“रानो,रानो बहू कहाँ हो? सुनो तो जरा |” विमलादेवी सत्संग से आकर अपनी बहू रानो को खोज रही थी |
“यहीं हूँ,माँजी” चाय लेकर आते हुए रानो ने कहा |
दोनों चाय पीने लगी | चाय पीते-पीते विमलादेवी ने कहा “रानो परसों सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक सूर्य-ग्रहण है | इस बीच कुछ खाना-पीना नहीं है | दोष लगता है| ग्रहण शुद्ध होने के बाद ही नहा-धोकर भगवान की पूजा और खाना-पीना होगा |”
“जी माँजी, जैसा आप कहेंगी वैसा ही होगा |” रानो ने कहा | हालाँकि वह जानती है कि ग्रहण एक खगोलीय घटना है और इस दौरान खाने-पीने या भगवान की पूजा करने में कुछ गलत नहीं है | लेकिन माँजी की बात काटकर वह उनका दिल नहीं दुखाना चाहती थी |
“निवि नहीं आयी अभी तक 5 बजने आये |” विमलादेवी ने चिंतित होते हुए कहा |
“माँजी, आज उसके स्कूल में सामान्यज्ञान की प्रतियोगिता है,आने वाली ही होगी |” रानो के ये कहते-कहते ही निवि हाथ में सर्टिफिकेट लिए दौड़ती हुई आई और “हुर्रे! मैं जीत गयी” कहते हुए विमलादेवी के गले में झूल गयी |
“दादी,आपको पता है मैं उन 20 स्टूडेंट्स में सेलेक्ट हुई हूँ जो परसों प्लैनेटेरियम में चीफ-मिनिस्टर के साथ सोलर एक्लिप्स (solar eclipse) देखने जाएँगे|” उसने उछलते हुए कहा |
“बहुत खुशी की बात है लाडो, पर ये सोलर एक्लिप्स क्या होता है?” विमलादेवी ने पूछा |
“सूर्य ग्रहण” दूध पीते हुए निवि ने कहा | “मैं सूर्य ग्रहण देखने मुख्यमंत्री के साथ जाऊँगी,दादी |”
“क्या ग्रहण देखने जाएँगी | बावली हो गई है क्या? आंखें खराब हो जाएँगी | कहीं नहीं जाना है समझी |” विमलादेवी ने डाँटते हुए कहा |
“पर डायरेक्ट, मेरा मतलब सीधे थोड़ी ना देखूँगी | दूरबीन से देखूँगी | प्लीज,जाने दो ना दादी | कितने बच्चों ने ट्राय किया था लेकिन सिर्फ 20 ही सेलेक्ट हुए है|” निवि ने जिद करते हुए कहा |
“ना, बिल्कुल ना | कहीं नहीं जाना है समझी | रानो इसे अच्छी तरह समझा दे |” विमलादेवी ने गुस्से से कहा |
“पर माँजी” रानो ने कुछ कहना चाहा |
“देख बहू, मुझे इस बारे में कोई बहस नहीं करनी |” विमलादेवी ने गुस्साते हुए कहा |
तभी उनके बेटे आलोक की आवाज़ आई |
“माँ, रानो कहाँ हो सब?”
“यहीं हैं, क्या हुआ? विमलादेवी ने पूछा |
“माँ, मेरे कुछ विदेशी ग्राहक (foreign clients) यहाँ दिल्ली आए हुए हैं | उन्हें राजस्थानी खाना बहुत पसंद है | इसीलिए मैंने उन्हें लंच पर बुलाया है | तुम अपनी स्पेशल दाल-बाटी जरूर बनाना |”
“हाँ-हाँ बना दूँगी | पर कब आ रहे हैं यह तो बता |” विमलादेवी ने पूछा|
“परसों 1 बजे | रानो, कल ही सब तैयारियाँ कर लेना | कोई कमी नहीं होनी चाहिए उनके स्वागत में|” आलोक ने कहा |
“क्या कहा परसों!” विमलादेवी ने चौंकते हुए कहा |
“हाँ,माँ परसों” आलोक ने हामी भरी |
“पर परसों तो ग्रहण है | ग्रहण में खाना-पीना कैसे होगा? तू उन्हें किसी और दिन बुला ले |” विमलादेवी ने कहा |
“लेकिन माँ, परसों शाम को ही वे लौट रहे हैं और कल उन्हें दूसरी जगह जाना है | किसी और दिन संभव नहीं है | रही बात ग्रहण की तो ये एक खगोलीय घटना है और खाने-पीने से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है |” आलोक ने समझाया |
“वो सब मैं नहीं जानती लेकिन ग्रहण में खाना न बनेगा न खाया जायेगा, समझा |” विमलादेवी ने गुस्से से कहा |
“माँ गजब करती हो,अब सामने से निमंत्रण देकर मना कैसे करूँ? बुरा मान जाएँगे | हद होती है हर चीज की |” आलोक ने झुँझलाते हुए कहा|
“हाँ-हाँ, अब तो मैं, मेरी बातें सभी पुरानी लगेगी | लेकिन एक बात कान खोलकर सुन लो दोनों बाप-बेटी जब तक मैं हूँ तब तक नियम-धर्म-ग्रहण सब मानने होंगे|” विमलादेवी गुस्से से बोली |
“माँजी, आप शांत हो जाइये | आपकी तबीयत खराब हो जाएगी| जैसा आप कहेंगी वैसा ही होगा |” विमलादेवी को शांत कराते हुए रानो ने कहा |
फिर निवि और आलोक के पास जाकर बोली “माँजी से बहस करने या उनका दिल दुखाने से कोई समाधान नहीं निकलेगा | हमें माँजी को समझाना होगा | उनके अंधविश्वास को दूर करने का प्रयास करना होगा| मुझे एक बार ट्राय तो करने दीजिये |”
“अगर फिर भी माँ नहीं मानी तो |” आलोक ने चिढ़ते हुए कहा |
“तो क्या? ये कोई लास्ट ऑपरच्युनिटी तो नहीं है आप दोनों के लिए | लाइफ में ऐसे बहुत से मौके मिलेंगे आपको |अबतक कितनी जिद पूरी की है माँजी ने आप दोनों की, तो क्या आप लोग माँजी की एक बात का मान नहीं रख सकते |” रूम से बाहर जाते हुए रानो ने कहा |
दूसरे दिन, “माँजी जल्दी से तैयार हो जाइये | पिक्चर देखने चलेंगे |” रानो ने कहा |
“कौन सी?” पिक्चर देखने की शौकीन विमलादेवी ने पूछा |
“सरप्राइज है |” रानो ने हँसते हुए कहा और विमलादेवी को लेकर प्लैनेटेरियम पहुँच गई|
थोड़ी ही देर में वहाँ के थिएटर में सोलर एक्लिप्स पर स्पेशल 3D शो शुरू हो गया |
“रानो ये कैसी पिक्चर है?” विमलादेवी ने चौंकते हुए कहा |
“माँजी, ये हमारी धरती, सूर्य और चन्द्रमा के बारे में है | आपको बहुत पसंद आएगी | आप देखिये तो |” रानो ने कहा |
धीरे-धीरे विमलादेवी को भी शो देखने में मज़ा आने लगा | नीली धरती और लाल दहकता सूर्य उन्हें लुभाने लगा | शो के बाद उन्होंने रानो के साथ ब्रह्माण्ड और विभिन्न ग्रहों के मॉडल भी देखे | ये सब देख सुनकर उन्हें बहुत अच्छा लगा |
घूम-फिर कर वे दोनों घर आ गई | शाम को निवि के स्कूल से लौटने पर विमलादेवी ने पूछा “लाड़ो, तुम्हें कल कितनी बजे जाना है ग्रहण देख़ने?”
ये सुनकर निवि चौंक गई | “9 बजे, पर आप गुस्सा मत होइये दादी | मैं नहीं जाऊँगी |”
“क्यों ना जाएँगी? जरूर जाना | अब मैं समझ गई हूँ कि ग्रहण में कोई राहु-केतु ना खाए है सूरज को, ये तो चाँद आ जाए है सूरज और धरती के बीच में और अँधेरा छा जाए है | है ना रानो, सही कह रही हूँ ना |” विमलादेवी ने हँसते हुए कहा |
“हाँ-हाँ दादी बिल्कुल सही |” रानो के बोलने से पहले ही निवि दादी के गले लग बोल पड़ी |
“और हाँ आलोक बेटा, तू चिंता मत कर | कल तेरे मेहमानों के लिए स्पेशल दाल-बाटी मैं ही बनाऊँगी |” विमलादेवी ने कहा |
“थैंक्यू माँ,” कहते हुए आलोक विमलादेवी से लिपट गया |
“अरे बावले! थैंक्स बोलना है तो रानो को बोल |” कहते हुए उन्होंने रानो को गले लगा लिया |
लेखिका-श्वेता अग्रवाल, धनबाद, झारखंड
शीर्षक- ग्रहण
कैटिगरी-लेखक/लेखिका बोनस प्रोग्राम