एक सखी, जो देवरानी के रूप में आई थी – संगीता अग्रवाल 

कमरे में बिखरे हुए कपड़ों के ढेर के बीच मीरा हताश होकर बेड के किनारे बैठ गई। माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। अलमारी के सारे रैक खाली हो चुके थे, साड़ियाँ, सूट, शॉल—सब कुछ बेड पर एक पहाड़ की तरह जमा था, लेकिन वह एक चीज़ नदारद थी जिसकी उसे तलाश थी।

“दीदी, आप इतनी देर से क्या ढूँढ रही हैं इस अलमारी में?” पीछे से एक चहकती हुई आवाज़ आई।

मीरा ने मुड़कर देखा। दरवाज़े पर उसकी देवरानी, नव्या खड़ी थी। हाथ में कॉफ़ी का मग और चेहरे पर वही बेफिक्र मुस्कान जो मीरा को कभी-कभी बहुत प्यारी लगती थी, तो कभी-कभी बहुत चुभती थी।

“पूरा घंटा बर्बाद हो गया नव्या,” मीरा ने थकी हुई आवाज़ में कहा। “मैंने पूरी अलमारी तीन-तीन बार छान डाली पर वो साड़ी नहीं मिली। माँजी की वो नीली कांजीवरम साड़ी ढूँढ रही हूँ, जो उन्होंने अपनी शादी में पहनी थी। वो खानदानी निशानी है।”

“नीली कांजीवरम? जिस पर सुनहरे मोर बने हैं?” नव्या ने कॉफ़ी का घूंट भरते हुए पूछा। “पर आप उस साड़ी को अभी क्यों ढूँढ रही हैं? अभी तो कोई त्यौहार भी नहीं है।”

मीरा थोड़ा झिझकी। “बस… ऐसे ही। मन कर रहा था देखने का। सोचा था उसे ड्राई क्लीन के लिए भेज दूँ, ताकि सुरक्षित रहे।”

नव्या ने लापरवाही से कंधे उचकाए। “ओह, वो साड़ी! दीदी, आप बेकार में परेशान हो रही हैं। दरअसल, आज सुबह ही माँजी ने वो साड़ी मुझे दे दी है। उन्होंने कहा कि यह उनकी सबसे कीमती चीज़ है और अब यह मेरे पास रहेगी।”

नव्या की यह बात सुनकर मीरा सन्न रह गई। उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। “तु… तुम्हें दे दी?”

“हाँ दीदी,” नव्या ने मुस्कुराते हुए कहा और अपने कमरे की तरफ मुड़ गई। “मैं तो खुद हैरान थी, पर उन्होंने ज़िद करके मेरे हाथ में थमा दी। अच्छा, मैं चलती हूँ, मेरी ऑनलाइन मीटिंग है।”

नव्या चली गई, लेकिन मीरा के कानों में उसके शब्द पिघले हुए सीसे की तरह गूंज रहे थे। दो दिन पहले… सिर्फ़ दो दिन पहले की ही तो बात थी।

मीरा को याद आया, शाम का वक़्त था। सास, सुमित्रा देवी, अपनी आराम कुर्सी पर बैठी थीं और मीरा उनके पैरों में तेल की मालिश कर रही थी। सुमित्रा जी ने बड़े स्नेह से मीरा के सिर पर हाथ फेरा था और कहा था—

“मीरा, अगले हफ्ते मेरी और तेरे बाबूजी की 50वीं सालगिरह है। स्वर्ण जयंती। मैं चाहती हूँ कि उस दिन पूजा में तू मेरी वो शादी वाली नीली कांजीवरम साड़ी पहने। वो साड़ी सिर्फ़ कपड़ा नहीं है, इस घर की ‘मर्यादा’ है। और दस सालों में तूने इस घर को जिस तरह संभाला है, उस मर्यादा की असली हक़दार तू ही है। मैंने वो साड़ी तेरी अलमारी के सबसे ऊपर वाले रैक में रखवा दी है। उसे पहनना, मुझे बहुत खुशी होगी।”

और आज? आज वही साड़ी नव्या के पास थी? और नव्या ने कहा कि माँजी ने उसे “दे दी” है?

मीरा की आँखों में आँसू तैरने लगे। यह सिर्फ़ एक साड़ी का मामला नहीं था। यह विश्वास का मामला था। मीरा इस घर की बड़ी बहू थी। पिछले दस सालों से उसने अपनी एम.ए. की डिग्री संदूक में बंद करके इस घर की रसोइया, नर्स और मैनेजर की भूमिका निभाई थी। नव्या तो अभी छह महीने पहले ब्याह कर आई थी। मॉडर्न, नौकरीपेशा, और घर के कामों से कोसों दूर रहने वाली नव्या।

क्या माँजी को अब मीरा की सेवा और समर्पण पुराना लगने लगा था? क्या नई बहू के आते ही पुरानी बहू की अहमियत ख़त्म हो गई? मीरा का दिल भारी हो गया। उसे लगा जैसे उसका स्थान छीना जा रहा है।

उसने साड़ियों का ढेर वापस अलमारी में ठूंसा और भारी कदमों से बाहर निकल गई।

शाम को घर का माहौल सामान्य था, लेकिन मीरा के अंदर तूफ़ान चल रहा था। सुमित्रा जी हॉल में बैठी टीवी देख रही थीं। मीरा चाय लेकर आई।

“माँजी, चाय,” मीरा ने हमेशा की तरह कप बढ़ाया, लेकिन आज उसकी आवाज़ में वो खनक नहीं थी।

“रख दे बेटा,” सुमित्रा जी ने बिना नज़र हटाए कहा। “अरे सुन, नव्या कहाँ है? उसे बुला ज़रा। मुझे उससे कुछ ज़रूरी काम था।”

मीरा का दिल फिर से दुखा। पहले हर ज़रूरी काम के लिए ‘मीरा’ पुकारी जाती थी, अब ‘नव्या’।

“वो अपने कमरे में है, काम कर रही होगी,” मीरा ने रूखा जवाब दिया और किचन में चली गई।

रात के खाने की मेज पर भी मीरा चुप रही। उसके पति, राघव ने पूछा भी, “क्या हुआ मीरा? तबियत ठीक है?” तो उसने सिरदर्द का बहाना बना दिया। उसे नव्या की तरफ देखने का भी मन नहीं कर रहा था जो बड़े चाव से सुमित्रा जी को अपने ऑफिस के किस्से सुना रही थी।

अगले चार दिन मीरा ने खुद को एक खोल में बंद कर लिया। वह काम करती, पर मशीनी अंदाज़ में। वह सुमित्रा जी से बात करती, पर सिर्फ़ ‘हाँ’ या ‘ना’ में। वह इंतज़ार कर रही थी कि शायद सुमित्रा जी उस साड़ी का ज़िक्र करेंगी, शायद कहेंगी कि “मीरा, साड़ी तैयार कर लेना।” पर सुमित्रा जी ने एक बार भी उस साड़ी का नाम नहीं लिया।

सालगिरह का दिन आ गया।

घर को गेंदे के फूलों से सजाया गया था। रिश्तेदार आने शुरू हो गए थे। सुबह पूजा का मुहूर्त दस बजे का था।

नौ बजे सुमित्रा जी मीरा के कमरे में आईं। मीरा शीशे के सामने खड़ी थी। उसने एक साधारण सी पीली सूती साड़ी पहन रखी थी।

सुमित्रा जी चौंक गईं। “अरे मीरा! यह क्या पहना है? मैंने तुझे वो नीली कांजीवरम पहनने को कहा था न? तूने वो क्यों नहीं पहनी?”

मीरा का सब्र अब टूट गया। वह पलटी, उसकी आँखों में आँसू और गुस्सा दोनों थे।

“माँजी, मैं वो साड़ी कैसे पहनती जो आपके पास है ही नहीं? और फिर, जिसका हक़ हो, उसे ही पहननी चाहिए न।”

सुमित्रा जी उलझन में पड़ गईं। “क्या कह रही है तू? साफ़-साफ़ बोल।”

“माँजी, आपने वो साड़ी नव्या को दे दी,” मीरा की आवाज़ भर्रा गई। “उसने मुझे खुद बताया। अगर आपको लगता है कि नव्या उस खानदानी निशानी के ज़्यादा काबिल है, तो मुझे कोई शिकायत नहीं है। पर कम से कम मुझे झूठा दिलासा तो न देतीं कि मैं इस घर की ‘मर्यादा’ हूँ। मुझे बहुत दुःख हुआ माँजी।”

सुमित्रा जी कुछ पल के लिए शांत रहीं। फिर उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आ गई। “अच्छा! तो यह बात है। तूने यह सोच लिया कि मैंने तेरा पत्ता काट दिया?”

“नव्या ने खुद कहा कि साड़ी उसके पास है,” मीरा ने सिसकते हुए कहा।

“हाँ, है उसके पास,” सुमित्रा जी ने स्वीकार किया। “पर तूने यह नहीं पूछा कि क्यों है? चल मेरे साथ।”

सुमित्रा जी ने मीरा का हाथ पकड़ा और उसे खींचते हुए नव्या के कमरे की तरफ ले गईं। दरवाज़ा बंद था। सुमित्रा जी ने बिना खटखटाए दरवाज़ा खोल दिया।

अंदर का नज़ारा देखकर मीरा ठिठक गई।

कमरे में बेड पर वो नीली कांजीवरम साड़ी फैली हुई थी। लेकिन यह वो साड़ी नहीं थी जिसे मीरा जानती थी। साड़ी का पल्लू, जो पुराना होने के कारण गलने लगा था और जिसमें कई जगह से ज़री निकल चुकी थी, अब बिल्कुल नया लग रहा था। नव्या ज़मीन पर बैठी थी, उसके आस-पास सुनहरे धागे, सुई और कुछ पैचवर्क के टुकड़े बिखरे पड़े थे। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे, जैसे वह पूरी रात जागी हो।

नव्या के हाथ में सुई थी और वह साड़ी के बॉर्डर पर बहुत बारीकी से रफू (mernding) कर रही थी।

“अरे माँजी! आपने दरवाज़ा क्यों खोल दिया? अभी दस मिनट का काम बाकी था, सरप्राइज़ ख़राब हो गया,” नव्या ने हड़बड़ाते हुए साड़ी छिपाने की कोशिश की।

मीरा अवाक खड़ी थी। “यह… यह क्या हो रहा है?”

सुमित्रा जी ने मीरा के कंधे पर हाथ रखा। “देख मीरा, दो दिन पहले जब मैंने वो साड़ी निकाली थी तुझे देने के लिए, तो मैंने देखा कि उसका पल्लू चूहों ने कुतर दिया था और जगह-जगह से कपड़ा भी गल गया था। मैं डर गई थी। अगर मैं तुझे वो फटी साड़ी देती, तो तुझे लगता कि मैं तेरा अपमान कर रही हूँ या तुझे शगुन में फटी चीज़ दे रही हूँ। मेरा दिल बैठ गया था।”

सुमित्रा जी ने नव्या की ओर इशारा किया। “तब मैंने नव्या से बात की। मुझे याद आया कि नव्या ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया है और उसे एम्ब्रॉयडरी (कढ़ाई) का बहुत शौक है। मैंने उसे साड़ी दी और पूछा कि क्या इसका कुछ हो सकता है? नव्या ने मुझसे कहा कि ‘माँजी, आप दीदी को मत बताना, मैं इसे ठीक कर दूँगी। यह दीदी के लिए मेरा सरप्राइज़ होगा’।”

नव्या मुस्कुराई, हालाँकि उसकी उंगलियों में सुई की चुभन के निशान थे। “दीदी, मुझे पता था यह साड़ी आपके लिए कितनी मायने रखती है। अगर मैं आपको बताती कि यह फट गई है, तो आपका दिल टूट जाता। इसलिए मैंने माँजी से कहा कि वो आपको कुछ न बताएं। मैं पिछले तीन रातों से इसे रिस्टोर (restore) कर रही हूँ। मैंने इस पर ज़री का नया काम किया है ताकि फटे हुए हिस्से छिप जाएं और साड़ी नई जैसी लगे।”

मीरा के पैरों में जान नहीं रही। वह वहीं ज़मीन पर बैठ गई और साड़ी को हाथ लगाया। नव्या ने इतनी सफाई से काम किया था कि पुरानी साड़ी अब एक डिज़ाइनर मास्टरपीस लग रही थी।

“तुम… तुम मेरे लिए यह कर रही थी?” मीरा ने नव्या की ओर देखा, शर्मिंदगी से उसकी नज़रें झुक गईं। “और मैंने सोचा कि…”

“कि मैंने साड़ी हथिया ली?” नव्या हंस पड़ी। “ओह दीदी! आप भी न! मुझे साड़ी पहनना आता भी नहीं ठीक से। मैं तो जींस वाली हूँ। यह भारी भरकम साड़ी तो सिर्फ आप ही संभाल सकती हैं। आप में वो ग्रेस है।”

मीरा की आँखों से अब जो आँसू गिरे, वो दुःख के नहीं, पश्चाताप और प्रेम के थे। उसने जिस देवरानी को अपनी प्रतिद्वंद्वी समझा, वह असल में उसकी सहयोगी थी। जिस सास पर उसने शक किया, वह असल में उसकी भावनाओं को चोट लगने से बचा रही थी।

“मुझे माफ़ कर दे नव्या,” मीरा ने नव्या का हाथ अपने हाथों में ले लिया। “मैं… मैं बहुत छोटी सोच की निकली। मैंने तुम पर शक किया।”

“अरे बस-बस, अब इमोशनल ड्रामा बंद करो दीदी,” नव्या ने शरारती अंदाज़ में कहा। “जल्दी से तैयार हो जाओ। यह साड़ी पहनकर जब आप नीचे उतरेंगी, तो राघव भैया तो बेहोश ही हो जाएंगे। पर हाँ, क्रेडिट मुझे देना कि मैंने डिज़ाइन की है!”

सुमित्रा जी ने हंसते हुए दोनों बहुओं को देखा। “देखा? पुरानी नींव और नई ईंटें मिल जाएं, तो घर का ढांचा कितना मज़बूत हो जाता है। मीरा, तू इस घर की मर्यादा है, और नव्या इस घर का हुनर। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरी हो।”

मीरा उठी, उसने अपनी पीली साड़ी का पल्लू पोंछा और नव्या को गले लगा लिया। उस आलिंगन में सारी असुरक्षाएं, सारी गलतफहमियां पिघल गईं।

एक घंटे बाद, जब मीरा पूजा के लिए हॉल में उतरी, तो वह नीली साड़ी रोशनी में दमक रही थी। राघव उसे एकटक देख रहा था। मेहमान साड़ी की तारीफ कर रहे थे।

“बहुत सुंदर साड़ी है मीरा,” एक बुआजी ने कहा। “बिल्कुल नई लगती है।”

मीरा ने मुस्कुराकर नव्या की ओर देखा, जो एक कोने में खड़ी होकर मोबाइल से वीडियो बना रही थी। मीरा ने इशारे से नव्या को अपने पास बुलाया।

“बुआजी,” मीरा ने नव्या को अपने साथ खड़ा करते हुए गर्व से कहा, “साड़ी तो पुरानी है, खानदानी है। लेकिन इसमें जो चमक है, वो मेरी छोटी बहन नव्या की मेहनत की है। अगर यह न होती, तो आज यह साड़ी और मैं, दोनों फीके रह जाते।”

नव्या का चेहरा खिल उठा। सुमित्रा जी दूर खड़ी यह देख रही थीं और मन ही मन अपनी 50 साल की गृहस्थी की सबसे बड़ी उपलब्धि पर मुस्कुरा रही थीं—कि उन्होंने अपनी बहुओं को ‘देवरानी-जेठानी’ नहीं, बल्कि ‘बहनें’ बनते देख लिया था।

उस दिन मीरा ने सिर्फ़ साड़ी नहीं पहनी थी, उसने एक नया रिश्ता ओढ़ लिया था। उसे समझ आ गया था कि घर में किसी के आने से किसी की जगह कम नहीं होती, बल्कि दिल बड़ा करो तो जगह और बन जाती है। अलमारी में साड़ी तो मिल गई थी, पर उससे कहीं ज़्यादा कीमती चीज़ मिल गई थी—एक सखी, जो देवरानी के रूप में आई थी।

मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल 

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