धोखा – सुनीता साहनी

नैना ने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए पानी की बोतल खोली ही थी कि उसकी नज़र सामने वाली डेस्क पर टिकी सुहानी पर जा रुकी। ऑफिस की वह डेस्क, जो हमेशा हंसी-ठिठोली और चाय के कपों की खनक से गूंजती रहती थी,

आज वहां एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। सुहानी, जो इस दफ्तर की ‘जान’ मानी जाती थी, आज अपने कंप्यूटर स्क्रीन को ऐसे घूर रही थी जैसे उस पर कोई एक्सेल शीट नहीं, बल्कि उसकी ज़िंदगी का कोई बहुत कड़वा सच लिखा हो।

नैना और सुहानी की दोस्ती सिर्फ़ कलीग्स वाली नहीं थी। पिछले पाँच सालों में उन्होंने साथ में न जाने कितने प्रोजेक्ट्स निपटाए थे, बॉस की डांट खाई थी और कैंटीन की बेस्वाद कॉफी पीते हुए अपने-अपने घरों की कहानियां साझा की थीं। लेकिन आज, दो दिन की बीमारी की छुट्टी के बाद जब नैना वापस लौटी थी, तो उसे सुहानी का रूप कुछ बदला-बदला सा लगा।

सुहानी वह लड़की थी जिसके पर्स में हमेशा एक्स्ट्रा चॉकलेट्स होती थीं और जुबान पर हर समस्या का कोई न कोई चुटकुले भरा समाधान। अगर ऑफिस में एसी ख़राब हो जाए, तो सुहानी ही थी जो पसीना पोंछते हुए कहती, “अरे छोड़ो यार, फ्री में सॉना बाथ मिल रहा है, एन्जॉय करो।

” उसकी सकारात्मकता संक्रामक थी। लेकिन आज… आज उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे और उसके कंधों का झुकाव बता रहा था कि वह किसी बहुत भारी बोझ तले दबी है।

लंच टाइम हुआ। अमूमन सुहानी ही सबसे पहले नैना के पास आती थी—”चल नैना, आज मैं राजमा-चावल लाई हूँ, ठंडा होने से पहले खत्म करते हैं।” पर आज वह अपनी सीट से हिली तक नहीं।

नैना से रहा नहीं गया। वह अपना टिफिन लेकर सुहानी की डेस्क पर पहुँच गई।

“मैडम, अगर स्क्रीन घूरने का कॉम्पिटिशन चल रहा है तो बता दो, मैं भी हिस्सा ले लूँ?” नैना ने हल्का मज़ाक किया, यह सोचकर कि शायद सुहानी हमेशा की तरह हंस देगी।

सुहानी चौंकी। उसने नैना की तरफ देखा और जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की। वह मुस्कान इतनी खोखली थी कि नैना का दिल बैठ गया।

“अरे नैना, तू कब आई? मुझे पता ही नहीं चला। नहीं बस, एक रिपोर्ट चेक कर रही थी,” सुहानी ने हड़बड़ाते हुए कहा और माउस को बेमतलब हिलाने लगी।

“रिपोर्ट बंद है सुहानी, स्क्रीन पर सिर्फ डेस्कटॉप वॉलपेपर दिख रहा है,” नैना ने गंभीरता से कहा। “टिफिन उठा और छत पर चल। अभी।”

नैना की आवाज़ में वो अधिकार था जिसे सुहानी टाल नहीं सकती थी। वे दोनों ऑफिस की छत पर आ गईं। दोपहर की धूप तेज़ थी, लेकिन हवा में ठंडक थी। दोनों ने एक कोने में अपनी जगह ली। नैना ने टिफिन खोला, लेकिन सुहानी ने खाने की तरफ देखा तक नहीं। वह रेलिंग पकड़कर नीचे शहर के शोरगुल को देख रही थी।

“अब बताएगी या मैं अपने जासूसी घोड़े दौड़ाना शुरू करूँ?” नैना ने परांठे का टुकड़ा तोड़ते हुए पूछा। “और मुझे ‘कुछ नहीं’ वाला जवाब नहीं चाहिए। मैं तुझे जानती हूँ सुहानी। तेरी चुप्पी का मतलब है कि कोई तूफ़ान है जो अंदर ही अंदर तुझे तबाह कर रहा है।”

सुहानी ने एक गहरी सांस ली। उसकी आँखों में जो बांध अब तक बंधा हुआ था, वह नैना के इस एक सवाल से टूट गया। उसकी आँखों से आंसू बह निकले। वह सुबकने लगी। नैना ने तुरंत टिफिन साइड में रखा और उसे गले लगा लिया। कुछ देर तक सुहानी बस रोती रही, जैसे बरसों का गुबार निकाल रही हो।

“नैना… सब ख़त्म हो गया यार,” सुहानी ने सिसकते हुए कहा।

“क्या ख़त्म हो गया? पहेलियाँ मत बुझा,” नैना ने उसे पानी की बोतल थमाई।

सुहानी ने पानी का एक घूंट पिया और खुद को थोड़ा संभाला। “तुझे याद है, मैंने बताया था कि पापा ने रिटायरमेंट के पैसों से एक प्लॉट लिया था? वो उनका सपना था। वो चाहते थे कि शहर की भीड़भाड़ से दूर अपना एक छोटा सा घर हो, जहाँ वो अपनी बागवानी कर सकें।”

“हाँ, याद है। तूने कहा था कि रजिस्ट्री हो गई है और अगले महीने से काम शुरू होगा,” नैना ने कहा।

“वो ज़मीन… वो ज़मीन फ़र्ज़ी थी नैना,” सुहानी की आवाज़ कांप गई। “जिस डीलर के ज़रिये पापा ने वो सौदा किया था, वो पापा का बचपन का दोस्त था। ‘रमेश अंकल’। पापा उन पर आँख मूंदकर भरोसा करते थे। उन्होंने पापा को जो कागज़ दिखाए, जो रजिस्ट्री करवाई… सब नकली था। कल पुलिस घर आई थी। पता चला कि वो ज़मीन सरकारी थी और उस डीलर ने पापा जैसे न जाने कितने लोगों को ठगा है। वो रमेश अंकल अब फरार हैं।”

नैना सन्न रह गई। वह जानती थी कि सुहानी का परिवार एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार है। पिता की पूरी ज़िंदगी की कमाई उस एक प्लॉट में लगी थी।

सुहानी ने आगे कहा, “पापा को तो जैसे लकवा मार गया है नैना। वो कल से एक शब्द नहीं बोले हैं। बस छत को घूरते रहते हैं। माँ का रो-रोकर बुरा हाल है। और भैया… भैया तो गुस्से में घर से निकल गए हैं उस डीलर को ढूंढने। मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूँ। घर में जैसे मातम छा गया है। पैसों का जाना तो एक बात है, लेकिन पापा का ‘भरोसा’ टूटा है। उन्हें लग रहा है कि उनकी वजह से हम सब सड़क पर आ गए हैं। वो खुद को माफ़ नहीं कर पा रहे।”

नैना ने सुहानी का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उसकी उंगलियाँ ठंडी पड़ चुकी थीं।

“सुहानी, यह बहुत बड़ा धक्का है, मैं समझ सकती हूँ। लेकिन तू तो हम सबकी ‘पावर हाउस’ है। अगर तू ऐसे टूट जाएगी, तो अंकल-आंटी को कौन संभालेगा?”

“यही तो दिक्कत है नैना,” सुहानी ने अपनी लाल हो चुकी आँखों से नैना को देखा। “मैं थक गई हूँ ‘मज़बूत’ बनते-बनते। ऑफिस में सबको हंसाना, घर पर सबको हिम्मत देना… मुझे भी तो डर लगता है। मुझे भी तो रोना आता है। कल रात जब मैंने पापा को बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोते देखा, तो लगा मेरी दुनिया हिल गई। वो मेरे हीरो थे नैना, और एक धोखे ने उन्हें इतना लाचार बना दिया। अब वकील कह रहे हैं कि केस चलेगा, सालों लग सकते हैं। हमारे पास न तो केस लड़ने के पैसे हैं और न ही हिम्मत।”

हवा का एक झोंका आया और सुहानी के बिखरे बालों को उड़ा ले गया। नैना ने महसूस किया कि आज उसके सामने वो ‘चुलबुली सुहानी’ नहीं खड़ी थी, बल्कि एक ज़िम्मेदार बेटी खड़ी थी जो अपने परिवार को बिखरते देख रही थी।

नैना ने कुछ पल सोचा। फिर उसने बहुत शांत स्वर में कहा, “सुहानी, रोना कमज़ोरी नहीं है। जी भर के रो ले। लेकिन उसके बाद तुझे वो करना होगा जो तू हमेशा दूसरों को सिखाती है—’लड़ना’।”

“कैसे लड़ूँ? सिस्टम से? उस धोखेबाज़ दोस्त से?” सुहानी ने निराशा से पूछा।

“नहीं, पहले हालात से,” नैना ने दृढ़ता से कहा। “देख, जो पैसे गए, वो शायद अभी वापस न आएं। लेकिन तेरा परिवार अभी भी तेरे पास है। अंकल इस वक़्त सदमे में हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि वो अकेले हैं। उन्हें ज़रूरत है यह अहसास दिलाने की कि उनके बच्चे उनके साथ हैं, चाहे वो ज़मीन हो या न हो। तुझे घर जाकर ‘रोने वाली बेटी’ नहीं, बल्कि ‘पार्टनर’ बनना होगा।”

सुहानी ने नैना की तरफ देखा।

नैना ने आगे कहा, “रही बात कानूनी मदद की, तो तुझे याद है मेरे जीजाजी हाई कोर्ट में वकील हैं? मैं आज शाम को ही उनसे बात करूँगी। वो फ्रॉड केसेस देखते हैं। हम उनसे सलाह लेंगे। हो सकता है कोई रास्ता निकले। और पैसों की चिंता मत कर, हम सब कलीग्स मिलकर कुछ न कुछ इंतज़ाम कर सकते हैं अगर एमरजेंसी हुई तो। लेकिन तुझे हार नहीं माननी है।”

सुहानी की आँखों में उम्मीद की एक हल्की सी किरण जागी। “क्या सच में तेरे जीजाजी मदद करेंगे? हम उनकी फीस…”

“फीस की बात बाद में,” नैना ने बात काटी। “पहले हम पेपरवर्क देखेंगे। और सुन, आज ऑफिस से जल्दी निकल जाना। घर जा, पापा के पास बैठ। उनसे कह कि ‘पापा, आप हैं तो सब है। ज़मीन फिर खरीद लेंगे, पैसे फिर कमा लेंगे, लेकिन अगर आपको कुछ हो गया तो हम कंगाल हो जाएंगे।’ उन्हें तेरे साथ की ज़रूरत है, तेरे आंसुओं की नहीं।”

सुहानी ने नैना का हाथ कसकर दबाया। “थैंक यू, नैना। मुझे सच में नहीं पता था कि मैं यह सब किससे कहूँ। ऑफिस में सब मुझे हंसता हुआ ही देखना पसंद करते हैं। मुझे लगा अगर मैं अपना दुख बताऊंगी तो लोग मज़ाक उड़ाएंगे या बेचारा समझेंगे। और मुझे ‘बेचारा’ कहलाना पसंद नहीं है।”

“तू बेचारी नहीं है पगली, तू इंसान है,” नैना ने मुस्कुराते हुए उसके आंसू पोंछे। “और हर वक़्त खुश रहने का ठेका तूने नहीं ले रखा है। कभी-कभी गिरना और संभलना भी पड़ता है।”

लंच ब्रेक ख़त्म होने वाला था। दोनों ने जल्दी-जल्दी खाना खाया। जब वे छत से नीचे उतर रही थीं, तो सुहानी की चाल में वो भारीपन नहीं था जो सुबह था। समस्या अभी भी वही थी—प्लॉट नहीं मिला था, पैसे नहीं आए थे—लेकिन अब वह अकेली नहीं थी। उसके मन का गुबार निकल चुका था और उसे एक दिशा मिल गई थी।

ऑफिस में वापस आकर सुहानी अपनी सीट पर बैठी। उसने नैना को एक मैसेज किया—“शाम को जीजाजी से अपॉइंटमेंट पक्का कर देना।”

नैना ने दूर से ही थम्स-अप किया।

सुहानी ने एक गहरी सांस ली, अपना कंप्यूटर ऑन किया और काम में लग गई। शाम को जब वह ऑफिस से निकली, तो उसके चेहरे पर वो ‘नकली हंसी’ नहीं थी जो वह अक्सर ओढ़े रहती थी। उसके चेहरे पर एक गंभीरता थी, एक संकल्प था।

घर पहुँचकर उसने देखा कि घर में अभी भी मातम जैसा माहौल है। उसके पिता अंधेरे कमरे में बैठे थे। सुहानी अंदर गई, बत्तियां जलाईं और पिता के सामने कुर्सी डालकर बैठ गई।

“पापा,” सुहानी ने मज़बूती से कहा।

पिता ने धीरे से सिर उठाया। उनकी आँखें सूजी हुई थीं।

“बेटा, मैंने सब बर्बाद कर दिया…” वे बुदबुदाए।

“नहीं पापा,” सुहानी ने उनका हाथ थामा। “आपने भरोसा किया, यह आपकी अच्छाई थी। धोखा उन्होंने दिया, यह उनकी बुराई है। हम अपनी अच्छाई नहीं छोड़ेंगे। और सुनिए, मैं और भैया अभी जवान हैं। हाथ-पैर सलामत हैं। हम कमा लेंगे। लेकिन हमें वो पुराना वाला पापा चाहिए जो हमें कहा करते थे कि ‘ईमानदारी की सूखी रोटी भी बेईमानी के हलवे से बेहतर है’। आज हमें आपकी ज़रूरत है। क्या आप हमारे लिए वापस खड़े होंगे?”

पिता ने बेटी की आँखों में देखा। उन्हें वहां अपनी ही परछाई दिखी, लेकिन ज़्यादा मज़बूत, ज़्यादा निडर। उन्होंने कांपते हाथों से बेटी को गले लगा लिया और रो पड़े। लेकिन इस बार का रोना हताशा का नहीं, बल्कि इस सुकून का था कि उनकी दुनिया अभी पूरी तरह उजड़ी नहीं थी—उनकी असली पूंजी, उनके बच्चे, उनके साथ चट्टान की तरह खड़े थे।

अगले दिन जब सुहानी ऑफिस आई, तो वह ‘चुलबुली’ नहीं थी। वह शांत थी, काम पर फोकस कर रही थी। लेकिन जब नैना ने उसे देखा, तो सुहानी ने एक छोटी सी, असली मुस्कान दी। वह मुस्कान कह रही थी—“जंग जारी है, और मैं हार नहीं मानूँगी।”

नैना समझ गई कि उसकी सहेली अब सिर्फ़ ‘खुशमिज़ाज़’ नहीं, बल्कि ‘साहसी’ भी बन गई है। और कभी-कभी, साहस मुस्कुराहट से ज़्यादा खूबसूरत होता है।

लेखिका : सुनीता साहनी

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