एक रिश्ता ऐसा भी – डाॅ संजु झा

अमन और नमन को अपने पैरों पर खड़ा देखकर नीता को विश्वास ही नहीं हो रहा है।उन दोनों के साथ नीता का क्या रिश्ता है? गुरु -शिष्य का, माॅं -बेटे का या मानवता का,यह आज तक नहीं समझ पाई।जब नीता मात्र पच्चीस साल की थी,तभी उसने सात वर्षीय अमन और नमन को गोद लेने का कठिन फैसला।

किया था।उसी समय से जिस तरह दीये अपनी प्रकृति के अनुसार हवाओं से जूझते हुए अंधकार को भगाने और किसी के जीवन में उजाला भरने के लिए अपनी देह को निमित्त बनाते हैं,उसी प्रकार वह अपनी संपूर्ण ओजस्विता से दोनों बच्चों के संपूर्ण व्यक्तित्व बनाने के यज्ञ में स्वयं को होम करती रही।खुशी की बात है कि उसकी तपस्या सफल रही।

गुजरा हुआ कल  नीता को वर्त्तमान  से  बार-बार खींचकर अतीत की ओर ले जा रहा था। उसे महसूस हो रहा है कि मानो कल की ही बात है।नीता की स्नातक की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी।वह बी एड कर रही थी।उसी समय उसके माता-पिता उसकी शादी के लिए लड़के देख रहें थे।

दुबली -पतली साॅंवली-सलोनी नीता का गुण और व्यवहार लड़केवाले को प्रभावित नहीं करता,केवल उसका साॅंवला रंग ही उनकीअस्वीकृति का कारण बन जाता।दिखावटी  गुड़ियाॅं बनकर आत्मसम्मान खोने से अच्छा दूसरे शहर जाकर स्कूल में शिक्षिका बनना उसने बेहतर समझा।उसके माता-पिता अकेली लड़की को किसी हालत में दूसरे शहर नहीं भेजना चाहते थे।

उसकी माॅं ने उसे समझाते हुए कहा -“बेटी!बात मान लो,शादी के बाद नौकरी करना।अकेली दूसरे शहर में रहोगी,तो लोग बातें बनाएंगे!”

नीता गुस्से में -“माॅं! लोग तो हमेशा बातें बनाऐंगे।अभी भी तो बातें बनाकर कह रहें हैं कि काली रंगत के कारण नीता को लड़केवाले देख-देखकर छोड़ देते हैं!”

माॅं-” बेटी!लोग तो जो मुॅंह में आता है,वहीं कह देते हैं।”

नीता -“माॅं!अब मैं अपने दिल की सुनूॅंगी।मुझे नौकरी करने दूसरे शहर जाना ही है!”

 नीता की माॅं अपने पति से कहती हैं -“अब आप ही समझाओ,मेरी तो सुनती ही नहीं है!”

नीता के पिता -“अभी नीता को अपने पैरों पर खड़े होने दो, फिर रिश्ते खुद-ब-खुद चलकर आऐंगे।”

कुछ समय पश्चात् बी एड की डिग्री मिलने पर नीता ने सरकारी स्कूल में शिक्षिका के तौर पर नौकरी ज्वाइन कर ली।वह बड़ी तन्मयता से स्कूल में बच्चों  को पढ़ाती। बच्चों से उसका भावनात्मक रिश्ता जुड़ता जा रहा था।कभी गरीब बच्चों की फीस भर देती,कभी उनकी अन्य जरूरतें पूरी कर देती। इसमें उसको सुकून का एहसास होता।

 वक्त अपनी गति में व्यतीत हो रहा था, परन्तु अचानक से एक हादसे ने उसकी ज़िन्दगी का रुख ही पलट दिया।सर्दी का मौसम था , ठंढ़ के कारण स्कूलों में छुट्टियाॅं हो गई थी।नीता का समय काटे नहीं कट रहा था।वह बालकनी  में बैठी कोई किताब पढ़ रही थी।अचानक से बहुत सारे लोगों की आवाजों ने उसका ध्यान खींचा। बाहर आकर देखने पर पता चला कि भयानक एक्सीडेंट में पति-पत्नी दोनों मारे गए हैं। उस समय तो उसे कुछ पता नहीं चला, परन्तु अगली सुबह उसे पता चला कि उसके स्कूल के छात्र अमन और नमन के माता-पिता उस दुर्घटना में मारे गए हैं।यह खबर सुनते ही नीता स्तब्ध हो उठी।उसने तुरंत उनके घर जाने का फैसला किया।

अमन और नमन के घर जाने पर उसने देखा कि नीरसता वहाॅं पसरी हुई थी। सगे-संबंधी शव की अंतिम मुक्ति देकर वापस लौट चुके थे।बूढ़ी दादी बच्चों को अपने ऑंचल में समेटे सुबक रहीं थीं। उन्हें देखकर उसे ऐसा लगा मानो अचानक से गम का समंदर आकर उसके सामने खड़ा हो गया हो। निरीह मासूम को देखकर उसे अपना सिर घूमता नजर आया। जब दर्द गहरा होता है,तबऑंसू बिना रोऍं ,बिना आवाज के ही बहने लगते हैं।सन्नाटे के अंधकार में डूबा हुआ उनका जीवन और सहमा हुआ बचपन!

दर्दनाक  हादसे ने  बच्चों की  हर आकांक्षा,हर उम्मीद का गला घोंट दिया था ।उस हृदयविदारक दृश्य को देखकर नीता का अंतर्मन  विदीर्ण हो उठा।उसे देखकर  बच्चों की बूढ़ी दादी सुबकती-सिसकती एक चीत्कार के साथ रो पड़ी। तत्क्षण उसने मन-ही-मन तीनों को अपने घर लाने का फैसला किया।उन बच्चों के लिए जीना आसान नहीं था।उन दर्दनाक यादों से खुद को अलग करना बहुत ही मुश्किल था।एक दिन दोनों बच्चों को चुप कराती हुई बूढ़ी दादी का भी बॅंधा हुआ सब्र का बाॅंध ढ़ह पड़ा। जोर-जोर से हिचकियाॅं लेकर रोने लगीं।नीता ने उन्हें चुप कराते हुए कहा -“दादी!आप ही हिम्मत हार जाओगी,तो इन्हें कौन सॅंभालेगा?”

दादी -बिटियाॅं! मैं तो खुद कब्र में पाॅंव लटकाऍं बैठी हूॅं। बच्चों को किस्मत ने मरुस्थल के ठीक बीचों -बीच ला बिठाया है, जहाॅं न तो छाॅंव है,न कोई राह!”

नीता -“दादी!ऐसे बच्चों को हतोत्साहित नहीं करते, कोई -न-कोई राह तो निकल ही आएगी!”

नीता स्कूल खुलने पर प्रिंसिपल से मिलकर बच्चों की समस्या का समाधान करना चाहती थी, परन्तु तब तक दूसरी समस्या आ खड़ी हुई।बूढ़ी दादी इस सदमे को सहन न कर सकी और नींद में ही अनंतधाम की  यात्रा पर निकल पड़ी।असमय ही अस्त हुए सूरज ने बच्चों को भीतर तक अंधकार में ढकेल दिया।उनकी पथराईं ऑंखें अपनों को ढ़ूॅंढ़ रहीं थीं । शून्य में पथराईं ऑंखों से निहारना, ऑंसुओं की बाढ़, ज्वालामुखी -सा भूचाल उनकी जिंदगी को तबाह कर रहा था।उनकी जिंदगी बचाने के लिए नीता ने दोनों  को गोद लेने का सुदृढ़ फैसला किया।

बच्चों को गोद लेने का फैसला नीता के परिवार और समाज को हैरान कर गया।उसके माता-पिता ने उसे समझाते हुए कहा -” नीता!दोनों  बच्चों से तुम्हारा क्या रिश्ता है,जो तुम अपनी जिंदगी बर्बाद करने चली हो?इनके कारण तुम्हारी जिंदगी में बहुत सारी समस्याऍं उपस्थित होंगी!”

नीता -“माॅं -पिताजी!एक रिश्ता ऐसा भी होता है, जहाॅं कोई नाम न होकर मात्र मानवता ही होती है। जहाॅं तक समस्याओं की बात है तो जीवन किसी सरल रेखा-सा नहीं चल सकता है,वह अपनी इच्छानुसार मोड़ ले ही लेता है!”

अमन और नमन के गोद लेने के कारण उसकी जिंदगी में सवालों का मकड़जाल हमेशा उसके आस-पास बना रहता।उसे एहसास होने लगा कि लोगों के दुख पर घड़ियाली ऑंसू बहानेवाले ही अधिकतर रहें हैं। धीरे-धीरे समाज का घिनौना सच उसके सामने उजागर होने लगा।लोग दोनों बच्चों के  टूटे हुए मनोबल को  और अधिक बिखेरने की कोशिश करतें, परन्तु एक मजबूत स्तंभ की भाॅंति नीता उनके पीछे खड़ी रहती।

नीता की निजी  जिंदगी का एक अध्याय पीछे छूट गया।अब उसकी जिंदगी की किताब में दोनों बच्चों के रूप में नया अध्याय जुड़ गया था,जिसे उसे पढ़ना था। लेकिन उसे पता नहीं था कि वह अध्याय उसके लिए कैसा साबित होगा?

कुछ समय तक बच्चे सदमे में बने रहें, परन्तु नीता ने  सदैव उन्हें हौसला देते हुए कहा -” बच्चों ! तुम्हें  आईने की तरह नाजुक नहीं बनना है।आईना बनने से बेहतर  है‌ पत्थर  बनो।पत्थर बनकर  तराशे‌ जाओगे तो  महान कहलाओगे!”

कहावत है  कि परिवर्तन समय का नियम है और समय अतीत के दर्द पर पर्दा डाल ही देता है!जिंदगी के उतार-चढ़ाव,हालात के थपेडों ने बच्चों में ठहराव, हिम्मत और हौसला भर दिया। नीता के प्यार के कारण  नए विश्वास और पूर्ण सहजता  के साथ बच्चों  ने  जीवन जीना सीख लिया। कभी-कभी दोनों भाई हादसों को याद कर दुखी हो उठते।नीता उन्हें प्यार से सहलाती  हुई कहती -बच्चों!हम तीनों अपनी-अपनी जगह परिस्थिति और नियति के हाथों मजबूर होकर अधूरे रह गए हैं।अब हमें एक-दूसरे को पूरा करके एक संपूर्ण परिवार का गठन करना है।इसके लिए तुम्हें काबिल बनना आवश्यक है!”

 बच्चे  भी नीता की बातों को पत्थर की लकीर मानते थे।  धीरे-धीरे दोनों की ऑंखों में  प्रातःकाल  के पूर्वी क्षितिज की तरह चमक दिखाई देने लगी।  वे  सपनों को यथार्थ के धरातल पर सजाने के लिए  जी-जान  से मेहनत करने लगें। वक्त के पंखों पर सवार होकर धीरे-धीरे दोनों किशोरावस्था के शिखर पर पहुॅंच गए। बिल्कुल निश्छल,सहज और सरल, परन्तु अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त! 

आखिरकार अमन और गगन ने अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी मंजिल पा ही ली। उन्हें खुश देखकर नीता ने सीने से लगाते हुए कहा -“तुमने  अपने दम पर गम को मात देकर ख्वाहिशों का आसमान छू ही लिया!”

अमन और गगन ने नीता के पैर छूते हुए कहा -“मैम!अपने नहीं, बल्कि आपके दम पर हमारी जिंदगी सॅंवरी है।आज से हम आपको मैम ने कहकर माॅं ही कहेंगे।”

नीता -“तुम दोनों को देखकर सहसा विश्वास नहीं होता है कि एक रिश्ता खून का न होकर भी इतना प्यारा हो सकता है!”

अमन और गगन -“माॅं!अब तो खुशियाॅं मनाने आप हमारे साथ बाहर चल सकतीं हैं?”

नीता हॅंसते हुए -“हाॅं!हाॅं!चलो।”

अमन और गगन नम ऑंखों से नीता के गले लग जाते हैं।

समाप्त।

लेखिका -डाॅ संजु झा।

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