हां हो गई हूं मैं स्वार्थी – मीनाक्षी गुप्ता

नीलम ने चुपचाप चाय का कप मेज पर रखा और उन कागजों को देखा जो उसके पति संजय ने सामने फैला रखे थे।

“नीलम, इन पेपर्स पर साइन कर दो। चिंटू का कनाडा का वीजा लग जाएगा और रिया की शादी भी तो धूमधाम से करनी है। आखिर यह जमीन हम साथ थोड़े ही ले जाएंगे?” संजय ने पेन बढ़ाते हुए कहा।

नीलम ने पेन नहीं पकड़ा। उसे कल रात की वे बातें याद आ रही थीं जो उसने अनजाने में सुन ली थीं।

चिंटू अपने दोस्त से फोन पर कह रहा था, “अरे एक बार मम्मी की जमीन बिक जाए, फिर मैं तो निकल जाऊँगा कनाडा। यहाँ इन बुड्ढों की सेवा कौन करेगा? वहाँ सेटल होकर साल में एक बार फोन कर लिया करूँगा, बहुत है।”

और रिया? वह अपनी सहेली से बातें कर रही थी, “मम्मी कितनी ओल्ड फैशन हैं, कहती हैं सादगी से शादी करो। अरे, वह जमीन के पैसे मिलेंगे तभी तो मेरा डेस्टिनेशन वेडिंग का सपना पूरा होगा। मम्मी का क्या है, उनको इतने पैसों की क्या जरूरत है? मम्मी-पापा की आगे की जिंदगी तो पापा की पेंशन पर भी कट जाएगी।”

नीलम का दिल उस वक्त टूटा नहीं, बल्कि पत्थर हो गया था।

उसने कागज़ दूर हटाए और कहा, “मैं साइन नहीं करूँगी।”

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। चिंटू झल्लाकर बोला, “मम्मी, आर यू सीरियस? मेरा पूरा करियर दांव पर है और आप अपनी जमीन बेचने से मना कर रही हैं, कितनी मतलबी हैं आप!”

रिया की आँखों में आँसू आ गए, “मम्मी, आपको मेरी खुशी से ज्यादा वह मिट्टी का टुकड़ा प्यारा है? अगर मेरी शादी उस लेवल की नहीं हुई तो मैं अपने दोस्तों को क्या मुँह दिखाऊँगी? मेरी कितनी बेइज्जती हो जाएगी। आप सिर्फ अपने बारे में सोच रही हैं, हमारे सपनों से आपको कोई मतलब नहीं, कितनी स्वार्थी हो गई हैं आप!”

नीलम अपनी जगह से उठी और शांति से बोली, “हाँ चिंटू, हाँ रिया… मैं स्वार्थी हो गई हूँ। और यह स्वार्थ मैंने तुम दोनों से ही सीखा है।”

संजय चिल्लाया, “नीलम! यह क्या बदतमीजी है?”

नीलम ने जवाब दिया, “बदतमीजी नहीं संजय, सच है। चिंटू, तुम विदेश जाकर यहाँ ‘बुड्ढों’ को अकेला छोड़ने की प्लानिंग कर चुके हो। और रिया, तुम्हें मेरी पूरी जिंदगी की जमापूँजी सिर्फ एक दिन की दिखावे वाली शादी में फूँकनी है।

तुम दोनों ने हमारे बुढ़ापे के बारे में कभी कुछ सोचा? अगर कल को मुझे कोई बीमारी हुई या कोई दुख-तकलीफ हुई या मुझे तुम्हारी जरूरत पड़ी, तो मैं कहाँ जाऊँगी? चिंटू, तुम तो कनाडा जाकर हमेशा के लिए वहीं रहने वाले हो, और रिया, तुम बताओ क्या भविष्य में तुम हमारी जिम्मेदारी लोगी?”

वह रुकी और फिर बोली, “यह जमीन मेरा सहारा है। इसे बेचकर मैं तुम दोनों की ‘अय्याशी’ पूरी नहीं करूँगी। चिंटू, पढ़ना है तो अपनी काबिलियत पर स्कॉलरशिप लाओ या एजुकेशन लोन लो। और रिया, शादी अपनी हैसियत के हिसाब से ही करनी चाहिए। यह जमीन मेरी है और मेरे पास ही रहेगी।”

सास अपने कमरे से बड़बड़ाईं, “कैसी माँ है, बच्चों का भला नहीं देख रही। सिर्फ अपने बारे में सोच रही है। अरे, एक माँ अपने बच्चों के लिए सब कुछ त्याग देती है और तुमसे एक जमीन का टुकड़ा नहीं छोड़ा जा रहा है। घोर कलियुग आ गया है!”

संजय ने भी कड़वाहट से कहा, “नीलम, अगर तुम यह प्लॉट नहीं बेचतीं, तो समझ लेना कि इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है। हम सब एक तरफ हैं और तुम्हारा स्वार्थ एक तरफ। जब तुम्हें अपने बच्चों की कोई परवाह नहीं है तो हमें भी तुमसे कोई मतलब नहीं है।”

नीलम ने सबकी बात मानने से इनकार कर दिया। अंत में संजय ने नीलम को धमकी दी कि अगर नीलम ने जमीन बेचने के कागज पर दस्तखत नहीं किए तो उसे घर छोड़कर जाना होगा। सब नीलम को भला-बुरा बोलते हुए अपने कमरे में चले गए।

नीलम ने उस रात रोने में वक्त बर्बाद नहीं किया। उसने अगले ही दिन बैंक से संपर्क किया। उस प्लॉट की कीमत इतनी थी कि उसे आसानी से ‘कंस्ट्रक्शन लोन’ मिल गया। घर वालों ने उससे बात करना बंद कर दिया था। वह घर में ही एक अजनबी बन गई थी। संजय ने नीलम को घर से निकलने को कह दिया। पूरा परिवार एक तरफ था और नीलम अकेली दूसरी तरफ।

नीलम की जमीन पर कंस्ट्रक्शन शुरू हो चुका था। उसने वहाँ “नीलम विला – गर्ल्स पीजी” की नींव रखी।

जब तक बिल्डिंग बन रही थी, नीलम ने वहीं किराए का कमरा लेकर रहना शुरू किया। कुछ समय बाद शहर के बीचों-बीच एक सुरक्षित गर्ल्स पीजी तैयार था। नीलम ने घर तो पहले ही छोड़ दिया था, अब वह वहीं के एक कमरे में शिफ्ट हो गई।

अब उसका रूटीन बदल चुका था। सुबह वह उन लड़कियों के साथ नाश्ता करती जो अलग-अलग शहरों से यहाँ अपने सपने पूरे करने आई थीं।

कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी, कोई यूपीएससी की तैयारी कर रही थी। नीलम के साथ वे सभी लड़कियाँ घुल-मिल गई थीं। नीलम भी सब लड़कियों का बहुत ध्यान रखती थी। एक बहुत ही अच्छा रिश्ता बन चुका था नीलम आंटी के साथ सब लड़कियों का। पीजी से होने वाली कमाई ने नीलम को आर्थिक रूप से मजबूत कर दिया था।

एक दिन चिंटू और संजय उससे मिलने आए। चिंटू का वीजा रिजेक्ट हो गया था क्योंकि उसके पास पर्याप्त फंड नहीं थे। रिया की शादी भी टल गई थी क्योंकि रिया को बहुत महंगी शादी करनी थी और संजय के पास इतना इंतजाम नहीं था। रिया अपने बजट में शादी के लिए तैयार ही नहीं हो रही थी।

संजय ने नीलम से कहा, “नीलम, चिंटू हमारा बेटा है। अगर तुम इस बिल्डिंग को बेच दो या इसे गिरवी रखकर लोन दिला दो, तो उसका काम बन जाएगा। आखिर चिंटू हमारा अपना खून है। तुम्हें गैर लोगों के साथ अपने खुद के बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए। इतना मतलबी होना सही नहीं है।”

नीलम ने अपनी कुर्सी पर टेक लगाई और शांति से उन्हें देखा। उसने कहा, “संजय, जिस दिन मैंने साइन करने से मना किया था, उस दिन चिंटू ने कहा था कि मैं ‘मतलबी’ हूँ। रिया ने कहा था कि वह मेरा मुँह नहीं देखेगी। उस दिन तुम सब मेरा ‘स्वार्थ’ देख रहे थे, लेकिन किसी ने मेरी वह ‘थकान’ नहीं देखी जो मैं पिछले 25 सालों से ढो रही थी।”

उसने चिंटू की तरफ देखा, “बेटा, अगर तुम्हें विदेश जाना है, तो खुद कमाओ या लोन लो। और तुम यहाँ रहकर भी आगे की पढ़ाई कर सकते हो, जितना मुझसे होगा मैं तुम्हारी मदद करूँगी। यह बिल्डिंग मेरी मेहनत और मेरे पिता की निशानी है। यह मेरा ‘स्वार्थ’ नहीं, मेरा ‘अस्तित्व’ है। मैं अब इसे किसी के दिखावे या ऐश के लिए दांव पर नहीं लगाऊँगी।”

जब वे दोनों खाली हाथ वापस जा रहे थे, नीलम ने उन्हें गेट तक छोड़ते हुए कहा, “और हाँ, रिया से कहना कि सादगी से शादी करने में कोई बुराई नहीं होती। जितना हमसे होगा हम उसकी शादी उस हिसाब से धूमधाम से करेंगे। इतना दिखावा क्यों करना है, किसलिए करना है? दिखावा करने से बेहतर है कि वह ये पैसे भविष्य के लिए बचा कर रखे।

कल को किसी तरह की परेशानी हुई तो दूसरों से माँगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब वह बड़ी हो गई है, उसे पैसों की अहमियत समझनी चाहिए। अगर उसे अपनी सादगी वाली शादी के लिए माँ का आशीर्वाद चाहिए, तो मेरा घर हमेशा खुला है। “

संजय ने चिढ़ते हुए कहा, “हमें तुम्हारा उपदेश नहीं सुनना! इस बिल्डिंग को बेचकर हमारी सब मुश्किलें हल हो सकती हैं। चिंटू विदेश जाएगा, रिया की आलीशान शादी होगी और मेरा…” संजय अचानक रुका, फिर झुंझलाकर बोला, “…और मेरा वह कर्ज भी उतर जाएगा

जो मैंने अपनी जरूरतों के लिए लिया था।” (नीलम जानती थी कि वह जरूरत नहीं, बल्कि संजय की जुए और सट्टे की लत का ‘काला कर्ज’ था जिसे उतारने के लिए वह उसके इकलौते सहारे को दांव पर लगा रहा था)। पर नीलम की आँखों में पत्थर जैसी दृढ़ता थी।

चिंटू गुस्से में पैर पटकते हुए चिल्लाया, “देख लिया पापा, मैंने कहा था न कि यह औरत किसी की सगी नहीं है। आज अपने ही बेटे को पराया कर दिया। चलिए यहाँ से, ऐसी माँ होने से तो अच्छा है कि इंसान अनाथ ही रहे।”

संजय ने भी कड़वाहट भरी नजरों से नीलम को देखा और जाते-जाते बोला, “आज तुमने साबित कर दिया नीलम कि तुम्हारे लिए दौलत रिश्तों से बढ़कर है। यह इमारत खड़ी करके तुम खुश तो हो लोगी, पर याद रखना कि अकेलेपन की आग में एक दिन तुम खुद ही जलोगी। बहुत बड़ी स्वार्थी और बेरहम औरत हो तुम।”

नीलम ने उनकी कड़वी बातों का कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस गेट बंद किया और गहरी सांस ली। उनकी बातें अब उसे जख्म नहीं दे रही थीं, बल्कि उसे आजाद कर रही थीं। उसने मुड़कर अपनी उस चमकती हुई बिल्डिंग को देखा जहाँ कई लड़कियाँ अपनी उड़ान भरने की तैयारी कर रही थीं।

नीलम अंदर आई और अपनी डायरी में लिखा— “हाँ, आज मैं स्वार्थी हूँ, और इस स्वार्थ में जो सुकून है, वह बरसों के त्याग में कभी नहीं था।”

समाप्त 

# स्वरचित एवं मौलिक 

मीनाक्षी गुप्ता

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