गलती का एहसास –  गीता वाधवानी

 आशा देवी दहाड़े मारकर रो रही थी। उनकी बहू निशा का अचानक देहांत हो गया था। बेचारी अच्छी भली बैठी हुई खाना खा रही थी और हार्ट फेल हो गया। आशा देवी का पोता अभी सिर्फ 5 वर्ष का था। वैसे तो आशा देवी को बहू से कोई खास लगाव नहीं था, लेकिन उन्हें अपने पोते देव पर दया आ रही थी कि वह बेचारा अब कैसे अपनी मां के बिना रहेगा। 

       देव बहुत मासूम बच्चा था। सारे मेहमानों को देखकर सबसे पूछ रहा था कि” मेरी मम्मी कहां गई? ” 

 सबकी आंखों में आंसू थे कि उस बच्चे को क्या जवाब दें। धीरे-धीरे सारे मेहमान चले गए और देव अपनी मां को बहुत ज्यादा याद करने लगा। उसकी बुआ जी उसके पास रुकी हुई थी ं, पर समस्या तो यह थी कि उसकी बुआ पल्लवी के दो बच्चे थे और वह अपने भतीजे के पास ज्यादा रुक नहीं सकती थी। एक न एक दिन तो उन्हें अपने घर जाना ही था। 

 कुछ समय बीता तो आशा देवी अपने बेटे विक्रम को दूसरी शादी के लिए मानने लगीं। 

 विक्रम,निशा से बहुत प्यार करता था और उसके जाने के बाद एकदम टूट गया था। उसने शादी के लिए मना कर दिया। एक दिन आशा देवी बाजार जाते समय बेहोश होकर गिर गई। आसपास के दुकानदार उन्हें पहचानते थे इसीलिए उन्होंने उन्हें ऑटो में बिठाकर घर तक छोड़ दिया। 

 अब विक्रम को मां की चिंता हो रही थी इसीलिए उसने आशा देवी की बात मानकर विवाह के लिए हां कर दी। आशा देवी ने रिश्ता खोजना शुरू कर दिया था। 

 कुछ समय बाद उन्हें एक तलाकशुदा लड़की शिवानी का रिश्ता मिला। शिवानी की एक 4 साल की बिटिया भी थी मानसी। आशा देवी को सब कुछ ठीक लग रहा था लेकिन उनका मन था कि शिवानी मानसी को अपने साथ लेकर ना आए बल्कि उसे मायके में छोड़ आए। लेकिन शिवानी ने साफ कह दिया था कि वह मानसी को अपने साथ ही लाएगी। 

 तब विक्रम ने अपनी मां को समझाया कि” जब शिवानी, देव को पाल सकती है तो हम मानसी को क्यों नहीं पाल सकते, ऐसे भेदभाव उचित नहीं है। ” 

    आशा देवी को बात माननी पड़ी। मंदिर में एक साधारण सा विवाह किया गया और शिवानी विक्रम के घर आ गई। 

 कुछ समय तक तो सब कुछ ठीक था लेकिन बाद में आशा देवी शिवानी की बेटी मानसी को बात-बात में ताने मारती रहती थी और उससे बिल्कुल प्यार नहीं करती थी। वह सिर्फ अपने पोते देव को हर सुविधा और प्यार देना चाहती थी। मानसी से, प्यार के दो मीठे बोल भी नहीं बोलती थी। हर समय डांटती रहती थी। 

      एक बार उन्होंने देव को चॉकलेट दी, तो मानसी ने भी चॉकलेट मांगी। इस पर आशा देवी ने कहा -” कैसे बेशर्म  की तरह चॉकलेट मांग रही है, चॉकलेट चाहिए तो अपनी मां से मांग, न जाने कहां से आ गई है अपना हक जमाने, पहले हम इस पर पढ़ाई लिखाई का और पालन पोषण का खर्च करें और फिर इसकी शादी करवाएं, हमें तो लग गई ना लाखों की चपत। ” 

     शिवानी सब कुछ सुन रही थी। उसे बहुत बुरा लगा और उसने पूरी बात विक्रम को बताई। विक्रम ने अपनी मां को बहुत समझाया लेकिन उनकी समझ में कुछ भी नहीं आया। धीरे-धीरे समय बितता रहा और आशा देवी के ताने बढ़ते रहे। 

 कभी-कभी तो मानसी अपनी मां से पूछती थी” मम्मी दादी जी, मुझे इतना नाराज क्यों रहती हैं और मुझे प्यार भी नहीं करती। सब कुछ देव को देती रहती हैं और प्यार भी उसी से करती हैं। ” 

 शिवानी उसे समझाती-” मानसी बेटा, सब कुछ धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा और दादी तुमसे बहुत प्यार करती हैं, वह सिर्फ कहती नहीं है, तुम उदास मत रहा करो। ” 

 अब देव और मानसी बड़े हो चुके थे। देव अपनी जॉब के लिए इंटरव्यू दे रहा था और मानसी अभी कॉलेज में पढ़ रही थी। 

 आशा देवी बीमार रहने लगी थी। डॉक्टर ने बताया था कि उनका लिवर बहुत कमजोर है, अगर ध्यान नहीं रखा गया तो हो सकता है कि लीवर का प्रत्यारोपण करना पड़े। 

 एक दिन आशा देवी की हालत बहुत खराब हो गई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर साहब ने सारे टैस्ट किये और कहा कि थोड़े दिनों में ही ऑपरेशन करना पड़ेगा। 

 आशा देवी को अपने पोते देव से पूरी उम्मीद थी कि वह मुझे अपने लीवर का हिस्सा देगा हालांकि वह अपने पोते को किसी मुसीबत में डालना नहीं चाहती थी लेकिन डॉक्टर साहब ने कहा ” लीवर दान करने वाले  की उम्र 25 से 40 के बीच हो तो बहुत अच्छा रहेगा क्योंकि सेहत के सुधार में आसानी रहती है और जवान इंसान अपनी सेहत को जल्दी बना लेता है। ” 

       आशा देवी को यह बात पता ही नहीं थी कि उनके पोते देव की जॉब बेंगलुरु में लग चुकी है और जिस दिन उनका ऑपरेशन है उससे एक दिन पहले ही उसे जाना था और वैसे भी वह अपनी मम्मी को मना कर चुका था कि मैं दादी को कोई लीवर दान नहीं करूंगा, उनकी किस्मत में होगा तो वह जीवित रहेंगी वरना नहीं। मैं उनके पीछे अपना शरीर क्यों खराब करूं। ” 

 शिवानी ने समझाया -” लेकिन देव बेटा, इसमें शरीर खराब होने वाली बात नहीं है, लीवर तो खुद अपने आप को पूरा कर लेता है। ” 

 लेकिन देव नहीं माना और वह चुपचाप सामान लेकर चला गया। अब विक्रम और शिवानी में से कोई भी लीवर दे सकता था लेकिन मानसी जिद पर अड़ गई की दादी को अपने लीवर का हिस्सा मैं ही दूंगी। आप दोनों की उम्र नहीं है यह करने की। दोनों ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह नहीं मानी। 

 डॉक्टर साहब ने भी कहा -“यही सही रहेगा” 

 आखिरकार ऑपरेशन हो गया। आशा देवी जब होश में आई, तो अपने पोते देव से मिलने के लिए तड़प रही थी।       गीता वाधवानी 

 आशा देवी-” शिवानी, विक्रम, कोई तो मुझे देव से मिलवाने ले चलो या फिर उसे मेरे पास ले आओ, मुझे लीवर का हिस्सा देने के बाद, मेरा बच्चा कैसा है, ठीक तो है वो, कहीं कमजोर तो नहीं हो गया, पीला तो नहीं पड़ गया। कुछ तो बताओ। मुझे पता है वह अपनी दादी के बिना रह नहीं सकता। ” 

 शिवानी ने कहा-” मां जी, आप अभी शांत रहिए और आराम कीजिए।घर जाकर मैं आपकी उससे फोन पर बात करवा दूंगी। ” 

 आशा देवी-” फोन पर क्यों? ” 

 शिवानी-” क्योंकि वह अपनी नौकरी करने के लिए बेंगलुरु चला गया है। ” 

 आशा देवी-” हे राम! कैसी माँ है तू, और यहां के डॉक्टर कैसे हैं, ऑपरेशन के बाद मेरे बच्चे को आराम भी करने नहीं दिया और तुरंत दूसरे शहर भेज दिया और डॉक्टर ने भी जाने की इजाजत दे दी। ” 

 विक्रम-” मां,तुम्हें देव ने लीवर दान नहीं किया है इसलिए तुम उसकी चिंता मत करो। ” 

 आशा देवी हैरान होकर विक्रम की तरफ देखने लगी और बोली-” देव ने नहीं, तो किसने दिया है? ” 

 विक्रम-” जिससे तुमने हमेशा नफरत की, कभी उसे अपना नहीं माना और उससे कभी प्यार के दो मीठे बोल भी नहीं बोले, जो हमेशा तुम्हारे लाड के लिए तरसती रही। ” 

 आशा देवी ने धीरे से कहा-” मानसी? ” 

 विक्रम और शिवानी ने आंखों में आंसू लेते हुए कहा-” हां माँ, मानसी। ” 

 आशा देवी की आंखों में आंसू आ गए और उन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा उन्होंने नर्स को इशारा किया कि वह उसे व्हीलचेयर पर बिठा और मानसी के रूम में ले चले। 

 आशा देवी, विक्रम और शिवानी, नर्स के साथ मानसी के कमरे में पहुंचे। 

 उसकी आंखें बंद थी। 

 अपने सिर पर एक प्यार भरा स्पर्श पाकर उसने अपनी आंखें खोलीं। दादी उसे प्यार कर रही थी। लाड दिख रही थी। 

 उसने दादी का हाथ पकड़ लिया और चूम लिया। दोनों दादी और पोती की आंखों से आंसू बह रहे थे और आशा देवी के मुंह से निकला-” मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची, मैंने हमेशा तुझसे नफरत की और तूने मेरी जान बचा ली और देव अपनी जॉब पर चला गया, मुझे ऐसे ही छोड़कर। ”     गीता वाधवानी 

 आंसुओं के साथ-साथ सारे गिले शिकवे बह गए थे। दादी को देव से भी कोई शिकायत नहीं थी। 2 हफ्ते बाद जब वे लोग घर गए, तब सब ने मिलकर देव से वीडियो कॉल पर बात की। उसके बाद सबके चले जाने पर, मानसी ने देव को दोबारा कॉल की और उससे कहा-” थैंक्यू देव, 

 देव-” किस बात का थैंक यू? ” 

 मानसी-” हां, जैसे तो मुझे कुछ पता ही नहीं है, तुम दादी से बहुत प्यार करते हो, फिर भी तुम उनके सामने बुरे बन गए, सिर्फ मेरे लिए, क्योंकि तुम्हें पता था कि तुम्हारे इनकार करने के बाद, मैं दादी को लीवर दूंगी और फिर दादी मुझसे प्यार करने लगेगी, इसीलिए तुम बुरे बन गए और किसी को कुछ नहीं बताया, लेकिन मैं भी तुम्हारी बहन हूं मुझे सब कुछ समझ में आ गया। 

 देव ने हंसकर कहा – ” तुम तो बड़ी होशियार हो गई हो, सचमुच मानसी, मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था जब दादी तुम्हारे साथ भेदभाव करती थी, मुझे लगा कि शायद अब कुछ हो सकता है और देखो सचमुच सब कुछ ठीक हो गया, तुम समझ गई हो लेकिन किसी से बताना मत। ” 

 मानसी-” ठीक है नहीं बताऊंगी लेकिन मुझे लगता है कि मम्मी भी समझ गई है क्योंकि वह तुम्हारा नेचर अच्छी तरह जानती हैं उन्होंने तुम्हें बचपन से पाला है।”  

 देव-” हां सही कह रही हो, मम्मी से कुछ नहीं छुपता। अपना और दादी का पूरा ध्यान रखना। ” 

 मानसी-” हां ठीक है। तुम भी अपना ध्यान रखना भाई। ” बाय बाय 

 दोस्तों आपको कहानी कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताएं धन्यवाद अप्रकाशित, स्वरचित  

 गीता वाधवानी दिल्ली

साप्ताहिक प्रतियोगिता विषय #प्यार के दो मीठे बोल

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