“मीरा, कल सुबह से तुम और सुमित अपनी रसोई अलग कर लोगे। ऊपर वाले फ्लोर पर छोटा किचन बना हुआ है, गैस और बर्तन मैंने रखवा दिए हैं। राशन का सामान कल सुमित ले आएगा। अब से तुम दोनों का खाना-पीना वहीं होगा।”
सावित्री देवी ने अपनी नई-नवेली बहू मीरा से यह बात इतने सपाट लहजे में कही, जैसे वो किसी को बाज़ार से सब्जी लाने का आदेश दे रही हों। मीरा के हाथ से चाय का कप लगभग छूटते-छूटते बचा। अभी शादी को सिर्फ बीस दिन हुए थे। हाथों की मेहंदी का रंग भी पूरी तरह फीका नहीं पड़ा था, और सासू माँ ने घर के बंटवारे का फरमान सुना दिया?
मीरा सन्न रह गई। वह एक आधुनिक ख्यालों वाली लड़की थी, लेकिन उसके संस्कार गहरे थे। वह पुणे के एक छोटे से परिवार में पली-बड़ी थी, जहाँ माता-पिता दोनों नौकरी करते थे और वह अक्सर घर में अकेली रहती थी। इसीलिए, जब उसकी शादी बनारस के इस प्रतिष्ठित और भरे-पूरे ‘त्रिपाठी सदन’ में तय हुई थी,
तो वह खुशी से फूली नहीं समाई थी। इस घर में सुमित के ताऊ जी, चाचा जी और उनका पूरा कुनबा साथ रहता था। लगभग पच्चीस लोगों का परिवार। मीरा को लगा था कि उसे वह प्यार और अपनापन मिलेगा जिसके लिए वह हमेशा तरसी थी।
लेकिन आज? आज सासू माँ ने उसे अलग कर दिया।
शाम को जब सुमित ऑफिस से आया, तो मीरा ने रोते हुए उसे यह बात बताई। सुमित भी हैरान था। वह दौड़कर अपनी माँ के पास गया।
“माँ, यह क्या है? मीरा रो रही है। लोग क्या कहेंगे? पन्द्रह दिन में ही बेटे-बहू को अलग कर दिया? क्या मीरा से कोई गलती हुई है? अगर हुई है, तो आप उसे डांट लीजिए, समझा लीजिए, लेकिन यूँ अलग तो मत कीजिए,” सुमित ने माँ के पैरों के पास बैठकर विनती की।
सावित्री देवी ने अपनी रामायण बंद की और चश्मा उतारकर बेटे को देखा। उनके चेहरे पर एक अजीब सी कठोरता थी, जो सुमित ने पहले कभी नहीं देखी थी।
“सुमित, मैंने जो फैसला लिया है, वह बदल नहीं सकता। कल से तुम दोनों ऊपर रहोगे। और हाँ, अपनी सैलरी का एक भी पैसा अब नीचे के घर में देने की ज़रूरत नहीं है। अपनी गृहस्थी खुद चलाओ। जाओ अब, मुझे पूजा करनी है।”
उस रात मीरा और सुमित के गले से निवाला नहीं उतरा। अगले दिन, भारी मन से उन्होंने ऊपर वाले फ्लोर पर अपनी गृहस्थी जमा ली।
मीरा का दिल टूट गया था। उसे नीचे से आती हंसी-ठिठोली की आवाज़ें सुनाई देतीं, और उसे लगता जैसे उसे सजा दी गई है। नीचे बड़ी ताई जी की बहुएं मिलकर खाना बनातीं, बच्चे आंगन में खेलते, चाचा जी राजनीति पर चर्चा करते—यह सब मीरा को बहुत आकर्षित करता था। उसे लगता कि सावित्री देवी शायद उससे नफरत करती हैं या उसे इस लायक नहीं समझतीं कि वह परिवार का हिस्सा बन सके।
एक हफ्ता बीत गया। मीरा ने देखा कि सावित्री देवी का व्यवहार विचित्र है। जब भी मीरा नीचे आती, सावित्री देवी उसे चाय पिलातीं, प्यार से बात करतीं, लेकिन जैसे ही घर का कोई और सदस्य आता, वे मीरा से रूखा व्यवहार करने लगतीं और उसे ऊपर भेज देतीं।
“जाओ बहू, ऊपर तुम्हारा काम होगा। यहाँ भीड़ मत बढ़ाओ,” वे अक्सर ताई जी या बुआ जी के सामने कह देतीं।
मीरा को अपमान महसूस होता, लेकिन सुमित उसे समझाता कि “माँ का स्वभाव ऐसा नहीं है, ज़रूर कोई बात है।”
धीरे-धीरे मीरा ने अपने “एकांतवास” (ऊपर की बालकनी) से नीचे के आंगन का निरीक्षण करना शुरू किया। और जो उसने देखा, उसने उसकी आँखें खोलनी शुरू कर दीं।
उसने देखा कि घर तो ‘संयुक्त’ था, लेकिन काम और खर्चे ‘संयुक्त’ नहीं थे। सुबह चार बजे उठकर सावित्री देवी (उसकी सासू माँ) अकेले पूरे घर के लिए चाय बनाती थीं। ताई जी और चाची जी दस बजे तक सोकर उठती थीं। घर के राशन का बिल, बिजली का बिल, यहाँ तक कि ताऊ जी के पोतों की स्कूल फीस भी सावित्री देवी के पति (मीरा के ससुर जी) की पेंशन और खेती की कमाई से जाती थी।
एक दिन दोपहर में, मीरा सीढ़ियों पर खड़ी थी। नीचे हॉल में ताऊ जी के बेटे, यानी सुमित के बड़े चचेरे भाई, विक्की भैया, सावित्री देवी पर चिल्ला रहे थे।
“चाची, यह क्या है? खाने में आज फिर लौकी? आपको पता है न मुझे पनीर पसंद है? और हाँ, मुझे पाँच हज़ार रुपये चाहिए, दोस्तों के साथ पार्टी में जाना है। चाचा जी से मांगकर दीजिए।”
सावित्री देवी ने सिर झुकाकर कहा, “बेटा, अभी तो परसों ही दिए थे। अब हाथ तंग है। तुम्हारे चाचा जी की दवाइयां भी आनी हैं।”
“अरे, तो सुमित की शादी में जो शगुन आया था, वो कहाँ गया? दबाकर बैठी हो क्या? यह संयुक्त परिवार है चाची, यहाँ सबका पैसा सबका होता है,” विक्की ने बदतमीजी से कहा और मेज पर रखा ग्लास पटक दिया।
ताई जी वहीं बैठी पान चबा रही थीं। उन्होंने बेटे को डांटने के बजाय सावित्री देवी से कहा, “अरे दे दे न सावित्री। लड़का है, जवान खून है। और वैसे भी, तेरा सुमित तो अब कमाता है, उससे मांग ले।”
मीरा का खून खौल उठा। वह नीचे जाने ही वाली थी कि उसने सावित्री देवी का जवाब सुना।
“सुमित अब अलग रहता है दीदी। उसकी रसोई अलग है, खर्चा अलग है। मैं उससे पैसे नहीं मांग सकती। और मेरे पास अब और पैसे नहीं हैं।”
विक्की बड़बड़ाता हुआ चला गया। ताई जी और चाची जी ने मुंह बनाया और अपने कमरों में चली गईं। सावित्री देवी चुपचाप बिखरे हुए कांच के टुकड़े उठाने लगीं।
मीरा की आँखों से पर्दा हट चुका था। उसे समझ आ गया कि यह ‘भरा-पूरा परिवार’ असल में एक ऐसा दलदल था जो सावित्री देवी और उनके पति को सालों से चूस रहा था। यहाँ प्यार नहीं, परजीविता (parasitism) थी।
शाम को एक और घटना हुई। बुआ जी (सुमित की बुआ) अपने परिवार के साथ धमक पड़ीं। आते ही फरमाइशें शुरू हो गईं।
“अरे सावित्री, सुना है नई बहू बहुत सुंदर है। और खूब दहेज भी लाई है। बुला ज़रा उसे, मेरी बेटी के लिए भी कुछ साड़ियाँ पसंद कर लूँ। और हाँ, सुमित की सैलरी तो अब अच्छी होगी, तो जाते वक्त हमें शगुन अच्छा मिलना चाहिए।”
सावित्री देवी, जो अब तक थकी हुई लग रही थीं, शेरनी की तरह खड़ी हो गईं।
“जीजी, बहू ऊपर रहती है। उसकी तबीयत नासाज़ है, वो नीचे नहीं आएगी। और सुमित की सैलरी पर उसका और उसकी बीवी का हक़ है। मैंने उनका बंटवारा कर दिया है। वो अपना कमाते हैं, अपना खाते हैं। मेरे पास देने को सिर्फ़ चाय-पानी है, वो ग्रहण करें।”
बुआ जी का मुंह खुले का खुला रह गया। “बंटवारा? नई बहू के आते ही घर फोड़ दिया तूने? कलमुंही है तेरी बहू, जिसने आते ही माँ-बेटे को अलग कर दिया।”
“जो कहना है कहिए जीजी,” सावित्री देवी ने दृढ़ता से कहा। “पर मैं अपनी बहू की कमाई और उसके गहनों पर इस घर की गिद्ध-दृष्टि नहीं पड़ने दूँगी। मैंने पूरी ज़िंदगी इस ‘संयुक्त परिवार’ के नाम पर अपनी इच्छाओं की बलि दी, अब अपनी बहू की नहीं देने दूँगी।”
मीरा, जो सीढ़ियों के पीछे छिपी सब सुन रही थी, अपने आंसुओं को रोक नहीं पाई। वह जिसे अपनी सासू माँ की निष्ठुरता समझ रही थी, वह दरअसल उनका ‘सुरक्षा कवच’ था। सावित्री देवी ने बदनामी का टीका अपने माथे पर लगाकर मीरा और सुमित के भविष्य को सुरक्षित कर दिया था। उन्होंने मीरा को अलग इसलिए नहीं किया था क्योंकि वे उससे प्यार नहीं करती थीं, बल्कि इसलिए किया था क्योंकि वे उसे इस शोषण से बचाना चाहती थीं।
मीरा दौड़कर ऊपर गई। उसने अपना चेहरा धोया और एक दृढ़ निश्चय किया।
शाम को जब बुआ जी और बाकी रिश्तेदार हॉल में बैठे सावित्री देवी को ताने मार रहे थे—”कैसी सास है, बहू को सिर पर चढ़ा रखा है,” “अलग कर दिया,” “नाक कटवा दी”—तभी मीरा एक बड़ी सी थाली में चाय और नाश्ता लेकर नीचे उतरी।
सब चौंक गए। मीरा ने साड़ी का पल्लू करीने से सिर पर रखा हुआ था। वह बुआ जी के पास गई और उनके पैर छुए।
“अरे, तू तो कह रही थी तबीयत खराब है?” बुआ जी ने व्यंग्य किया।
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “बुआ जी, बड़ों का आशीर्वाद मिले तो तबीयत अपने आप ठीक हो जाती है।”
फिर वह सावित्री देवी के पास गई। सावित्री देवी की आँखों में घबराहट थी। वे शायद सोच रही थीं कि मीरा कहीं उनका भंडाफोड़ न कर दे या सबके सामने लड़ न पड़े।
मीरा ने सबके सामने सावित्री देवी के हाथ थाम लिए और ऊँची आवाज़ में बोली, “आप लोग मेरी सासू माँ को गलत समझ रहे हैं। इन्होंने हमें अलग करके मुझे पराया नहीं किया, बल्कि मुझे ‘गृहलक्ष्मी’ बनना सिखाया है। और हाँ, रसोई अलग होने का मतलब यह नहीं कि रिश्ते अलग हो गए।”
फिर मीरा ने अपनी ताई सास और चाची सास की ओर देखकर मीठे जहर जैसा तीर छोड़ा।
“ताई जी, चाची जी, आप लोग तो घर की बड़ी हैं। मम्मी जी की उम्र हो गई है, उनसे अब इतना काम नहीं होता। डॉक्टर ने उन्हें सख्त आराम (Bed rest) की सलाह दी है। इसलिए, आज से मम्मी जी का खाना भी मैं ही बनाऊंगी। वो ऊपर मेरे साथ ही खाना खाएंगी। और घर के बाकी काम… मुझे यकीन है कि विक्की भैया की पत्नी और आप लोग मिलकर संभाल ही लेंगे। आखिर यह ‘संयुक्त परिवार’ है, है न? काम भी संयुक्त रूप से होना चाहिए।”
हॉल में सन्नाटा छा गया। ताई जी और चाची जी के चेहरों का रंग उड़ गया। सावित्री देवी को आराम? और काम उन्हें करना पड़ेगा?
मीरा यहीं नहीं रुकी। “और बुआ जी, सुमित कह रहे थे कि घर की मरम्मत के लिए पैसों की ज़रूरत है। तो हमने सोचा कि चूंकि हम ऊपर अलग रहते हैं, तो नीचे के घर का खर्चा और मेंटेनेंस ताई जी और चाची जी के बेटे मिल-बांटकर उठा लेंगे। आखिर सुमित अकेले कब तक बोझ उठाएगा? है न?”
रिश्तेदार बगलें झांकने लगे। जो लोग अभी तक ‘संयुक्त परिवार’ की दुहाई दे रहे थे, जैसे ही जिम्मेदारी और खर्च की बात आई, सब खिसकने के बहाने ढूंढने लगे।
“अरे… हमें तो देर हो रही है,” बुआ जी उठीं।
“हाँ, विक्की के पापा बुला रहे होंगे,” ताई जी भी खिसक लीं।
थोड़ी देर में हॉल खाली हो गया। वहां सिर्फ़ सावित्री देवी, मीरा और सुमित (जो अभी ऑफिस से लौटा था और दरवाजे पर खड़ा मुस्कुरा रहा था) रह गए।
सावित्री देवी ने मीरा को देखा। उनकी आँखों में आज आंसू थे।
“पगली, तूने यह क्या किया? अब पूरा खानदान मेरे खिलाफ हो जाएगा।”
मीरा ने सावित्री देवी के गले लगते हुए कहा, “होने दीजिए माँ। जो लोग आपको सिर्फ़ काम करने वाली मशीन समझते हैं, उनका खिलाफ होना ही अच्छा है। आपने मुझे बचाने के लिए बदनामी ली, तो क्या मैं आपके लिए ढाल नहीं बन सकती?”
सुमित ने आगे बढ़कर माँ के पैर छुए। “माँ, मुझे माफ़ करना। मैं समझ ही नहीं पाया कि आप किस घुट-घुट कर जी रही थीं। मीरा ने आज मुझे आपकी खामोशी का मतलब समझा दिया।”
सावित्री देवी ने दोनों को गले लगा लिया।
“पर बहू,” सावित्री देवी ने आंसू पोंछते हुए कहा, “तूने तो कह दिया कि मैं ऊपर खाना खाऊंगी, पर नीचे तो…”
“नीचे जो पकाएगा, वो खाएगा माँ,” मीरा ने हंसते हुए कहा। “अब से आप ‘ड्यूटी’ पर नहीं हैं, आप ‘रिटायरमेंट’ पर हैं। आपका बेटा और बहू हैं न आपको संभालने के लिए।”
उस दिन के बाद त्रिपाठी सदन में एक नई व्यवस्था शुरू हुई। ताई जी और चाची जी को मजबूरन रसोई में जाना पड़ा क्योंकि सावित्री देवी अब “बीमार” (मीरा के कहने पर) रहने लगी थीं। विक्की और अन्य चचेरे भाइयों को अपनी अय्याशियों के लिए पैसे मिलने बंद हो गए, तो उन्हें भी नौकरियां ढूंढनी पड़ीं।
मीरा और सावित्री देवी की रसोई भले ही ऊपर थी, लेकिन शाम की चाय दोनों सास-बहू अपनी बालकनी में बैठकर पीती थीं, नीचे के आंगन में हो रही भागदौड़ को देखकर मुस्कुराती थीं।
मीरा ने सही कहा था—कभी-कभी जुड़ने के लिए थोड़ा अलग होना ज़रूरी होता है। सावित्री देवी ने जो लकीर खींची थी, उसने घर नहीं तोड़ा था, बल्कि उस घर की नींव को खोखला होने से बचा लिया था। और मीरा? मीरा को वह बड़ा परिवार तो नहीं मिला जिसकी उसने कल्पना की थी, लेकिन उसे एक ऐसी ‘माँ’ मिल गई थी जो उसके लिए दुनिया से लड़ गई थी। और यह किसी भी भरे-पूरे परिवार से कहीं ज्यादा कीमती था।
मूल लेखिका
हेमलता गुप्ता