*बुढ़ापे की लाठी वो नहीं जो घर के कोने में रखी हो, बल्कि वो है जो लड़खड़ाते वक्त हाथ थाम ले, चाहे वो हाथ सात समंदर पार से ही क्यों न बढ़ा हो।*
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फ़ोन रखने के बाद, रघुनाथ जी ने कड़वाहट से कहा, “विमला, तू कब तक झूठ बोलेगी? जो बेटी पांच सौ किलोमीटर दूर बैठकर भी मेरी दवाई और डॉक्टर का हिसाब रखती है, उसे तू समझा रही है? और जो बेटा दस सीढ़ियों के ऊपर रहता है, उसे खबर तक नहीं कि उसका बाप ज़िंदा है या मर गया।”
शहर के पॉश इलाके में बना ‘शांति निकेतन’ बंगला बाहर से देखने में किसी महल से कम नहीं था। सफ़ेद संगमरमर का फर्श, दीवारों पर महंगी पेंटिंग्स और बगीचे में झूलता हुआ झूला, सब कुछ इतना व्यवस्थित था कि कोई भी देखकर कह दे कि यहाँ रहने वाले लोग कितने खुशकिस्मत होंगे। लेकिन उस आलीशान बंगले के अंदर की खामोशी, वहां के बुजुर्ग मालिक रघुनाथ जी और उनकी पत्नी विमला देवी के दिल के सन्नाटे से भी गहरी थी।
शाम के सात बज रहे थे। रघुनाथ जी अपनी व्हीलचेयर पर बैठे मुख्य दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए देख रहे थे। विमला देवी पूजा की थाली लेकर आईं और उनके माथे पर तिलक लगाया।
“अब अंदर चलो जी, ठंड बढ़ रही है। रोहन के आने का वक्त हो गया है, पर वो तो अपनी चाबी से ही आएगा,” विमला देवी ने शॉल ओढ़ाते हुए कहा।
“जानता हूँ विमला,” रघुनाथ जी ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा। “पर दिल है कि मानता नहीं। सोचता हूँ शायद आज वो घंटी बजा दे, शायद आज वो कहे कि पापा, चलिए आज चाय साथ पीते हैं।”
तभी एक बड़ी सी एसयूवी गेट के अंदर दाखिल हुई। रोहन आ गया था। रघुनाथ जी की आँखों में चमक आ गई। रोहन, उनका इकलौता बेटा, जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी जवानी खपा दी थी, जिसके ऐश-ओ-आराम के लिए उन्होंने अपनी ज़रूरतें मारी थीं, आज एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पद पर था।
रोहन ने कार पार्क की। एक हाथ में लैपटॉप बैग और दूसरे में फ़ोन, जिस पर वह किसी क्लाइंट पर चिल्ला रहा था। वह मुख्य दरवाज़े से अंदर आया।
“अरे रोहन बेटा, आ गए?” विमला देवी ने उत्साह से पूछा। “आज तेरे पसंद के कोफ्ते बनाए हैं, हाथ-मुंह धो ले, मैं खाना लगाती हूँ।”
रोहन ने बिना रुके, फ़ोन पर बात करते हुए बस हाथ से इशारा किया कि ‘नहीं चाहिए’ और तेज़ कदमों से सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे की ओर चला गया। उसके कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ पूरे हॉल में गूंज गई।
रघुनाथ जी और विमला देवी एक-दूसरे का चेहरा देखते रह गए। यह कोई आज की बात नहीं थी, पिछले तीन सालों से यही दिनचर्या थी। बेटा घर में आता था, पर घर में ‘रहता’ नहीं था। वह ऊपर की मंजिल पर अपनी दुनिया में कैद था और बूढ़े माँ-बाप नीचे की मंजिल पर अपनी यादों के सहारे जी रहे थे।
तभी लैंडलाइन फ़ोन की घंटी बजी। विमला देवी ने लपक कर फ़ोन उठाया।
“नमस्ते माँ! कैसी हो आप? पापा का बी.पी. आज चेक किया था? उन्होंने शाम की दवाई ली या नहीं?” दूसरी तरफ से मधुर और चिंतित आवाज़ आई। यह उनकी बेटी, ‘सुधा’ थी, जो शादी करके दूसरे शहर, पुणे में रहती थी।
विमला देवी की आवाज़ में आई नमी को छुपाते हुए उन्होंने कहा, “हाँ बेटा, सब ठीक है। तू कैसी है? दामाद जी और बच्चे कैसे हैं?”
“माँ, आप मेरी चिंता छोड़ो। मुझे पापा की आवाज़ सुस्त लग रही थी कल। मैंने यहाँ से डॉ. मेहता को फ़ोन करके अपॉइंटमेंट ले लिया है कल सुबह का। ड्राइवर को मैंने बोल दिया है, वो आ जाएगा। आप प्लीज पापा को ले जाना। और सुनो, भाई घर आ गए?”
“हाँ… आ गया,” विमला देवी ने दबी आवाज़ में कहा।
“उन्होंने पापा से बात की? माँ, आप भाई से डरते क्यों हो? उन्हें बोलो ना कि पापा को वक्त दें,” सुधा की आवाज़ में गुस्सा और लाचारी दोनों थी।
“छोड़ ना बेटा, वो थका हुआ आता है। काम का बोझ बहुत है उस पर,” माँ ने हमेशा की तरह बेटे का बचाव किया।
फ़ोन रखने के बाद, रघुनाथ जी ने कड़वाहट से कहा, “विमला, तू कब तक झूठ बोलेगी? जो बेटी पांच सौ किलोमीटर दूर बैठकर भी मेरी दवाई और डॉक्टर का हिसाब रखती है, उसे तू समझा रही है? और जो बेटा दस सीढ़ियों के ऊपर रहता है, उसे खबर तक नहीं कि उसका बाप ज़िंदा है या मर गया।”
रात गहरी हो गई। बाहर मूसलाधार बारिश शुरू हो चुकी थी। बिजली कड़क रही थी। करीब दो बजे रघुनाथ जी को सीने में हल्का भारीपन महसूस हुआ। पहले उन्होंने सोचा कि गैस होगी, लेकिन धीरे-धीरे दर्द बढ़ने लगा। उनके माथे पर पसीना आ गया। विमला देवी हड़बड़ा गईं।
“जी… जी क्या हो रहा है आपको?” विमला देवी ने कांपते हाथों से पानी का गिलास बढ़ाया।
“विमला… सांस… सांस नहीं आ रही…” रघुनाथ जी ने मुश्किल से कहा।
विमला देवी घबराकर खड़ी हुईं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। लैंडलाइन खराब पड़ा था। उनका मोबाइल चार्जिंग पर दूसरे कमरे में था। उन्हें बस एक ही सहारा दिखा—ऊपर के कमरे में सो रहा उनका बेटा रोहन।
विमला देवी अपनी गठिया (Arthritis) के दर्द को भूलकर, लंगड़ाते हुए सीढ़ियाँ चढ़ने लगीं। हर सीढ़ी उनके लिए पहाड़ जैसी थी। किसी तरह वो ऊपर पहुंचीं और रोहन के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।
“रोहन! रोहन बेटा दरवाज़ा खोल! तेरे पापा की तबीयत खराब है,” विमला देवी ने आवाज़ लगाई।
अंदर से कोई जवाब नहीं आया। शायद ए.सी. की आवाज़ और कानों में लगे हेडफोन की वजह से रोहन को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। या शायद गहरी नींद थी।
विमला देवी ने जोर-जोर से दरवाज़ा पीटा। “रोहन! बेटा उठ! हमें अस्पताल जाना होगा!”
तभी अंदर से रोहन की झुंझलाई हुई आवाज़ आई, “ओह गॉड माँ! क्या है? सोने भी नहीं देते। सुबह बात कर लेंगे ना, जो भी है।”
विमला देवी सन्न रह गईं। उनके पति की जान जा रही थी और बेटा कह रहा था कि सुबह बात करेंगे। उन्होंने दोबारा खटखटाने की हिम्मत नहीं जुटाई। वह रोते हुए नीचे भागीं। उनका कांपता हुआ हाथ अपने पुराने मोबाइल तक पहुंचा। उन्हें सिर्फ़ एक ही नंबर याद आया—सुधा।
रात के 2:15 बजे फ़ोन की घंटी बजी और सुधा ने पहली ही घंटी में फ़ोन उठा लिया, जैसे वह किसी अनहोनी की आहट सुन रही हो।
“माँ? इतनी रात को? सब ठीक है?”
“सुधा… तेरे पापा… सीने में दर्द… रोहन दरवाज़ा नहीं खोल रहा…” विमला देवी फूट-फूट कर रो पड़ीं।
सुधा ने एक पल भी नहीं गंवाया। “माँ, आप रोना बंद करो। पापा के पास रहो। फ़ोन मत काटना। मैं अभी लाइन पर हूँ।”
सुधा ने दूसरे फ़ोन से तुरंत अपने शहर से ही ऑनलाइन एम्बुलेंस सर्विस को कॉल किया। उसने अपनी सहेली, जो उसी शहर में डॉक्टर थी, उसे कॉन्फ्रेंस पर लिया।
“माँ, स्पीकर ऑन करो। डॉक्टर रश्मि लाइन पर हैं, वो जैसा कह रही हैं, वैसा करो। एम्बुलेंस बस दस मिनट में पहुँच रही है,” सुधा निर्देश दे रही थी।
पाँच सौ किलोमीटर दूर बैठी बेटी ने कोहराम मचा दिया। उसने पड़ोसियों को जगाने के लिए गार्ड को फ़ोन किया। दस मिनट के अंदर घर की घंटी बजी। एम्बुलेंस आ चुकी थी और पड़ोसी शर्मा जी भी आ गए थे।
हल्ला-गुल्ला सुनकर अब रोहन की नींद खुली। वह आँखें मलते हुए नीचे आया। उसने देखा कि घर का मुख्य दरवाज़ा खुला है, बारिश की बौछारें अंदर आ रही हैं, कुछ पैरामेडिकल स्टाफ उसके पिता को स्ट्रेचर पर लिटा रहे हैं और उसकी माँ एम्बुलेंस के कर्मचारी के साथ बात कर रही हैं।
“यह… यह सब क्या हो रहा है?” रोहन हक्का-बक्का रह गया।
विमला देवी ने पलटकर रोहन को देखा। उनकी आँखों में आज ममता नहीं, एक ठंडी आग थी।
“तेरे पापा को हार्ट अटैक आया है। जब मैं ऊपर तुझे बुलाने आई थी, तूने कहा था सुबह बात करेंगे। अगर मैं तेरी ‘सुबह’ का इंतज़ार करती, तो आज तेरे पापा का ‘सूरज’ हमेशा के लिए डूब जाता।”
रोहन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “माँ, मुझे लगा कोई मामूली बात होगी…”
“मामूली?” विमला देवी ने चिल्लाकर कहा। “तेरी नज़र में हम और हमारी तकलीफें मामूली ही तो हैं। हट जा रास्ते से!”
रघुनाथ जी को अस्पताल ले जाया गया। समय पर इलाज मिलने से उनकी जान बच गई। डॉक्टर ने बाहर आकर कहा, “शुक्र मनाइए कि पेशेंट को सही वक्त पर लाया गया। अगर पंद्रह मिनट की भी देरी होती, तो हम कुछ नहीं कर पाते। जिसने भी एम्बुलेंस को कॉल किया, उसने इनकी जान बचा ली।”
रोहन अस्पताल के गलियारे में सिर झुकाए खड़ा था। उसका फोन बजा। सुधा का वीडियो कॉल था। रोहन ने डरते-डरते फोन उठाया।
स्क्रीन पर सुधा का चेहरा था, बाल बिखरे हुए, आँखें सूजी हुई। उसने रोहन को देखते ही कोई दुआ-सलाम नहीं की।
“भैया,” सुधा की आवाज़ सख्त थी। “बधाई हो, आप घर के वारिस हैं। घर की सारी वसीयत, बैंक बैलेंस सब आपके नाम है। लेकिन आज हकीकत यह है कि उस घर की छत के नीचे रहकर भी आप ‘बेघर’ हैं। मैं यहाँ पुणे में बैठकर भी पापा की धड़कन सुन सकती हूँ, और आप बगल वाले कमरे में रहकर उनकी चीख नहीं सुन पाए?”
“सुधा, मैं…” रोहन कुछ कहना चाहता था।
“मत बोलिए भैया,” सुधा ने उसे रोका। “बचपन में जब हम खेलते थे और आप गिरते थे, तो पापा दौड़कर आपको उठाते थे, यह नहीं कहते थे कि सुबह उठाएंगे। आज जब वो गिरे, तो आपने करवट बदल ली? याद रखिएगा भैया, बेटा होने का फर्ज़ सिर्फ ‘अंतिम संस्कार’ में आग देना नहीं होता, बल्कि जीते जी मां-बाप के बुढ़ापे की ‘आग’ (तकलीफ) को ठंडा करना होता है। आज आपने यह साबित कर दिया कि बेटे ‘भाग’ से मिलते हैं, पर बेटियाँ ‘सौभाग्य’ से मिलती हैं।”
फोन कट गया। रोहन उस सुनसान कॉरिडोर में अकेला खड़ा रह गया। उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन वह जानता था कि कांच पर पड़ी दरार अब जुड़ नहीं सकती।
अगले दिन रघुनाथ जी को होश आया। रोहन उनके पास गया।
“पापा, मुझे माफ़ कर दीजिये,” उसने रोते हुए कहा।
रघुनाथ जी ने बेटे के सिर पर हाथ नहीं रखा। उन्होंने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “रोहन, माफ़ी गलतियों की होती है, अपराध की नहीं। तूने मुझे नहीं मारा, तूने उस ‘भरोसे’ को मार दिया जो एक पिता को अपने बेटे पर होता है। तू जा, अपने काम पर जा। तेरी मीटिंग होगी, तेरे क्लाइंट्स होंगे। हम संभाल लेंगे।”
रोहन समझ गया कि आज उसने अपने पिता को हमेशा के लिए खो दिया है, भले ही वे ज़िंदा थे।
दो दिन बाद, रघुनाथ जी और विमला देवी घर वापस आए। उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने सुधा को बुलाया।
वकील के सामने रघुनाथ जी ने कहा, “मैं यह घर नहीं बेचना चाहता। लेकिन मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद इस घर का आधा हिस्सा, या इसकी कीमत सुधा को मिले। और मेरी बाकी बची ज़िंदगी की देखभाल के लिए मैं एक केयरटेकर रखूँगा, मैं अपने बेटे पर बोझ नहीं बनना चाहता।”
रोहन कोने में खड़ा सब सुन रहा था। उसे आज समझ आ रहा था कि ‘एक घर में रहना’ और ‘साथ रहना’ दो अलग बातें हैं।
उस शाम, सुधा वापस पुणे जाने के लिए निकली। विमला देवी ने उसे गले लगाया। “बेटा, तू जा रही है, अब हमारा क्या होगा?”
सुधा ने मुस्कुराते हुए माँ के आंसू पोंछे। “माँ, मैं जा रही हूँ, मेरा प्यार नहीं। मेरा फ़ोन मेरे पास है। एक घंटी बजाना, मैं दौड़ी चली आऊंगी। और वैसे भी माँ…” उसने रोहन की तरफ एक नज़र डाली, जो अपराधी सा खड़ा था, “…रिश्ते खून से नहीं, ‘एहसास’ से चलते हैं। जो पास रहकर भी दूर है, वो पराया है। और जो दूर रहकर भी पास है, वही अपना है।”
सुधा की गाड़ी गेट से बाहर निकल गई। रघुनाथ जी ने विमला देवी का हाथ थाम लिया। उन्हें पता था कि उनका बुढ़ापा अब उस बेटे के भरोसे नहीं है जो ऊपर सोता है, बल्कि उस बेटी के भरोसे है जो मीलों दूर जागती है।
**कहानी का सार:**
यह कहानी हमें आईना दिखाती है कि आधुनिकता और व्यस्तता की दौड़ में हम अपने जड़ों को कैसे काट रहे हैं। बेटा होना सिर्फ़ वंश बढ़ाने का नाम नहीं है, बल्कि उस वंश की नींव (माता-पिता) को थामने का नाम है। बेटियां अक्सर ‘परायी’ कहकर विदा कर दी जाती हैं, लेकिन वक्त आने पर वही बेटियां साबित करती हैं कि अपनापन सरनेम बदलने से नहीं बदलता।
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**अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या रोहन को माफ़ी मिलनी चाहिए? क्या माता-पिता का फैसला सही था? क्या आपके आस-पास भी ऐसी सुधा है जो दूर रहकर भी फर्ज़ निभा रही है?
**“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें ताकि यह संदेश हर उस बेटे तक पहुंचे जो अपने माँ-बाप को अनदेखा कर रहा है। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**