वीना शुक्ला को अभी इस विद्यालय में स्थानांतरित होकर आए दो सप्ताह ही हुए थे किन्तु इतने कम समय में ही उन्होंने नोटिस किया कि कक्षा नौवीं सी की छात्रा सुमन अन्य छात्राओं से कुछ अलग- थलग रहती है।वह ना किसी से बोलती है और ना ही किसी के पास बैठती है।वह चुपचाप गुमसुम सी सबसे आखिरी सीट पर तीन की सीट होते हुए भी अकेली बैठती है अन्य कोई छात्रा उसके पास नहीं बैठती।
एक दिन लंच समय में अपनी जिज्ञासा शांत करने हेतु उन्होंने स्टाफ रुम में अपनी अन्य सहयोगियों से उसके बारे में जानकारी करने के मकसद से अपनी जिज्ञासा उनके समक्ष रखी।वह बोलीं कक्षा नौवीं सी की छात्रा सुमन ऐसे अलग -थलग क्यों रहती है। क्या आप लोग उसके बारे में जानते हैं।
यह सुनते ही हंसी का सामूहिक अट्टहास गूंज उठा। उनमें से एक बोली वीना जी वह झुग्गी से पढ़ने आती है। उसकी मां घरों में काम करती है।उसकी मां का कहना है कि मेरी बेटी पढ़ने में बहुत होशियार है, मैं उसे पढ़ा लिखा कर बड़ी अफसर बनाऊंगी।
दूसरी बोली अब आप ही बताओ यदि काम वालीयों की बेटियां अफसर बनने लगेंगी तो फिर घरों में काम कौन करेगा।
तीसरी बोली इसीलिए अच्छे घरों से आने वाले बच्चे उसके साथ नहीं बैठते एवं उससे बात करना पसंद नहीं करते। किन्तु क्या आप लोगों ने अन्य छात्राओं को समझाने का प्रयास नहीं किया कि उसे भी पढ़ने का, आगे बढ़ने का अधिकार है। जरुरी तो नहीं जिस परिस्थिति वश उसकी मां को काम करना पड़ रहा है वह भी करे।
मीना जी बोलीं हम क्यों समझाएंगे हमारा काम है पढ़ाना सो हम कक्षा में पढ़ाकर आ जाते हैं।
स्मिता जी बोलीं हम क्यों सोचें यह तो उसकी मां को सोचना चाहिए कि उसे बजाए स्कूल भेजने के अपने साथ काम पर ले जाए और काम करना सिखाए।
उन सबकी बातें और विचार सुन वीना जी समझ गईं इनसे कुछ भी कहना निरर्थक है ये तो अपना राग अलापते रहेंगे। मुझे स्वयं ही अब उसके लिए कोई कदम उठाना पड़ेगा।
वीना जी की आदत थी कि वे कक्षा में कैवल होशियार बच्चों को लेकर ही नहीं चलतीं थीं बल्कि कमजोर बच्चों को भी आगे आने का पूरा मौका देतीं थीं।उनकी सोच थी होशियार बच्चे तो पढ़ लेंगे किन्तु उन्हें तो कमजोर बच्चों को भी पढ़ाना है। अतः वे ऐसे बच्चों को एक्स्ट्रा समय देतीं उन्हें अलग से समझातीं। कोई भी छात्रा उनसे कभी भी अपनी परेशानी पूछ सकती थी। अपनी आदतानुसार यहां भी उन्होंने उसी तरह कक्षाएं लेना प्रारंभ कर दिया।
धीरे धीरे उन्होंने सुमन को भी कक्षा में उत्तर देने के लिए प्रोत्साहित किया।वह प्रश्नों के उत्तर बहुत सटीक देती।वह वास्तव में पढ़ने में बहुत अच्छी थी। एक दिन वीना जी ने उसे कक्षा के बाहर बुला कर पूछा कि तुम कक्षा में बोलती क्यों नहीं थी ना ही कभी हाथ खड़ा करती हो।
तब वह डरते डरते बोली मैम अन्य छात्राओं ने उसे बोलने से मना किया था कि तुझे सब प्रश्नों के उत्तर आते हैं तू नहीं बोलेगी तेरे कारण हमरी डॉट पड़ती है अतः तू चुप रहा कर कभी उत्तर देने के लिए हाथ खड़ा नहीं करेगी।
बच्चों की कूटनीति सुन वीना जी को हंसी आ गई।वे बोलीं अब ऐसा कुछ नहीं होगा तुम बोला करो।यह सुन वह खुश हो गई।
एक दिन सुमन नहीं आई उन्होंने कक्षा में पूछा आज सुमन क्यों नहीं आई आप में से किसी को पता है।
एक वाचाल सी छात्रा बोली जी मैम वह कामवाली की लड़की है ना गई होगी कहीं काम करने।
यह सुन वीना जी को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने उससे पूछा कि क्या काम करने में कोई बुराई है। क्या आपके माता-पिता काम नहीं करते।सब अपनी योग्यतानुसार काम करते हैं। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। पैसे कमाने के लिए काम तो करना पड़ेगा। देखो मैं यहां विद्यालय में काम करने आती हूं चूंकि मैं पढ़ी-लिखी हूं तो पढ़ाती हूं।तुम्हारी मम्मी भी घर का काम करतीं हैं, किसी की मम्मी नौकरी करती होगीं , पापा भी बाहर काम करने जाते हैं फिर यदि उसकी मम्मी पढ़ी-लिखी नहीं है तो वह घरों में काम करतीं हैं इसमें क्या बुराई है। पूरी कक्षा शांत हो मैम की बात सुन रही थी।
वीना जी ने पुनः कहा बताओ काम करने में क्या बुराई है।
तभी कुछ छात्राएं एक साथ बोलीं मैम इस तरह से तो हमने कभी सोचा ही नहीं था।
बताओ तुम सब मिलकर सुमन को परेशान करती हो क्या उसे बुरा नहीं लगता होगा।
हां मैम ।अब हम उसे परेशान नहीं करेंगे।
वीना जी की मेहनत रंग लाई और सुमन सब बच्चों के साथ सामान्य रूप से रहने लगी।
बच्चों में आए परिवर्तन से सभी अध्यापिकाएं अचंभित थीं कि इन छात्राओं को हो क्या गया है जो सुमन से इतना घुल-मिल गईं हैं।जब उन्हें वीना जी की पहल के बारे में पता चला तो अपने व्यवहार पर अफसोस हुआ।
धीरे धीरे वीना जी और सुमन के बीच एक प्यारा सा अनाम रिश्ता बन गया।वे हर संभव उसकी मदद को तैयार रहतीं कारण उस बच्ची की आंखों में एक आग, तड़प दिखती थी अपना और अपनी मां का सपना पूरा करने की।
वीना जी की सहायता से स्कूलिंग प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर उसने इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश लिया।
इस दौरान वीना जी ने उसकी लगन को देखते हुए पूरा सहयोग दिया तन,मन,धन से। कभी भी कोई कमी नहीं आने दी।यह एक अनाम रिश्ता था गुरु शिष्या के बीच जो उन्हें मजबूती से जोड़े हुए था।
इंजीनियरिंग करने के बाद उसे एक कम्पनी में अच्छे पद पर नियुक्ति मिल गई। पहली पै मिलने पर वह सीधी अपनी मां के साथ वीना जी से मिलने पहुंची और उनके हाथ पर पैसे रखते बोली मैम आज आपको अपनी पहली पै देते हुए स्वयं को कितना गौरवान्वित अनुभव कर रही हूं, आप न होतीं तो शायद मैं स्कूल की पढाई भी पूरी नहीं कर पाती।
नहीं सुमन तुमने इस अनाम रिश्ते को इतना मान दिया यही बहुत है।इन पैसों पर सबसे पहला हक तुम्हारी मां का है उन्हें दो।
मैम इन्हें आप गुरु दक्षिणा समझ कर रख लें मुझे बहुत खुशी होगी।
जरुर बेटा कहते हुए वीना जी ने एक रुपया लेते हुए वाकी पैसे उसे लौटाते हुए कहा अपनी मां के हाथ पर रखो ।
सुमन और उसकी मां की आंखों से खुशी के आंसू झर रहे थे। मां मुश्किल से बोल पाईं मैडम जी आप नहीं होते तो सुमन ——-।
वीना जी ने उन्हें आगे नहीं बोलने दिया सुमन में यह सब करने की क्षमता थी मैंने तो उसे केवल राह सुझाई और आगे बढ़ने में मदद की बस। मेहनत तो सुमन ने ही की है और आज यह सुखद क्षण उसकी मेहनत का ही परिणाम है।
सुमन भले ही हमारे बीच खून का रिश्ता नहीं था ना ही कोई सामाजिक रिश्ता था किन्तु एक ऐसा रिश्ता था जिसे इंसानियत का रिश्ता कहते हैं, और यह जीवन भर अटूट रहेगा।इसे हम ऐसे ही प्यार और विश्वास से सींचते रहेंगे।
जी मैम मेरे जीवन में भगवान के बाद आप ही वरदान बन कर आईं और मेरे जीवन को सफल बनाने के साथ -साथ मेरी मां की आंखों में पलते सपने को भी साकार कर दिया।
शिव कुमारी शुक्ला
स्व रचित एवं अप्रकाशित
7-1-26
बिषय+++++एक रिश्ता ऐसा भी