एक रिश्ता ऐसा भी – बबीता झा

आज मैं जब अस्पताल से आ रही थी तो अंदर एक सुकून सा एहसास हो रहा था। आज मैं एक ऐसी शख्स मिली जो मेरा पेशेंट नहीं था, मेरा कोई अपना भी नहीं था, लेकिन पता नहीं क्यों आज उसको देखकर अजीब सी खुशी मिल रही थी।  

घर पहुंची तो अजय ने कहा, “दीपा, कितनी देर हो गई! तुम्हारी बचपन की दोस्त नीति कब से तुम्हारा इंतजार कर रही है।” मैं तो पहले से ही अंदर से बहुत खुश लग रही थी, जैसे आज मुझे क्या मिल गया है। मैं अंदर नीति से मिलने गई तो बातों-बातों में नीति ने मुझे कहा, “आज तुम ज्यादा ही खुश लग रही हो, क्योंकि मैं तो तुमसे चार दिन पहले भी मिली थी, लेकिन कल और आज में बहुत अंतर है। क्या बात है?”  

मैंने कहा, “यह तो मैं भी नहीं समझ पा रही हूं, लेकिन हां, आज मैं बहुत खुश हूं।”  

मैंने नीति से कहा, “नीति, तुम्हें याद होगा शायद आज से 17 साल पहले जब हम मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे, मैं अपने पापा को गांव से दिल्ली इलाज के लिए ला रही थी।”  

नीति ने कहा, “वह तो मुझे अच्छी तरह याद है। अंकल जी की तबीयत रास्ते में बहुत खराब हो गई थी।”  

मैंने कहा, “हां, तभी की बात है। मैं मां और पापा जी को लेकर ट्रेन में सेकंड क्लास में सफर कर रही थी। हमारी तीन सीटें थीं—दो ऊपर और एक नीचे। मां और पापा जी में से कोई भी ऊपर नहीं चढ़ सकता था। मैं सोच रही थी कि सामने वाले से रिक्वेस्ट करती, तभी उन्होंने ही कहा, ‘आप लोग नीचे सो जाइए, मैं ऊपर चला जाऊंगा।’  

मैंने कहा, ‘थैंक्स!’ और उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम अमित बताया। मैंने भी अपना नाम दीपा बताया। फिर दोनों में बातें होने लगीं। बातों-बातों में कुछ मैंने अपने बारे में बताया, कुछ अमित ने अपने बारे में बताया। फिर सब खाना खाकर अपने-अपने सीट पर सोने के लिए चले गए।  

मैं सोते-सोते दवि दवि आंखों से उसको देख रही थी। कब नींद आ गई, पता नहीं। तभी मां ने जोर-जोर से हिलाया, ‘दीपा, दीपा! पापा जी की बहुत तबीयत खराब हो रही है।’  

मैं सुनकर जल्दी से नीचे उतरी तो देखा पापा जी अपना सीना पकड़कर कराह रहे थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था। तभी मुझे याद आया डॉक्टर ने दवाई दी थी कि जब दर्द हो तो आप इन्हें दे दीजिएगा। मैं तुरंत वह दवाई निकालकर पापा जी को खिला दी। लेकिन उससे थोड़ी ही देर आराम हुआ। फिर उसके बाद बहुत तेज दर्द उठ गया।  

मैं और मां बहुत घबरा गए। इतने में अमित जी उठ गए। उन्होंने दोनों का शोर सुनकर नीचे आकर कहा, “अंकल जी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई है क्या?”  

मैंने कहा, “हां।”  

तो उन्होंने कहा, “मैं भी डॉक्टर हूं। इनको अटैक का दर्द लग रहा है। आपने जो दवाई दी है वह ठीक है। स्टेशन भी आने वाला है।”  

तभी स्टेशन आ गया। हम लोग जल्दी-जल्दी पापा जी को लेकर हॉस्पिटल जाने के लिए निकले। तभी अमित ने पीछे से टोका, “मैं भी आप लोगों के साथ चलता हूं। आप लोगों की हालत ठीक नहीं लग रही है और मैं अपने हॉस्पिटल में ले जाता हूं। जल्दी इलाज हो जाएगा।”  

हम लोग साथ चल दिए। पापा के इलाज के दौरान अमित ने मुझसे पूछा, “अंकल को पहले भी अटैक हुआ था क्या?”  

मैंने कहा, “हां।”  

तो फिर उन्होंने कहा, “इसका मतलब यह दूसरा अटैक है। लेकिन अभी अंकल ठीक हैं। इनको आप लोग जल्दी ही ऑपरेशन करा दीजिएगा।”  

अगले दिन पापा जी को छुट्टी मिल गई। मैं, मां, पापा जी और मेरा भाई भी आ गया था। हम लोग सब घर को निकल गए।  

अस्पताल में ही मैं और अमित ने एक-दूसरे का फोन नंबर ले लिया था। कुछ दिनों के बाद मैंने ऐसे ही अमित को फोन किया। अमित की आवाज सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। उसने हंसते हुए कहा, “और दीपा, कैसे याद किया?”  

मैंने कहा, “अमित, मैं तुम्हें कैसे भूल सकती हूं? तुमने जो हमारी मदद की, इतना कौन कर सकता है।”  

अमित ने कहा, “थैंक यू करना है तो यहां आकर करो और एक कॉफी पिला दो।”  

मैं अमित को ‘ना’ नहीं कह सकी और मैं चली गई। कॉफी पीते-पीते बहुत बातें हुईं। बातों-बातों में अमित ने बताया कि उसकी शादी की बात चल रही है।  

मैंने कहा, “तुम्हारी शादी नहीं हुई थी क्या? मैं तो पूछना ही भूल गई।”  

अमित ने मेरी तरफ देखते हुए कहा, “हां, तुम्हारे जैसी लड़की जो नहीं मिली थी।”  

मैंने कहा, “अब मिल गई क्या?”  

अमित ने कहा, “शायद।” कहकर हंसने लगा।  

फिर एक दिन अमित का फोन आया, “दीपा, मुझे तुम्हारे जैसी लड़की मिल गई है। मैं शादी कर रहा हूं। तुम आओगी ना लड़की देखने?”  

मैं थोड़ा चौंक गई, लेकिन मैंने अपने आप को संभालते हुए कहा, “सॉरी, मैं नहीं आ सकती हूं। मैं हैदराबाद में हूं और उसी दिन मेरी बड़ी बहन की शादी है। लेकिन ठीक है, जब फुर्सत होगी तो आ जाऊंगी।”  

अमित ने कहा, “फुर्सत निकाल ही लेना और अपनी ट्रू कॉपी को आकर देख लेना।” कहकर अमित जोर-जोर से हंसने लगा। मुझे भी बहुत हंसी आई।  

दिन बीतते चले गए। हम दोनों का फोन पर भी बात करना बंद हो गया। दोनों अपनी-अपने में व्यस्त हो गए।  

2 साल बाद मेरी शादी हो गई। कुछ दिनों के बाद जब मैं अपनी केबिन में बैठी थी, किसी ने आवाज दी, “मे आई कम इन?”  

मुझे यह आवाज कुछ जानी-पहचानी लगी। पलट कर देखा तो सामने अमित खड़ा था। मैं तो उसे देखते रह गई।  

अमित ने कहा, “अंदर आने को नहीं कहोगी क्या?”  

मैं चौंक गई। मैंने कहा, “आओ ना, तुम्हें पूछने की क्या जरूरत है। मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि फिर कभी तुमसे मुलाकात हो पाएगी।”  

अमित ने कहा, “इसलिए तो पूछना पड़ा। अगर नहीं पहचानती तो?” कहकर दोनों हंसने लगे।  

फिर अमित ने पापा जी के बारे में पूछा। मैंने कहा, “सब ठीक है।”  

फिर अमित ने कहा, “तुमने कैसे लड़के से शादी की?”  

मैंने कहा, “मुझे भी तुम्हारे जैसा ही कोई मिल गया, तो मैं भी शादी कर ली।”  

अमित ने कहा, “चलो ठीक है। तब तो हम दोनों ने अपने-अपने पसंद की शादी की है।”  

मैंने पूछा, “लेकिन तुम यहां कैसे? मैं तो पूछना ही भूल गई।”  

अमित ने कहा, “मेरी एक दोस्त की मां इसी अस्पताल में एडमिट है। मैं भी किसी काम से इस शहर में आया था, तो सोचा जरा हॉस्पिटल जाकर उनको भी देख लूं। मैं अभी निकल ही रहा था कि सामने गेट पर तुम्हारे नाम का बोर्ड दिखा। तो सोचा थोड़ा चेक कर लूं कहीं तुम ही तो नहीं हो। क्योंकि उस समय तुम मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी। मेरा अंदाजा सही निकला।”  

फिर दोनों अपने परिवार की बातें करने लगे। कब समय बीत गया, पता ही नहीं चला।  

फिर अमित ने ही टोका, “दीपा, आज घर नहीं जाना है क्या?”  

मैंने कहा, “हां, तुमसे बातें करने में समय का पता ही नहीं चला।”  

फिर दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखकर सुकून की सांस ली और अपने-अपने घर को निकल गए।  

सच बताऊं, अनीता आज बहुत दिनों के बाद अमित से मिलकर अच्छा लगा।  

सोच रही हूं, एक ऐसा भी रिश्ता होता है जिससे कोई रिश्ता न होते हुए भी अपना सा लगता है।  

 नीता ने कहा “कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे लोग दे देती है जो हमारे रिश्तों की परिभाषा बदल देते हैं।  

वे न दोस्त कहलाते हैं, न परिवार, लेकिन दिल के सबसे करीब होते हैं।  

शायद यही रिश्ते हमें सिखाते हैं कि अपनापन नाम से नहीं, एहसास से होता है।”

बबीता झा

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