वक्त का कुछ भी नहीं पता चलता है।एक समय गोविन्द जी का परिवार काफी इज्जतदार था। आस-पास के गाॅंवों में भी उनके परिवार की काफी इज्जत थी।यह इज्जत उनके पुरखों ने अपने सत्कर्मों से कमाई थी, परन्तु अप्रत्याशित रूप से वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि उन्हें अपनी जन्मस्थली तक छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
सारी इज्जत, सम्पत्ति धरी की धरी रह गई।उनके परिवार के सदस्यों को जान से हाथ धोना पड़ गया।आज उनका बेटा आदित्य परिवार के साथ विदेश से आनेवाला है।इस बार उनकी ख्वाहिश है कि परिवार के साथ होली अपने पुश्तैनी गाॅंव में मनाऍं, परन्तु इसके लिए उनके दिल में कशमकश जारी है।गोविन्द जी वर्षों पूर्व अपने परिवार के साथ हुए हादसों को याद कर रह-रहकर बेचैन हो उठते हैं।
आज सुबह से ही उनके घर में चहल-पहल मची हुई है।उनकी पत्नी सीमा जी की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं है।उनका एक पैर रसोईघर में,तो एक पैर बच्चों के कमरे की साफ-सफाई में लगा हुआ है।सीमा जी अपने पुराने नौकर रामू को हिदायतें देती हुईं कहतीं हैं -“काका !सभी कमरों की साफ-सफाई अच्छे से होनी चाहिए। विदेशों में बहुत सफाई रहती है। थोड़ी -सी भी धूल-मिट्टी से बच्चों को एलर्जी हो सकती है!”
रामू-“बहू रानी!आप निश्चिंत रहिए।एक महीने से तो साफ-सफाई ही हो रही है!”
कुछ देर बाद सीमा जी अपने पति गोविन्द जी से पूछतीं हैं -“आपने बच्चों की पसन्द का सारा सामान तो लाकर फ्रीज में रख दिया है न?”
गोविन्द जी हॅंसते हुए -“सीमा जी!आपको तो मुझ पर भरोसा ही नहीं है,खुद फ्रीज खोलकर देख लीजिए!”
सचमुच सीमा जी फ्रीज खोलकर एक-एक चीज देखतीं हैं।फ्रीज में बच्चों की पसन्द के केक,चाॅकलेट, आइसक्रीम,फल वगैरह भरे पड़े हैं। तसल्ली हो जाने पर सीमा जी फ्रीज बन्द कर पति की ओर मुस्कुराते हुए देखतीं हैं।
गोविन्द जी पत्नी से कह उठते हैं -“केवल आप ही बच्चों की दादी नहीं हैं, मैं भी उनका दादा हूॅं। मैं कुछ नहीं भूलता हूॅं।हाॅं!आप अवश्य बच्चों के आने की खुशी में मुझे चाय देना भूल गईं हैं!”
सीमा जी -“अरे! मैं भी पागल ही हूॅं,अभी आपके लिए चाय लाती हूॅं।”
सीमा जी रसोई में जाकर महाराज (कुक) को बच्चों की पसन्द का खाना बनाने का निर्देश देतीं हैं और खुद दो प्याली चाय लेकर गोविन्द जी के पास बैठकर थोड़ी देर सुस्ताने लगतीं हैं।चाय पीते हुए सीमा जी गोविन्द जी से कहतीं हैं -“देखा आपने?आज अपना घर कितना सुन्दर लग रहा है!ऐसा प्रतीत हो रहा है,मानो घर की सभी निर्जीव वस्तुऍं भी सजीव हो उठीं हों!”
गोविन्द जी -“सीमा जी!आपकी बातें बिल्कुल सत्य हैं! बच्चों और परिवार से ही तो घर में रौनक आती है।हम पति-पत्नी तो अकेले घर के किसी कोने में उनकी यादों में सुबकते रहते हैं।”
सीमा जी -” मैं तो उदित बेटा को किसी भी सूरत में विदेश नहीं भेजना चाहती थी।आपकी जिद्द के कारण ही उसे विदेश जाने दिया।”
पत्नी की बातें सुनकर गोविन्द जी की ऑंखों में अश्कों का समंदर उमड़ पड़ा।वह अपनी मन: स्थिति पत्नी को कैसे समझाऍं?किन हालातों से बेबस होकर उन्हें अपने एकलौते बेटे को विदेश भेजना पड़ा था!ऐसा नहीं है कि उनकी पत्नी को उन बातों की जानकारी नहीं है, परन्तु किसी बात का पता होना और उसे यथार्थ में भोगना अलग-अलग है।अपने परिवार के साथ हुए हादसा एक बार फिर से उनकी ऑंखों के समझ उपस्थित होकर घूमने लगा।
गोविन्द जी के दादा जी जमींदार थे।समाज में उनकी बहुत इज्जत थी।गाॅंव में सभी की मदद के लिए उनका परिवार तत्पर रहता था।देश आजाद होने के बाद जमींदारी प्रथा समाप्त हो गई, परन्तु फिर भी उनके पूर्वजों के पास काफी जमीनें थीं।काफी समय तक उनके माता-पिता को संतानहीनता का दंश झेलना पड़ा।
काफी इलाज और मनौतियों के बाद भी उन्हें संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी।उनके माता-पिता ने गाॅंव के गरीब बच्चों की बेहतरी पर ही अपना ध्यान लगाना शुरू कर दिया। गाॅंव के लोग उन्हें काफी इज्जत और मान-सम्मान देते थे। एक दिन उनकी माता जी ने सपने में देखा कि कृष्ण -बलराम बाल रूप में उनके ऑंगन में खेल रहें हैं।उनकी माता जी ने हर्षित होते हुए यह बात अपने पति को बताई।
उनके पति बस आह भरकर रह गए।ईश्वर का चमत्कार या विधि का लेख! सचमुच कुछ समय बाद उनकी माॅं का सपना पूरा हुआ।सपना देखने के पूरे नौ माह बाद उनके बड़े भाई का जन्म हुआ और उसके छः साल बाद उनका जन्म हुआ।उस समय से उनकी माता कृष्ण भक्त बन गईं। उन्होंने बड़े बेटे का नाम गोपाल और छोटे का नाम गोविन्द रखा। दोनों बच्चे परिवार की छत्र-छाया में रहकर पढ़ाई के साथ-साथ पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों की शिक्षा पा रहें थे।
गोविन्द जी के दादाजी का देहांत हो चुका था।उनके पिता पारिवारिक मूल्यों में चार-चाॅंद लगा रहे थे। आस-पास के गाॅंवों में भी गोविन्द जी के पिता की कीर्तिपताका लहरा रही थी।उनके पास जितनी ही अधिक सम्पत्ति थी,उतने ही वे विनम्र स्वभाव के थे।इस कारण समाज के सभी तबकों में उनके परिवार की इज्जत थी।गरीब और जरूरतमंद उनके दरवाजे से कभी खाली हाथ नहीं लौटते।
समय अपनी गति से चल रहा था। गोविन्द जी के बड़े भाई गोपाल शहर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। गोविन्द जी गाॅंव के स्कूल में ही दसवीं की पढ़ाई कर रहे थे। माॅं में दोनों भाईयों की जान बसती थी।उस समय भी होली का त्योहार था।उनके घर में होली बहुत धूम- धाम से मनाई जाती थी।उनकी हवेली में होली की तैयारी महीनों से शुरू हो जाती थी।
उस होली में उनके सभी सगे-संबंधी होली मनाने आ चुके थे।वह होली उनके परिवार के लिए खास थी, क्योंकि होली के बाद उनके बड़े भाई गोपाल की सगाई होनेवाली थी।होली के दिन पूरा गाॅंव उनके दालान(दरवाजे)पर होली मनाने जुटा था।सभी मस्ती में छोटे के चेहरे पर गुलाल लगा रहें थे और बड़ों के पैर पर अबीर डालकर आशीर्वाद लेकर ठंडई(भाॅंग की शर्बत) पीकर झूमते हुए जोगीरा सारा-रा गाते हुए आगे जा रहें थे।
गोविन्द जी की तंद्रा भंग करते हुए सीमा जी नाश्ता करने के लिए आवाज देतीं हैं।पत्नी की आवाज से गोविन्द जी वर्त्तमान में लौट आते हैं।अपनी नम ऑंखों को पोंछकर नाश्ता करने लगते हैं।
नाश्ता करते हुए भी उनका मन अतीत की भयावह गलियों में भटक रहा था। नाश्ता करने के बाद उन्होंने पत्नी से कहा -“सीमा जी!अभी तो बच्चों के आने में समय है,तब तक मैं थोड़ी देर आराम कर लेता हूॅं।”
सीमा जी चिन्तातुर होते हुए पूछती हैं -“आपकी तबीयत तो ठीक है?”
गोविन्द जी-“आप चिंता मत कीजिए। मैं बिल्कुल ठीक हूॅं।बस थोड़ी देर आराम कर रहा हूॅं।”
सीमा जी उनके सर पर हाथ रखकर देखतीं हैं, फिर “ठीक है”कहकर अपने कामों में लग जाती हैं।
बिस्तर पर लेटे-लेटे गोविन्द की ऑंखों में अतीत की भयावह घटना तैरने लगती है।आह!कैसा हृदयविदारक दृश्य था! उनकी खुशियों भरी जिंदगी को पलक झपकते ही दुखों की कालिमा ने डस लिया था।वह हादसा पुनः उनके मन में ताज़ा जख्म की भाॅंति रिसने लगा।होली का त्योहार खुशी-खुशी संपन्न हो चुका था।अगले दिन उनके भाई के होनेवाली ससुराल से लोग आऍं हुए थे।उनके बड़े भाई गोपाल के चेहरे पर मंद-मंद मुस्कराहट और लज्जा थी। गोपाल के ससुराल वाले भी काफी इज्जतदार और संपन्न लोग थे। उन्होंने काफी धूम-धाम से सगुन की रस्में अदा कीं। आस-पास के गाॅंवों में सगाई की खबर आग की तरह फ़ैल चुकी थी कि सगाई में काफी सोना -चाॅंदी चढ़ाया गया है।लोग आपस में बढ़ -चढ़कर एक-दूसरे को सुना रहें थे।
सगाई की रस्म खत्म होने के बाद सभी रिश्तेदार लौट चुके थे।घर में केवल गोविन्द जी के माता-पिता, चाचा-चाची और गोविन्द जी दोनों भाई रह गए थे।होली और सगाई के बाद परिवार के सभी लोग थके हुए थे।सभी नौकर -चाकर उस दिन छुट्टी लेकर अपने घर जा चुके थे।
परिवार के लोग भी घर बन्द कर जल्द ही सोने चले गए थे।काफी समय से कुछ असमाजिक तत्व समाज में सर उठा रहें थे,जिसके कारण गोविन्द जी के पिता चिन्तित रहा करते थे।उस समय उनके क्षेत्र में नक्सलियों का बोलबाला हो चुका था।वे लोग गोविन्द जी के परिवार की जमीन पर कब्जा करने का प्रयास भी कर चुके थे, परन्तु प्रत्येक बार उनके पिता ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया था। प्रशासन और पुलिस भी उनके पिता का साथ देती थी।
उस दिन परिवार के सभी सदस्य जल्द ही सो गए थे। गोविन्द जी भी सपरिवार बेसुध सोऍं हुए थे। अचानक से आधी रात को नक्सलियों ने उनकी हवेली पर धावा बोल दिया।करीब बीस-पच्चीस गुण्डे अत्याधुनिक हथियारों से लैस थे।उनलोगों ने सबसे पहले उनकी हवेली के मजबूत दरवाजे को बम से उड़ा दिया और घर के अंदर प्रवेश कर गए।जबतक लोग कुछ समझ पाते,तबतक गुन्डों की हैवानियत शुरू हो चुकी थी।
गोविन्द जी अपने चाचा के साथ सोए हुए थे।उनके चाचा को अनहोनी का आभास हो चुका था। वे गोविन्द जी को खींचकर अनाज के बाखर (अनाज रखने की बाॅंस की कोठी)के पास ले गए और उसके अंदर छुपने को कहा। गोविन्द जी डर से थर-थर काॅंप रहें थे,
किसी तरह बाखर के अंदर घुस गए।चाचा ने बाखर को कपड़े से ढॅंक दिया।उसी समय एक बदमाश उनके चाचा को गला पकड़कर खींचते हुए बाहर ले गया। गोविन्द जी का दिमाग भय से सुन्न हो चुका था।वे बस गुन्डों की चिल्लाहट और गोलियों की आवाज सुन रहें थे।वे डर के मारे दम साधे छुपे हुए थे।
बदमाशों ने एक-एक कर उनके माता-पिता और चाचा-चाची को गोली मारी थी।उनका बड़ा भाई गोपाल इन दर्दनाक हत्याओं को देखकर बेकाबू हो चुका था। उसने अपनी हिम्मत दिखाते हुए एक बदमाश को बुरी तरह अपनी बाॅंहों में जकड़ लिया।वह बदमाश उसकी पकड़ से छूटने के लिए छटपटाने लगा।उसी समय दूसरे बदमाश ने क्रोधित होते हुए तलवार निकालकर एक ही झटके में गोपाल की गर्दन उड़ा दी।
बदमाशों ने अपनी तरह से पूरे परिवार की हत्या कर दी।सारे कीमती सामान लूटकर घर को तहस-नहस कर डाला। जाते-जाते क्रूर अट्टहास करते हुए घर में डायनामाइट लगाकर चले गए। आवाज शांत होने पर गोविन्द जी बाखर से बाहर निकल गए।सामने एक ओर उनके भाई का तिलक लगा हुआ
सर शरीर से अलग बेजान पड़ा हुआ था,दूसरी ओर कटे हुए गर्दन से रक्त के फव्वारे निकल रहे थे।ऐसी स्थिति में गोविन्द जी भाई के सिर को गोद में रखकर भावशून्य स्थिति में बैठे हुए थे।।बदमाशों के रहते गाॅंववाले बाहर आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहें थे।उनके जाते ही सभी गाॅंववाले हवेली की तरफ दौड़ पड़े।उनके साथ उनका पुराना नौकर हरि भी था।
गाॅंववाले हवेली में मौत का खौफनाक मंजर देखकर हतप्रभ थे।हवेली में मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था। एक साथ इतने शवों को देखकर कुछ क्षणों के लिए गाॅंववाले भी किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो उठे।इतनी बड़ी घटना तुरंत जंगल में आग की भाॅति चारों ओर फैले गई। पुलिस -प्रशासन त्वरित गति से अपराधियों की खोज में लग गया। पुलिस -प्रशासन,नेता, पत्रकार अचानक से सक्रिय हो उठे।
पुलिस ने तेजी दिखाते हुए कुछ गुण्डों को पकड़ भी लिया। जमीन का मालिकाना हक उनके मामा-मामी को सौंप दिया। जमीन की सुरक्षा की व्यवस्था भी प्रशासन की ओर से कर दी गई थी।यह वह दौर था ,जब भूमिपतियों और भूमीहीनों के बीच जमीन कब्जा करने को लेकर संघर्ष जारी था।
गोविन्द जी के सारे करीबी रिश्तेदार गाॅंव छोड़कर शहर पलायन कर चुके थे।उस हृदयविदारक घटना का बहुत बुरा असर गोविन्द जी के मनोमस्तिष्क पर पड़ा था।अकेले उन्होंने माता-पिता, चाचा-चाची और बड़े भाई को मुखाग्नि दी थी।उनका किशोर मन बुरी तरह भयाक्रांत हो उठा था।गोविन्द जी को उनके मामा अपने साथ रहने ले आऍं ।
उस घटना के बाद से गोविन्द जी का किशोर मन सहम-सा गया था, परन्तु मामा-मामी के स्नेह -दुलार ने उनके जख्मों पर मरहम का काम किया।समय पंख लगाकर अपनी गति से उड़ता रहा। गोविन्द जी पढ़ -लिखकर सरकारी अफसर बन गए।मामा ने इज्जतदार घराने में सीमा जी से उनकी शादी करा दी।मीठी नोंक-झोंक और समझदारी से उनके जीवन की गाड़ी
जीवन-पथ पर आगे बढ़ चली।उनके दिल का जख्म इतना गहरा था कि भरने का नाम ही नहीं लेता था। यदा-कदा वे खामोश और बहुत उदास हो जाता करते थे।उनकी उदासी और मायूसी से सीमा जी घबड़ा उठतीं।कई बार गोविन्द जी ने अपने गाॅंव जाने का मन बनाया, परन्तु वो हादसा उनकी ऑंखों के समक्ष तत्क्षण उपस्थित होकर उन्हें रोक देता।
अतीत की दुखद घटना बार-बार उनके मन में टीसें मारतीं रहतीं।बेटे उदित के जन्म के बाद से तो उनका दिल और कमजोर हो उठा। उन्हें हर पल बेटे की जान की चिन्ता रहती।इस कारण पत्नी के न चाहते हुए भी दिल पर पत्थर रखकर बारहवीं के बाद बेटे को पढ़ने के लिए विदेश भेज दिया।
कहते हैं कि वक्त बहुत बलवान होता है।काफी वक्त बीतने के बाद धीरे-धीरे उनके दिल पर उन कटु यादों पर धूल जमने लगी।एक-दो बार अकेले कुछ घंटों के लिए अपने गाॅंव भी हो आऍं।समय के साथ बेटे की भी शादी हो गई और पोता-पोती के दादा भी बन गए, परन्तुअब तक अपने परिवार को गाॅंव ले जाने की हिम्मत नहीं हुई।
कुछ समय से उन्हें अपने गाॅंव की बहुत याद आने लगी है,इस कारण उन्होंने सपरिवार होली में गाॅंव जाने का प्रोग्राम बनाया है। बच्चों के आने की शोर-गुल से उनकी तंद्रा भंग हो जाती है।वे उठकर बच्चों से मिलने चले जाते हैं।
गोविन्द जी बच्चों को गले लगाकर जी भर प्यार करते हैं।बच्चे भी दादा-दादी से मिलकर काफी खुश होते हैं।उनका बेटा उदित कह उठता है -“माॅं!खाने की खुशबू से भूख और तेज लगने लगी है!”
सीमा जी -“बेटा! तुमलोग फ्रेश हो जाओ,तब तक मैं खाना लगाती हूॅं।कुछ देर बाद आकर उनकी बहू अलका खाना लगाने में मदद करती है।सभी आपस में हॅंसी-मजाक करते हुए खाना खाने लगते हैं।उसी समय गोविन्द जी बेटा से अपने मन की बात कहते हैं -“उदित!इस बार मेरी इच्छा गाॅंव जाकर होली मनाने की है।
हाल में ही एक-दो बार गाॅंव गया हूॅं।अब समय बदल चुका है।सभी जगह अमन-चैन कायम हो चुका है।मेरी भी अब उम्र हो चली है।अपनी पुश्तैनी जमीन का सदुपयोग के बारे में भी सोचना है।होली के अगले ही दिन हम वापस लौट आएंगे!”
गाॅंव जाने की बात सुनकर सीमा जी के माथे पे थोड़ी -सी शिकन आ जाती है, परन्तु उनके पोता-पोती उत्साहित होते
हुए कहते हैं -“हम दादू का गाॅंव देखने अवश्य जाएंगे।”
उनकी बहू भी गाॅंव जाने को उत्सुक थी।
गोविन्द जी बच्चों के सर पर हाथ रखकर कहते हैं -“हम अवश्य आप सबों को गाॅंव ले चलेंगे।”
दो दिन बाद शंकित मन से गोविन्द जी सपरिवार गाॅंव के लिए रवाना हो गए।रास्ते में हरे-भरे लहलहाते हुए खेत ऐसे प्रतीत हो रहे थे,मानो प्रकृति ने हरी चादर ओढ़ रखी हो। वसंत ऋतु अपने पूरे यौवन पर थी। गुलाबी सर्दी के कारण मौसम खुशनुमा था। बच्चे उन दृश्यों को काफी मासूमियत के साथ निहार रहे थे।आम के बौर की मादक खुशबू और फूलों की मतवाली सुगंध से सभी भावविभोर हो रहे थे। आकाश में उड़ती रंग-बिरंगी चिड़ियाॅं को बच्चे कौतूहल से देखतरहे थे।उनका पोता कह उठता है -“दादू!एक दिन मैं भी चिड़ियाॅं की तरह आकाश में उड़ूॅंगा।”
गोविन्द जी पोता-पोती के सर पर हाथ रखकर कहते हैं -“हाॅं बच्चों!आप भी आसमां में उड़ सकते हो।एक दिन आप जरूर इस आसमां की बुलंदियों को छुओगे।”
कुछ देर बाद उनकी गाड़ी गाॅंव की सीमा में प्रवेश करती है। गाॅंव की मिट्टी की सौंधी सुगंध उनके नथुनों में समा जाती है। गाॅंव में पक्की सड़कें देखकर उत्साहित होते हुए गोविन्द जी कहते हैं -“बच्चों पहले तो हमारी जीप कच्ची सड़कों पर धूल उड़ाती चलती थी।हम धूल से नहा जाते थे।अब तो गाॅंवों में काफी तरक्की हो रही है। गाॅंवों में भी शहरों -सी सुविधाऍं मिलने लगीं हैं।आप सभी को कोई दिक्कत नहीं होगी।”
गोविन्द जी की बातें सुनकर सभी मुस्कराने लगें।
गाॅंव पहुॅॅंचते ही बहुत -से लोग मिलने आ पहुॅंचे।उन लोगों का जैसा आत्मीय व्यवहार उनके साथ था,वे लोग भी उनके साथ वैसा ही अपनत्व महसूस करने लगें। गाॅंव की महिलाओं ने भी सीमा जी और उनकी बहू को अपना भरपूर प्यार दिया।सभी लोगों से मिलकर गोविन्द जी को पुनः पुराने रिश्तों की गर्माहट महसूस होने लगी। उन्हें एहसास हो रहा था कि जो अपनापन गाॅंवों में है,वह शहरों में कहाॅं? शहरों में रंग-बिरंगी सुसज्जित दीवारों के सहारे भी तन्हाई काटना मुश्किल होता है, यहाॅं की खुरदरी और ऊबड़-खाबड़ जमीन में भी अपनत्व का एहसास है।अब उन्हें महसूस हो रहा था कि जीवन की सांध्य-वेला में अपनी मिट्टी से वंचित रहकर शहर में बिल्कुल तन्हा-से रह गए हैं।
जहाॅं कुछ असामाजिक तत्वों ने उनके परिवार पर ज़ुल्म ढ़ाऍं थे, वहीं आज गाॅंव के लोगों के प्यार -मुहब्बत से उनका दिल गदगद हो उठा। गाॅंवों में रिश्ते बनाने नहीं पड़ते हैं, यहाॅं खुद-ब-खुद रिश्ते निकल आते हैं।कुछ ही पलों में उनका घर पुराने नौकर-चाकर, पंडित -पुरोहित तथा सभी वर्णों के लोगों से भर जाता है।सभी समवेत स्वर में विनती करते हुए कहते हैं -“छोटे मालिक!आप इज्जतदार लोग हैं।हम सभी आपकी इज्जत करते हैं।अब आप गाॅंव छोड़कर मत जाओ।हम सभी आप लोगों की सुरक्षा में जान दे देंगे।”
गाॅंववालों से मिलकर गोविन्द जी पिता के कमरे में जाकर एक-एक चीज को बड़े प्यार से छूकर महसूस करतें हैं,मानो माता-पिता पिता के स्नेहसिक्त स्पर्श से भींग रहें हों।उनकी ऑंखों से अनायास ही अश्रु धारा बहने लगती है।
अगले दिन होली थी।सुबह से ही बड़ा ही मनमोहक वातावरण था।हवेली में तरह-तरह के पुऍं और पकवान बन रहें थे। चारों तरफ खुशबू की बारात छाई हुई थी। धीरे-धीरे लोग गोविन्द जी के यहाॅं जुटने लगें।जिस प्रकार गोविन्द जी के पिता होली दिन जरुरतमंदों को त्योहार मनाने के लिए कपड़े और सामान देते थे,उसी प्रकार गोविन्द जी भी सभी को देने लगें।उनके पोता-पोती उनके पहलू में बैठकर आश्चर्यचकित भाव से सभी कुछ देख रहें थे। वर्षों बाद उनके चेहरे पर आत्मसंतुष्टि के भाव नजर आते हैं।
होली पर्व के धूम-धाम से गाॅंव के साथ उनकी हवेली भी झूम उठी। उन्हें ऐसा एहसास हो रहा था कि अपनों के साहचर्य से उनके घर का कोना-कोना खुशियों की रोशनी से जगमगा उठा हो।रंग ने पूरे वातावरण को जैसे गुलालमय कर दिया हो। आखिर वर्षों बाद हवेली ने ऐसी रौनक देखी थी। इस बार की होली उनके परिवार के लिए यादगार होली बन गई।
होली समाप्त होने पर एक सप्ताह सपरिवार गाॅंव में रह जाते हैं।इन दिनों में वे बेटे के साथ मिलकर गाॅंव की समस्याओं का बखूबी अध्यन करते हैं।इसके पश्चात वे अपने बेटे से कहते हैं -“आदित्य! हमें अपनी जमीन का सदुपयोग करना है!”
आदित्य विस्मय से -“कैसे पिताजी?”
गोविन्द जी -“हम अपनी सारी जमीनें गाॅंव के विकास में लगा देंगे। यहाॅं अस्पताल का अभाव है। मैं अपने पिताजी के नाम पर अस्पताल खोलूॅंगा।”
उनके इस निर्णय से हर्षित होकर परिवार के सदस्य ताली बजाने लगतें हैं।
गाॅंव से विदा होते समय सभी लोग फूट-फूटकर रोने लगते हैं।एक वृद्ध रिश्तेदार उनके गले लगकर कहता है -“बेटा!इतने बड़े हादसे के बाद भी तुमने ग्रामीणों की समस्याओं पर ध्यान दिया।तुम सचमुच इज्जतदार खानदान के रोशन चिराग हो!”
ग्रामीणों के निश्छल और अपनेपन से गोविन्द जी का पूरा परिवार अभिभूत था। उन्होंने ग्रामीणों से हर साल होली में आने का वादा किया। अपनत्व के रस से सराबोर सपरिवार अपनी जन्मभूमि को प्रणाम कर नम ऑंखों से शहर वापस लौट गए।सभी के दिलों में खुशहाली की नई उम्मीदें रोशन हो रहीं थीं।
समाप्त।
लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)