घर के आंगन में गेंदे के फूलों की सजावट और रसोई से आती देसी घी की महक बता रही थी कि आज तिवारी जी के घर में कोई खास उत्सव है। और हो भी क्यों न? उनकी लाड़ली बेटी, वंदना, पूरे दो साल बाद अपने मायके जो आई थी। घर का कोना-कोना खिल उठा था। मेहमानों का आना-जाना लगा हुआ था, और हंसी-ठिठोली की आवाज़ें गूंज रही थीं।
इन सबके बीच, घर की बड़ी बहू, मेघना, मशीन की तरह काम में जुटी थी। कभी मेहमानों के लिए चाय, कभी नाश्ता, कभी बच्चों को संभालना। उसके चेहरे पर मुस्कान तो थी, लेकिन वह मुस्कान आंखों तक नहीं पहुंच पा रही थी। उसकी आंखों में एक अजीब सी छटपटाहट थी, जिसे शोरगुल में कोई नहीं देख पा रहा था। कोई, सिवाय वंदना के।
वंदना कल शाम ही आई थी। आते ही उसने देखा कि मेघना भाभी कुछ बदली-बदली सी हैं। वह मेघना, जो कभी कॉलेज के दिनों में अपनी हाजिरजवाबी और आत्मविश्वास के लिए जानी जाती थी, आज एकदम सिमटी हुई लग रही थी।
रात के ग्यारह बज चुके थे। मेहमान जा चुके थे और घरवाले सोने की तैयारी कर रहे थे। वंदना पानी लेने के लिए रसोई की तरफ गई, तो देखा कि मेघना के कमरे की बत्ती अभी भी जल रही है। दरवाजा हल्का सा खुला था। वंदना ने झांका, तो उसका दिल धक से रह गया।
मेघना फर्श पर बैठी थी। उसके चारों तरफ मोटी-मोटी किताबें बिखरी पड़ी थीं। वह एक हाथ से किताब के पन्ने पलट रही थी और दूसरे हाथ से अपनी आंखों से बहते आंसुओं को पोंछ रही थी। वह कुछ रट रही थी, बुदबुदा रही थी, लेकिन बार-बार उसका गला रुंध जाता था।
वंदना दबे पांव अंदर गई और मेघना के कंधे पर हाथ रखा। “भाभी?”
मेघना एकदम से चौंक गई। उसने हड़बड़ाहट में किताबें समेटनी शुरू कर दीं, जैसे कोई चोरी करते हुए पकड़ा गया हो। “अरे वंदना दीदी… आप? आपको कुछ चाहिए था क्या? पानी? मैं अभी लाती हूं…”
वंदना ने मेघना का हाथ पकड़ लिया। “पानी नहीं चाहिए भाभी। मुझे सच चाहिए। यह सब क्या है? आप इतनी रात को… और यह रोना क्यों?”
मेघना ने नजरें झुका लीं। कुछ पल की खामोशी के बाद, उसने एक गहरी सांस ली और कहा, “दीदी, परसों पी.सी.एस. (PCS) की मुख्य परीक्षा है। मेरा यह आखिरी प्रयास (attempt) है। पिछले छह महीनों से मैं चोरी-छिपे, रात-रात भर जागकर पढ़ाई कर रही थी। सोचा था इस बार निकाल लूंगी। लेकिन…”
“लेकिन क्या?” वंदना ने पूछा।
“लेकिन घर में यह पूजा… आप आई हैं… कल सत्यनारायण की कथा है, फिर परसों पूरे मोहल्ले का भोज है। मां जी ने कहा है कि घर की इज्जत का सवाल है, बहू का घर पर रहना जरूरी है। रसोइया तो आएगा, लेकिन देखरेख तो घर की बहू को ही करनी पड़ती है न। मैंने उनसे बात करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने कहा कि ‘पढ़-लिख कर क्या अब बुढ़ापे में कलेक्टर बनोगी? घर के काम पहले हैं।’ अब परसों सुबह ही पहला पेपर है। तैयारी पूरी है दीदी, लेकिन जाने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा।”
मेघना की आवाज टूट गई। “शायद मेरी किस्मत में यही है। चूल्हा-चौका और मेहमाननवाजी।”
वंदना सन्न रह गई। उसे अपनी मां, सुमित्रा देवी, पर गुस्सा भी आया और हैरानी भी हुई। वही मां, जो वंदना की छोटी-छोटी उपलब्धियों पर पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटती थी, अपनी बहू के इतने बड़े सपने को कुचलने में जरा भी नहीं हिचकिचाई?
वंदना ने मेघना की किताबों को देखा। उन पन्नों पर पीले हाइलाइटर के निशान मेघना की मेहनत की गवाही दे रहे थे।
“आप सो जाइए भाभी,” वंदना ने संजीदगी से कहा। “अभी बहुत रात हो गई है।”
मेघना ने निराश होकर किताबें अलमारी में डाल दीं और लाइट बंद कर दी। उसे लगा वंदना भी शायद यही सोचती है कि अब कुछ नहीं हो सकता।
अगली सुबह घर में कोहराम मचा हुआ था। कथा की तैयारियां जोरों पर थीं। सुमित्रा देवी एक सेनापति की तरह निर्देश दे रही थीं। “मेघना! अरे ओ मेघना! पंडित जी के लिए फल काट लिए? और वो पंचामृत तैयार हुआ कि नहीं?”
मेघना रसोई में थी, सर झुकाए फल काट रही थी। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे थे, जो रात भर न सोने का सबूत थे।
तभी वंदना वहां आई। उसने मेघना के हाथ से चाकू ले लिया।
“आप जाओ भाभी, तैयार हो जाओ,” वंदना ने कहा।
“तैयार? किसके लिए? कथा तो दोपहर में है,” मेघना ने हैरान होकर पूछा।
“कथा के लिए नहीं, अपनी रिवीजन के लिए। जाओ अपने कमरे में और दरवाजा बंद करके पढ़ाई करो,” वंदना की आवाज में एक दृढ़ता थी।
“अरे, वंदना बिटिया, तुम यहां क्या कर रही हो? और बहू को क्यों हटा रही हो?” सुमित्रा देवी रसोई के दरवाजे पर खड़ी थीं। उन्होंने वंदना की बात सुन ली थी।
“मां,” वंदना ने मां की आंखों में सीधे देखते हुए कहा। “भाभी आज और कल घर का कोई काम नहीं करेंगी। वो अपने कमरे में रहेंगी और पढ़ाई करेंगी। परसों उनका पेपर है।”
सुमित्रा देवी का चेहरा तमतमा गया। “क्या बचपना है यह? घर में पूजा है, रिश्तेदार आ रहे हैं, और घर की बहू कमरे में बंद रहेगी? लोग क्या कहेंगे? कि तिवारी जी की बहू को बड़ों का लिहाज नहीं है? और यह पढ़ाई-लिखाई… अरे शादी हो गई, बच्चे हो गए, अब कौन सी नौकरी करनी है उसे?”
“नौकरी करनी है या नहीं, यह फैसला भाभी का होना चाहिए, मां,” वंदना ने शांत लेकिन सख्त लहजे में कहा। “और रही बात ‘लोग क्या कहेंगे’ की, तो याद है मां? पांच साल पहले जब मुझे दिल्ली में प्रमोशन मिला था और मुझे वहां शिफ्ट होना था, तब पापा ने मना कर दिया था। कहा था कि ‘लड़की जात है, अकेले इतनी दूर नहीं रहेगी’। तब आप ही थीं मां, जो पापा से लड़ी थीं। आपने कहा था कि ‘मेरी बेटी की तरक्की के बीच दुनिया की कोई रीत नहीं आएगी’। फिर आज भाभी के लिए नियम अलग क्यों?”
सुमित्रा देवी चुप हो गईं, लेकिन उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ था। “वह बेटी थी, यह बहू है। फर्क होता है, वंदना। कल को अगर यह अफसर बन गई और घर-बार छोड़ दिया तो?”
“यही डर है न आपको?” वंदना ने मां के कंधे पर हाथ रखा। “कि वह हाथ से निकल जाएगी? मां, हम बेटियों को आप पंख देती हैं ताकि हम उड़ सकें, लेकिन बहुओं के पंख इसलिए काट देती हैं ताकि वो आंगन में ही रहें? यह कैसा न्याय है? भाभी पिछले पांच सालों से इस घर को, आपको, पापा जी को और बच्चों को संभाल रही हैं। उन्होंने कभी उफ्फ तक नहीं की। आज जब उन्हें अपने लिए सिर्फ दो दिन चाहिए, तो हम उन्हें वो भी नहीं दे सकते? क्या यह घर उनका नहीं है? और अगर यह घर उनका है, तो उनके सपनों की कद्र इस घर में क्यों नहीं होनी चाहिए?”
मेघना दरवाजे के पीछे खड़ी यह सब सुन रही थी। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
वंदना ने बात जारी रखी, “मां, याद करिए, जब बुआ जी ने मेरी शादी के समय मेरे सांवले रंग पर ताना मारा था, तो भाभी ने ही सबसे पहले टोका था उन्हें। वो हमेशा मेरे साथ खड़ी रहीं। आज मैं उनकी ननद बनकर नहीं, एक औरत बनकर आपसे पूछ रही हूं—क्या एक औरत ही दूसरी औरत के सपनों की दुश्मन बनेगी?”
रसोई में सन्नाटा छा गया। कड़ाही में घी गर्म हो रहा था, लेकिन रिश्तों की जमी हुई बर्फ भी पिघल रही थी।
सुमित्रा देवी ने पलटकर मेघना को देखा। मेघना डर और उम्मीद के मिश्रित भाव से उन्हें देख रही थी। सुमित्रा देवी को याद आया कि कैसे पिछले महीने जब उनके घुटनों में दर्द था, तो मेघना ने रात-रात भर जागकर तेल मालिश की थी। कैसे वह अपनी जरूरतों को मारकर घर की जरूरतें पूरी करती थी।
सुमित्रा देवी धीरे से आगे बढ़ीं। उन्होंने मेघना के हाथ से फलों की टोकरी ले ली।
“जा…” सुमित्रा देवी ने भारी आवाज में कहा।
मेघना समझ नहीं पाई। “जी मां जी?”
“जा, जाकर पढ़ाई कर। और सुन,” सुमित्रा देवी ने पल्लू से अपनी आंख का एक कोना पोंछा। “अगर पास होना है तो अच्छे नंबरों से होना। वरना लोग कहेंगे कि सुमित्रा की बहू ने नाक कटवा दी।”
मेघना को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वह दौड़कर सुमित्रा देवी के पैरों में गिर गई। “मां जी…”
“अरे अब रोकर समय क्यों बर्बाद कर रही है? जा, भाग यहां से। और वंदना, तू यहां क्या खड़ी है? चल, पंचामृत बना। मां को ज्ञान देना बहुत आता है, काम भी कर ले थोड़ा,” सुमित्रा देवी ने बनावटी गुस्से से कहा, लेकिन उनके होठों पर एक हल्की मुस्कान थी।
अगले दो दिन घर का माहौल बदल गया। वंदना ने पूरी रसोई संभाल ली। सुमित्रा देवी ने रिश्तेदारों को संभालने का मोर्चा थाम लिया। जब भी कोई रिश्तेदार पूछता, “बहू नहीं दिख रही?” तो सुमित्रा देवी गर्व से कहतीं, “अरे, वो हमारी बहू बहुत होशियार है, बड़ी अफसर बनने वाली है। परीक्षा की तैयारी कर रही है। डिस्टर्ब मत करो उसे।”
मेघना कमरे में बंद होकर पढ़ती रही, लेकिन उसे अकेलापन महसूस नहीं हुआ। समय-समय पर वंदना चाय रख जाती, कभी सासू मां चुपचाप बादाम वाला दूध रख जातीं। उसे लगा जैसे पूरा घर उसके साथ परीक्षा दे रहा है।
परीक्षा के दिन, जब मेघना तैयार होकर निकली, तो सुमित्रा देवी ने दही-चीनी खिलाकर उसे विदा किया।
“विजयी भव,” सुमित्रा जी ने आशीर्वाद दिया। “और हां, पेपर कैसा भी हो, घर जल्दी आना। तेरे बिना घर सूना लगता है।”
मेघना ने वंदना को गले लगाया। “शुक्रिया दीदी। आपने मुझे मेरी खोई हुई आवाज लौटा दी।”
“मैंने कुछ नहीं किया भाभी,” वंदना मुस्कुराई। “मैंने बस वो किया जो उस वक्त किसी को मेरे लिए करना चाहिए था, पर कोई कर नहीं पाया। आपकी जीत में मेरी उस अधूरी कहानी की भी जीत होगी।”
शाम को जब मेघना लौटी, तो उसका चेहरा खिला हुआ था। पेपर बहुत अच्छा हुआ था। लेकिन उससे भी ज्यादा खुशी उसे इस बात की थी कि उसने न सिर्फ एक परीक्षा दी थी, बल्कि अपने परिवार का एक नया रूप भी देखा था।
उस रात, वंदना और मेघना छत पर बैठी थीं।
“जानती हो भाभी,” वंदना ने तारों की तरफ देखते हुए कहा। “अक्सर हम औरतें ही एक-दूसरे की बेड़ियां बन जाती हैं। सास को लगता है बहू उनका हक छीन लेगी, और ननद को लगता है कि भाभी पराया कर देंगी। पर जिस दिन हम एक-दूसरे की ढाल बन जाएं न, उस दिन दुनिया की कोई ताकत हमें रोक नहीं सकती।”
मेघना ने वंदना का हाथ थाम लिया। “सच कहा दीदी। आज तक सुना था कि मायके की बेटी घर की रौनक होती है। पर आज देख लिया कि ननद अगर चाहे, तो ससुराल को भी मायका बना सकती है। आपने मेरे पंख नहीं खोले, आपने मुझे आसमान दिया है।”
नीचे से सुमित्रा देवी की आवाज आई, “अरे, तुम दोनों की बातें खत्म हों तो नीचे आओ, खाना ठंडा हो रहा है!”
दोनों हंस पड़ीं और नीचे दौड़ गईं। उस घर की नींव अब और मजबूत हो गई थी, क्योंकि उसमें एक-दूसरे को दबाने की नहीं, बल्कि एक-दूसरे को उठाने की समझदारी जुड़ गई थी।
मूल लेखिका : डॉ उर्मिला शर्मा