अचानक से मोबाइल का स्क्रीन चमका और एक मैसेज आया
“माँ, बाबा… इस बार नहीं आ पाएँगे। ऑफिस में बहुत काम है।”
मैसेज उनका बेटा अमित भेजता था—हर बार वही कारण, हर बार वही दूरी।
धनिया ने चुपचाप फोन रख दिया। फिर भी वह हँसने की कोशिश करते हुए बोली,
“काम तो होता है बेटा… शहर में लोग बड़े व्यस्त रहते हैं।”
अमित के पिता हरिहर ने आँगन की ओर देखते हुए कहा,
“व्यस्त रहते हैं या… हमें भूल गए हैं?”
धनिया चौंक गई। वह हरिहर को ऐसा कहते कम ही सुनती थी। हरिहर कभी शिकायत नहीं करते थे। पर इस बार उनकी आवाज़ में एक दर्द थी। वह बोले नहीं, बस एक लंबी साँस लेकर उठे और गोशाले की तरफ चले गए। धनिया ने देखा—उनकी चाल में उम्र का बोझ कम, चिंता का भार ज़्यादा था।
घर में पोते की बातें रोज़ होती थीं। पोता—आरव—जिसका चेहरा उन्होंने बस फोटो में देखा था। जब आरव पैदा हुआ था तब भी अमित और बहू नेहा गाँव नहीं आए थे। “डिलीवरी के बाद ट्रैवल ठीक नहीं है,” कहकर टाल दिया। हरिहर ने तब भी कुछ नहीं कहा था। धनिया ने तब भी समझाया था—“अभी नए-नए माता-पिता बने हैं, डरते होंगे…”
पर साल बीतते गए, दूरी बढ़ती गई।
फिर एक दिन धनिया ने व्हाट्सएप पर एक फोटो देखी। आरव का स्कूल में जन्मदिन मन रहा था—सिर पर रंगीन कैप, हाथ में चॉकलेट, आसपास बच्चे हँस रहे थे। नीचे लिखा था—“काउंटडाउन शुरू! इस बार घर पर ग्रैंड बर्थडे!”
धनिया की आँखें चमक उठीं। उसने हरिहर को आवाज़ दी।
“सुनिए… आरव का जन्मदिन आने वाला है… और इस बार घर पर बड़ा फंक्शन है!”
हरिहर ने फोटो ध्यान से देखा। उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान उभरी, फिर तुरंत गायब हो गई।
“कहाँ हमें बुलाएँगे?” उन्होंने धीमे से कहा।
धनिया ने थोड़ी देर चुप रहकर, जैसे खुद को समझाते हुए कहा,
“बुलाएँ या न बुलाएँ… हम तो चले जाते हैं। अपने पोते का जन्मदिन है… हमारी भी तो कोई खुशी है।”
हरिहर ने आश्चर्य से देखा।
“अकेले? शहर? इतनी दूर?”
धनिया की आँखें भर आईं।
“अकेले नहीं… हम दोनों। चुपके से। किसी को बताए बिना। बस… एक झलक देख लेंगे। दुआ दे देंगे।”
हरिहर लंबे समय तक कुछ नहीं बोले। फिर धीरे से बोले,
“अगर उन्हें बुरा लगा तो?”
धनिया ने हाथ जोड़ दिए,
“तो हम वापस आ जाएँगे। लेकिन अगर हम अब नहीं गए… तो पता नहीं कब तक ये आँखें आरव को बस फोटो में ही देखती रहेंगी…”
उस रात दोनों ने निर्णय कर लिया। जैसे बूढ़े पेड़ भी कभी-कभी अचानक नई कोंपलें निकाल देते हैं, वैसे ही उनके भीतर भी एक छोटा सा हौसला जाग उठा। उन्होंने पुराने ट्रंक से अपने अच्छे कपड़े निकाले, हरिहर ने अपनी धोती-कुर्ता ठीक से तह किया, धनिया ने साड़ी के पल्लू में पोते के लिए एक छोटा-सा चाँदी का कड़ा और घर की बनी गुड़ की रेवड़ी बाँध दी।
उन्होंने किसी को नहीं बताया। गाँव में कह देते तो लोग सवाल पूछते, सलाह देते, और उनके भीतर का यह साहस शायद डर में बदल जाता।
अगली सुबह वे बस में बैठे। बस की खिड़की से खेत पीछे छूटते गए। हरिहर खिड़की के बाहर देखते रहे, और धनिया अपने पर्स में रखी आरव की फोटो बार-बार निकालकर देखती रही, जैसे उस फोटो को देखकर दिल को ताकत मिल रही हो।
शहर पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई। ऊँची-ऊँची इमारतें, चमकते बोर्ड, तेज़ आवाज़ें—सब कुछ उनके लिए नया नहीं था, पर फिर भी हर बार शहर उन्हें छोटा कर देता था। यहाँ लोग किसी को देखते नहीं, बस निकल जाते हैं।
अमित के घर पहुँचकर उन्होंने घंटी बजाने से पहले ही हाथ कांपते महसूस किए। धनिया ने धीरे से कहा,
“अब तो आ ही गए हैं।”
दरवाजा खुला। अमित सामने था। एक पल को वह ठिठक गया, जैसे आँखों पर विश्वास न हो। फिर उसके चेहरे पर एक अजीब सा तनाव फैल गया।
“माँ… बाबा… आप…?”
धनिया मुस्कराई,
“बस… आरव का जन्मदिन है ना… इसलिए…”
अमित ने पीछे देखा। नेहा भी आ गई थी। उसके चेहरे पर खुशी नहीं, घबराहट थी—जैसे कोई अनचाहा मेहमान अचानक आ गया हो।
“आपने बताया क्यों नहीं?” नेहा ने हल्की-सी खीझ के साथ कहा। “इतनी दूर… आपको… दिक्कत हो जाती।”
हरिहर ने झिझकते हुए कहा,
“बेटा… हमने सोचा… बस एक बार आरव को देख लें।”
अमित ने गले लगाने के बजाय थोड़ा-सा किनारे हटकर कहा,
“देखिए… कल बर्थडे है, घर में बहुत तैयारी है। मेहमान आएँगे, सब मैनेज करना है… आप लोग… पास के किसी होटल में रुक जाइए। कल बर्थडे के बाद हम आपको बुला लेंगे, आराम से मिलेंगे।”
यह वाक्य जैसे धनिया के दिल के बीचोंबीच उतर गया।
“होटल…?” उसने धीरे से दोहराया।
हरिहर ने आँखें झुका लीं। बूढ़े माता-पिता को होटल की ओर धकेलना… वह भी अपने ही बेटे के घर के सामने…
धनिया ने फिर भी खुद को संभाला।
“ठीक है बेटा… जैसा तुम कहो।”
अमित ने जल्दी-जल्दी किसी तरह टैक्सी बुलवाई, पास के होटल का नाम बताया, और पैसे देकर कह दिया,
“कल सुबह हम फोन कर देंगे।”
होटल का कमरा साफ था, पर अपना नहीं था। धनिया ने तकिये पर सिर रखा तो उसे गाँव का घर याद आया—जहाँ कोई भी आए तो पहले पानी, फिर खाना, फिर बात…
यहाँ तो अपने ही बेटे के घर में भी उनके लिए जगह नहीं थी।
रात भर धनिया को नींद नहीं आई। हरिहर बार-बार करवट बदलते रहे।
“धनिया…” उन्होंने धीरे से पुकारा।
“हाँ?”
“हमने गलत किया क्या… आकर?”
धनिया ने आँसू छिपाते हुए कहा,
“गलत तो नहीं… पर… शायद हम उनके हिसाब से ‘फिट’ नहीं बैठते।”
सुबह हुई। जन्मदिन का दिन। होटल की खिड़की से शहर भागता हुआ दिखता था। धनिया ने आरव के लिए लाई रेवड़ियाँ निकालीं, चाँदी का कड़ा कपड़े में लपेटा। उसके होंठों पर मुस्कान थी, पर आँखों में नमी।
दोपहर तक कोई फोन नहीं आया। शाम होने लगी। धनिया का दिल जैसे हाथ में आ गया।
“चलो…” उसने अचानक कहा।
हरिहर ने चौंककर देखा,
“कहाँ?”
धनिया ने दृढ़ स्वर में कहा,
“अपने पोते को देखने। चुपके से। बस एक मिनट। उसे आशीर्वाद दे देंगे। फिर लौट आएँगे।”
हरिहर डर गए।
“अगर अमित नाराज हुआ तो?”
धनिया ने जवाब दिया,
“नाराज हो जाए… लेकिन अगर हम आज भी आरव को नहीं देखेंगे… तो ये मन हमें जिंदगी भर कचोटेगा।”
वे टैक्सी से अमित के घर के पास पहुँचे। बाहर रोशनी थी, बैनर लगा था—“Happy Birthday Aarav!”
घर के अंदर से बच्चों की हँसी, संगीत, लोगों की बातें सुनाई दे रही थीं।
वे धीरे से गेट के किनारे खड़े हो गए। किसी ने ध्यान नहीं दिया। सब अपने-अपने काम में व्यस्त थे। धनिया ने दरवाजे की दरार से आरव को देखा—एक प्यारा सा बच्चा, माथे पर छोटा-सा तिलक, नीली ड्रेस, सिर पर क्राउन। वह केक के पास खड़ा था, चॉकलेट से सने हाथों से ताली बजा रहा था।
धनिया का कलेजा भर आया।
“हाय… कितना बड़ा हो गया मेरा लाल…” वह बुदबुदाई।
उसी पल आरव की नजर दरवाजे की तरफ गई। बच्चे की आँखें तेज होती हैं—वह भीड़ में भी किसी अपनापन पहचान लेते हैं। आरव ने दो सेकंड देखा, फिर जैसे पहचान गया। वह दौड़कर आया।
“दादू! दादी!”
उसकी आवाज़ इतनी ऊँची थी कि पूरा हॉल जैसे अचानक शांत हो गया।
धनिया का हाथ अपने आप आगे बढ़ गया। आरव ने उनकी उँगली पकड़ ली—जैसे सालों से वही उँगली पकड़ता आया हो।
“आप आए हो?” उसने खुशी से पूछा। “मेरे बर्थडे पर?”
धनिया बोल नहीं पाई। बस माथा चूम लिया। हरिहर की आँखें भीग गईं। उन्होंने काँपते हाथों से आरव के सिर पर हाथ रखा।
“जीते रहो बेटा…”
आरव ने उनकी उँगली पकड़े-पकड़े पूरे हॉल में खींच लिया।
“चलो… मैं सबको बताता हूँ… ये मेरे दादू-दादी हैं!”
और फिर वह बच्चे जैसी मासूम गर्व से भरी आवाज़ में हर मेहमान के पास ले जाने लगा—
“ये मेरे दादू हैं… ये मेरे दादी हैं… दादी गाँव में रहती हैं… दादी ने मेरे लिए मीठा लाया है…”
मेहमान मुस्कराए। कुछ ने आदर से पैर छुए। कुछ ने कहा,
“अरे वाह! दादू-दादी आए हैं! कितनी अच्छी बात है!”
और वहीं, कमरे के एक कोने में खड़े अमित और नेहा… शर्म से गड़ गए। नेहा की आँखें झुक गईं। अमित का चेहरा लाल पड़ गया। उसे पहली बार महसूस हुआ कि माता-पिता को “होटल” भेज देना सिर्फ एक व्यवस्था नहीं था—वह एक अपमान था, जिसे आज उसके बेटे ने सबके सामने उजागर कर दिया… बिना किसी शिकायत के, बस प्रेम के साथ।
आरव ने फिर खुशी से कहा,
“दादू… आप मेरे साथ केक काटो।”
अमित आगे बढ़ा। उसकी आवाज़ भारी थी,
“माँ… बाबा… आप… अंदर आइए… मैं… मैं बस…”
हरिहर ने उसे देखा—उस नज़र में गुस्सा नहीं था, सिर्फ थकान थी।
धनिया ने धीमे से कहा,
“बेटा… हम तो बस आरव को देखने आए थे।”
नेहा आगे आई। उसकी आँखों में पानी था।
“माँ… मुझे माफ कर दीजिए… मैं… मैं नहीं समझ पाई…”
धनिया ने नेहा का हाथ पकड़ लिया।
“समझ… हम भी नहीं पाए थे, बेटा। हम तो बस इतना जानते हैं कि घर का सबसे बड़ा सामान रिश्ता होता है।”
अमित की आँखें भर आईं।
“मैंने… आपको होटल में भेज दिया… मुझे बहुत शर्म आ रही है…”
उसी वक्त आरव ने उनके बीच की चुप्पी तोड़ दी।
“दादी… आप मेरे साथ फोटो खिंचवाओ… और मेरे दोस्तों को बताओ कि गाँव कैसा होता है।”
धनिया हँसी—पहली बार सच्ची हँसी।
“गाँव?” उसने आरव को गोद में उठाते हुए कहा, “गाँव में… दिल बड़े होते हैं बेटा…”
केक काटा गया। आरव ने पहला टुकड़ा दादू के मुँह में डाला, दूसरा दादी को। सब मेहमान तालियाँ बजाने लगे। अमित और नेहा वहीं खड़े थे—एक अजीब-सा पछतावा और सीख उनके चेहरे पर साफ थी।
पार्टी के बाद अमित ने सबके सामने कहा,
“आज… मेरे माता-पिता ने नहीं, मेरे बेटे ने मुझे सिखाया है… कि रिश्ते ‘मैनेज’ करने की चीज नहीं, जीने की चीज हैं।”
नेहा ने धनिया को गले लगा लिया।
“माँ… अब आप होटल नहीं… घर में ही रहेंगी।”
हरिहर चुप थे, पर उनकी आँखें चमक रही थीं। उन्हें ऐसा लगा जैसे गाँव के सूने आँगन में फिर से दीपक जल गया हो।
रात को आरव ने दोनों के लिए अपने कमरे में तकिया लगाया।
“दादी… आप यहीं सोना… मेरे पास,” उसने मासूमियत से कहा।
धनिया ने उसके माथे पर हाथ रखा।
“हाँ बेटा… आज दादी तुम्हारे कमरे में ही सोएगी।”
और सच में—उस रात, शहर के उस फ्लैट में, पहली बार लगा की अब ये फ्लैट घर बन गया है ।
क्योंकि जहाँ दादू-दादी की मौजूदगी हो, वहाँ सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं होते—वहाँ आशीर्वाद होता है, अपनापन होता है… और रिश्तों की वह गर्मी होती है, जो किसी एसी में नहीं मिलती।
सुबह होते-होते अमित ने गाँव जाने की बात खुद छेड़ दी।
“बाबा… इस बार… मैं और नेहा… गाँव चलेंगे। आरव को भी ले चलेंगे। मुझे… आपके आँगन में एक बार फिर बैठना है…”
हरिहर ने बस इतना कहा,
“देर से सही… पर घर की राह फिर मिल गई, यही बहुत है।”और धनिया ने मन ही मन सोचा—
पोता सिर्फ जन्मदिन का तोहफ़ा नहीं होता… परिवार को एक करने का उत्सव था
लेखिका : गरिमा चौधरी