एक पति का अपराध बोध – गीतू महाजन

पूरे 15 दिन हो गए थे उसे गए हुए..वो सब कुछ छोड़कर जा चुकी थी हमेशा के लिए।एक ऐसी जगह जहां से कोई भी लौटकर नहीं आता और पीछे छोड़ गई थी अपना भरा पूरा घर परिवार।कितना ही सहेज कर रखती थी वह अपने घर को।कितनी तन्मयता से सब कुछ संभालती।बाहर की फुलवारी से लेकर पीछे के किचन गार्डन तक पूरे घर में उसकी सुघड़ता की झलक दिखती..सब कुछ साफ सुथरा करीने से लगा हुआ। 

पास पड़ोस..नाते रिश्तेदार हर कोई उसकी तारीफ करता और वह हमेशा अपने सौम्य से चेहरे पर मुस्कुराहट रख देती।15 दिन पहले भी तो ऐसे ही शांत सी वह चली गई थी।।ऐसे लग रहा था जैसे बहुत ही गहरी नींद सो रही हो।सच भी था..इतनी  गहरी नींद तो उसने पूरे जीवन में नहीं ली होगी।रोज़ रात को सोते हुए सुबह की चिंता..बच्चों का स्कूल..पति का टिफिन..सास ससुर की दवाइयां और घर बाहर के ढेरों काम..पर क्या कोई जानता था कि इतनी सुघड़ और शांत रहने वाली स्त्री का मन उथल-पुथल से भरा होगा। अपने मन के भावों को चेहरे पर ना दर्शाने की अदाकारी में उसे महारत हासिल थी। 

आज उसके बिना घर-घर नहीं लग रहा था और मैं उसका पति देवांश अपने ही अपराध बोध में जल रहा था..कैसा अपराध बोध।शहर के एक सफल व्यवसायी के मन में कैसा अपराध बोध होगा पर मैं जानता था कि मेरा मन क्यों परेशान था।मेरी पत्नी सुधा जब इस घर में ब्याह कर आई थी तो चारों तरफ उसकी हंसी की आवाज़ गूंजती थी।उसकी पायल से आती छन छन की आवाज़ से ऐसा लगता जैसे पूरा घर जी उठा हो।उसके भोले चेहरे और प्यार भरी मुस्कराहट ने सबका मन मोह लिया था।खाना बनाने की कला में वह निपुण थी। उसके आते ही सबको उसके स्वाद की लत लग गई थी। 

मेरी छोटी बहन उसके आगे पीछे घूमती क्योंकि वह उसी की सच्ची सहेली बन चुकी थी। मेरे माता-पिता को सुधा पूरा आदर मान देती।हर काम के लिए तत्पर और मुझ पर तो पूरी जान छिड़कती पर फिर मुझे उस से जलन होने लगी।धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि वह घर का केंद्र बिंदु बन चुकी है।हर कोई उस से सलाह मशवरा लेता।मेरे पिता जो शुरू से ही कड़क स्वभाव के रहे..उसकी हर बात मानते।कभी-कभी तो उनकी शुगर को लेकर वह उन्हें डांट भी देती और मैं हैरानी से देखता कि कैसे पिताजी उसके सामने बच्चे की तरह चुप रहते। 

मेरी जलन ने धीरे-धीरे कुंठा का रूप ले लिया था। मैं उस पर बेवजह झल्लाता और कभी-कभी डांट भी देता।फिर 2 साल बाद हमारा बेटा हुआ। घर वालों को एक खिलौना मिल गया था..सभी बहुत खुश थे। उसे पहले से भी ज्यादा प्यार मिलने लगा था..ऐसा मुझे लगता था।मैं उसके प्रति उदासीन रहने लगा।अपने ही पति की बेरुखी शायद उसकी समझ से परे थी।उसका साफ मन मेरी जलन को समझ नहीं पा रहा था। वो वैसे ही सबके आगे पीछे घूमती और मैं अपने ही खोल में सिमटता रहा। 

धीरे-धीरे मैंने अपने काम को और बढ़ाना शुरू कर दिया..शायद मैं उससे दूर रहना चाहता था कभी-कभी वह शिकायत भी करती और तब उसका रूआंसा सा चेहरा देखकर मेरे दिल को खूब तसल्ली मिलती। मैं समय न होने का बहाना कर अपनी कई ज़िम्मेदारियों से मुंह मोड़ चुका था।उसे बाहर ले जाने के लिए तैयार कर बाद में मना कर देना मुझे बहुत सुकून देता।मां मुझे समझाती कि मुझे अपने पत्नी को थोड़ा समय देना चाहिए पर मां को क्या बताता कि मैं अपनी जलन की वजह से उसे दुख देता था।हां.. बच्चे से मैं भरपूर प्यार करता।अपने बेटे की अच्छी परवरिश के लिए हर चीज़ की सुविधा देना मेरा कर्तव्य था पर जहां बात पत्नी की आती वहां मैं अपने हाथ खींच लेता। ऐसा नहीं था कि उसे कोई कमी थी पर सबसे बड़ी कमी उसे मेरा साथ न होने की थी।जब कोई रिश्तेदार या पड़ोसी उसकी तारीफ करता तो खुश होने की बजाए मैं अंदर ही अंदर गुस्सा हो जाता।अपनी कुंठा निकालने का मैंने उसे ज़रिया बना लिया था।उसकी बातों को काटना मेरे लिए आम सा हो गया था। 

सुधा एक अच्छी चित्रकार भी थी।वह सुंदर-सुंदर चित्र बनाती।पेड़ -पौधे.. फूल -पत्तियां उसके बनाए चित्र पूरी तरह जीवंत होते..शायद जीवन की खुशियों को अपने चित्रों में वह खोजने की कोशिश करती।अपनी सहेलियों और घर वालों की सलाह से उसने अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगानी शुरू की।धीरे-धीरे उसकी पहचान बनने लगी। उसके चित्र लोगों को पसंद आते और सभी उसकी सफलता पर बहुत खुश होते सिवाय  मेरे क्योंकि मुझे लगता कि उसकी सफलता मेरे कद को और छोटा करती जा रही है जबकि इसमें रत्ती भर सच्चाई नहीं थी। 

अपनी हर प्रदर्शनी के बाद वह मुझे उलाहने देती कि मैं उसकी प्रदर्शनी में क्यों नहीं आया और मैं बहाने लगाकर उसे टाल देता।धीरे-धीरे वह मेरी बेरूखी को समझने लगी थी।अब उसे मेरा ना आना शायद कुछ एहसास  कराने लगा था।अब वह मुझसे कोई सवाल नहीं करती।धीरे-धीरे उसने चुप्पी का आवरण ओढ़ लिया था।पेंटिंग्स बनाना भी शायद कम कर दिया था। वह आप बुझी बुझी और थकी हुई सी लगती।

 डॉक्टर को भी दिखाया पर उसके सब टेस्ट ठीक आए थे..शायद उसके मन में ही कोई बात घर कर गई थी और फिर अचानक से आज से 15 दिन पहले वह हमें छोड़ कर चली गई।उसकी तेरहवीं के बाद मैं घर के पिछले हिस्से के उस कमरे में गया जहां वह पेंटिंग्स बनाया करती थी।मैं पहली बार उस कमरे में जा रहा था.. दरवाज़ा खुला.. बत्ती जली तो मैंने  देखा वहां अनगिनत पेंटिंग्स पड़ी थी।सब में एक खुशहाल औरत की तस्वीर थी..कुछ पति के साथ.. कुछ परिवार के साथ..शायद यही सपना था जो वह जीना चाहती थी और  वहीं उसने अपनी तस्वीरों में उतारा था।उसका यह सपना उसके साथ ही चला गया..शायद मेरी वजह से ही पूरा नहीं हो पाया था क्योंकि मैं अपनी नासमझी  से अपनी जलन का उसको शिकार बनाता रहा था। 

उसके बारे में याद कर आज अपराध बोध से मेरा मन भर उठा था।समझ नहीं आता कि कैसे मैं इस अपराध बोध से छुटकारा पाऊंगा।लगता है इस अपराध बोध के लिए हर सज़ा कम है। बाकी सारा जीवन मुझे यह बात कचोटती  रहेगी कि सुधा का असली गुनहगार मैं ही हूं। मैंने सारा जीवन में उसे कभी भी असली खुशी नहीं दी जिसकी वह हकदार थी और अब तो मैंने उससे उसके जीने का भी हक छीन लिया था।अपने बेटे का भी मैं गुनहगार था क्योंकि उसके सर से उसकी मां का साया हमेशा के लिए मैं छीन चुका था।

मुझे लगा जैसे मेरी इस गुनाह के लिए कोई भी प्रायश्चित कम होगा।अपने बेटे को जीवन की सारी खुशियां दूंगा क्योंकि यही तो वो चाहती थी..उसे कभी भी मां की कमी नहीं महसूस होने दूंगा शायद इससे ही मेरा अपराध बोध थोड़ा कम हो सके।जो भी हो.. जो सज़ा मैं सुधा को जीवन भर देते आया था आज उस अकेलेपन और दुख की सज़ा मुझे अपने बाकी जीवन के लिए मिल गई थी। यही सोचकर मेरा मन चीत्कार कर उठा और मैं दहाड़े मार कर रोने लगा.. पास बैठी मेरी मां मुझे गले लगा कर सांत्वना दे रही थी पर शायद वह नहीं जानती थी कि इस चीत्कार के पीछे सुधा के जाने के गम के साथ-साथ मेरा अपराध बोध भी था।

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गीतू महाजन,

नई दिल्ली।

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