“एक ही घर में दो नियम क्यों?” – संगीता अग्रवाल

दोपहर के तीन बजे थे। अनन्या अभी-अभी अपना लैपटॉप बंद करके उठी ही थी कि डोरबेल बजी। उसने घड़ी देखी और एक गहरी साँस ली। वह जानती थी कि इस समय कौन हो सकता है। यह समय उसकी सासू माँ, निर्मला जी की बचपन की सहेली और कॉलोनी की ‘खबर-नवीश’ सरला चाची के आने का था।

अनन्या ने मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खोला। सामने सरला चाची खड़ी थीं, चेहरे पर वही चिर-परिचित असंतोष का भाव और हाथ में एक छोटा सा टिफिन।

“नमस्ते चाची जी, आइए न,” अनन्या ने रास्ता छोड़ते हुए कहा।

“जीते रहो बेटा,” सरला जी ने अनमने ढंग से कहा और सीधे ड्राइंग रूम में सोफे पर जाकर बैठ गईं, जहाँ निर्मला जी पहले से ही टीवी पर कोई पुराना धारावाहिक देख रही थीं।

“अरे सरला, तू आ गई? मैं तेरा ही इंतज़ार कर रही थी,” निर्मला जी ने टीवी की आवाज़ कम करते हुए कहा।

अनन्या रसोई में चली गई। वह जानती थी कि अब अगले दो घंटे तक इस कमरे में क्या होने वाला है। सरला चाची का एक ही एजेंडा होता था—अपनी बहू, शिखा की बुराई करना। मजे की बात यह थी कि शिखा एक बहुत ही सुलझी हुई और मेहनती लड़की थी, जो घर और ऑफिस दोनों बखूबी संभालती थी, लेकिन सरला जी की ‘आदर्श बहू’ की परिभाषा में वह कभी फिट नहीं बैठती थी।

अनन्या जब ट्रे में चाय और बिस्किट लेकर लौटी, तो वहां उम्मीद के मुताबिक ‘शिखा-पुराण’ शुरू हो चुका था।

“निर्मला, तुझे क्या बताऊँ, आज तो हद ही हो गई,” सरला जी ने चाय का कप उठाते हुए मुंह बिचकाया। “कल रविवार था, सोचा था बहू घर पर है तो कुछ अच्छा नाश्ता बनाएगी। कचौड़ी या पकोड़े। पर महारानी जी ने क्या किया? सुबह 9 बजे उठीं और ऑनलाइन आर्डर करके इडली-डोसा मंगवा लिया। कहती हैं—’मम्मी जी, आज मेरा रेस्ट डे है, किचन में नहीं खपूँगी’।”

निर्मला जी ने सहानुभूति जताते हुए सिर हिलाया, “हां बहन, आजकल की लड़कियों को आराम ज्यादा प्यारा है। हमारे जमाने में तो बुखार में भी हम चूल्हा फूंकते थे।”

सरला जी को हवा मिल गई। उन्होंने एक बिस्किट चाय में डुबोया और बोलीं, “अरे आराम की बात छोड़, पैसे की बर्बादी देख। घर में आटा-दाल सब भरा पड़ा है, पर नहीं, बाहर का खाना है। और मेरा बेटा… वो तो जोरू का गुलाम हो गया है। चुपचाप बिल भर देता है। मैंने कहा—’बेटा, घर का खाना सेहत के लिए अच्छा होता है’, तो बहू बीच में बोल पड़ी—’मम्मी जी, हफ़्ते में एक दिन बाहर का खाने से कोई मर नहीं जाता’। देख रही है ज़बान? कैसे कैंची की तरह चलती है।”

अनन्या चुपचाप एक कुर्सी पर बैठ गई और मोबाइल देखने का नाटक करने लगी, लेकिन उसके कान उनकी बातों पर ही थे। उसे शिखा पर तरस आ रहा था। वह जानती थी कि शिखा एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर हेड है और हफ्ते भर 10-12 घंटे काम करती है।

सरला जी का सिलसिला जारी था। “और सुन, पिछले हफ्ते मेरी बेटी, वंदना आई थी। बेचारी कितनी दुबली हो गई है। उसके ससुराल वाले उससे कितना काम करवाते हैं। सुबह 5 बजे उठती है, टिफिन बनाती है, फिर ऑफिस जाती है। और उसका पति? एक नंबर का नकारा। पानी का गिलास भी खुद नहीं उठाता। मेरी बच्ची को मशीन समझ रखा है उन लोगों ने।”

अनन्या के दिमाग में एक घंटी बजी। यहीं वह विरोधाभास था जिसे पकड़ना ज़रूरी था। सरला जी अपनी बेटी के ससुराल वालों को ‘जल्लाद’ कह रही थीं क्योंकि वे उससे काम करवाते थे, और अपनी बहू को ‘कामचोर’ कह रही थीं क्योंकि वह एक दिन आराम करना चाहती थी।

अनन्या ने फोन मेज पर रखा और बहुत ही मासूमियत से बातचीत में शामिल हो गई।

“चाची जी,” अनन्या ने मीठी आवाज़ में पूछा, “वंदना दीदी कैसी हैं अब? आपने बताया था कि उनका प्रमोशन होने वाला था?”

सरला जी का चेहरा खिल उठा। बेटी की तारीफ सुनते ही उनकी आँखों में चमक आ गई। “अरे हाँ अनन्या, तुझे बताना तो भूल ही गई। वंदना अब ‘वाइस प्रेसिडेंट’ बन गई है। पूरे ऑफिस में उसका डंका बजता है। अभी पिछले महीने ही कंपनी ने उसे ‘बेस्ट एम्प्लॉई’ का अवार्ड दिया। और पता है, उसकी सैलरी अब उसके पति से भी ज्यादा हो गई है।”

“वाह! यह तो बहुत खुशी की बात है,” अनन्या ने ताली बजाते हुए कहा। “सच में चाची जी, वंदना दीदी बहुत मेहनती हैं। घर और ऑफिस दोनों मैनेज करना आसान नहीं होता।”

“वही तो मैं कह रही हूँ,” सरला जी ने गर्व से सीना चौड़ा किया। “मेरी बेटी सर्वगुण संपन्न है। पर उसके ससुराल वाले उसकी कद्र नहीं करते। सोच, इतनी बड़ी पोस्ट पर होने के बाद भी उसे घर जाकर रोटियां बेलनी पड़ती हैं। उसका पति अगर थोड़ी मदद कर दे—सब्जी काट दे या कपड़े मशीन में डाल दे—तो क्या उसका पौरुष कम हो जाएगा? पर नहीं, वहां तो मर्दों को काम करना पाप लगता है।”

अनन्या ने निर्मला जी की ओर देखा, जो सहमति में सिर हिला रही थीं। अब अनन्या ने अपना पासा फेंका।

“सही कह रही हैं आप चाची जी,” अनन्या ने गंभीर होकर कहा। “आज के ज़माने में जब पति-पत्नी दोनों कमा रहे हैं, तो घर का काम भी मिल-जुलकर होना चाहिए। वैसे, शिखा भाभी का ऑफिस भी तो काफी दूर है न? सुना है वो भी अक्सर लेट आती हैं?”

सरला जी का मुंह थोड़ा कसैला हो गया, जैसे स्वाद बदल गया हो। “हां, आती तो है 8 बजे तक। पर काम ही ऐसा है, क्या करें।”

“और भैया? वो कब आते हैं?” अनन्या ने पूछा।

“रोहित? वो तो 6 बजे ही आ जाता है,” सरला जी ने लापरवाही से कहा।

अनन्या ने अपनी आवाज़ में थोड़ी हैरानी मिलाई, “अच्छा? भैया 6 बजे आ जाते हैं और भाभी 8 बजे? तो फिर शाम की चाय और नाश्ता कौन बनाता है?”

सरला जी थोड़ी असहज हुईं। “अरे, रोहित ही बना लेता है कभी-कभी। या फिर वो शिखा के आने का इंतज़ार करता है। पर मुझे बहुत बुरा लगता है। मर्द जात होकर वो चाय की पतीली चढ़ाए, यह शोभा देता है क्या? उस दिन मैं देख रही थी, रोहित कपड़े तय कर रहा था और शिखा सोफे पर बैठकर पैर दबा रही थी। मेरा तो कलेजा ही मुँह को आ गया। कैसी बहू है, पति से काम करवाती है।”

अनन्या ने एक क्षण का विराम लिया, ताकि उसकी बात का असर गहरा हो। फिर उसने बहुत ही शांत स्वर में कहा, “चाची जी, मुझे एक बात समझ नहीं आई। जब वंदना दीदी का पति काम नहीं करता, तो आपको गुस्सा आता है कि वो ‘मदद’ नहीं करता। और जब शिखा भाभी का पति (आपका बेटा) मदद करता है, तो आपको लगता है कि वो ‘गुलाम’ बन गया है?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। निर्मला जी ने चाय का कप होठों से हटा लिया और अनन्या को देखने लगीं। सरला जी का मुंह आधा खुला रह गया, जैसे उनके पास कोई जवाब न हो।

अनन्या ने बात जारी रखी, “देखिए न चाची जी, वंदना दीदी भी वीपी हैं और शिखा भाभी भी एचआर हेड हैं। दोनों ही थकी-हारी घर आती हैं। आप चाहती हैं कि वंदना दीदी के ससुराल वाले उन्हें ‘मशीन’ न समझें और उन्हें आराम दें। लेकिन जब शिखा भाभी संडे को इडली आर्डर करके थोड़ा आराम करना चाहती हैं, तो वो आपको ‘कामचोर’ लगती हैं?”

सरला जी ने हकलाते हुए बचाव करना चाहा, “अरे नहीं बेटा, बात वो नहीं है। वंदना तो…”

“बात वही है चाची जी,” अनन्या ने विनम्रता से काटा। “असल में हम अपनी बेटी में वो ‘थकान’ देख लेते हैं जो हमें अपनी बहू में ‘बहाना’ लगती है। आप गर्व करती हैं कि वंदना दीदी कमा रही हैं, लेकिन आप यह भूल जाती हैं कि शिखा भाभी की कमाई भी आपके ही घर आ रही है। अगर वंदना दीदी के लिए ‘बाहर का खाना’ मजबूरी है, तो शिखा भाभी के लिए ‘शौक’ क्यों?”

निर्मला जी ने धीरे से कप मेज पर रखा। उन्हें अपनी बहू की समझदारी पर गर्व महसूस हुआ। उन्होंने देखा कि सरला का चेहरा उतर गया है।

सरला जी ने थोड़ा पानी पिया। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक आत्म-मंथन की परछाई थी। “पर अनन्या, घर की औरत का फर्ज तो होता है न कि…”

“फर्ज तो प्यार और सहयोग से चलता है चाची जी,” अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा। “आप सोचिए, अगर शिखा भाभी की सास (यानी आप) भी वैसी ही बनें जैसी आप वंदना दीदी की सास को देखना चाहती हैं—सहयोगी और समझने वाली—तो क्या शिखा भाभी आपको पलकों पर नहीं बिठाएंगी? कल जब उन्होंने डोसा आर्डर किया था, अगर आप उनसे कहतीं—’अरे वाह! आज तो पार्टी हो गई, चलो सब साथ खाते हैं’—तो क्या उन्हें अच्छा नहीं लगता? क्या पता अगली बार वो खुद आपके लिए आपकी पसंद के पकोड़े बनातीं?”

अनन्या उठी और सरला जी के घुटनों पर हाथ रखा। “चाची जी, आप तो मेरी माँ जैसी हैं। बुरा मत मानिएगा। पर शिखा भाभी भी किसी की वंदना हैं। उनकी माँ भी शायद किसी सहेली से यही कह रही होंगी कि ‘मेरी बेटी इतना काम करती है, पर उसकी सास उसे समझती नहीं’। इस चक्र को तो आप ही तोड़ सकती हैं न?”

सरला जी चुप थीं। उनकी नज़रें झुकी हुई थीं। शायद उनकी आँखों के सामने दो तस्वीरें साथ-साथ चल रही थीं—एक तरफ उनकी थकी हुई बेटी वंदना, और दूसरी तरफ उनकी थकी हुई बहू शिखा। और दोनों की थकान एक जैसी थी।

कुछ देर की खामोशी के बाद सरला जी ने एक गहरी साँस ली। “तूने तो आज मेरी आँखें खोल दीं अनन्या। मैं हमेशा सोचती थी कि मैं ही पीड़ित हूँ, कभी शिखा के नज़रिए से सोचा ही नहीं।”

फिर उन्होंने अपना फोन उठाया।

“क्या कर रही है?” निर्मला जी ने पूछा।

“शिखा को मैसेज कर रही हूँ,” सरला जी ने धीमी आवाज़ में कहा। “लिख रही हूँ कि शाम को घर आते समय सब्जी मत लाना, मैंने रोहित से मंगा ली है। तू बस आकर मेरे साथ चाय पीना, आज चाय मैं बनाऊँगी।”

निर्मला जी और अनन्या ने एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराहट साझा की।

अनन्या ने कहा, “यह हुई न बात! और चाची जी, यह टिफिन में क्या है?”

सरला जी हंसीं, “अरे, यह गाजर का हलवा है। शिखा को बहुत पसंद है, पर मैं उसे देने के बजाय यहाँ ले आई थी कि तुम दोनों खा लेना। अब सोच रही हूँ, आधा तुम्हें देती हूँ और आधा वापस ले जाती हूँ। शाम को बहू के साथ बैठकर खाऊँगी।”

माहौल एकदम बदल गया था। जो कमरा थोड़ी देर पहले शिकायतों और नकारात्मकता से भरा था, अब वहां समझदारी और मिठास घुल गई थी।

जब सरला जी जाने लगीं, तो उन्होंने अनन्या के सिर पर हाथ फेरा। “जीती रह बेटा। निर्मला, तेरी बहू तो हीरा है ही, पर इसने आज मुझे भी जौहरी बना दिया। अब मैं भी अपनी बहू को पत्थर नहीं, हीरा ही समझूँगी।”

सरला जी के जाने के बाद निर्मला जी ने अनन्या को गले लगा लिया। “अनन्या, आज तूने बहुत बड़ी बात कह दी। अक्सर हम बूढ़ी औरतें अपनी पुरानी मान्यताओं और आदतों में इतना जकड़ जाती हैं कि हमें यह दिखता ही नहीं कि समय बदल गया है। तूने सरला को ही नहीं, मुझे भी एक सीख दी है।”

अनन्या ने सास को गले लगाया, “माँ जी, सीख तो आप लोगों से ही मिलती है। बस कभी-कभी चश्मा धुंधला हो जाता है, तो उसे साफ करना पड़ता है।”

शाम ढल रही थी, लेकिन उस घर में रिश्तों की एक नई सुबह हो चुकी थी। कहीं दूर, किसी ऑफिस में बैठी शिखा के फोन पर जब उसकी सास का मैसेज आया होगा, तो यकीनन उसके चेहरे पर जो मुस्कान आई होगी, वह उस दिन की सबसे बड़ी जीत थी।

समाज में बदलाव बड़े-बड़े आंदोलनों से नहीं, बल्कि घर के ड्राइंग रूम में होने वाली ऐसी छोटी-छोटी, समझदारी भरी बातचीत से आता है। आज एक सास की सहेली अपनी बहू की बुराई करने आई थी, लेकिन एक माँ बनकर लौटी थी।

मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

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