एक माँ – एम. पी. सिंह

आशा और गोपाल दास के दो बेटे थे, राम और श्याम. दोनों मे 2 साल का अंतर था. घर के पास ही गोपाल जी का अपना किराना स्टोर था और काफ़ी अच्छा कमा लेते थे. सवेरे दुकान पर जाते तो रात को ही वापस आते. लंच नौकर घर से ले जाता था. माँ का प्यार राम से कुछ ज्यादा ही था क्योंकि जब आशा दूसरी बार माँ बनने वाली थी तो उसे लड़की चाहिए थी, पर श्याम हो गया. नई किताबें, नए कपड़े, खिलोने शायद ही श्याम को मिले हो, वो तो राम की उतरन पहन कर बड़ा हुआ था. घर के सारे छोटे बड़े काम उसी के जिम्मे थे. श्याम पढ़ाई मे तेज था और मार्क्स भी ज्यादा लाता था. जब राम 12वी क्लास मैं था तो उसके पिताजी को हार्ट अटैक आया और वो चल बसे. परीक्षा के बाद राम आगे की पढ़ाई के लिए बड़े शहर चला गया और श्याम ने पढ़ाई छोड़ कर दुकान संभाल लीं. श्याम की मेहनत से कारोबार काफ़ी बड़ गया और कमाई भी पहले से बहुत ज्यादा हो गईं. राम ने पढ़ाई पूरी करके अपने ही शहर मैं नौकरी पकड़ लीं और इसी बीच श्याम ने मकान डबल स्टोरी कर लिया. राम की शादी एक पढ़ी लिखी पैसे वाली लड़की से हुई. शादी के बाद राम ने ऊपर का पोर्शन ले लिया और श्याम माँ के साथ नीचे रहने लगा. आशा को सीढ़ी चढ़ने मे तकलीफ होती इसलिए राम की बीवी रनीता सारा दिन नीचे ही रहती. माँ को जैसे राम प्यारा था वैसे ही बड़ी बहु भी प्यारी लगने लगी और वो दिलभर बेटी बेटी करती रहती. थोड़े समय बाद श्याम की भी शालू से शादी हो गई. शालू कम पढ़ी लिखी, सीधी सादी और सहनशील लड़की थी. आते ही आशा ने शालू को रसोई संभालवा दी और खुद रनीता के साथ बाहर घूमना /बाजार जाना वगैरह साब करती. आशा, रनीता को हमेशा बड़ी बहु या बेटी कहकर बुलाती पर छोटी बहु को शालू कहकर बुलाती.

जब भी कोई घर पर आता तो बहुओं का परिचय इस प्रकार होता, ये मेरी बड़ी बहु रनीता और ये श्याम की पत्नी शालू. सुनने वालों को भी अजीब लगता और शालू को भी मन मैं टीस पहुँचती. शालू जब भी पूछती, माँ जी, सब्जी क्या बनाऊ, तो जवाब मिलता, बड़ी बहु से पूछले, क्या खाना है. फिर राम का परमोशन हो गया और तबादला मुंबई. माँ राम के साथ मुंबई जाना चाहती थी पर राम माँ को साथ नहीं ले जाना चाहता था, और बहाना बना दिया की शहर मैं छोटे छोटे मकान होते है, हवा भी दूषित होती है, तुम वहाँ बीमार हो जाओगी. राम अपनी पत्नी के साथ मुंबई चला गया और इसी चिंता मैं माँ की तबियत बिगड़ने लगी और समय के साथ साथ बीमारी बढ़ती गई पर राम देखने नहीं आया. शानू बिना कुछ बोले दिन रात सासू माँ की सेवा मैं लगी रहती. श्याम ने भी सेवा मैं कोई कमी नहीं छोड़ी पर बीच बीच में जता देता कि आपका सका बेटा आ जाता तो आप जल्दी ठीक हो जाती. 

एक दिन पड़ोसी वाली चाची अपनी सहेलियों के साथ हाल चाल पूछने आई और बोली, आशा, तू तो अपने बड़े बेटे / बड़ी बहु को बुलाले, वहीं तुझे ठीक कर सकते है. अगर वो नहीं आते है, तो तू शानू को दिल से अपनी बहु मानले, फिर देख तेरी सेहत कैसे नहीं सुधारती. चाची कि बात आशा के दिल पर लग गई और उसे अपनी गलती का अहसास होने लगा और दिल से बेटा बहु  के लिए दुआएं निकलने लगी पर कहने में अभी भी संकोच कर रही थीं. उस दिन के बाद आशा की तबियत में सुधार होने लगा. अब आशा को श्याम और शानू कि खूबियां नज़र आने लगी और रसोई में शानू  का काम में हाथ बटाने लगी. कुछ दिनों बाद आशा ने दिल मजबूत करके बोला , शानू, एक कप चाय तो बना दे, इच्छा हो रही है. आज रात का खाना बेटा बहु के साथ बैठकर खाऊगी. शानू ने सोचा शायद राम भईया भाभी आ रहे होंगे, पर कुछ नहीं बोली. रात को जब श्याम आया तो माँ बोली, बेटा तू आ गया? फिर बोली, बहु, खाना लगा दे, बेटा आ गया है. माँ कि बात सुनकर श्याम और शानू दोनो आश्चर्य से कभी एक दूसरे का मुँह देखते कभी माँ का. ये देख माँ फिर बोली, बेटा, ये घूर घूर के मेरी बहु को क्या देख रहा है, जल्दी हाथ मुँह धोले, साथ में खाना खायेंगे. माँ कि बात सुनकर श्याम भावुक होकर माँ के गले लगकर बोला, ये सब सुनने कि लिए में कब से तरस रहा था, आज जी भर के खाना खाऊंगा. माँ बोली, जी भर के तो मैं खाऊगी, सालों से दिल पर बोझ लेकर जी रही थीं, आज दिल हल्का हो गया. राम के यहाँ रहते और जाने के बाद भी मैंने हमेशा तुम दोनों की मेहनत और सेवा दोनों को नज़रअंदाज़ किया, 

तुम दोनों ने मेरी बड़ी सेवा कि और मुझे मेरी गलती का अहसास करा दिया. में वादा करती हूँ कि अब राम लेने भी आये तो भी में तुम्हारे साथ ही रहूगी और अपनी भूल का प्राश्चित करुँगी. तब बहु बोली, माँ जी, हमने तो हमेशा आपको अपनी माँजी समझा है, कोई गलती हो गई हो तो माफ कर देना, माँ बोली, बस बस, ज्यादा बातें मत बना और खाना लगा, बहुत भूख लगी है, और तीनो मिलकर साथ में खाना खाने लगे.

साथिओं, कभी कभी माँ बाप बच्चों को अलग अलग नज़र से देखते है जिससे बच्चों में हीनता कि भावना घर कर लेती है, दिल में आक्रोश पैदा हो जाता है, जो कभी कभी माँ बाप के लिए बहुत घातक और दुखदाई सिद्ध  होता है. 

लेखक 

एम. पी. सिंह

(Mohindra Singh)

स्वरचित, अप्रकाशित 

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