डिग्रियां तो बहुत मिलीं, मगर संस्कार सिलेबस से बाहर थे – रश्मि प्रकाश

*जिस मां ने अपने गहने बेचकर बेटे को ‘जज’ बनाया, आज वही बेटा अपनी मां को ‘कटघरे’ में खड़ा करके पूछ रहा था—”तुम मेरे स्टेटस में कहां फिट होती हो?”*

“मुझे बस एक बात बता दे बेटा,” जानकी की आवाज़ भर्रा गई, “तेरी उन मोटी-मोटी किताबों में, तेरे उस संविधान में, या तेरे उस बड़े स्कूल के सिलेबस में… किस पन्ने पर यह लिखा है कि जब बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, तो जिस माँ ने उसे उंगली पकड़ना सिखाया, उसे ‘तन्हा’ छोड़ देना चाहिए?”

शहर के पॉश इलाके ‘सिविल लाइन्स’ में स्थित वह सरकारी बंगला बेहद शानदार था। गेट पर वर्दीधारी संतरी खड़ा था और नेमप्लेट पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—’मिस्टर विवान अवस्थी, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM)’।

यह नाम पढ़कर कोई भी गर्व से भर सकता था, लेकिन उस बंगले के पिछले हिस्से में बने एक छोटे से कमरे में बैठी 65 वर्षीय जानकी देवी की आँखों में गर्व नहीं, बल्कि एक अजीब सा सूनापन था। जानकी देवी को पढ़ना नहीं आता था, लेकिन उन्हें इतना पता था कि गेट पर लिखी वो नेमप्लेट उनकी ही मेहनत, पसीने और आंसुओं की स्याही से लिखी गई थी।

विवान उनका इकलौता बेटा था। पति की मौत तब हो गई थी जब विवान महज चार साल का था। गांव में जानकी देवी के पास थोड़ी सी ज़मीन थी। रिश्तेदार कहते थे, “जानकी, दूसरी शादी कर ले या बेटे को किसी दुकान पर काम पर लगा दे, पढ़ाकर क्या करेगी?” लेकिन जानकी की ज़िद थी। वह अनपढ़ थी, अंगूठा लगाती थी, इसलिए दुनिया उसे ठग लेती थी। उसने कसम खाई थी कि उसका बेटा अंगूठा नहीं लगाएगा, वह तो दूसरों की किस्मत के फैसले लिखेगा।

उसने खेतों में मज़दूरी की, दूसरों के घरों में बर्तन मांजे, अपनी जवानी धूप में जला दी ताकि विवान को शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ा सके। जब विवान को इंजीनियरिंग के बाद यूपीएससी की तैयारी करनी थी, तो जानकी ने अपनी ज़मीन और अपनी माँ की दी हुई आखिरी निशानी—चांदी की पायल—भी बेच दी थी।

आज विवान डी.एम. था। उसकी शादी ‘रिया’ से हुई थी, जो एक बड़े बिजनेसमैन की बेटी थी और खुद एक इंटीरियर डिज़ाइनर थी।

बंगले में आज बहुत बड़ी पार्टी थी। शहर के बड़े-बड़े अफसर और नेता आने वाले थे। घर को विदेशी फूलों से सजाया गया था। जानकी देवी ने अपनी पुरानी संदूक से एक नई सूती साड़ी निकाली। यह साड़ी उन्होंने पिछले साल गांव के मेले से खरीदी थी, जिसे उन्होंने आज के खास दिन के लिए बचाकर रखा था। वे तैयार होकर अपने कमरे से बाहर निकलने ही वाली थीं कि तभी रिया वहां आ धमकी।

रिया ने एक डिज़ाइनर गाउन पहना हुआ था। उसने जानकी देवी को ऊपर से नीचे तक देखा और माथे पर शिकन लाते हुए बोली, “मम्मी जी, आप बाहर कहाँ जा रही हैं?”

“अरे बहू, आज विवान का जन्मदिन है ना। मैंने उसके लिए अपने हाथों से गाजर का हलवा बनाया है। मेहमानों के आने से पहले उसे खिलाना चाहती हूँ,” जानकी देवी ने अपनी झुर्रियों वाले चेहरे पर मुस्कान लाते हुए कहा।

रिया ने एक गहरी सांस ली, जैसे अपना गुस्सा काबू कर रही हो। “मम्मी जी, प्लीज! बाहर शहर के कमिश्नर और मेयर आए हुए हैं। वहां सब इंग्लिश में बात कर रहे हैं, हाई-प्रोफाइल लोग हैं। आप वहां ये सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहनकर जाएंगी? और वो गाजर का हलवा… प्लीज, वहां कॉन्टिनेंटल खाना सर्व हो रहा है। आपके हलवे की घी की महक से पूरा हॉल भर जाएगा।”

जानकी देवी का हाथ ठिठक गया। “लेकिन बहू, विवान को मेरे हाथ का हलवा पसंद है…”

“वो बचपन में पसंद था मम्मी जी,” रिया ने कड़वा सच बोला। “अब वो डी.एम. साहब हैं। उनका स्टेटस है। आप समझती क्यों नहीं? अगर किसी ने आपसे इंग्लिश में कुछ पूछ लिया तो विवान की कितनी इंसल्ट होगी? आप यहीं कमरे में रहिये, मैं खाना भिजवा दूंगी।”

रिया इतना कहकर, दरवाज़ा बाहर से सटाकर चली गई।

जानकी देवी के हाथ से हलवे की कटोरी छूटकर मेज़ पर गिर गई। जिस बेटे के लिए उन्होंने दुनिया से लड़कर उसे ‘बड़ा आदमी’ बनाया था, आज उसी बेटे की दुनिया में उनकी जगह एक ‘पुरानी कुर्सी’ की तरह हो गई थी, जिसे मेहमानों के आने पर स्टोर रूम में छिपा दिया जाता है।

पार्टी देर रात तक चली। संगीत, हंसी-ठहाके और अंग्रेजी की बातें जानकी के बंद कमरे तक छन-छन कर आ रही थीं। विवान एक बार भी माँ के पास नहीं आया। शायद वह भूल गया था कि जिस तारीख को वह अपना जन्मदिन मना रहा है, उस तारीख को जन्म देने के लिए उसकी माँ ने मौत को भी मात दी थी।

अगली सुबह, नाश्ते की मेज़ पर विवान और रिया बैठे थे। जानकी देवी वहां आईं। उनकी आँखें सूजी हुई थीं।

विवान ने अखबार से नज़रें हटाईं और सामान्य स्वर में बोला, “माँ, हलवा अच्छा था। रिया ने बाद में बताया कि तुमने बनाया था।”

जानकी देवी ने कुछ नहीं कहा। वह बस अपने बेटे को देख रही थीं। वह बेटा जिसे उन्होंने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज वह नज़रों से भी दूर हो गया था।

“माँ, मुझे तुमसे ज़रूरी बात करनी है,” विवान ने कॉफी का घूंट भरते हुए कहा। उसका लहज़ा थोड़ा सख्त, थोड़ा व्यावहारिक (practical) था। बिल्कुल एक अफसर जैसा।

“हम्म्, बोल,” जानकी ने धीमी आवाज़ में कहा।

“देखो माँ, तुम्हें यहाँ शहर में अच्छा नहीं लगता। यहाँ का रहन-सहन अलग है, तुम बोर हो जाती हो। रिया और मेरी लाइफस्टाइल बहुत बिजी है। हमारे घर अक्सर बड़े लोग आते रहते हैं, और तुम्हें… मतलब, तुम यहाँ एडजस्ट नहीं कर पा रही हो,” विवान शब्दों को चुन रहा था, जैसे कोर्ट में दलील पेश कर रहा हो।

“तो?” जानकी ने सीधा पूछा।

“तो मैंने सोचा है कि तुम्हारे लिए ‘शांति धाम’ सबसे अच्छी जगह रहेगी। वो एक बहुत वी.आई.पी. ओल्ड एज होम (वृद्धाश्रम) है। वहां तुम्हारे जैसी उम्र की और भी महिलाएं मिलेंगी। वहां सत्संग होता है, गार्डन है, डॉक्टर्स हैं। मैंने वहां बात कर ली है। वहां तुम्हें बहुत ‘आराम’ मिलेगा। यहाँ तुम दिन भर कमरे में बंद रहती हो, वहां आज़ादी होगी।”

रिया ने भी हाँ में हाँ मिलाई, “हाँ मम्मी जी, वो जगह बहुत अच्छी है। हम आपसे हर संडे मिलने आएंगे। यहाँ तो आप अकेली ही पड़ जाती हैं।”

जानकी देवी सन्न रह गईं। उनके कानों में विवान के शब्द गूंज रहे थे—’आराम मिलेगा’, ‘आज़ादी होगी’।

क्या वाकई? या फिर यह बेटे की ‘आज़ादी’ का रास्ता था?

जानकी देवी उठीं और अपने कमरे में गईं। थोड़ी देर बाद वह लौटीं। उनके हाथ में कोई कपड़े की पोटली नहीं थी, बल्कि एक पुरानी, पीली पड़ चुकी डायरी और एक पेन था।

विवान और रिया हैरान होकर उन्हें देख रहे थे। जानकी तो अनपढ़ थीं, फिर यह डायरी और पेन क्यों?

जानकी ने वह डायरी विवान के सामने पटकी और पेन उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“विवान, तू बहुत बड़ा अफ़सर है ना? बहुत पढ़ाई की है तूने। दुनिया भर की किताबें पढ़ी हैं। कानून की किताबें, समाज की किताबें… सब रटी होंगी।”

विवान चुप था। माँ की आवाज़ में आज एक अलग ही कम्पन था।

“मुझे बस एक बात बता दे बेटा,” जानकी की आवाज़ भर्रा गई, “तेरी उन मोटी-मोटी किताबों में, तेरे उस संविधान में, या तेरे उस बड़े स्कूल के सिलेबस में… किस पन्ने पर यह लिखा है कि जब बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, तो जिस माँ ने उसे उंगली पकड़ना सिखाया, उसे ‘तन्हा’ छोड़ देना चाहिए?”

विवान की नज़रें झुक गईं।

जानकी ने आगे कहा, “तू कहता है मुझे वहां आराम मिलेगा? बेटा, जब तू छोटा था और तुझे चेचक (chickenpox) निकला था, तो डॉक्टर ने कहा था कि यह छूत की बीमारी है, बच्चे से दूर रहो। तब मैंने तुझे किसी ‘नर्सिंग होम’ में नहीं भेजा था। मैं 15 दिन तक बिना सोए तुझे अपनी गोद में लेकर बैठी रही थी। तब मुझे ‘आराम’ नहीं चाहिए था?”

“माँ, वो बात अलग थी…” विवान ने बुदबुदाने की कोशिश की।

“अलग क्या थी?” जानकी चीख पड़ीं। “फर्क बस इतना था कि तब तू बेबस था और मैं समर्थ थी। आज मैं बूढ़ी और बेबस हूँ, और तू समर्थ है। तूने कहा मैं यहाँ के माहौल में ‘फिट’ नहीं बैठती। सच तो यह है विवान, कि जब मैं अनपढ़ होकर, गोबर पाथकर, तुझे दुनिया के सबसे महंगे इंग्लिश स्कूल में पढ़ा रही थी, तब भी मैं वहां के माहौल में ‘फिट’ नहीं थी। मेरे कपड़े तब भी गंदे थे, मेरी चप्पल तब भी टूटी थी। पर तब तुझे शर्म नहीं आई थी क्योंकि तब तुझे मेरी ज़रूरत थी।”

रिया बीच में बोलने लगी, “मम्मी जी, आप इमोशनल हो रही हैं। हम प्रैक्टिकल बात कर रहे हैं।”

जानकी ने रिया की तरफ हाथ दिखाकर उसे चुप करा दिया। “चुप रह बहू। प्रैक्टिकल? जिस दिन विवान पैदा हुआ था, अगर मैं प्रैक्टिकल होती, तो इसे अनाथालय छोड़ देती और अपनी जवानी मजे से जीती। माँ ‘प्रैक्टिकल’ नहीं होती, इसीलिए ‘माँ’ होती है।”

जानकी ने पेन विवान के हाथ में थमा दिया।

“ले, लिख दे इस डायरी में। अपनी उस डी.एम. वाली मुहर लगाकर लिख दे कि ‘मैं, विवान अवस्थी, अपनी अनपढ़ माँ को घर से निकाल रहा हूँ क्योंकि उसकी शक्ल और उसके कपड़े मेरे रूतबे पर दाग लगा रहे हैं।’ लिख दे कि तेरी डिग्री में ‘इंसानियत’ का पाठ नहीं था।”

विवान के हाथ कांपने लगे। वह पेन नहीं पकड़ पाया। पेन लुढ़क कर ज़मीन पर गिर गया। उस शानदार बंगले के एसी डाइनिंग रूम में सन्नाटा ऐसा था कि सुई गिरने की आवाज़ भी सुनाई दे।

जानकी ने एक सूखी हंसी हंसी। “नहीं लिख पाएगा। क्योंकि तेरी शिक्षा ने तुझे दिमाग तो दिया, पर रीढ़ की हड्डी नहीं दी। तू कागज़ों पर फैसले सुनाता है, पर आज तेरी अनपढ़ माँ ने तुझे तेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला सुना दिया है।”

जानकी देवी मुड़ीं। “मुझे तेरे उस ‘शांति धाम’ की ज़रूरत नहीं है। मेरे गांव की झोपड़ी अभी टूटी नहीं है। वहां की मिट्टी में मेरे पसीने की महक है। वहां लोग अनपढ़ जरूर हैं, पर उनकी आँखों में शर्म और दिल में लिहाज है। मैं जा रही हूँ।”

“माँ, रुको! तुम ऐसे नहीं जा सकतीं!” विवान अपनी कुर्सी से उठा, उसकी आँखों में शर्मिंदगी के आंसू थे।

जानकी दरवाज़े पर रुकीं। उन्होंने पलटकर नहीं देखा।

“मत रोक विवान। अगर मैं रुक गई, तो मुझे लगेगा कि मेरी परवरिश जीत गई, लेकिन मेरा बेटा हार गया। और मैं अपने बेटे को हारा हुआ नहीं देख सकती। तू अपनी इस आलीशान जेल में खुश रह। बस एक दुआ है मेरी… भगवान करे तेरा बेटा इतना ‘पढ़ा-लिखा’ न निकले कि कल को वो तेरे साथ वही करे, जो आज तूने मेरे साथ किया।”

जानकी देवी उस बड़े से बंगले की दहलीज पार कर गईं। विवान पत्थर की मूरत बना खड़ा रहा। बाहर खड़ी सरकारी गाड़ी और लाल बत्ती उसे चिढ़ा रही थी। उसे अपनी तमाम डिग्रियां, अपने मेडल, अपनी नेमप्लेट… सब उस जाती हुई बूढ़ी औरत के कदमों की धूल के सामने रद्दी के टुकड़े लग रहे थे।

उसकी अनपढ़ माँ ने आज उसे वो पाठ पढ़ा दिया था, जो दुनिया की किसी यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ाया जाता।

**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**

क्या विवान की डिग्रियां और सफलता किसी काम की हैं, अगर वो अपनी जन्मदात्री को सम्मान नहीं दे सका? क्या हम भी ‘मॉडर्न’ होने की दौड़ में अपने संस्कारों को पीछे छोड़ रहे हैं?

अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें। हम हर कमेंट पढ़ते हैं।

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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश 

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