“बहू, ये लाल रंग का भारी काम वाला लहंगा कितने का होगा?”
विमला बुआ ने अपनी बड़ी भतीज-बहू, मानसी के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा। उनकी नज़रें स्टेज पर बैठी अपनी सगी भतीजी और आज की दुल्हन, शिखा पर टिकी थीं।
मानसी ने एक हल्की, लेकिन थकी हुई मुस्कान के साथ जवाब दिया, “बुआ जी, ये पच्चीस हजार के आस-पास का है। शिखा को यही डिज़ाइनर पीस पसंद आया था, तो आपके भतीजे ने बिना एक पल सोचे कार्ड स्वाइप कर दिया।” मानसी की आवाज़ में एक अजीब सी उदासी थी, जो शादी के इस खुशनुमा माहौल से बिल्कुल मेल नहीं खा रही थी।
विमला बुआ की पैनी नज़रें स्टेज पर बैठी शिखा और उसके बगल में खड़ी अपनी ही बड़ी बहन (मानसी की सास), सुमित्रा जी पर गईं। “लहंगा तो बहुत खूबसूरत है, सजावट भी राजा-महाराजाओं जैसी की है तुम्हारे पति और देवर ने। लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आ रही… इस घर की बेटी की शादी है, इतने बड़े घराने में रिश्ता तय हुआ है, फिर भी सुमित्रा दीदी और शिखा का चेहरा ऐसे क्यों लटका हुआ है जैसे कोई मातम का घर हो?”
मानसी कुछ पल चुप रही। वह अपने होठों को भींचकर अपने अंदर उठ रहे तूफ़ान को शांत करने की कोशिश कर रही थी। तभी पास ही बैठी मानसी की जेठानी की उम्र की चचेरी ननद, सरिता ने बात को बीच में ही लपक लिया।
“अरे बुआ जी, आप तो ताई जी (सुमित्रा) का स्वभाव जानती ही हैं। ताऊ जी के अचानक गुज़र जाने के बाद, जब ये बच्चे छोटे थे, तब से ताई जी ने हमेशा रोने की ही आदत डाल ली है। ताऊ जी तो बेटी के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं छोड़ पाए थे। ये तो मानसी के पति राघव और इसके देवर सुमित की मेहनत है कि आज ये दिन देखने को मिल रहा है। बिना बाप की बहन का बोझ उठाना कोई आसान काम नहीं होता बुआ जी। बाप की छत्रछाया हो तो बात अलग है, लेकिन जब भाइयों पर पूरी ज़िम्मेदारी आ जाए, तो ज़माना सिर्फ ये देखने के लिए बैठा रहता है कि भाई अपनी ज़िम्मेदारी कैसे निभाते हैं। और राघव-सुमित ने तो अपना खून-पसीना एक कर दिया।”
विमला बुआ ने एक लंबी गहरी सांस ली। “भगवान का शुक्र है कि दोनों लड़कों ने अच्छी पढ़ाई की और आज ऊंचे पदों पर बैठे हैं। वरना ये धूमधाम, ये लाखों का खर्च… क्या ये मुमकिन था? सुमित्रा दीदी तो शुरू से ही बस अपनी मनमानी करती आई हैं। लेकिन आज तो उन्हें खुश होना चाहिए। दोनों बेटों ने अपनी ज़िम्मेदारी से बढ़कर काम किया है।”
मानसी के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान उभर आई। “बुआ जी, यही तो बात है। माजी (सुमित्रा जी) को ये हज़म ही नहीं हो रहा है कि उनके दोनों बेटे इतने लायक निकल गए कि उन्होंने बिना किसी से हाथ फैलाए, अपनी बहन की शादी इतने बड़े घर में कर दी। माजी तो हमेशा से समाज में यही गाती फिरी हैं कि उनके बेटों ने उनका कोई खयाल नहीं रखा, बहुएं उन्हें कुछ नहीं समझतीं। आज जब पूरा समाज राघव और सुमित की तारीफ कर रहा है, तो माजी और शिखा को ये बात चुभ रही है।”
विमला बुआ का माथा ठनक गया। उन्हें अपनी बड़ी बहन सुमित्रा के इस रवैये पर हमेशा से ही कोफ़्त होती थी। “तो इसमें मुंह फुलाने वाली क्या बात है? शिखा बत्तीस साल की हो चुकी है। पढ़ाई के नाम पर उसने दस साल दिल्ली में रहकर कोचिंग की, दोनों भाइयों ने पानी की तरह पैसा बहाया। जब कोई नौकरी नहीं लगी, तो क्या उम्र भर उसे घर में बिठा कर रखते? भाइयों को भी तो समाज में जवाब देना पड़ता है। आखिर कब तक वो एक कुंवारी बहन को लेकर बैठे रहते?”
मानसी की आँखें अब छलकने को बेताब थीं। उसने अपनी रुलाई को रोकते हुए कहा, “बुआ जी, आप सच कह रही हैं। राघव ने अपनी जवानी के वो दिन, जब लड़के अपने करियर और शौक पूरे करते हैं, शिखा की फीस भरने में निकाल दिए। सुमित ने अपनी शादी के गहने गिरवी रखकर शिखा की दिल्ली की कोचिंग का खर्च उठाया था। हम दोनों बहुओं ने कभी एक शब्द नहीं कहा। हमने शिखा को अपनी छोटी बहन से बढ़कर माना। लेकिन माजी… माजी को लगता है कि हम शिखा से ‘छुटकारा’ पा रहे हैं। उन्होंने तो कल रात तक राघव को ताने मारे कि ‘तूने अपनी बहन को बोझ समझ कर घर से निकाल दिया। अगर वो कल को अफसर बन जाती, तो क्या तू उसकी शादी इस तरह जल्दबाज़ी में करता?'”
“क्या बकवास है!” विमला बुआ गुस्से से तिलमिला उठीं। “सुमित्रा दीदी तो शुरू से ही स्वार्थी रही हैं। जीजा जी जब ज़िंदा थे, तब भी वो उन्हें इसी तरह ताने मार-मार कर परेशान रखती थीं। उनके सीधेपन का फायदा उठाकर दीदी ने हमेशा घर में अपनी ही हुकूमत चलाई। जीजा जी बेचारे इसी घुट-घुट कर जीने की आदत में जल्दी चले गए। और अब वही काम वो अपने बेटों के साथ कर रही हैं। वो चाहती थीं कि शिखा नौकरी करे, और उसकी कमाई पर वो अपनी धौंस जमाएं। उन्हें शिखा की शादी की नहीं, बल्कि उस पैसे की चिंता थी जो शिखा के अफसर बनने पर उन्हें मिलता।”
सरिता ने भी हामी भरी, “बिल्कुल सही कहा बुआ जी आपने। ताई जी को कभी बेटों की मेहनत नज़र नहीं आई। राघव भइया ने पिछले छह महीने से दिन-रात ओवरटाइम किया है ताकि शादी के बजट में कोई कमी न आए। तीस लाख से ऊपर का खर्च हुआ है। दस लाख तो भइया ने अपने नाम पर पर्सनल लोन लिया है। लेकिन ताई जी और शिखा का तो बस एक ही रोना है कि ‘लड़के वालों ने जो गाड़ी मांगी थी, वो टॉप मॉडल क्यों नहीं दी?'”
मानसी का मन अतीत की परतों में उलझ गया था। उसे याद आ रहा था वो दिन जब वह इस घर में नई-नई ब्याह कर आई थी। राघव के पिता का साया बहुत पहले ही उठ चुका था। राघव ने एक पिता की तरह अपने छोटे भाई सुमित और बहन शिखा को पाला था। मानसी ने राघव के संघर्ष को बहुत करीब से देखा था। कैसे वो अपने फटे हुए जूतों को दो-दो साल तक पॉलिश करके पहनता था, ताकि शिखा को कॉलेज जाने के लिए नई स्कूटी दिलाई जा सके। कैसे सुमित ने अपनी पहली सैलरी से माँ या पत्नी के लिए नहीं, बल्कि शिखा के लिए लैपटॉप खरीदा था।
लेकिन सुमित्रा जी ने कभी अपनी बहुओं को अपनी बेटी के बराबर नहीं माना। उनके लिए बहुएं सिर्फ घर की नौकरानियां थीं और बेटे, पैसे कमाने की मशीनें। शिखा, जिसे भाइयों ने लाड-प्यार से सिर पर चढ़ा रखा था, वो भी अपनी माँ की ही परछाई बन गई थी। उसे लगता था कि भाइयों का पैसा उस पर खर्च होना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, और इसके लिए उसे किसी का अहसानमंद होने की ज़रूरत नहीं है। जब शिखा का रिश्ता तय हुआ था, तो लड़के वालों ने एक अच्छी खासी शादी की मांग की थी। राघव ने बिना अपनी माँ को कुछ बताए, अपनी सारी जमापूंजी निकाल ली थी।
आज जब शिखा लाल जोड़े में सजी बैठी थी, तो मानसी को उम्मीद थी कि कम से कम आज के दिन माजी और शिखा के चेहरे पर राघव और सुमित के लिए थोड़ी कृतज्ञता होगी। लेकिन वहां तो सिर्फ एक अनकहा गुरूर और शिकायतें ही नज़र आ रही थीं। शिखा अपनी सहेलियों से कह रही थी कि ‘मेरे भाइयों ने मेरी पसंद का डेकोरेशन नहीं करवाया, मैंने पिंक थीम बोला था, इन्होंने रेड करवा दिया।’ ये बातें मानसी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं।
तभी जयमाला की घोषणा हुई। डीजे की तेज़ आवाज़ और रिश्तेदारों की तालियों के बीच शिखा और दूल्हा स्टेज पर आमने-सामने खड़े थे। राघव और सुमित अपनी बहन के पीछे खड़े थे। मानसी देख सकती थी कि राघव की आँखें नम थीं। वो शिखा को फूलों की माला पहनाते हुए देख रहा था, जैसे कोई पिता अपनी बेटी को विदा कर रहा हो। उस एक पल में, राघव के लिए सारे ताने, सारी शिकायतें और सारा कर्ज बेमानी हो गया था। उसके लिए सिर्फ ये मायने रखता था कि उसकी छोटी बहन, जिसे उसने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज अपने नए घर जा रही है।
सुमित ने राघव के कंधे पर हाथ रखा। दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुरा दिए। ये मुस्कान उन दोनों के बीच की उस अनकही समझ की थी, कि उन्होंने अपना फ़र्ज़ निभा दिया। दुनिया चाहे जो कहे, माँ चाहे जितने ताने मारे, उन्होंने अपने पिता को दिया हुआ वचन पूरा कर दिया था।
मानसी की आँखों से भी आँसू छलक पड़े। विमला बुआ ने मानसी के आँसू पोंछते हुए कहा, “रो मत बहू। ये आंसू तुम्हारे पति की हार के नहीं, बल्कि उसकी जीत के हैं। इंसान अपना फ़र्ज़ निभा सकता है, लेकिन किसी की फितरत नहीं बदल सकता। सुमित्रा दीदी और शिखा को आज ये सब एक ‘हक’ लग रहा है। लेकिन एक दिन, जब शिखा अपने ससुराल में इसी तरह की ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबेगी, तब उसे अपने भाइयों का ये निस्वार्थ प्यार और उनका बहाया हुआ पसीना याद आएगा। और दीदी… वो तो अपनी कड़वाहट में ही जलती रहेंगी। तुम और तुम्हारे पति ने जो किया है, उसका पुण्य तुम्हें ज़रूर मिलेगा।”
जयमाला संपन्न हो चुकी थी। लोग खाना खाने की तरफ बढ़ रहे थे। मानसी ने एक गहरी सांस ली। उसने अपने मन से सारी कड़वाहट को बाहर निकाल दिया। उसने तय कर लिया कि अब वह अपनी सास के तानों और ननद की बेरुखी को अपने दिल पर नहीं लगाएगी। फ़र्ज़ की डोरी बहुत नाज़ुक होती है, लेकिन जब इसे निस्वार्थ भाव से बांधा जाता है, तो ये कभी नहीं टूटती।
राघव स्टेज से उतरकर मानसी के पास आया। उसके चेहरे पर एक सुकून था। “सब ठीक हो गया न मानसी?” उसने थकी हुई आवाज़ में पूछा।
मानसी ने मुस्कुराकर अपने पति का हाथ थाम लिया। “हाँ राघव, सब बहुत अच्छे से हो गया। तुमने एक बेटे और एक भाई का फ़र्ज़ बहुत खूबसूरती से निभाया है। मुझे तुम पर बहुत गर्व है।”
राघव ने गहरी सांस ली और मुड़कर उस स्टेज को देखा जहां शिखा बैठी थी। उसकी माँ सुमित्रा जी अभी भी किसी रिश्तेदार से इस बात की शिकायत कर रही थीं कि खाने में दो मिठाइयां कम क्यों रह गईं। लेकिन अब राघव को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसने मुस्कुराते हुए मानसी का हाथ पकड़ा और मेहमानों के बीच चला गया। उसने अपनी ज़िंदगी की एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली थी, और अब वो सिर्फ अपनी और मानसी की एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करने के लिए आज़ाद था।
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मूल लेखिका : कृति रश्मि