सेठ मोहन दास आज जयपुर के जाने माने मार्बल एक्सपोर्टर है. ये सब उनकी मेहनत का नतीजा था. उनका बेटा रोहित भी एम.बी.ए. करने के बाद पिताजी के साथ काम करने लगा था. रोहित के आने के बाद एक्सपोर्ट की नई उचाईयो क़ो छू लिया. वैसे रोहित के दादाजी की साइकिल रिपेयर की दुकान थीं
जो जयपुर के पास एक छोटे से शहर टोंक मैं थीं. मोहन ने पढ़ाई के बाद अपना मार्बल कटिंग का कारोबार शुरू किया और कारोबार जम जाने के बाद सब लोग जयपुर शिफ्ट हों गए. मोहन के पिताजी ने भी अपना काम बन्द कर दिया और बेटे के साथ जयपुर शिफ्ट हों गये.
रोहित के दादा जी अब घर पर ही रहते थे पर पूरे घर मैं आज भी उनकी ही चलती थीं. उनकी मर्जी के बिना कोई भी फैसला नहीं लिया जाता था. उन्हें अपनी दौलत का बहुत मान था. इसके विपरीत मोहन और रोहित दोनों एक दूसरे के दोस्त जैसे रहते थे.
रोहित ने एक दिन अपने पिताजी से बोला, पापा, एक लड़की है कोमल, मेरे साथ एम. बी. ए. मैं पड़ती थीं, हम दोनों एक दूसरे क़ो चाहते है, आप कहो तो आपसे मिलवा दूँ.
मोहन जी बोले, अरे, तू तो बहुत तेज निकला, तूने तो मेरी परेशनी ही खत्म कर दी. वेसे वो लोग कहाँ से है, क्या करते है. रोहित बोला की यही पास ही चोमू मैं उनका स्टोन ज्यूलरी का बिज़नेस है. अपने जैसी कमाई तो नहीं है पर काम काफ़ी अच्छा चलता है.
तब मोहन जी बोले, ऐसा करो, किसी संडे क़ो लंच या डिनर पर किसी होटल मैं मिल लेते है, या उनके घर चलते है, जैसा उन्हें उचित लगे, कोमल से बात कर लेना, तुम्हारी माँ क़ो भी मिलवा देंगे, आखिर रहना तो उसी के साथ है.
तुम तो अपने दादाजी क़ो जानते ही हों, अमीरी, गरीबी, जात पात, हैसियत वगैरह लेकर बैठ जायेगे, मैं अपने हिसाब से समझा लूँगा. ये केवल मुलाक़ात और जान पहचान होंगी, रस्मे वगैरह सब बाद में होती रहेगी.
एक रविवार मोहन अपनी पत्नि और बेटे के साथ कोमल और उसके माता पिताजी से मिलने चोमू गये. कोमल के पिताजी का दो मंजिला मकान बहुत बड़ा नहीं था पर उनके लिए 4 कमरे काफ़ी थे,
इंटीरियर और फर्नीचर लक्ज़री नहीं था फिर भी काफ़ी अच्छा था. खाना बहुत स्वादिस्ट था, खाने के बाद भी काफ़ी देर तक एक दूसरे के परिवार से कई विषयो पर बाते करते रहे और दोनों ही परिवार एक दूसरे से काफ़ी प्रभावित हुए. रोहित के माँ पिताजी क़ो कोमल और उसका परिवार पसन्द आ गया.
एक दिन खाना खाते समय मोहन जी ने अपने पिताजी क़ो कोमल की फोटो दिखाई और बोला, रोहित के लिए रिश्ता आया है, आप कहें तो उन्हें घर बुला ले. फोटो देखकर रोहित के दादाजी बोले, लड़की तो अच्छी है, पर परिवार कैसा है, क्या करता है, कहाँ से है, सब पता करलो, फिर बुलाना.
मोहन जी ने हामी भर दी. कुछ दिन बाद मोहन जी ने अपने पिताजी क़ो कोमल और उनके परिवार के बारे में बताया तो उन्होंने शादी के लिए मना कर दिया क्योंकि वो हमारी हैसियत के नहीं है. इस बात पर रोहित और मोहन दोनों बहुत मायूस हों गयें,
उस दिन के बाद से रोहित न ढंग से खाता पीता, न काम पर जाता, बस अपने कमरे मैं पड़ा रहता. रोहित के माँ पिताजी से बेटे की ये हालत देखी नहीं जा रही थीं, उन्होंने बेटे क़ो समझया की कुछ दिन सब्र कर, तेरी शादी कोमल से ही होंगी, ये मेरा वादा है. पिता के भरोसे ने रोहित क़ो काफ़ी हद तक सामान्य कर दिया और वो ऑफिस जाने लगा.
कुछ दिनों बाद दादाजी ने रोहित के लिए अपने किसी पहचान वाले रहीस परिवार की बेटी की फोटो दिखाई, लेकिन किसी ने फोटो क़ो देखने मैं कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखाई और साइड मैं रख दी. ये बात दादाजी क़ो बुरी लग गई और वो बोले शादी ब्याह अपने बराबर वालों की साथ ही अच्छी लगती है,
किसी भी गरीब खानदान से रिस्ता जोड़ने चलें हों. मोहन जी बेटे की शादी के लिए वैसे ही परेशान थे ऊपर से पिताजी की बात सुनकर उनका गुस्सा फूट पड़ा. वो बोले, पिताजी, अगर रोहित के नानाजी ने भी ऐसे ही हैसियत वाली ज़िद पकड़ ली होती तो आपकी भी शादी माँ से न होती, उनकी हैसियत आपसे कई गुना ज्यादा थीं.
हम सब आपकी इज्जत करते है इसका मतलब ये नहीं है की आप अपनी बात पर अड़े रहे और किसी न सुने. मोहन की बात सुनकर उनके पिताजी क़ो अहसास हुआ की बेटे की बात मैं सच्चाई तो है. उन्हें अपनी ज़िद क़ो छोड़ कोमल के रिश्ते क़ो स्वीकार करना पड़ा जिसमे सबकी खुशी थीं. रोहित और कोमल की शादी बड़ी धूम धाम से हों गई.
साथिओं, जीवन मैं पैसा आना जाना लगा रहता है, लेकिन पैसा आने के बाद अपने अतीत तो भुलाकर दूसरों क़ो कमतर समझने मैं कोई बुद्धिमानी नहीं है. घर के बुजुर्गो क़ो भी चाहिए की परिवारिक जिम्मेदारियों से खुद क़ो मुक्त कर ले, इसी मैं सबकी भलाई छिपी होती है.
लेखक
एम. पी. सिंह, कोटा
(Mohindra Singh )
स्वरचित, अप्रकाशित