“शर्मा जी, क्या गजब करते हैं आप भी! सुना है बड़ा बेटा विदेश में लाखों छाप रहा है और छोटा यहाँ सरकारी अफ़सर है, फिर भी आप इस तपती दुपहरी में फाइलों का बोझ उठाए घूम रहे हैं? लगता है बेटों की कमाई में बरकत नहीं है, या फिर बुढ़ापे में आपको नोट गिनने का शौक चढ़ गया है?”
पान की दुकान पर खड़े मोहल्ले के कुछ लोग खिलखिला कर हंस पड़े। बांकेलाल जी का यह तंज तीखा था, सीधा दिल पर लगने वाला। 65 वर्षीय रमाकांत शर्मा ने अपने पसीने से भीगे माथे को रूमाल से पोंछा और एक फीकी मुस्कान उनके चेहरे पर तैर गई। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपना पुराना चमड़े का बैग कंधे पर ठीक किया और आगे बढ़ गए।
रमाकांत जी रिटायर्ड अकाउंटेंट थे। पिछले छः महीनों से वे एक प्राइवेट फर्म में पार्ट-टाइम ऑडिटिंग का काम कर रहे थे। लोग बातें बनाते थे। कोई कहता कि बेटे कंजूस हैं, तो कोई कहता कि बुड्ढे को पैसे का लालच है। लेकिन रमाकांत जी के होंठों पर एक ताला जड़ा था, जिसकी चाबी शायद उन्होंने समुद्र में फेंक दी थी।
वे घर की ओर मुड़े। उनके कदम आज कुछ ज्यादा ही भारी लग रहे थे। शरीर थक चुका था, लेकिन मन की थकान उससे कहीं ज्यादा थी। वे जब अपनी सोसायटी के गेट पर पहुँचे, तो गार्ड ने सलाम किया, “साहब, आज बड़ी देर हो गई?” रमाकांत जी ने बस हाथ हिला दिया। बोलने की ताकत नहीं बची थी।
घर के अंदर घुसते ही एसी की ठंडक ने उन्हें थोड़ा सुकून दिया। यह एक आलीशान डुप्लेक्स था। हर चीज़ करीने से सजी हुई। गरीबी या तंगी का नामोनिशान नहीं था।
“पापा जी, आप आ गए?” बड़ी बहू, कविता, रसोइ से पानी का गिलास लेकर आई। “कितनी बार कहा है कि आप यह काम छोड़ दीजिए। लोग क्या कहते होंगे? हमें शर्म आती है पापा जी। सुमित (बड़ा बेटा) को पता चलेगा तो वो कितना नाराज होगा।”
रमाकांत जी ने पानी का गिलास हाथ में लिया ही था कि उनकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। “कुछ नहीं बेटा… बस थोड़ा मन बहल जाता है…” उनके शब्द लड़खड़ाए।
अचानक गिलास उनके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर पड़ा और चकनाचूर हो गया। रमाकांत जी सोफे की तरफ लपके लेकिन संतुलन नहीं बना पाए और वहीं कालीन पर ढेर हो गए।
“पापा जी!” कविता चीखी। “राहुल! जल्दी आओ, पापा जी गिर गए!”
राहुल, उनका छोटा बेटा, जो अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था, दौड़ता हुआ आया। माँ, सुमित्रा जी, भी पूजा घर से हड़बड़ाते हुए निकलीं। घर में कोहराम मच गया।
राहुल ने तुरंत नब्ज टटोली। “बीपी बहुत लो है। शायद लू लग गई है। जल्दी से डॉक्टर चाचा को फोन लगाओ।”
दस मिनट के अंदर पड़ोस के डॉक्टर देसाई आ गए। उन्होंने इंजेक्शन दिया और आराम करने की सलाह दी। “तनाव और शारीरिक श्रम। इस उम्र में यह जानलेवा हो सकता है। इन्हें पूर्ण विश्राम की ज़रूरत है,” डॉक्टर कहकर चले गए।
रमाकांत जी अब होश में थे, लेकिन आँखें बंद किए लेटे थे। सुमित, जो संयोगवश आज ही बिजनेस ट्रिप से लौटा था और ऊपर अपने कमरे में सो रहा था, शोर सुनकर नीचे आ गया था। उसे जैसे ही पता चला कि पिताजी काम से लौटते वक्त बेहोश हुए, उसका पारा चढ़ गया।
ड्राइंग रूम में सन्नाटा था, लेकिन यह तूफ़ान से पहले की शांति थी।
सुमित ने अपनी माँ की तरफ देखा। “माँ, यह क्या तमाशा है? मैं हर महीने घर खर्च के लिए पचास हज़ार भेजता हूँ। राहुल की सरकारी नौकरी है। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं है। फिर पापा को उस घटिया सी प्राइवेट कंपनी में धक्के खाने की क्या ज़रूरत है? मेरी रेपुटेशन का क्या? मेरे क्लाइंट्स पूछते हैं कि तुम्हारे पिता क्लर्क का काम क्यों करते हैं?”
सुमित्रा जी रो रही थीं। “मैंने बहुत समझाया बेटा, पर ये मानते ही नहीं। कहते हैं घर में मन नहीं लगता।”
राहुल भी सिर झुकाए खड़ा था। “भैया, मैंने भी पापा से कहा था कि अगर पैसे चाहिए तो मुझसे ले लो, पर वो सुनते ही नहीं।”
तभी रमाकांत जी ने आँखें खोलीं। उन्होंने हाथ के इशारे से सुमित को पास बुलाया। सुमित गुस्से में था, पर पिता की हालत देख पिघल गया। वह पास जाकर बैठ गया।
“पापा, क्यों करते हैं आप ऐसा? क्या कमी रखी है हमने?” सुमित ने रुआंसे होकर पूछा।
रमाकांत जी ने कुछ बोलने की कोशिश की, पर गला सूख रहा था। उन्होंने अपने कुर्ते की जेब की तरफ इशारा किया। “वो… वो डायरी…”
राहुल ने कुर्ते की जेब से एक छोटी सी लाल डायरी निकाली। डायरी पुरानी थी, उसके पन्ने मुड़े हुए थे।
“इसमें क्या है पापा?” राहुल ने पूछा।
रमाकांत जी ने बुदबुदाते हुए कहा, “पढ़ो… आखिरी पन्ना पढ़ो…”
राहुल ने डायरी खोली। आखिरी पन्ने पर कुछ हिसाब लिखा था और एक बैंक की रसीद रखी थी। राहुल ने जैसे ही रसीद देखी, उसका चेहरा फक पड़ गया। उसके हाथ कांपने लगे। उसने अविश्वास से पिता की ओर देखा।
“क्या हुआ राहुल? क्या है उसमें?” सुमित ने डायरी छीन ली।
सुमित ने रसीद देखी। वह पंद्रह लाख रुपये के लोन की आखिरी किश्त जमा करने की रसीद थी। और नीचे एक नोट लिखा था—“आज मेरे बेटे का स्वाभिमान पूरी तरह कर्ज़मुक्त हुआ।”
“लोन? पंद्रह लाख?” सुमित हैरान था। “पापा पर तो कोई कर्ज़ नहीं था। हमने तो घर कैश लिया था। यह किस चीज़ का लोन है?”
रमाकांत जी की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा, “यह मेरा कर्ज़ नहीं था बेटा… यह… यह राहुल का था।”
सबकी नज़रें राहुल पर गड़ गईं। राहुल अब घुटनों के बल बैठकर रो रहा था। कविता भी हैरान थी।
सुमित ने राहुल को कॉलर से पकड़ा, “तूने लोन लिया था? किसलिए? और मुझे बताया क्यों नहीं?”
रमाकांत जी ने सुमित का हाथ रोका। “उसकी गलती नहीं है सुमित। छोड़ उसे।”
फिर रमाकांत जी ने जो कहानी बताई, उसे सुनकर पूरे परिवार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
दो साल पहले, राहुल ने अपने दोस्तों के बहकावे में आकर शेयर बाज़ार में भारी पैसा लगाया था। उसे लगा था कि वह रातों-रात अमीर बन जाएगा और अपने बड़े भाई सुमित की तरह रईस हो जाएगा। उसने अपनी सरकारी नौकरी की साख पर पर्सनल लोन लिया और कुछ पैसे उधार भी लिए। लेकिन बाज़ार गिर गया और राहुल के सारे पैसे डूब गए।
उधार देने वाले लोग राहुल को परेशान करने लगे। वे ऑफिस आकर तमाशा करने की धमकी देते थे। राहुल आत्महत्या करने की सोचने लगा था। एक रात उसने यह बात रोते हुए अपने पिता को बताई।
रमाकांत जी ने उस रात राहुल से वादा लिया था कि वह यह बात सुमित को नहीं बताएगा।
“क्यों पापा?” सुमित की आँखों में आँसू और गुस्सा दोनों थे। “मैं उसका बड़ा भाई हूँ। पंद्रह लाख मेरे लिए बड़ी रकम नहीं थी। मैं एक चेक काटता और सब खत्म हो जाता। आपने खुद को क्यों इस आग में झोंका?”
रमाकांत जी उठकर बैठ गए। उन्होंने सुमित का हाथ अपने हाथों में लिया।
“बेटा, पैसे तो तुम दे देते। मुझे पता है। लेकिन उसके बाद क्या होता? तुम राहुल को हमेशा एक ‘नाकाम’ और ‘लापरवाह’ भाई की नज़र से देखते। और राहुल? राहुल हमेशा तुम्हारी एहसानमंदी के बोझ तले दबा रहता। भाई-भाई का रिश्ता बराबरी का होता है बेटा। अगर एक भाई दाता और दूसरा भिखारी बन जाए, तो उस रिश्ते में दरार आते देर नहीं लगती। मैं नहीं चाहता था कि मेरा छोटा बेटा अपने बड़े भाई से नज़रें मिलाने में कतराए।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ राहुल की सिसकियों की आवाज़ आ रही थी।
रमाकांत जी ने आगे कहा, “मैंने राहुल से कहा कि यह कर्ज़ मैं चुकाऊंगा, लेकिन मेरी शर्तों पर। मैंने अपनी जमा पूंजी तो दी ही, साथ ही यह नौकरी भी की। मैं चाहता था कि राहुल देखे कि एक पिता अपनी औलाद की गलती सुधारने के लिए किस हद तक जा सकता है। मैं उसे पैसे की नहीं, मेहनत की कीमत समझाना चाहता था। यह पिछले दो साल राहुल के लिए सजा भी थे और सबक भी।”
राहुल ने पिता के पैर पकड़ लिए। “पापा, मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। मैं रोज आपको थका हुआ देखता था और अंदर ही अंदर मरता था। मैंने कसम खाई है, आज के बाद मैं कभी शॉर्टकट नहीं लूँगा। आपकी एक-एक पाई मेहनत से चुकाऊंगा।”
सुमित अब तक चुप था। उसे अपने पिता का वह रूप दिखाई दे रहा था जो उसने कभी सोचा भी नहीं था। वह पिता, जिन्हें वह सिर्फ एक ‘रिटायर्ड बुजुर्ग’ समझता था, असल में वह परिवार की नींव बचा रहे थे। वे सिर्फ पैसा नहीं चुका रहे थे, वे दो भाइयों के बीच के स्वाभिमान और प्रेम को टूटने से बचा रहे थे। अगर सुमित ने पैसे दिए होते, तो शायद अनजाने में ही सही, वह राहुल को चार बातें सुना देता। लेकिन पिता ने ढाल बनकर सब कुछ अपने ऊपर ले लिया।
सुमित, जो हमेशा अपने पैसे और रुतबे के घमंड में रहता था, आज उसे अपना कद अपने पिता के सामने बहुत छोटा लग रहा था। वह भी फर्श पर बैठ गया और पिता के घुटनों पर सिर रख दिया।
“पापा, आपने हमें पालने के लिए पूरी जिंदगी काम किया। और अब जब आराम करने की उम्र थी, तब भी आपने हमारे लिए काम किया। आप हमें माफ कर दीजिए। हम नालायक हैं जो आपका दर्द नहीं समझ सके। मैं सोचता था आप पैसे के लालच में काम कर रहे हैं, जबकि आप तो परिवार जोड़ रहे थे।”
सुमित्रा जी, जो अब तक खामोश थीं, आगे बढ़ीं और उन्होंने रमाकांत जी के माथे से पसीना पोंछा। “आपने मुझे भी नहीं बताया? अकेले ही इतना बड़ा बोझ उठाते रहे?”
रमाकांत जी मुस्कुराए, इस बार उनकी मुस्कान में सुकून था। “अगर तुम्हें बताता तो तुम सुमित को बता देती। माँ का दिल है न, बेटे की परेशानी देखी नहीं जाती। पर कभी-कभी पिता को कठोर बनना पड़ता है, भविष्य संवारने के लिए।”
उन्होंने राहुल की ओर देखा। “राहुल, वो रसीद फाड़ दो। कर्ज़ खत्म हुआ। आज से नई शुरुआत करो। और याद रखना, पैसा फिर कमाया जा सकता है, पर इज्जत और भाई का प्यार एक बार चला जाए तो वापस नहीं आता।”
राहुल ने वह रसीद नहीं फाड़ी। उसने उसे अपनी डायरी में रख लिया। “नहीं पापा, यह रसीद मुझे जिंदगी भर याद दिलाएगी कि मेरे पिता मेरे लिए भगवान से भी बढ़कर थे।”
अगले दिन सुबह का नजारा बदला हुआ था।
रमाकांत जी जब सोकर उठे, तो देखा कि उनकी पुरानी ऑफिस वाली कुर्सी पर सुमित बैठा है और राहुल उनके पैरों की मालिश कर रहा है।
“अरे, यह क्या कर रहे हो?” रमाकांत जी ने टोका।
सुमित ने मुस्कुराते हुए एक लिफाफा उनके हाथ में थमाया। “पापा, यह मेरा रेजिग्नेशन लेटर नहीं है, लेकिन एक एग्रीमेंट है। मैंने एक नया ट्रस्ट खोला है बुजुर्गों के लिए। और आपको उसका चेयरमैन बनना है। काम बस इतना है कि आपको वहाँ जाकर हुक्म चलाना है, फाइलें नहीं ढोनी हैं। और राहुल वहाँ का अकाउंटेंट होगा, फ्री में सेवा करेगा अपनी गलती के प्रायश्चित के तौर पर।”
रमाकांत जी ने दोनों बेटों को गले लगा लिया।
शाम को जब रमाकांत जी बाल्कनी में बैठे चाय पी रहे थे, तो वही पड़ोसी बांकेलाल जी नीचे से गुज़रे। उन्होंने आदत के अनुसार ताना मारा, “क्या शर्मा जी! आज काम पर नहीं गए? छुट्टी मार ली क्या?”
इस बार जवाब रमाकांत जी ने नहीं, बल्कि सुमित ने दिया जो उनके बगल में खड़ा था। उसने बांकेलाल जी को हाथ हिलाकर कहा, “अंकल, मेरे पापा ने जिंदगी भर का काम पूरा कर लिया है। उन्होंने सिर्फ पैसे नहीं कमाए, उन्होंने एक ऐसा परिवार कमाया है जो अब उन्हें पलकों पर बिठाकर रखेगा। अब वो रिटायर नहीं हुए हैं, अब वो राजा की तरह राज करेंगे।”
बांकेलाल जी चुपचाप सरक लिए।
रमाकांत जी ने अपनी ‘पसंदीदा जगह’ से बाहर हरियाली को देखा। आज वह हरियाली उन्हें और भी ज्यादा हरी लग रही थी। उनके शरीर की थकान मिट चुकी थी, क्योंकि उनके मन का बोझ उतर चुका था। उन्होंने समझ लिया था कि एक पिता का काम कभी खत्म नहीं होता, बस उसका स्वरूप बदल जाता है। कभी वह उंगली पकड़कर चलना सिखाता है, तो कभी गिरते हुए को कंधा देकर उठाता है।
उस घर की दीवारों में अब कोई राज नहीं था, बस एक अटूट विश्वास की नींव थी जिसे एक बूढ़े पिता के पसीने ने सींचा था।
मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश
#भाई जैसा मित्र नहीं, ना भाई जैसा शत्रु