घर मे राशन भी तो आना था । उसके दोनो बच्चे कुछ नही बोले और सब वापिस आने लगे आते हुए जीवन और सुशीला राशन का सामान लेते आये । घर आ बाते करते चारों सोने लगे ।

” सुशी कल मुझे जल्दी उठा देना , और हाँ कल बच्चो को स्कूल भी तुम्ही छोड़ कर आना !” बच्चों के सोने के बाद जीवन पत्नी से बोला।

” क्यो क्या हुआ आपको कुछ काम है क्या ?” सुशीला ने पूछा।

” सुशी बच्चो ने खिलौनो की फरमाइश की है और तुम तो जानती हो सीमित कमाई मे घर चलाना ही मुश्किल है आजकल लोग कैब बुक ज्यादा करने लगे है ऑटो तो कम ही लोग लेना चाहते गर्मी के करण इसलिए सोच रहा हूँ कल से जल्दी निकाला करूंगा और रेलवे स्टेशन की तरफ चला जाया करूंगा सुबह सुबह सवारी मिल जाएगी तो बच्चो की जरूरतें पूरी हो जाएंगी !” जीवन बोला।

” ये तो सही सोचा आपने मैं भी सोच रही थोड़ा सिलाई का काम पकड़ लूं चार पैसे आएंगे तो काम ही आएंगे हमें अपने बच्चो को पढ़ा लिखा बड़ा आदमी भी तो बनाना है !” सुशीला बोली।

” हाँ सुशीला खुद ज्यादा नही पढ़ पाया इसलिए ये ऑटो चलाना पड़ रहा है पर अपने बच्चो को खूब पढ़ाऊंगा और बड़ा अफसर बनाऊंगा जिससे वो धूप मे ऑटो से नही ए सी वाली गाडी मे घूमे !” आँखों मे चमक लिए जीवन बोला। बात करते करते दोनो कब नींद के आगोश मे चले गये पता ही नही चला।

सुबह सुशीला ने जल्दी उठ जीवन के लिए खाना बनाया और उसे मुस्कुराते हुए विदा किया जीवन सोते हुए अपने दोनो बच्चो के माथे चूम काम पर निकल गया । सुशीला बाकी के काम निपटाने लगी फिर उसने बच्चो को उठाया और तैयार किया ।

” मम्मी आज पापा हमें छोड़ने क्यो नही जा रहे कहाँ गये वो आज ?” तैयार होते हुए परी ने सवाल किया ।

” बेटा पापा आज जल्दी काम पर चले गये शाम को तुम्हारे खिलौने जो लाने है !” सुशीला उसकी चोटी बनाती हुई बोली ।

” वाह्ह आज मेरी डॉल आएगी फिर मैं भी उसके ऐसे ही बाल बनाउंगी जैसे आप मेरे बनाती हो !” परी खुश होते हुए बोली ।

” और मेरी बड़ी सी बंदूक आएगी उससे मैं उन लोगो को मारूंगा जो मेरे पापा को परेशान करेंगे !” वंश भी खुश होता बोला । ऐसे ही बात करते दोनो सुशीला के साथ स्कूल चले गये । सुशीला उन्हे छोड़ कर जब वापिस आई तो उसने आस पास सिलाई के कपड़ो की बात की क्योकि उसने शादी से पहले सिलाई सीखी थी और अभी भी वो अपने कपड़े परी के फ़्रॉक सिल लेती थी तो उसमे आत्मविश्वास था कि वो ये काम आसानी से कर लेगी । उसके कुछ जानने वालों ने उसे आश्वासन दिया कि अब कोई कपड़ा सिलवाना होगा तो वो उसे ही देंगे । 

सुशीला खुशी खुशी घर आई और बाकी के काम करने लगी । काम करते करते वो अपने बच्चो के उज्ज्वल भविष्य के सपने भी देख रही थी । कितना अच्छा होगा जब जीवन और मैं दोनो कमाएंगे जीवन के पैसो से घर खर्च और मेरे पैसो से बच्चो के लिए बचत होगी । जब तक बच्चे बड़े होंगे हम काफी बचत कर लेंगे तब उन्हे बड़ा अफसर बनाएंगे । उनके अफसर बनते ही जीवन से बोल दूंगी मैं अब ऑटो चलाने की जरूरत नही अब तो बच्चो की ए सी गाडी मे शान से घूमो ! यही सब सोचते सोचते और काम करते करते बच्चो को स्कूल से लाने का समय हो गया । बच्चो को स्कूल से ला सुशीला ने उन्हे खिला कर सुला दिया ।

इधर जीवन भी खुश था क्योकि आज कमाई अच्छी हो गई थी । आज बच्चे कितने खुश होंगे जब वो अपनी पसंद के खिलौने देखेंगे तो । कल से रोज इसी समय आऊंगा चार पैसे ज्यादा कमाऊंगा तो बच्चे भी खुश रहेंगे । यही सोचते सोचते वो अपना काम कर रहा था । 

उधर सुशीला ने शाम को बच्चो को उठा दूध दिया और पढ़ने बिठा दिया और खुद खाने की तैयारी करने लगी क्योकि थोड़ी देर मे जीवन के आने का भी समय हो जाता । 

जीवन ने घड़ी देखी साढ़े सात बज रहे थे अब मुझे खिलौने ले घर चलना चाहिए बच्चे राह देख रहे होंगे ये सोच उसने अपना ऑटो एक खिलौने की दुकान पर रोका और एक अच्छी सी गुड़िया और बड़ी सी बन्दूक खरीद कर ऐसे ऑटो मे रखा मानो वो कोई अनमोल खजाना हो …वैसे खजाना ही तो थी क्योकि ये खिलौने उसके बच्चो के चेहरे पर खुशी लाएंगे और बच्चो के चेहरे की खुशी से बढ़कर भी कोई दौलत होती है एक पिता के लिए !! खुशी खुशी जीवन घर को जा रहा था कि अचानक उसे ब्रेक मारने पड़े ।

उधर सुशीला बेचैनी से घड़ी देख रही थी नौ बजने को आये ऐसा तो कभी नही हुआ कि जीवन ना आये वो तो रात का खाना अपने बच्चो के साथ ही खाता है इसलिए ज्यादा से ज्यादा आठ बजे तक घर आ जाता है । कितनी देर से फोन भी मिला रही थी वो पर फोन भी बंद आ रहा था । 

तभी दरवाजे पर जोर जोर से दस्तक हुई ” वंश परी पापा आ गये तुम्हारे !” ये बोल सुशीला दरवाजा खोलने भागी पीछे पीछे बच्चे भी क्योकि उन्हे तो अपने पापा का इंतज़ार कबसे था उनके खिलौने जो लाने वाले थे पापा। 

” भाभी वहाँ जीवन ….!” दरवाजा खोलते ही उसे किसी और की आवाज़ सुनाई पड़ी ।

” अरे सोनू भैया क्या हुआ ऐसे हांफ क्यो रहे हो और जीवन जी कहाँ है ? ” दरवाजे पर जीवन के दोस्त ऑटो ड्राइवर सोनू को देख सुशीला ने पूछा।

” आप मेरे साथ चलिए बस !” सोनू कुछ बोलने की स्थिति मे नही था इसलिए सुशीला का हाथ पकड़ ले जाने लगा । सुशीला ने दोनो बच्चो को लिया और सोनू के साथ उसके ऑटो मे बैठ गई । 

एक जगह आ सोनू ने ऑटो रोक दिया वहाँ बहुत भीड़ थी । ” भैया हम यहां क्यो आये है ?” डरती हुई सुशीला ने पूछा साथ ही उसके दोनो बच्चे भी इतनी भीड़ देख डर कर माँ से लिपट गये । तभी वहाँ पुलिस की गाडी भी आई । अब तो सुशीला और ज़्यादा डर गई । 

वो धड़कते दिल से भीड़ मे जगह बनाती आगे आई । सामने जीवन का ऑटो खड़ा देख किसी अनिष्ट की आशंका से उसके पास आई तो पछाड़ खाकर गिर पड़ी । सोनू ने दोनो बच्चो को साइड किया । बदहवास सी सुशीला किसी तरह उठकर जीवन के करीब जाने लगी बिल्कुल करीब इस आशा से कि शायद उसका सुहाग जिंदा हो । 

तभी एक लेडी कांस्टेबल ने उसका बाजू पकड़ा बोला ” अभी बॉडी के पास नही जाना साहब को जांच करने दो !”

” बॉडी नही है वो मेरे पति है पति । मेरे बच्चो के पिता !” सुशीला ये बोल जोर जोर से रोने लगी ।

” माफ़ कीजिये मैडम हमें अपना काम तो करना ही होगा ना !” उस कॉन्स्टेबल ने नर्म पड़ते हुए कहा। 

सुशीला कुछ नही बोली वो तो बस अपने सुहाग को देख रही थी जो खून मे लथपथ पड़ा था । उसे समझ नही आ रहा था यहाँ हुआ क्या है । उसके दोनो अबोध बच्चे अपनी माँ से आ लिपट गये उन्हे समझ तो कुछ नही आ रहा था पर पुलिस और भीड़ को देख डरे हुए थे वो । 

” भैया क्या हुआ है जीवन को ?” सुबकती हुई सुशीला सोनू से बोली।

” मम्मी देखो मेरी बार्बी डॉल और भईया की बंदूक .. पर मम्मी पापा को चोट कैसे लग गई , उन्हे उठाइये ना डॉक्टर के पास चलते है !” तभी परी एक तरफ इशारा करके बोली। जहाँ खून मे सनी एक गुड़िया और बंदूक पड़ी थी उन्हे देख सुशीला का कलेजा मुंह को आ गया उसके अपने बच्चो को अपने अंक मे भींच लिया और सोनू की तरफ देखने लगी । 

” भाभी जीवन काम से घर लौट रहा था आगे एक गाडी रुकी थी जैसे ही जीवन उसके करीब आया गाडी का दरवाजा अचानक खुला और उसमे से एक मैडम निकली अचानक से ये हुआ तो जीवन ब्रेक नही लगा सका और मैडम को धक्का लग गया वो जमीन पर गिर गई । बस इतनी सी बात पर मैडम के पति और आस पास गुजरते कुछ लोगो ने जीवन को पकड़ लिया और मारने लगे । मैं जब तक यहाँ आया वो जीवन को मार मार के बेदम कर चुके थे मैने उसे बचाने की कोशिश की पर नही बचा पाया। इसलिए आपके पास भागा आया !” सोनू भरी आँखों से बोला और एक तरफ इशारा करने लगा जहाँ वो मैडम और उनके पति खड़े थे । 

” किस किसने किया ये .. बोलो !” तभी इंस्पेक्टर कड़क आवाज़ मे बोला। 

” सर ये …ये मेरी पत्नी को छेड़ रहा था अब कोई भी इज्जतदार आदमी ये कैसे बर्दाश्त करता बस गुस्सा आ गया लेकिन मैने इसे जान से नही मारा वो तो भीड़ ने !” ये बोल उस औरत का पति चुप हो गया ।

” झूठ झूठ बोल रहे है आप मेरा पति किसी औरत को छेड़ ही नही सकता .. बहुत इज्जतदार आदमी है आप आपका खून खोल गया पर जो ये यहाँ खून से लथपथ पड़ा है ना ये औरतों की इतनी इज्जत करता है कि कोई इसके सामने किसी औरत के साथ बदतमीजी नही कर सकता ये खुद क्या किसी से करेगा । मेरा जीवन हमेशा यही कहता था ईश्वर ने मुझे भी बेटी दी है मैं कैसे किसी बहन बेटी के साथ गलत होते देख सकता हूँ !” सुशीला रोते रोते बोली। 

पुलिस ने जीवन की लाश को पोस्ट मार्टम के लिए भेज दिया और वहाँ सबका बयान लेने लगा । कुछ लोग जो उस भीड़ का हिस्सा थे वो जीवन की गलती बता रहे थे जबकि कुछ एक ने सही वाक्या भी बयान किया और कुछ खिसक लिए वहाँ से । 

” माना इसमे उसकी गलती भी थी तो किसने हक दिया आप लोगो को किसी की जान लेने का आपको उसे पुलिस को सौंपना था । किस सभ्य समाज के इज्जतदार लोग है आप जिन्हे किसी की जिंदगी इतनी सस्ती लगती है !” इंस्पेक्टर गुस्से मे बोला। 

” ये इंसान नही है साहब ये तो जानवर से भी गये बीते है । इतने सारे लोगो ने एक मासूम को मिलकर मार डाला । अरे दरिंदो ये तो सोचते वो गरीब किसी का बेटा , किसी का पति , किसी का बाप भी होगा । क्या होगा मेरे इन मासूम बच्चो का तुम लोग लाकर दोगे इनका पिता वापिस … ला सकते हो .. नही ना जब तुम किसी को जीवनदान नही दे सकते तो किसी का जीवन लेने का हक किसने दिया तुम्हे !” सुशीला चिल्ला कर बोली । गुस्से और दुख की अधिकता मे उसे समझ नही आ रहा था वो क्या करे उसकी तो दुनिया उजड़ गई थी । 

थोड़ी देर बाद उस गाडी वाले और अज्ञात लोगो के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का केस दर्ज कर पुलिस cctv फुटेज देखने चली गई । सुशीला भी सोनू के साथ अस्पताल की तरफ भागी ।

सारी रात अस्पताल मे गुजर गई सुशीला दोनो बच्चो को सीने से लगाई शून्य मे निहारती रही उसकी तो पूरी दुनिया उजड़ गई थी जिन बच्चो को अफसर बनाने का सपना उसने और जीवन ने देखा था अब उनके भविष्य की चिंता भी सुशीला को खा रही थी । 

” आप अब बॉडी को ले जा सकते है !” सुबह इंस्पेक्टर और डॉक्टर दोनो सुशीला के पास आकर बोले।

” बॉडी नही है वो मेरे पति है जिन्हे इस समाज के कुछ इज्जतदार लोगो ने इस हाल मे पहुंचाया है !” सुशीला रोती हुई बोली।

” देखिये मैडम हम आपका दुख समझ रहे है हम दोषियों को सजा भी देंगे आप बेफिक्र रहे !” इंस्पेक्टर बोला।

” क्या आपका कानून मेरे बच्चों का पिता वापस ला सकता है ..नही ना । उन्हे जिन जानवरो ने भीड़ इकट्ठा कर मारा क्या वो वापिस ला सकते है .. नही ना । वो बड़े लोग है कुछ दिन मे छूट जाएंगे पर मेरा और मेरे बच्चो का क्या !!” सुशीला गुस्से मे रोती हुई बोली।

” मम्मी आप रोओ मत। चलो ना घर चले पापा को भी घर ले चलो हम अब पापा से कुछ नही मांगेगे तब उन्हे चोट भी नही लगेगी बस आप उन्हे घर ले चलो ।” परी माँ के आंसू पोंछते हुए बोली।

तभी एक कांस्टेबल ने जीवन की जेब से निकले पैसे और वो खिलौने एक बैग मे ला इंस्पेक्टर को पकड़ाये और इंस्पेक्टर ने सुशीला को वो बैग पकड़ते हुए सुशीला की जोर से रुलाई फूट गई । 

दोस्तों ये भले एक काल्पनिक कहानी है पर आज की सच्चाई के करीब । अक्सर हम ऐसी घटनाये सुनते है जिसमे जरा सी गलती पर भीड़ पीट पीट कर मार डालती है । क्या हम किसी सभ्य समाज़ के इज्जतदार लोग है या फिर वहशी जानवर ।

संगीता अग्रवाल

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