एक रिश्ता ऐसा भी – दीपा माथुर

जो पेड़ नई कोपलों का स्वागत नहीं करते वे ठूठ हो जाते है

अम्मा ने हसते हुए विभु को कहा।

अम्मा का ८४ का बसंत पार हो रहा था।

चाहे मुंह में दांत हो ना हो अम्मा हमेशा हर काम जोश से करती थी।

हा अब काम की स्पीड में कमी हो गई थी पर पेफेक्टनेस वही थी।

सुन विभु देखना मेरे मोबाइल में क्या हुआ?

चल नहीं रहा रिचार्ज खत्म तो नहीं हो गया देख।

खराब हो गया हो तो ठीक करा देना नहीं तो नया फोन लाना पड़ेगा।

अबकी बार बिल्कुल तेरे जैसा चाहिए।

विभु हंसा ओर बोला ;” मेरे जैसा?”

अम्मा;” हा तो?”

अब मेरी आंखे कोई पहले जैसी थोड़ी है तेरे इसमें बड़े अक्षर बड़ी फोटो आती है ना ?कल आर्यन ( पड़पोता) दिखा रहा था।

मुझे भी भजन सुनने होते है।

गीता सुनती हु।

तुम लोगों के पास तो समय है ही नहीं हम बुजुर्गों का भी ग्रुप है उसमें वाट्सअप पर बात चीत चलती रहती है।

ओर तो ओर न्यूज भी सुन लेती हु।

देश विदेश में क्या हो रहा है खबर रहती ही है।

ले मेरा मोबाइल ठीक हो जाना चाहिए।

ले ठीक कर ।

विभु हंसा ओर ओर अम्मा की पीठ से लाड से अपनी बाहे 

डाल कर बोला ;” अम्मा कल मोबाइल शॉप पर जाकर इसे दिखा दूं अगर सही नहीं हुआ तो आपको ये मोबाइल दे दूंगा।

पर दाद देनी पड़ेगी इस उम्र में भी आप ……..।

अम्मा ;” तो अपडेट तो रहना पड़ता है तेरे मम्मी ,पापा अपडेट रहते है तो तुम्हे संभाल पा रहे है तुम सम्मान करते हो

मै अपडेट रहूंगी तभी तो मेरे बेटे बहु ओर पोते पोती मेरा सम्मान करेंगे और फिर घर में किच किच भी नहीं होंगी।

सब मस्त मै भी मस्त हां हां ……।

कर हस दी।

अम्मा ने विभु के गालों को प्यार से सहलाया और बोली तेरे बेटे के सामने भी अपडेट रहना पड़ता है।

पहले इंग्लिश बोलता था तो समझ ही नहीं आती थी अब मोबाइल से सीखों एप से वो भी सीख रही हु।

फिर इतराती हुई बोली ;” “आई एम लर्निंग…!”

अम्मा ने जैसे ही टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में कहा,

विभु हँस पड़ा—हंसी में गर्व का चमकता सूरज भी था।

बरामदे में हल्की धूप बिखरी थी।

नीम के पेड़ के पत्तों से छनकर आती रोशनी

अम्मा के सफ़ेद बालों पर ऐसे पड़ रही थी

जैसे समय भी उनके साथ खेल रहा हो।

विभु ने मोबाइल हाथ में लिया।

स्क्रीन सच में अटक रही थी।

पर अम्मा की बातें हवा को चीर रही थीं।

“देख बेटा, जो पेड़ नई कोपलें नहीं उगाते, वे ठूँठ हो जाते हैं।

मुझे ठूँठ नहीं बनना।

जीवन थोड़ा बचा है, पर सीखने की फुर्सत बहुत है।”

विभु कुछ बोलता इससे पहले ही

अम्मा की आँखों में हल्की नमी उतर आई—

आँखें उतनी तेज़ न थीं

फिर भी उनमें चमक और आग थी।

अम्मा ने धीरे से कहा, “पिछले महीने क्या हुआ पता है?

हमारे ग्रुप की सरोज दीदी का देहांत हो गया…”

कुछ पल का मौन

नीम की पत्तियाँ भी थमकर सुनती-सी लगीं।

“वो कहती थीं कि

‘हम तो बूढ़े हो गए, अब क्या सीखना’

और बस घर में खाट पर पड़ी रहती थीं।

न फोन, न बात, न हंसी।

धीरे-धीरे अकेलापन उनकी सांसें खा गया।”

अम्मा ने ठंडी सांस छोड़ी, “बुढ़ापा अकेलेपन से नहीं मारता बेटा,

रुक जाने से मारता है।

इसलिए मैं रुकना नहीं चाहती।”

इतना कहते हुए

अम्मा ने विभु के हाथ अपनी झुर्रीदार हथेलियों में ले लिए।

“तुम लोग सब अपने-अपने काम में व्यस्त हो।

किसी को दोष नहीं देती।

पर अगर मैं अपडेट न रहूं—

तुम तक पहुँचने का रास्ता खो दूँगी।

फिर मैं भी अकेली रह जाऊंगी।”

विभु का हृदय कस गया।

वह जानता था,

अम्मा की दुनिया अब वही मोबाइल सा छोटा-सा खिड़की था—

जितनी बड़ी दुनिया उसमें दिखती थी,

उतनी ही उनकी साँसों में उतरती थी।

विभु ने फोन को सीने से लगा लिया,

अम्मा को देखा और धीमे से बोला—

“अम्मा, आप नई कोपल नहीं हैं,

आप तो पूरा नया पेड़ हैं

जिसकी छाँव अब भी हमें ठंडक देती है।”

अम्मा हँसी—

बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में विभु को गोल-गोल झूलों पर झुलाते समय हंसती थीं।

“चलो, कल मोबाइल की दुकान चलते हैं,”

विभु बोला,

“और अगर ये ठीक न हुआ,

तो जो फोन तुम्हें पसंद हो, वही ले लेना।”

अम्मा की आँखों में शरारत चमकी, “तो ठीक है—तेरा मोबाइल मेरा”

चिंता मत कर फंक्शन तो में यू ट्यूब से सीख लूंगी।

अम्मा किसकी हु…?

थोड़ा थोड़ा आर्यन को मेरे पास बिठाउंगी नालायक यू नहीं बैठेगा पर मोबाइल में कुछ सिखाना हो तो सीखा कर ही दम लेगा।

वो मेरा मोबाइल गुरु है   उसके साथ एक रिश्ता ऐसा भी है।

ओर इस बहाने मुझे भी उसका साथ मिल जाता है।

दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।

नीम की पत्तियाँ झरीं—

जैसे धरती भी उनकी खुशी में शामिल हो गई।

दीपा माथुर

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