एक ज़िद्दी इश्क – नमिता पंडित

 सुहानी अभी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही एक सफेद रंग की एसयूवी आकर ठीक उसके सामने रुकी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और इससे पहले कि सुहानी कोई प्रतिक्रिया दे पाती, शौर्य ने उसका हाथ पकड़ा और उसे गाड़ी में बैठने का इशारा किया। उसकी आँखों में एक अजीब सी जल्दबाज़ी और एक ऐसा अधिकार था

जिसे सुहानी चाहकर भी टाल नहीं सकी। जैसे ही वह सीट पर बैठी, शौर्य ने बिना एक भी पल गंवाए गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया और एक्सीलेटर पर ज़ोर से पैर रख दिया। गाड़ी हवा की गति से सड़क पर दौड़ने लगी।

सुहानी अभी तक सकते में थी। उसने कुछ देर पहले ही तो शौर्य को उस कॉफी शॉप में बुलाया था। पूरे पाँच साल बाद। इन पाँच सालों में दोनों के बीच बस खामोशी का एक लंबा रेगिस्तान था। सुहानी ने अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों और अपने छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई के खातिर अपने प्यार की बलि चढ़ा दी थी।

उसने खुद ही शौर्य से दूर जाने का फैसला किया था, बिना उसे पूरी सच्चाई बताए। लेकिन आज, जब उसकी सारी ज़िम्मेदारियां पूरी हो चुकी थीं,

तो वह हिम्मत करके शौर्य से माफी मांगने और उसे अपनी असलियत बताने गई थी। कॉफी शॉप में उसने रोते हुए बस इतना ही कहा था, “शौर्य, मैंने जो कुछ भी किया…” लेकिन शौर्य ने उसे वाक्य पूरा ही नहीं करने दिया। वह अचानक उठा, सुहानी का हाथ पकड़ा और उसे बाहर ले आया। 

“शौर्य! ये क्या पागलपन है? हम कहाँ जा रहे हैं?” सुहानी ने घबराहट और उलझन भरे स्वर में पूछा। गाड़ी के शीशे पर बारिश की बूंदें ज़ोर-ज़ोर से टकराने लगी थीं। 

लेकिन शौर्य ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी नज़रें सामने सड़क पर गड़ी थीं और उसके जबड़े कड़े थे। उसके चेहरे पर एक ऐसा भाव था जो सुहानी ने पहले कभी नहीं देखा था। वह न तो गुस्से में लग रहा था और न ही शांत था; उसके भीतर जैसे कोई बहुत बड़ा तूफान शांत होने की कगार पर था, लेकिन उसे डर था कि कहीं कोई छोटी सी हवा का झोंका उसे फिर से न भड़का दे। 

“शौर्य, प्लीज़ मुझे बताओ! तुम ऐसे खामोश क्यों हो? मेरी बात तो सुनो…” सुहानी ने फिर कोशिश की।

“चुपचाप बैठी रहो सुहानी। आज तुम सिर्फ देखोगी और मैं करूंगा। तुम्हारे सोचने का वक्त अब खत्म हो चुका है,” शौर्य ने एक भारी और दृढ़ आवाज़ में कहा, जिसमें किसी भी बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी। सुहानी चुपचाप अपनी सीट से टिक गई। उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि शौर्य उसे कहाँ ले जा रहा है। 

कुछ ही देर में गाड़ी एक शांत और पॉश इलाके में दाखिल हुई और एक बड़े से खूबसूरत बंगले के सामने जाकर रुकी। सुहानी का दिल एक पल के लिए जैसे धड़कना भूल गया। यह शौर्य का घर था। पाँच साल पहले वह यहाँ अक्सर शौर्य की कॉलेज फ्रेंड के रूप में आती थी। यहाँ की हर ईंट, हर कोने से उसकी पुरानी यादें जुड़ी थीं। 

शौर्य ने गाड़ी बंद की और बाहर निकलकर सुहानी की तरफ का दरवाज़ा खोला। उसने सुहानी का हाथ थामा और उसे लेकर पोर्च की सीढ़ियां चढ़ने लगा। दरवाजे पर लगे शीशे से सुहानी ने देखा कि अंदर हॉल में शौर्य की माँ, देविका जी, सोफे पर बैठकर कुछ मैगज़ीन पढ़ रही थीं। 

शौर्य ने सीधा दरवाज़ा खोला और सुहानी का हाथ पकड़े हुए अंदर दाखिल हुआ। कदमों की आहट सुनकर देविका जी ने अपनी नज़रें उठाईं। उनके चेहरे पर पहले तो उलझन के भाव उभरे, लेकिन जैसे ही उन्होंने सुहानी को पहचाना, उनके चेहरे की रंगत ही बदल गई। उनके हाथ से मैगज़ीन छूट कर गिर पड़ी। सुहानी, जिसे उन्होंने अपनी बेटी की तरह चाहा था और जिसके अचानक गायब हो जाने से शौर्य टूट कर बिखर गया था, आज इतने सालों बाद उनके सामने खड़ी थी।

“सुहानी… बेटा?” देविका जी की आवाज़ में अचरज, खुशी और एक पुरानी शिकायत, सब कुछ एक साथ घुल गया था। वह अपनी जगह से उठीं और सुहानी की तरफ बढ़ीं।

सुहानी की आँखें भर आईं। वह देविका जी के पैर छूने के लिए नीचे झुकी, लेकिन उन्होंने उसे बीच में ही रोककर अपने सीने से लगा लिया। “कहाँ चली गई थी तू पगली? तुझे पता है इस घर ने और मेरे बेटे ने तुझे कितना याद किया है?” देविका जी की आँखें भी छलक पड़ी थीं। सुहानी के पास कोई जवाब नहीं था; वह बस सुबक रही थी।

देविका जी ने बड़े प्यार से सुहानी का माथा चूमा और उसे पकड़कर सोफे पर अपने पास बिठा लिया। वह सुहानी से ढेरों सवाल पूछना चाहती थीं। वह पूछना चाहती थीं कि वह कहाँ थी, कैसी थी, उसने शौर्य का दिल क्यों तोड़ा। लेकिन इससे पहले कि देविका जी कोई भी सवाल पूछ पातीं, शौर्य जो अब तक उनके सामने हाथ बांधे खड़ा था, अचानक बोल पड़ा।

“माँ,” शौर्य की आवाज़ पूरे हॉल में गूंज गई। देविका जी और सुहानी, दोनों ने हैरान होकर उसकी तरफ देखा। 

“माँ, हम दोनों शादी कर रहे हैं। और वो भी इसी महीने की पच्चीस तारीख को,” शौर्य ने बिना किसी भूमिका के सीधा ऐलान कर दिया।

हॉल में एक दम से सन्नाटा छा गया। बाहर हो रही बारिश की आवाज़ अब और भी साफ़ सुनाई देने लगी थी। देविका जी पूरी तरह से अवाक रह गईं। उनका दिमाग इस अचानक मिली खबर को प्रोसेस नहीं कर पा रहा था। 

“क्या… क्या मतलब इसी महीने? शौर्य, तू होश में तो है? शादी कोई बच्चों का खेल है क्या? अभी तो यह लड़की इतने सालों बाद वापस लौटी है। न हमने कोई बात की, न इसके घर वालों से मिले। और फिर इतनी जल्दी तैयारी कैसे होगी? कार्ड, रिश्तेदार, वेन्यू… कुछ तो सोच!” देविका जी ने हकलाते हुए अपनी हैरानी ज़ाहिर की। 

सुहानी भी फटी-फटी आँखों से शौर्य को देख रही थी। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि शौर्य ऐसा कुछ करेगा। 

शौर्य आगे बढ़ा और अपनी माँ के पास घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपनी माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और बहुत ही नर्म, लेकिन पक्की आवाज़ में बोला, “माँ, मैंने पाँच साल इस दिन का इंतज़ार किया है। इन पाँच सालों में मैंने एक-एक दिन कैसे काटा है, ये सिर्फ तुम जानती हो। आज जब ये वापस आ गई है, तो मैं इसे सोचने का एक और पल नहीं देना चाहता। अगर मैंने इसे सोचने का मौका दिया, तो इसका वो फालतू का त्याग वाला दिमाग फिर से जाग जाएगा। ये फिर सोचेगी कि ये मेरे लायक नहीं है, या इसके परिवार को इसकी ज़रूरत है, या समाज क्या कहेगा। माँ, मैं अब कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। मैं नहीं चाहता कि सुहानी का मन फिर से बदल जाए और ये मुझे छोड़कर कहीं गायब हो जाए।”

शौर्य की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी और बेइंतहा प्यार था। उसने सुहानी की तरफ देखा। उसकी आँखों में वो डर साफ दिखाई दे रहा था जो उसने पिछले पाँच सालों तक हर रात महसूस किया था—सुहानी को हमेशा के लिए खो देने का डर।

इतना सुनते ही सुहानी की आँखों से आंसुओं की एक नई धार बह निकली। उसका चेहरा शर्म, खुशी और एक गहरे पश्चाताप से लाल हो गया था। उसने अपना चेहरा नीचे झुका लिया क्योंकि वह शौर्य के उस बेपनाह प्यार का सामना नहीं कर पा रही थी जिसके साथ उसने इतना बड़ा अन्याय किया था। उसे एहसास हुआ कि शौर्य उससे कितना प्यार करता है, इतना कि वह उसकी किसी भी गलती, किसी भी दूरी को एक झटके में मिटा देना चाहता था।

देविका जी ने अपने बेटे की आँखों में वो सुकून देखा जो सालों से गायब था। उन्होंने प्यार से शौर्य के गाल थपथपाए और फिर मुड़कर सुहानी की तरफ देखा। सुहानी का शर्म से झुका हुआ चेहरा सब कुछ बयां कर रहा था। देविका जी के होंठों पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई। 

तभी बाहर से किसी के भागते हुए आने की आवाज़ आई। मुख्य दरवाज़ा ज़ोर से खुला और शौर्य का छोटा भाई, विवान, खुद को बारिश से बचाता हुआ अंदर घुसा। उसने अपने गीले बाल झटके और अपना बैग ज़मीन पर फेंकते हुए बोला, “यार, क्या बारिश है! पूरा शहर डूब जाएगा आज…”

बोलते-बोलते उसकी नज़र सोफे पर बैठी सुहानी और घुटनों के बल बैठे शौर्य पर पड़ी। विवान एक पल के लिए बुत बनकर खड़ा रह गया। उसने अपनी आँखें मलीं, जैसे उसे यकीन नहीं हो रहा हो कि वह क्या देख रहा है। 

“सुहानी दीदी…?” विवान के मुँह से अचरज भरी चीख निकल गई। “आप… आप वापस आ गईं? हे भगवान, मुझे तो लगा था कि भईया की ज़िंदगी अब ‘देवदास’ पार्ट टू बनकर ही खत्म होगी!” विवान ने अपने चिर-परिचित मज़ाकिया अंदाज़ में कहा।

विवान की इस बात पर हॉल का वो भावुक और भारी माहौल अचानक से हल्का हो गया। देविका जी के चेहरे पर हँसी फूट पड़ी। सुहानी ने भी अपने आंसू पोंछते हुए विवान की तरफ देखकर एक नम मुस्कान दी। शौर्य ने विवान को घूर कर देखा, लेकिन उसकी आँखों में भी एक सुकून भरी चमक थी।

विवान भागकर देविका जी के पास आया और बोला, “माँ, अब तो पार्टी बनती है। मेरे भईया वापस फॉर्म में आ गए हैं।”

देविका जी ने विवान का कान खींचते हुए कहा, “पार्टी नहीं, शादी की तैयारी करनी है। तेरे भईया का हुक्म है कि इसी महीने की पच्चीस तारीख को शादी होगी।”

विवान की आँखें फटी की फटी रह गईं। “पच्चीस? माँ, आज तो तीन तारीख हो गई! बस बाइस दिन? ये कोई टू-मिनट नूडल्स वाली शादी है क्या?” 

विवान की इस बात पर सुहानी से रहा नहीं गया और वह खिलखिला कर हँस पड़ी। पाँच सालों के बाद उस घर में सुहानी की हँसी गूंजी थी, और शौर्य के लिए दुनिया का सबसे खूबसूरत संगीत वही था। 

“तू चुप कर विवान,” शौर्य ने उठते हुए कहा। “शादी मतलब शादी। कार्ड छपें या न छपें, मेहमान आएं या न आएं, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे बस मेरी ज़िंदगी वापस चाहिए, और वो भी पूरी तरह से मेरी होकर।”

सुहानी ने अपनी नज़रें उठाईं और सीधे शौर्य की आँखों में देखा। उन आँखों में अब कोई डर नहीं था, न शौर्य की आँखों में और न सुहानी की। दोनों के बीच जो एक अदृश्य दीवार सालों से खड़ी थी, वह आज हमेशा के लिए ढह चुकी थी। देविका जी ने सुहानी का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “ठीक है बेटा, अगर मेरे बेटे की खुशी इसी में है, तो ऐसा ही होगा। अब से तू मेरी इस घर की बहू है, और ये कोई नहीं बदल सकता।”

बारिश अब थोड़ी थम गई थी, लेकिन उस घर के अंदर खुशियों की जो बारिश शुरू हुई थी, वह अब कभी रुकने वाली नहीं थी।

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दोस्तों, आपको शौर्य का यह जल्दबाज़ी भरा फैसला कैसा लगा? क्या प्यार में कभी-कभी ऐसे अड़ियल और ज़िद्दी फैसले लेना ज़रूरी हो जाता है ताकि हम अपने प्यार को खो न दें? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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लेखिका : नमिता पंडित

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