“दो अधूरे सच” – निभा राजीव

“उसने शादी की थी अपने भाई की साँसें खरीदने के लिए, और उसने सात फेरे लिए थे अपनी बेटी को एक ‘माँ’ देने के लिए—जब दो मजबूरियां एक छत के नीचे टकराईं, तो रिश्ता कागज़ का नहीं, रूह का बन गया।”

बनारस जंक्शन से ट्रेन के छूटते ही एसी फर्स्ट क्लास के कूपे में एक भारी खामोशी पसर गई थी। खिड़की के बाहर पीछे छूटते शहर को देखते हुए नैना की आँखों में नमी तो थी, लेकिन वह नमी विदाई के गम की नहीं, बल्कि किसी और ही कशमकश की थी। उसके सामने वाली बर्थ पर बैठे कबीर ने अपनी लैपटॉप स्क्रीन से नज़रें हटाकर एक बार अपनी नवविवाहिता पत्नी को देखा।

कबीर सिंघानिया, मुंबई का एक उभरता हुआ बिजनेस टाइकून, और नैना, बनारस के एक साधारण प्रोफेसर की बेटी। यह शादी किसी परीकथा जैसी लगती थी, लेकिन हकीकत में यह इतनी जल्दी तय हुई थी कि किसी को सोचने का वक्त ही नहीं मिला। कबीर अपने किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में बनारस आया था, एक कॉमन फ्रेंड के जरिए नैना के पिता से मिला, और महज तीन मुलाकातों में उसने नैना का हाथ मांग लिया।

नैना के पिता, प्रोफेसर दीनानाथ, तो खुशी से फूले नहीं समाए थे। बिना दहेज, बिना किसी तामझाम के इतना बड़ा रईस उनकी बेटी को अपना रहा था। नैना ने भी, जो हमेशा से शादी के खिलाफ थी, आश्चर्यजनक रूप से तुरंत ‘हाँ’ कह दी थी।

ट्रेन अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी। कबीर ने पानी की बोतल नैना की तरफ बढ़ाई।

“नैना, पानी?”

नैना ने चौंककर देखा, जैसे किसी गहरे विचार से जागी हो। “नहीं, धन्यवाद।” उसने रूखेपन से जवाब दिया और चादर ओढ़कर सोने का नाटक करने लगी।

कबीर ने एक गहरी सांस ली। उसे लगा कि नैना शायद नए माहौल और घर छूटने के गम में परेशान है। उसने उसे डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा। लेकिन कबीर नहीं जानता था कि नैना की बंद आँखों के पीछे एक बहुत बड़ा तूफ़ान चल रहा था।

मुंबई पहुँचते ही नैना की जिंदगी आलीशान बंगले की चारदीवारी में सिमट गई। कबीर उसे हर सुख-सुविधा देता था, लेकिन नैना का व्यवहार अजीब था। वह कबीर से कतराती थी। दिन भर वह अपने फोन पर व्यस्त रहती और अक्सर घर से बाहर जाने के बहाने ढूंढती रहती।

शादी के पंद्रह दिन बाद, कबीर को एक जरूरी मीटिंग के लिए पुणे जाना था। उसने नैना को बताया कि वह दो दिन बाद लौटेगा। नैना के चेहरे पर एक अजीब सी राहत दिखाई दी, जो कबीर की पारखी नज़रों से छिप न सकी।

कबीर घर से निकला, लेकिन वह पुणे नहीं गया। उसे नैना के व्यवहार पर शक हो चुका था। उसने अपनी कार को थोड़ी दूर पार्क किया और इंतजार करने लगा। आधे घंटे बाद, नैना घर से निकली। उसने साड़ी की जगह जींस और कुर्ती पहन रखी थी और चेहरे पर एक स्कार्फ बांधा हुआ था। उसने एक टैक्सी रोकी और चल दी।

कबीर ने अपनी कार उसके पीछे लगा दी। टैक्सी शहर के भीड़भाड़ वाले इलाक़े से गुजरती हुई ‘लीलावती हॉस्पिटल’ के सामने रुकी। कबीर का माथा ठनका। हॉस्पिटल? क्या नैना बीमार है?

वह दबे पाँव नैना के पीछे-पीछे अंदर गया। नैना रिसेप्शन पर कुछ बात करके जनरल वार्ड की तरफ बढ़ी। कबीर ने छिपकर देखा कि नैना एक बेड के पास जाकर खड़ी हो गई। उस बेड पर एक बीस-बाइस साल का लड़का लेटा हुआ था, जिसका पूरा सिर पट्टियों से बंधा था और वह कोमा जैसी स्थिति में लग रहा था।

नैना उस लड़के का हाथ पकड़कर फूट-फूटकर रो रही थी। “समीर… आँखें खोलो समीर। देखो, मैं आ गई हूँ। मैंने वो सब किया जो जरूरी था। अब हमारे पास पैसों की कमी नहीं है। तुम्हारा इलाज अब बेस्ट डॉक्टर करेंगे। मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगी।”

कबीर को लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर हथौड़ा मार दिया हो। समीर? क्या यह नैना का प्रेमी है? क्या नैना ने उससे शादी सिर्फ पैसों के लिए की थी ताकि वह अपने प्रेमी का इलाज करा सके? गुस्से और अपमान की आग में जलता हुआ कबीर वहां से सीधे बाहर निकल आया। उसका मन हुआ कि अभी जाकर नैना को बेनकाब कर दे, लेकिन उसने संयम रखा। वह जानना चाहता था कि यह खेल कहाँ तक जाएगा।

शाम को जब नैना घर लौटी, तो उसने देखा कि कबीर ड्राइंग रूम के अंधेरे में बैठा है।

“कबीर? आप तो पुणे जाने वाले थे?” नैना हड़बड़ा गई।

कबीर ने लाइट ऑन की। उसकी आँखों में एक अजीब सी सख्ती थी। उसने टेबल पर रखे कुछ कागजात नैना की तरफ सरकाए।

“यह तलाक के पेपर्स हैं, नैना। साइन कर दो। और अपनी मुंहमांगी कीमत लेकर यहाँ से दफा हो जाओ। जाओ अपने उस समीर के पास, जिसके लिए तुमने मेरे जज्बातों का सौदा किया।”

नैना के पैरों तले जमीन खिसक गई। “कबीर, आप… आप गलत समझ रहे हैं।”

“गलत?” कबीर चिल्लाया। “मैं आज हॉस्पिटल गया था। मैंने देखा तुम्हें उस लड़के का हाथ पकड़े रोते हुए। क्या नाम है उसका? समीर? तुम मुझसे शादी सिर्फ इसलिए करना चाहती थी ताकि मेरे पैसों से उसका इलाज करा सको, है न? तुमने मुझे एक एटीएम मशीन समझा?”

नैना की आँखों से आंसू बह निकले। वह घुटनों के बल बैठ गई। “हाँ कबीर, मैंने आपसे शादी सिर्फ पैसों के लिए की थी। लेकिन समीर मेरा प्रेमी नहीं है… वह मेरा जुड़वां भाई है।”

कबीर सन्न रह गया। “भाई?”

नैना ने सिसकते हुए कहा, “जी। समीर और मैं, हम दोनों की दुनिया एक-दूसरे तक ही सीमित थी। पिछले महीने उसका भयानक एक्सीडेंट हुआ था। ब्रेन हेमरेज था। डॉक्टरों ने कहा था कि ऑपरेशन के लिए बीस लाख रुपये चाहिए और वो भी मुंबई के किसी बड़े अस्पताल में। मेरे पिता एक साधारण टीचर हैं, हम अपना घर बेचकर भी इतने पैसे नहीं जुटा सकते थे। तभी आप रिश्ता लेकर आए। पापा ने मना कर दिया था, लेकिन मैंने… मैंने उनसे जिद की। मुझे पता था कि आपकी पत्नी बनकर ही मैं समीर को बचा सकती हूँ। मैंने आपसे झूठ बोला, धोखा दिया, मुझे माफ़ कर दीजिये। लेकिन मेरे पास अपने भाई की जान बचाने का और कोई रास्ता नहीं था।”

कबीर चुपचाप खड़ा नैना को देखता रहा। उसका गुस्सा, जो कुछ पल पहले ज्वालामुखी की तरह धधक रहा था, अब पानी हो चुका था। उसे अपनी जल्दबाजी और अपने शक पर ग्लानि होने लगी। वह धीरे से नैना के पास गया और उसे कंधों से पकड़कर उठाया।

“नैना…” कबीर की आवाज़ में अब नरमी थी। “अगर यह बात तुम मुझे शादी से पहले बतातीं, तो क्या मैं मदद नहीं करता?”

नैना ने सिर झुका लिया। “मुझे नहीं पता था कबीर। अमीर लोग अक्सर गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं, यही सुना था मैंने। मुझे डर था कि अगर मैंने सच बताया, तो आप शादी नहीं करेंगे और मदद भी नहीं मिलेगी। और तब तक समीर…” उसका गला रंध गया।

कबीर ने नैना को सोफे पर बिठाया और पानी का गिलास दिया। फिर वह उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।

“नैना, तुमने जो किया, वह एक मजबूरी थी। लेकिन आज मैं भी तुम्हें एक सच बताना चाहता हूँ,” कबीर ने गहरी सांस ली। “शायद यह नियति ही है कि हम दोनों एक-दूसरे से मिले। जैसे तुम्हारा एक मकसद था इस शादी का, वैसे ही मेरा भी एक मकसद था।”

नैना ने भीगी पलकों से कबीर की ओर देखा। “मकसद?”

कबीर उठा और दीवार पर लगी एक बड़ी पेंटिंग के पीछे से एक चाबी निकाली। उसने कमरे के कोने में रखे एक लॉकर को खोला और उसमें से एक एल्बम निकालकर नैना के सामने रखा।

“यह रिया है,” कबीर ने एल्बम की पहली तस्वीर की ओर इशारा किया। तस्वीर में एक पांच साल की प्यारी सी बच्ची व्हीलचेयर पर बैठी थी।

“मेरी बेटी,” कबीर ने कहा।

नैना हैरान रह गई। “बेटी? लेकिन आपने तो कहा था कि आप कुंवारे हैं?”

“यह दुनिया के लिए सच है,” कबीर ने उदास मुस्कान के साथ कहा। “कॉलेज के दिनों में मैं एक लड़की से प्यार करता था, अंजलि। हम शादी करना चाहते थे, लेकिन मेरा परिवार राजी नहीं था। हमने भागकर मंदिर में शादी कर ली। लेकिन अंजलि को एक लाइलाज बीमारी थी जो मुझे बाद में पता चली। रिया को जन्म देते ही अंजलि चल बसी। रिया… वह ‘सेरेब्रल पाल्सी’ के साथ पैदा हुई। मेरा परिवार, जो अंजलि को ही नहीं अपनाना चाहता था, उन्होंने रिया को अपनाने से साफ़ इनकार कर दिया। मेरे पिता ने शर्त रखी कि अगर मुझे बिजनेस और जायदाद चाहिए, तो मुझे रिया को अनाथालय छोड़ना होगा।”

कबीर की आँखें नम हो गईं। “मैं तब कमजोर था नैना। मैंने दुनिया की नज़रों में रिया को एक ‘केयर होम’ में शिफ्ट कर दिया। लेकिन मैं उससे मिलने रोज जाता था। अब मेरे पिता नहीं रहे, और मैं रिया को घर लाना चाहता था। लेकिन एक ‘स्पेशल चाइल्ड’ को संभालने के लिए मुझे एक साथी की जरूरत थी। मैंने कई लड़कियों को देखा, लेकिन वे सब मेरे पैसे और स्टेटस पर मरती थीं। जब मैंने तुम्हें देखा, तुम्हारी सादगी देखी, तुम्हारे पिता के संस्कार देखे, तो मुझे लगा कि तुम रिया को एक माँ का प्यार दे सकोगी। मैंने तुमसे शादी इसलिए की ताकि रिया को उसका घर मिल सके। मैंने भी तुमसे यह बात छिपाई क्योंकि मुझे डर था कि एक अपाहिज सौतेली बेटी की जिम्मेदारी सुनकर तुम शादी से इनकार कर दोगी।”

कमरे में एक भारी खामोशी छा गई। दो इंसान, जो एक-दूसरे को धोखेबाज समझ रहे थे, असल में परिस्थितियों के मारे हुए थे। दोनों ने एक-दूसरे से झूठ बोला था, लेकिन उस झूठ के पीछे का मकसद ‘प्रेम’ ही था—एक का भाई के लिए, दूसरे का बेटी के लिए।

नैना ने धीरे से एल्बम उठाया और रिया की तस्वीर पर उंगलियां फेरीं। “यह बहुत प्यारी है,” उसने धीरे से कहा।

कबीर ने उम्मीद भरी नज़रों से नैना को देखा। “समीर का इलाज अब मेरी जिम्मेदारी है नैना। देश के सबसे अच्छे न्यूरोसर्जन उसे देखेंगे। तुम्हें अब छिपकर जाने की जरूरत नहीं है। लेकिन… क्या तुम रिया को अपना सकोगी?”

नैना उठी और उसने तलाक के पेपर्स उठाए। एक पल के लिए उसने कबीर की आँखों में देखा, और फिर उन कागजों को फाड़कर डस्टबिन में डाल दिया।

“कल सुबह हम सबसे पहले समीर को देखने जाएंगे,” नैना ने दृढ़ता से कहा। “और शाम को… शाम को हम रिया को घर लेकर आएंगे। एक भाई को उसकी बहन की जरूरत है, और एक बेटी को उसकी माँ की। हम दोनों के अधूरे परिवार मिलकर ही पूरे होंगे।”

कबीर की आँखों से एक आंसू लुढ़क गया। उसने आगे बढ़कर नैना का हाथ थाम लिया। यह स्पर्श किसी समझौते का नहीं, बल्कि एक नए विश्वास का था।

उस रात उस आलीशान बंगले में पहली बार ‘घर’ जैसा सुकून था। दो झूठों ने मिलकर एक ऐसा सच रच दिया था जो किसी भी पवित्र रिश्ते से ज्यादा गहरा था।

मूल लेखिका : निभा राजीव 

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