एक नई सुबह – रमा शुक्ला

“हाँ बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं कल सुबह ही आ रही हूँ, और अब हमेशा के लिए आपके पास ही रहूँगी।”

इतना कहकर नंदिनी ने फ़ोन रख दिया और वह फ़फक-फफककर रोने लगी। उसके आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। कमरे के ठंडे फर्श पर घुटनों में सिर दिए बैठी नंदिनी को आज वो मनहूस घड़ी याद आ रही थी जब पति की मृत्यु के बाद वह अपने अकेले, बेसहारा सास-ससुर को बिलखता हुआ छोड़कर अपने मायके आ गई थी। आज तीन साल बाद, उसके भीतर का जमा हुआ सारा दर्द, सारा पश्चाताप एक ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ा था।

नंदिनी और अभिनव की शादी को अभी महज़ चार साल ही हुए थे। उनका जीवन किसी खूबसूरत सपने जैसा था। अभिनव के माता-पिता, पंडित विद्याधर और सुशीला देवी ने नंदिनी को कभी बहू नहीं, बल्कि एक बेटी की तरह लाड़-प्यार से रखा था। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। लेकिन किस्मत को शायद उनकी यह खुशियाँ रास नहीं आईं। एक शाम ऑफिस से लौटते वक्त अभिनव की कार का भयानक एक्सीडेंट हो गया, और वह हमेशा के लिए इस दुनिया से चला गया। नंदिनी के लिए तो जैसे आसमान ही टूट पड़ा। उस 27 साल की उम्र में उसकी मांग का सिंदूर धुल गया।

अभिनव की तेरहवीं के अगले ही दिन नंदिनी का बड़ा भाई, विकास और उसकी माँ, कांता देवी उसके ससुराल पहुँच गए। अभिनव के जाने से विद्याधर जी और सुशीला देवी पहले ही एक जिंदा लाश बन चुके थे। उनके बुढ़ापे का इकलौता सहारा छिन गया था। लेकिन कांता देवी ने आते ही घर में एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया।

उन्होंने विद्याधर जी के सामने साफ़ शब्दों में कह दिया, “समधी जी, जो हुआ उसका हमें भी बहुत दुख है। लेकिन मेरी बेटी अभी बहुत छोटी है। इसकी पूरी ज़िंदगी सामने पड़ी है। मैं इसे इस मातम भरे घर में घुट-घुट कर मरने के लिए नहीं छोड़ सकती। यह अब हमारे साथ जाएगी।”

विद्याधर जी ने हाथ जोड़ लिए थे। उनकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी थी। “कांता जी, ऐसा मत कहिए। यह घर नंदिनी का ही है। हमारा अभिनव चला गया, अब यही हमारी बेटी है, हमारा बेटा है। अगर यह भी चली गई, तो हम दोनों बूढ़े जीते जी मर जाएंगे। इसे मत ले जाइए, हम इसे पलकों पर बिठाकर रखेंगे।”

सुशीला देवी ने भी नंदिनी के पैर पकड़ लिए थे, “मत जा मेरी बच्ची, इस सूने घर में तेरे बिना हम कैसे जिएंगे? अभिनव की आखिरी निशानी है तू।”

लेकिन विकास ने अपनी बहन का ब्रेनवॉश करना शुरू कर दिया। “नंदिनी, तू पागल मत बन। तू यहाँ रहकर क्या करेगी? क्या पूरी उम्र इन बुड्ढे-बुढ़िया की नर्स बनकर बितानी है? तू हमारे साथ चल, हम तेरी दूसरी शादी करवाएंगे। तेरी ज़िंदगी फिर से आबाद करेंगे।”

जवान उम्र, पति को खोने का गहरा सदमा और अपनों का भावनात्मक दबाव—नंदिनी उस वक्त सही और गलत के बीच का फर्क भूल गई। उसे लगा कि शायद उसका मायका ही उसके लिए सबसे सुरक्षित जगह है। उसने अपना सारा सामान और अभिनव के बैंक एकाउंट्स की पासबुक बैग में रखी और ससुराल की दहलीज पार कर ली। सुशीला देवी उसके पीछे-पीछे कार तक दौड़ती आईं, गाड़ी का शीशा पीटती रहीं, लेकिन नंदिनी ने मुड़कर नहीं देखा। उसने अपने दर्द के आगे उन दो बूढ़े माता-पिता के दर्द को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया था।

शुरुआती कुछ महीने मायके में बहुत अच्छे बीते। सबने नंदिनी के साथ बहुत सहानुभूति दिखाई। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, ‘मायके’ का असली रंग सामने आने लगा। विकास की पत्नी, यानी नंदिनी की भाभी, रितु को नंदिनी का घर में रहना एक आँख नहीं भाता था।

धीरे-धीरे रितु ने घर के सारे काम नंदिनी के सिर पर डालना शुरू कर दिया। “नंदिनी, तू खाली बैठी रहती है तो डिप्रेशन में जाती है। थोड़ा घर का काम कर लिया कर, मन लगा रहेगा।” यह कहकर रितु ने उसे सुबह की चाय से लेकर रात के जूठे बर्तन मांजने तक की मशीन बना दिया। नंदिनी घर में सबसे पहले उठती और सबसे आखिर में सोती।

जिस दूसरी शादी के वादे करके कांता देवी और विकास उसे लाए थे, वह बात तो जैसे हवा में उड़ गई। जब भी नंदिनी कोई बात कहती, रितु उसे ताना मार देती, “अरे, जिसके अपने भाग्य में आग लगी हो, वो दूसरों का घर क्या रौशन करेगी।”

नंदिनी जब अपनी माँ से शिकायत करती, तो कांता देवी भी मुँह फेर लेतीं। “देख बेटा, यह घर अब विकास और रितु का है। तुझे थोड़ा तो एडजस्ट करना पड़ेगा। विधवा बेटी का वैसे भी समाज में कोई वजूद नहीं होता। चार बर्तन धो लेगी तो तेरा क्या घिस जाएगा?”

नंदिनी को तब पहली बार एहसास हुआ कि जिस मायके को वह अपना असली घर समझकर आई थी, दरअसल शादी के बाद वह घर उसका रहता ही नहीं है। मायका सिर्फ तब तक अच्छा है, जब तक आप मेहमान बनकर दो-चार दिन के लिए जाएं। जो भाई उसे ससुराल से ‘आज़ाद’ कराने गया था, आज वही भाई रितु के तानों पर कानों में रुई डालकर बैठा रहता था। अभिनव की जीवन बीमा की जो पॉलिसी नंदिनी को मिली थी, उसके पैसे भी विकास ने “बिज़नेस में लगाने” के नाम पर उससे ऐंठ लिए थे। नंदिनी अब उस घर में एक बिना पगार की नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं थी।

आज अभिनव की तीसरी पुण्यतिथि थी। मायके में किसी को याद तक नहीं था। रितु ने सुबह ही फरमान सुना दिया था कि आज उसकी किटी पार्टी की सहेलियाँ आ रही हैं, इसलिए नंदिनी को अकेले ही सबके लिए छोले-भटूरे और गाजर का हलवा बनाना है।

नंदिनी रसोई में प्याज काटते हुए रो रही थी। उसे अभिनव की याद आ रही थी। उसे याद आ रहा था कि कैसे अभिनव उसकी आँखों में एक आंसू नहीं आने देता था। अचानक उसके मोबाइल की रिंगटोन बजी। नंबर अनजान था, लेकिन जब उसने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से आती आवाज़ ने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी।

“कैसी हो नंदिनी बेटा?” आवाज़ कांपती हुई और बेहद कमज़ोर थी।

“बा… बाबूजी?” नंदिनी के गले से आवाज़ नहीं निकल पाई। यह विद्याधर जी का फोन था।

“हाँ बेटा… आज अभिनव का दिन है न। तुम्हारी माँ ने सुबह से कुछ नहीं खाया है। उसे अल्जाइमर की बीमारी हो गई है, बहुत सी बातें भूल जाती है। लेकिन आज सुबह से सिर्फ तुम्हारा नाम रट रही है। कह रही है कि ‘नंदिनी को अभिनव के हाथ की खीर बहुत पसंद है, वो आएगी तो खाएगी।’ वो बिस्तर से उठ नहीं पा रही है बेटा… डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है।” विद्याधर जी बोलते-बोलते रो पड़े।

नंदिनी की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। तीन साल… इन तीन सालों में उसने एक बार भी मुड़कर उन बूढ़े सास-ससुर की सुध नहीं ली थी। और वो आज भी उसे अपनी बेटी मानकर बैठे थे।

विद्याधर जी ने खुद को संभालते हुए आगे कहा, “बेटा, मैंने तुम्हें परेशान करने के लिए फोन नहीं किया। मैं जानता हूँ कि तुम्हारी अपनी ज़िंदगी है। बस तुम्हारी माँ ज़िद कर रही थी, तो सोचा एक बार तुम्हारी आवाज़ सुना दूँ शायद उसे चैन मिल जाए। और हाँ बेटा, अभिनव के जाने के बाद जो मकान था, वो मैंने और तुम्हारी माँ ने तुम्हारे नाम कर दिया है। हमारी कोई और औलाद तो है नहीं। हमारे जाने के बाद यह मकान कोई हड़प न ले, इसलिए मैंने कल ही वसीयत तुम्हारे नाम पक्की कर दी है। तुम अपना ख्याल रखना।”

यह वो पल था जब नंदिनी का हृदय टुकड़े-टुकड़े हो गया। एक तरफ यह मायका था, जो सगा होकर भी उसके पैसों का भूखा था और उसे नौकरानी समझता था। और दूसरी तरफ वो ससुराल था, जिसे वह ठुकरा कर आई थी, लेकिन वो आज भी अपना सर्वस्व उसके नाम कर रहे थे। उन्होंने एक बार भी उसे ताना नहीं मारा कि ‘तुम हमें छोड़कर क्यों गई?’ उन्होंने सिर्फ प्यार दिया।

यही सुनकर नंदिनी ने कहा था, “हाँ बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं आ रही हूँ… हमेशा के लिए।”

फोन कटने के बाद नंदिनी काफी देर तक फर्श पर बैठी अपने स्वार्थ, अपनी नासमझी और अपने घमंड पर रोती रही। उसे समझ आ गया था कि उसका असली घर वो था जहाँ उसके पति की यादें बसी थीं, जहाँ उसे ‘बेटी’ का दर्जा मिला था।

नंदिनी उठी। उसने अपने आंसू पोंछे और अपनी अलमारी से अपना सूटकेस निकाल लिया। उसने तेजी से अपने कपड़े पैक किए।

तभी रितु कमरे में आ गई। “ये क्या तमाशा है नंदिनी? तुम कपड़े क्यों पैक कर रही हो? बाहर मेरी सहेलियाँ आने वाली हैं, और तुमने अभी तक भटूरे नहीं तले!”

नंदिनी ने सूटकेस बंद किया और पलटकर रितु की आँखों में आँखें डालकर देखा। आज वो सहमी हुई विधवा नहीं थी।

“तुम्हारी सहेलियों को भटूरे खिलाने का ठेका मैंने नहीं ले रखा है भाभी। मैं जा रही हूँ… अपने घर।”

रितु हक्की-बक्की रह गई। “अपना घर? कौन सा अपना घर? यही तुम्हारा घर है। दिमाग तो खराब नहीं हो गया तुम्हारा?”

तभी आवाज़ सुनकर विकास और कांता देवी भी कमरे में आ गए।

“क्या हो रहा है यहाँ?” विकास ने कड़क आवाज़ में पूछा।

“भैया, मैं अपने ससुराल वापस जा रही हूँ। बाबूजी ने फोन किया था, माँ जी बहुत बीमार हैं। उन्हें मेरी ज़रूरत है, और सच कहूँ तो… मुझे उनकी ज़रूरत है।” नंदिनी ने अपना सूटकेस हाथ में लिया।

कांता देवी आगे आईं, “तू पागल हो गई है? तीन साल बाद वहां मुँह उठाकर जाएगी तो मोहल्ले वाले क्या कहेंगे? और वो बुड्ढे तुझे ताने मार-मार कर मार डालेंगे। हमने तुझे वहां से निकाला था।”

नंदिनी व्यंग्य से मुस्कुराई। “माँ, आपने मुझे वहां से निकाला नहीं था, आपने मुझे एक स्वार्थी इंसान बना दिया था। आपने कहा था कि मेरी पूरी ज़िंदगी पड़ी है, लेकिन यहाँ आकर मेरी ज़िंदगी क्या रह गई है? एक बिना पगार की आया बनकर रह गई हूँ मैं इस घर में। भैया ने अभिनव के सारे पैसे ले लिए, भाभी ने मेरा आत्मसम्मान ले लिया। और आप ‘मोहल्ले वालों’ की बात करती हैं? बाबूजी ने आज मुझे फोन करके यह नहीं पूछा कि मैं उन्हें छोड़कर क्यों गई, उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना घर मेरे नाम कर दिया है ताकि मैं सुरक्षित रहूँ।”

विकास ने गुस्से में कहा, “वो तुझे इमोशनल ब्लैकमेल कर रहे हैं। अगर तू आज इस दरवाज़े से बाहर गई, तो हमारे घर के दरवाज़े तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।”

नंदिनी ने एक पल के लिए अपने भाई को देखा और फिर शांति से बोली, “भैया, जब एक बेटी की शादी हो जाती है, तो मायके के दरवाज़े असल में उसी दिन बंद हो जाते हैं। जो दरवाज़े सिर्फ एक मेहमान के लिए खुलते हों, उन्हें ‘अपना घर’ नहीं कहते। मेरा घर वही था जिसे मैं तीन साल पहले लात मार कर आ गई थी। मैं अब अपने प्रायश्चित की आग में जलने जा रही हूँ, और मुझे आपके दरवाज़ों की अब कोई ज़रूरत नहीं।”

नंदिनी ने बिना किसी की परवाह किए उस घर की दहलीज पार कर ली। पीछे से कांता देवी और रितु कुछ बड़बड़ाते रहे, लेकिन आज नंदिनी के कानों में सिर्फ उन दो बूढ़े माता-पिता की सिसकियाँ गूंज रही थीं, जो आज भी उसके इंतज़ार में बैठे थे।

बस का सफर करते हुए नंदिनी का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। चार घंटे बाद जब वह अपने उसी पुराने मोहल्ले में पहुँची, तो उसकी आँखें फिर से छलक पड़ीं। वह अपने ससुराल के दरवाज़े पर खड़ी थी। घर की दीवारें सीलन खा चुकी थीं, दरवाज़े पर लगी अभिनव के नाम की नेमप्लेट पर धूल जमी थी।

नंदिनी ने कांपते हाथों से घंटी बजाई। कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला। सामने विद्याधर जी खड़े थे। वो इतने कमज़ोर हो चुके थे कि उन्हें देखकर नंदिनी की रूह कांप गई। उनकी आँखों की रौशनी कम हो गई थी।

“कौन?” उन्होंने धुंधली नज़रों से देखने की कोशिश की।

“बाबूजी… आपकी गुनहगार लौट आई है।” नंदिनी धड़ाम से उनके पैरों में गिर पड़ी और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी… मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं अंधी हो गई थी। मैं अपने दर्द में आपका दर्द भूल गई थी।”

विद्याधर जी के कांपते हाथों ने उसे उठाया। उनके चेहरे पर एक अलौकिक खुशी छा गई। उनके गालों से आँसू बहने लगे।

“अरे मेरी बच्ची… मेरी बेटी आ गई। तूने घर लौटने में थोड़ी देर कर दी बेटा, लेकिन तू आ गई, यही बहुत है।”

नंदिनी तुरंत घर के अंदर भागी। सुशीला देवी बिस्तर पर लेटी थीं। उनका शरीर कंकाल जैसा हो गया था। नंदिनी दौड़कर उनके सीने से लग गई।

“माँ… उठिए माँ। देखिए, आपकी नंदिनी आ गई। आपकी बेटी आ गई माँ। मैं अब आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।”

सुशीला देवी ने अपनी कमज़ोर आँखें खोलीं। उन्होंने नंदिनी के चेहरे को छुआ, जैसे यकीन कर रही हों कि यह कोई सपना तो नहीं। उनके सूखे होठों पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई।

“मेरी… मेरी बच्ची… आ गई। मैंने कहा था ना… मेरी नंदिनी जरूर आएगी।”

नंदिनी ने सुशीला देवी के पैरों को अपने आंसुओं से धो दिया। उस दिन उस सूने घर में फिर से जीवन लौट आया था। नंदिनी ने मायके का वो झूठा मोह हमेशा के लिए त्याग दिया था। उसने समझ लिया था कि खून के रिश्ते कभी-कभी स्वार्थ की चादर ओढ़ लेते हैं, लेकिन जज़्बातों और दर्द के जो रिश्ते बनते हैं, वो मौत के बाद भी नहीं टूटते। अब नंदिनी एक विधवा नहीं, बल्कि उस घर की रक्षक, एक मजबूत बेटी और अभिनव की ज़िंदा निशानी थी।

**एक सवाल आप सभी से:** क्या हमारे समाज में आज भी विधवा लड़कियों को मायके में बोझ समझा जाता है? क्या ससुराल ही एक औरत का असली घर होता है? अपने अनुभव और विचार हमारे साथ जरूर साझा करें।

**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद**

लेखिका : रमा शुक्ला

error: Content is protected !!