आख़िर छोटी-छोटी बातों में बहू के मायके वालों को क्यों शामिल करना??
शाम के छह बज रहे थे। घर की दीवार घड़ी ने अपना घंटा बजाया, लेकिन सुमन के कानों में वह आवाज़ किसी अलार्म की तरह नहीं, बल्कि किसी आने वाले तूफ़ान की चेतावनी जैसी लगी। वह ऑफिस से अभी-अभी लौटी थी। थकी हुई थी, लेकिन शारीरिक थकान से ज़्यादा उसे मानसिक दबाव महसूस हो रहा था। उसने अपना बैग सोफे पर रखा और सीधे रसोई में पानी पीने गई।
ड्राइंग रूम में उसकी सास, विमला जी, फोन कान से लगाए बैठी थीं। उनकी आवाज़ शहद जैसी मीठी थी, लेकिन उस मिठास में जो जहर घुला था, उसे सिर्फ़ सुमन पहचान सकती थी।
“हाँ भाई साहब, सब ठीक है। बस आपकी बेटी की थोड़ी चिंता लगी रहती है… नहीं-नहीं, कोई बड़ी बात नहीं है। बस आज फिर उसने गीला तौलिया बिस्तर पर छोड़ दिया था। मैंने सोचा बता दूँ, ताकि आप उसे समझा सकें। आखिर बेटी तो आपकी ही है न।”
सुमन का हाथ वहीं फ्रीज हो गया। पानी का गिलास उसके होठों तक पहुँचते-पहुँचते रुक गया।
सामने वाली लाइन पर सुमन के पिता, रमेश बाबू थे। एक रिटायर शिक्षक, जिन्हें हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत थी। सुमन जानती थी कि अभी उसके पिता फ़ोन के उस पार हड़बड़ा गए होंगे, माफ़ी मांग रहे होंगे, और कह रहे होंगे कि “मैं सुमन को समझाऊँगा, भाभी जी। माफ़ कर दीजिये।”
सुमन ने ज़ोर से गिलास सिंक में रखा। आवाज़ सुनकर विमला जी ने मुड़कर देखा, लेकिन फ़ोन नहीं काटा।
“अच्छा भाई साहब, अब वह आ गई है। मैं रखती हूँ। बस आप अपनी सेहत का ख्याल रखियेगा,” विमला जी ने बात ख़त्म की और विजयी मुस्कान के साथ फ़ोन नीचे रखा।
यह रोज की कहानी थी। शादी को तीन साल हो चुके थे। सुमन एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर थी, घर भी संभालती थी, और पूरी कोशिश करती थी कि कोई शिकायत न हो। लेकिन इस घर का नियम कुछ अलग था। यहाँ बहू की ग़लतियों का निपटारा घर के अंदर नहीं होता था, बल्कि उसकी ‘रिपोर्ट’ सीधे उसके मायके भेजी जाती थी।
सब्ज़ी में नमक ज़्यादा हो गया? – मायके फ़ोन।
सुमन ऑफिस से लेट आई? – मायके फ़ोन।
सुमन ने कोई साड़ी अपनी पसंद की पहन ली जो सास को नहीं भाती? – मायके फ़ोन।
सुमन ड्राइंग रूम में आई। “माँजी, गीला तौलिया मैंने नहीं, आपके बेटे मयंक ने बिस्तर पर छोड़ा था। मैंने तो उसे उठाकर बाल्कनी में डाला था।”
विमला जी ने टीवी का रिमोट उठाया और चैनल बदलते हुए लापरवाही से कहा, “अरे तो क्या हुआ? मयंक तो बच्चा है, मर्दों को कहाँ ये सब याद रहता है। और अगर मैंने समधी जी से बात कर ही ली तो क्या पहाड़ टूट पड़ा? अपने सुख-दुःख उनसे ही तो साझा करती हूँ।”
“यह सुख-दुःख साझा करना नहीं है माँजी,” सुमन ने अपनी आवाज़ संयमित रखने की कोशिश की। “यह चुगली करना है। और वह भी उन बातों की जो बेबुनियाद हैं। पापा का बीपी बढ़ा रहता है, आपको पता है न?”
तभी मयंक सीढ़ियों से उतरता हुआ आया। “क्या हुआ? तुम आते ही शुरू हो गई सुमन?”
“मैं शुरू नहीं हुई मयंक,” सुमन ने पति की ओर देखा। “माँजी ने फिर पापा को फ़ोन किया था। सिर्फ़ इसलिए कि बिस्तर पर गीला तौलिया था, जो कि तुमने छोड़ा था।”
मयंक ने माथा सिकोड़ा। “ओहो सुमन, तुम छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ क्यों बनाती हो? माँ का स्वभाव है बात करने का। वह पापा से क्लोज हैं, इसलिए बता देती हैं। इसमें ईगो पर लेने वाली क्या बात है?”
सुमन हतप्रभ रह गई। “क्लोज हैं? मयंक, क्या कभी मेरे पापा ने तुम्हारे घर फ़ोन करके बताया है कि दामाद जी ने आज हमारा फ़ोन नहीं उठाया या दामाद जी ने आज अपनी माँ पर चिल्लाया? नहीं न? क्योंकि वह मानते हैं कि हम बालिग हैं, अपनी गृहस्थी खुद संभाल सकते हैं।”
“अब तुम मेरे माँ-बाप को मत सिखाओ कि उन्हें क्या करना चाहिए,” मयंक ने चिढ़कर कहा और बाहर जाने के लिए चाबी उठाई। “मैं जिम जा रहा हूँ। मेरे आने तक यह ड्रामा ख़त्म कर देना।”
दरवाज़ा बंद हुआ और उसके साथ ही सुमन के सब्र का बांध भी चटकने लगा।
उस रात सुमन को नींद नहीं आई। वह करवटें बदलती रही। उसे अपने पिता का चेहरा याद आ रहा था। पिछले महीने जब वह मायके गई थी, तो पिता ने दबी जुबान में कहा था, “बेटा, थोड़ा संभलकर रहा कर। तेरी सास बहुत समझदार महिला हैं, उनकी बातों का मान रखा कर। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तेरे घर में क्लेश हो।”
सुमन जानती थी कि उसके पिता डरते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने विमला जी की किसी बात का विरोध किया, तो सुमन का जीना हराम हो जाएगा। और विमला जी इसी डर का फायदा उठा रही थीं। वह सुमन को एक ‘डिफेक्टिव प्रोडक्ट’ मानती थीं जिसकी शिकायत बार-बार ‘मैन्युफैक्चरर’ (मायके वालों) से करना उनका अधिकार था।
अगले दिन रविवार था। घर में मेहमान आने वाले थे। विमला जी की दूर की बहन और उनका परिवार। सुबह से ही रसोई में हंगामा था। सुमन ने छोले बनाए, भटूरे का आटा लगाया, खीर बनाई। सब कुछ विमला जी के निर्देशानुसार।
मेहमान आए। हंसी-ठिठोली शुरू हुई। नाश्ता परोसा गया।
विमला जी की बहन, सरिता मौसी ने खीर चखी। “अरे वाह विमला! खीर तो बहुत स्वादिष्ट है। तेरी बहू के हाथ में तो जादू है।”
सुमन, जो ट्रे लेकर खड़ी थी, थोड़ी मुस्कुराई। उसे लगा शायद आज तारीफ़ मिलेगी।
लेकिन विमला जी ने तुरंत बात काट दी। “अरे कहाँ जीजी! यह तो मैंने इसके सिर पर खड़े होकर बनवाई है। वरना इसे तो दूध उबालना भी नहीं आता। परसों ही की बात है, इसने पूरा दूध उफान दिया। मैंने तुरंत इसके पिताजी को फ़ोन किया कि भाई साहब, अपनी लाड़ली को कम से कम रसोई का काम तो सिखा देते।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। मेहमानों ने एक-दूसरे को देखा। सुमन का चेहरा अपमान से लाल हो गया।
सरिता मौसी ने माहौल हल्का करने की कोशिश की, “अरे, आजकल की लड़कियाँ ऑफिस संभालती हैं, वही बहुत है। छोटी-मोटी ग़लतियाँ तो होती रहती हैं।”
“छोटी-मोटी?” विमला जी ने मुँह बनाया। “जीजी, संस्कार तो मायके से ही आते हैं न। अगर हम नहीं टोकेंगे, और उनके माँ-बाप को नहीं बताएंगे, तो सुधार कैसे होगा? हम तो इनके भले के लिए ही मायके वालों को शामिल करते हैं।”
सुमन ने ट्रे मेज पर जोर से रखी। चीनी मिट्टी के कप खनखना उठे।
“बस माँजी,” सुमन की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी जो आज से पहले कभी नहीं सुनी गई थी।
सबकी नज़रें सुमन पर टिक गईं। मयंक, जो बगल में बैठा समोसा खा रहा था, एकदम रुक गया।
“सुमन, मेहमान बैठे हैं, तमीज़ से…” मयंक फुसफुसाया।
सुमन ने मयंक की बात अनसुनी कर दी और सीधे अपनी सास की आँखों में देखा।
“आपने अभी कहा कि आप मेरे भले के लिए मेरे मायके वालों को शामिल करती हैं। लेकिन सच यह है माँजी, कि आप उन्हें शामिल करती हैं क्योंकि आप मुझे नीचा दिखाना चाहती हैं। आप चाहती हैं कि मेरे बूढ़े पिता हर दूसरे दिन आपके सामने हाथ जोड़कर माफ़ी मांगें।”
विमला जी खड़ी हो गईं। “जुबान लड़ाती है? यही सिखाया है तेरे बाप ने?”
“मेरे बाप ने मुझे यह सिखाया है कि ग़लत बात सहना, ग़लत करने से भी बड़ा अपराध है,” सुमन की आवाज़ कांप रही थी, लेकिन वह रुकी नहीं। “मैं तीस साल की हूँ, माँजी। मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में पचास लोगों की टीम हैंडल करती हूँ। अगर मैं ऑफिस में कोई ग़लती करती हूँ, तो मेरा बॉस मेरे पिता को फ़ोन नहीं करता। वह मुझसे बात करता है। हम सुलझाते हैं। क्योंकि हम वयस्क हैं।”
उसने पूरे कमरे पर नज़र डाली।
“शादी दो वयस्कों के बीच होती है, दो परिवारों के बीच रिश्ता जुड़ता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बहू के मायके वाले इस घर के लिए ‘कस्टमर केयर’ बन जाएं जहाँ हर छोटी-बड़ी शिकायत दर्ज कराई जाए।”
मयंक गुस्से में खड़ा हुआ। “सुमन, तुम हद पार कर रही हो। माँ से माफ़ी मांगो।”
“नहीं मयंक,” सुमन ने मयंक का हाथ झटक दिया। “आज माफ़ी मैं नहीं, तुम मांगोगे। उस दिन के लिए जब तुमने गीला तौलिया छोड़ा और इल्ज़ाम मुझ पर आया। उस दिन के लिए जब मैं बीमार थी और माँजी ने पापा को फ़ोन करके कहा कि आपकी बेटी कामचोर है।”
उसने अपना फ़ोन निकाला और स्पीकर ऑन करके मेज पर रख दिया। फिर उसने अपने पिता का नंबर मिलाया।
घंटी बजी। उधर से डरी हुई आवाज़ आई, “हेलो? सुमन? क्या हुआ बेटा? सब ठीक तो है? विमला भाभी जी ने कुछ कहा क्या?”
पिता की घबराई हुई आवाज़ सुनकर पूरे कमरे में सन्नाटा पसर गया। विमला जी का चेहरा पीला पड़ गया। मेहमान भी असहज होकर नीचे देखने लगे।
सुमन ने गहरी साँस ली। “नहीं पापा, माँजी ने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ यह बताने के लिए फ़ोन किया है कि आज से इस घर की कोई भी शिकायत आप तक नहीं आएगी। अगर इस घर में नमक कम है, तो मैं और मयंक देखेंगे। अगर कपड़ा इधर-उधर है, तो हम संभालेंगे। आप आराम कीजिये, अपनी दवा लीजिये और शाम को पार्क घूमने जाइये। अब आप मेरी फ़िक्र करना छोड़ दीजिये।”
पिताजी कुछ पल चुप रहे, फिर उनकी भर्राई हुई आवाज़ आई, “बेटा, तू…”
“मैं ठीक हूँ पापा। बहुत ठीक हूँ। और हाँ, अगर अब आपके पास इस घर से कोई शिकायत का फ़ोन आए, तो आप उसे वैसे ही काट दीजियेगा जैसे रॉन्ग नंबर को काटते हैं।”
सुमन ने फ़ोन काट दिया।
वह विमला जी की ओर मुड़ी। “माँजी, आप मेरी सास हैं, मैं आपकी इज़्ज़त करती हूँ। आप मुझे डांट लीजिये, मुझे ताने दे दीजिये, मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैं सुधार कर लूँगी। लेकिन अगर आज के बाद आपने मेरी किसी भी ग़लती, चाहे वो कितनी भी बड़ी क्यों न हो, के लिए मेरे पिता को फ़ोन किया… तो मैं यह मान लूँगी कि यह घर मुझे अपनाने के क़ाबिल नहीं है।”
सरिता मौसी उठीं और उन्होंने सुमन के कंधे पर हाथ रखा। “सही कह रही है बहू। विमला, हम भी तो बहुएं थीं। क्या हमारी सासू माँ हमारी शिकायतों की पोटली लेकर हमारे मायके भागती थीं? घर की बात घर में रहे, तभी घर रहता है। वरना वह कचहरी बन जाता है।”
विमला जी धम्म से सोफे पर बैठ गईं। उनके पास कहने को कोई शब्द नहीं थे। उनका सबसे बड़ा हथियार—सुमन के पिता का डर—आज सुमन ने ही चकनाचूर कर दिया था।
मयंक, जो अब तक गुस्से में था, पिता की वह डरी हुई आवाज़ सुनकर पिघल गया था। उसे पहली बार अहसास हुआ कि उसकी ‘नॉर्मल’ लगने वाली चीज़ें असल में उसके ससुर के लिए कितनी तकलीफदेह थीं।
उसने धीरे से सुमन का हाथ छुआ। “सॉरी,” उसने बुदबुदाया। “मुझे अंदाज़ा नहीं था कि यह इतना… इतना बुरा लग रहा होगा।”
सुमन ने अपनी आँखों के कोने पोंछे और मेहमानों की तरफ मुड़ी। “माफ़ कीजियेगा, आपका मूड ख़राब किया। मैं सबके लिए चाय लेकर आती हूँ।”
वह रसोई की तरफ बढ़ गई।
शाम को जब मेहमान चले गए, तो घर में एक अजीब सी शांति थी। लेकिन यह शांति तनाव वाली नहीं थी, बल्कि एक नए समझौते की शांति थी।
रात के खाने की मेज पर विमला जी चुपचाप खाना खा रही थीं। अचानक मयंक ने पानी का जग उठाने की कोशिश की और वह गिर गया। पूरा पानी मेज पर फैल गया।
सबकी नज़रें पानी पर, और फिर विमला जी पर गईं। विमला जी की आदत के अनुसार हाथ फ़ोन की तरफ बढ़ने वाला था, लेकिन फिर वह रुक गईं। उन्होंने हाथ वापस खींच लिया।
सुमन ने चुपचाप कपड़ा उठाया और मेज साफ़ करने लगी।
“रहने दे सुमन,” विमला जी ने बहुत धीमे स्वर में कहा, और अपनी प्लेट से नज़रे नहीं हटाईं। “मयंक साफ़ कर लेगा। उसी ने गिराया है।”
मयंक ने हैरानी से माँ को देखा, फिर मुस्कुराते हुए कपड़ा सुमन के हाथ से ले लिया। “हाँ माँ, मैं कर लूँगा।”
सुमन ने एक गहरी सुकून की साँस ली। उसे समझ आ गया था कि लड़ाई ख़त्म हो चुकी है। उसने सिर्फ़ एक सीमा नहीं खींची थी, उसने अपने पिता के सम्मान और अपनी गरिमा को वापस हासिल किया था।
उसने मन ही मन दोहराया—“आख़िर छोटी-छोटी बातों में बहू के मायके वालों को क्यों शामिल करना?” और जवाब उसे मिल चुका था: कोई ज़रूरत नहीं है। क्योंकि जिस घर में समस्याएं ‘हमारी’ (पति-पत्नी की) होती हैं, वहां समाधान भी ‘हमारा’ ही होना चाहिए। तीसरा, चाहे वह मायका हो या कोई और, सिर्फ़ दूरियाँ बढ़ाता है, हल नहीं देता।
अब आपकी बारी 👇
क्या सुमन का अपने पापा को फोन करके सास के सामने “सीमा” तय करना सही था?
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“घर की बात घर में” ✅ या “मायके को बताना ज़रूरी है” ❌
और बताइए—
अगर आपके साथ ऐसा होता, तो आप चुप रहते या सीमा खींचते?
लेखक : मुकेश पटेल