दहलीज के इस पार, आँचल के उस पार – मुकेश पटेल 

“अक्सर पुरुष यह सोचकर सारी ज़िंदगी निकाल देते हैं कि उन्होंने घर में ‘संतुलन’ बना रखा है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि ‘माँ की ममता’ और ‘पत्नी के त्याग’ को तराजू पर तौला नहीं जा सकता, उन्हें सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है।”

विहान को लगता था कि वह एक आदर्श बेटा और आदर्श पति है। वह अपनी माँ और पत्नी के बीच कभी भेदभाव नहीं करता था। अगर माँ के लिए साड़ी लाता, तो पत्नी के लिए भी लाता। अगर पत्नी को घुमाने ले जाता, तो माँ को भी साथ ले जाता। उसे लगता था कि यही ‘न्याय’ है। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि रिश्तों में ‘गणित’ नहीं, ‘जज़्बात’ काम आते हैं।

शाम के सात बज रहे थे। शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों से गुज़रते हुए विहान अपनी कार की स्टीयरिंग पर उंगलियाँ थपथपा रहा था। आज उसे घर पहुँचने की जल्दी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी घबराहट थी। यह घबराहट पिछले कुछ महीनों से उसका पीछा कर रही थी।

विहान एक सफल आर्किटेक्ट था। वह इमारतों के नक्शे बनाने में माहिर था, लेकिन अपने ही घर का नक्शा उसे समझ नहीं आ रहा था। उसके घर में दो महिलाएं थीं—उसकी माँ, सुमित्रा देवी, जिन्होंने पति की मृत्यु के बाद सिलाई-कढ़ाई करके उसे पाला-पोसा था। और दूसरी उसकी पत्नी, ईशा, जो शादी से पहले एक चहकती हुई फैशन डिज़ाइनर थी, लेकिन शादी के बाद उसने विहान के कहने पर अपनी नौकरी छोड़ दी थी ताकि घर अच्छे से संभल सके।

विहान को लगता था कि वह एक आदर्श बेटा और आदर्श पति है। वह अपनी माँ और पत्नी के बीच कभी भेदभाव नहीं करता था। अगर माँ के लिए साड़ी लाता, तो पत्नी के लिए भी लाता। अगर पत्नी को घुमाने ले जाता, तो माँ को भी साथ ले जाता। उसे लगता था कि यही ‘न्याय’ है। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि रिश्तों में ‘गणित’ नहीं, ‘जज़्बात’ काम आते हैं।

उस दिन घर का माहौल कुछ ज़्यादा ही तनावपूर्ण था।

जब विहान घर में दाखिल हुआ, तो सन्नाटा पसरा हुआ था। माँ अपने कमरे में रामायण पढ़ रही थीं, और ईशा रसोई में बर्तनों को कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से पटक रही थी।

विहान ने टाई ढीली की और सोफे पर बैठ गया। “पानी मिलेगा?” उसने आवाज़ लगाई।

ईशा पानी लेकर आई और मेज़ पर पटककर जाने लगी।

“क्या हुआ ईशा? आज फिर मूड ख़राब है?” विहान ने झुंझलाते हुए पूछा।

ईशा रुकी। उसकी आँखों में आंसू तैर रहे थे। “विहान, मैंने आपसे कहा था कि अगले हफ़्ते मेरे कज़िन की शादी है। मुझे जाना है। लेकिन माँ जी कह रही हैं कि मेहमान आने वाले हैं, तो मेरा जाना ठीक नहीं लगेगा।”

विहान ने सिर पकड़ लिया। “तो इसमें बड़ी बात क्या है ईशा? माँ सही तो कह रही हैं। बुआ जी आ रही हैं। तुम घर की बहू हो। शादी तो होती रहती है। अगली बार चली जाना।”

ईशा ने विहान को अविश्वास से देखा। “अगली बार? विहान, पिछले दो साल से मैं अपने घर के किसी फंक्शन में नहीं गई। मैंने अपना करियर छोड़ा, अपना शहर छोड़ा, अपनी सहेलियां छोड़ीं… सिर्फ़ आपके लिए। और आज मुझे दो दिन के लिए मायके जाने की इज़ाज़त मांगनी पड़ रही है?”

तभी सुमित्रा देवी कमरे से बाहर आ गईं। “अरे बहू, कैसी बातें कर रही हो? हमने कब रोका? बस यही तो कहा कि घर की इज़्ज़त मेहमानों के सामने बनी रहे। बुआ जी पहली बार आ रही हैं।”

विहान ने बीच-बचाव किया, “देखो, तुम दोनों लड़ना बंद करो। ईशा, तुम नहीं जा रही हो, बात ख़त्म। माँ बुज़ुर्ग हैं, वो अकेले मेहमानों को कैसे संभालेंगी? तुम्हें थोड़ा एडजेस्ट करना चाहिए।”

ईशा कुछ नहीं बोली। वह चुपचाप अपने कमरे में चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया। विहान को लगा उसने मामला सुलझा लिया है। उसने माँ से कहा, “माँ, आप चिंता मत करो। वो समझ जाएगी। आजकल की लड़कियों में सब्र कम होता है।”

सुमित्रा देवी ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी चिंता थी जो विहान देख नहीं पाया।

रात के दो बज रहे थे। विहान को प्यास लगी तो उसकी नींद खुली। उसने देखा कि ईशा बिस्तर पर नहीं थी। उसे लगा शायद वॉशरूम गई होगी। लेकिन दस मिनट बाद भी जब वह नहीं लौटी, तो विहान घबराया। वह उठकर बाहर आया।

बालकनी में अंधेरा था, लेकिन चांद की रोशनी में उसे एक परछाई दिखी। ईशा रेलिंग पकड़कर खड़ी थी और सिसक रही थी। विहान उसके पास जाने ही वाला था कि तभी उसने देखा कि दूसरी तरफ से माँ, सुमित्रा देवी, धीरे-धीरे चलकर ईशा के पास जा रही हैं।

विहान ठिठक गया। उसे लगा अब फिर से सास-बहू की बहस होगी। वह ओट में खड़ा होकर सुनने लगा।

सुमित्रा देवी ने ईशा के कंधे पर हाथ रखा। ईशा चौंक गई और जल्दी से अपने आंसू पोंछने लगी। “माँ जी, आप? आपको कुछ चाहिए था?”

सुमित्रा देवी ने ईशा को अपनी ओर घुमाया। उनकी बूढ़ी आँखों में आज वो सख्ती नहीं थी जो दिन में दिखती थी।

“रो रही हो बेटा?” सुमित्रा जी ने पूछा।

“नहीं माँ जी, बस ऐसे ही…” ईशा ने नज़रें चुराईं।

सुमित्रा जी ने एक गहरी सांस ली और आसमान की ओर देखा। “ईशा, तुझे पता है? जब विहान के पापा गुज़रे थे, तो मैं सिर्फ़ पच्चीस साल की थी। पूरी दुनिया ने कहा कि दूसरी शादी कर लो या मायके चली जाओ। लेकिन मैंने इस घर की दहलीज नहीं लांघी। क्यों? क्योंकि मेरी गोद में विहान था। मुझे लगा कि अगर मैं चली गई, तो मेरे बेटे का क्या होगा? मैंने अपनी जवानी, अपने सपने, अपनी खुशियां… सब इस उम्मीद में होम कर दीं कि एक दिन मेरा बेटा बड़ा होगा और मुझे समझेगा।”

विहान ओट में खड़ा सुन रहा था। उसे माँ के संघर्ष की कहानियां पता थीं, लेकिन आज उनके स्वर में दर्द कुछ और ही था।

सुमित्रा जी ने आगे कहा, “मैं विहान को दुनिया में लाई। मैंने उसे पालने के लिए दुनिया से लड़ाई की। मुझे उस पर हक़ जताने की आदत पड़ गई है। कभी-कभी भूल जाती हूँ कि अब वो सिर्फ़ मेरा बेटा नहीं, किसी का पति भी है।”

ईशा चुपचाप सुन रही थी।

फिर सुमित्रा जी ने ईशा का हाथ अपने हाथों में लिया। उनके हाथ झुर्रियों से भरे थे, और ईशा के हाथ कोमल।

“लेकिन ईशा,” सुमित्रा जी की आवाज़ भर्रा गई। “मेरा त्याग तो ‘ममता’ थी। प्रकृति ने मुझे माँ बनाया था, इसलिए मेरा झुकना मेरा स्वभाव था। लेकिन तुम… तुम तो पराई थीं। तुम दूसरे घर की लाडली थी। तुम्हारे पिता ने तुम्हें नाज़ों से पाला था। तुम इस घर में सिर्फ़ इसलिए आईं क्योंकि तुमने मेरे बेटे से प्यार किया। तुमने अपना सरनेम बदला, अपना घर बदला, अपनी आदतें बदलीं। विहान को इस दुनिया में लाने वाली मैं ज़रूर हूँ, लेकिन उसके लिए अपनी पूरी दुनिया छोड़कर आने वाली तुम हो।”

विहान के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने आज तक कभी इस नज़रिए से सोचा ही नहीं था। वह हमेशा सोचता था कि माँ महान है क्योंकि उसने उसे जन्म दिया, और पत्नी का तो फ़र्ज़ है साथ निभाना।

सुमित्रा जी ने अपनी कलाई से एक कंगन उतारा और ईशा के हाथ में पहना दिया।

“माँ जी, यह क्या कर रही हैं आप?” ईशा ने रोकना चाहा।

“रख लो बेटा। आज दिन में जब विहान ने तुम्हें डांटा, तो मुझे अपनी जीत महसूस हुई थी। मुझे लगा बेटा मेरी तरफ है। लेकिन रात होते-होते मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी स्वार्थी हो गई हूँ। मैं एक औरत होकर दूसरी औरत का दर्द नहीं समझ पाई। तुम कल अपने कज़िन की शादी में जाओगी। मेहमानों को मैं संभाल लूंगी। बुआ जी से कह दूंगी कि मेरी बहू अपने मायके वालों का भी उतना ही मान रखती है जितना ससुराल वालों का।”

ईशा रो पड़ी और सुमित्रा जी के गले लग गई। “माँ जी, मुझे शादी में जाने का उतना दुख नहीं था, जितना इस बात का था कि विहान ने मेरी भावनाओं को नहीं समझा। लेकिन आज आपने मुझे बेटी मान लिया, अब मुझे कहीं नहीं जाना। मैं आपके साथ रहूँगी।”

“पगली, रोते नहीं। जा सो जा, सुबह पैकिंग भी करनी है,” सुमित्रा जी ने उसे माथे पर चूमा।

विहान अंधेरे में खड़ा सुन्न था। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे। उसे आज समझ आया कि वह कितना बड़ा अपराधी है। वह दो देवियों के बीच खड़ा था, लेकिन उसने दोनों को ही इंसान समझने की भूल की थी।

अगली सुबह, नाश्ते की मेज़ पर विहान चुप था। ईशा रसोई में खुश होकर परांठे बना रही थी और माँ पूजा कर रही थीं।

विहान ने चाय का कप उठाया और माँ के पास गया। उसने माँ के पैर पकड़े और अपना सिर उनकी गोद में रख दिया।

“क्या हुआ विहान? तबीयत ठीक है?” माँ घबरा गईं।

“नहीं माँ,” विहान ने भीगी आँखों से ऊपर देखा। “तबीयत तो आज ठीक हुई है। कल रात मैंने आपकी बातें सुन ली थीं।”

माँ और ईशा दोनों स्तब्ध रह गईं।

विहान उठा और ईशा के पास गया। उसने ईशा के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए।

“ईशा, मुझे माफ़ कर दो। मैं हमेशा ‘बराबरी’ करने की कोशिश करता रहा। एक साड़ी माँ को, एक तुम्हें। एक गहना माँ को, एक तुम्हें। मुझे लगा यही प्यार है। लेकिन मैं भूल गया कि तुम दोनों का स्थान अलग है, और दोनों का सम्मान अलग तरीके से होना चाहिए।”

उसने माँ की ओर देखा। “माँ, आप मुझे इस दुनिया में लाईं। आपका कर्ज़ मैं सात जन्मों में नहीं उतार सकता। आपकी जगह भगवान भी नहीं ले सकता।”

फिर उसने ईशा की ओर देखा। “और तुम… तुम मेरे लिए अपनी बनी-बनाई दुनिया छोड़कर आईं। अनजान लोगों के बीच, अनजान घर में, सिर्फ़ मेरे भरोसे। यह कोई फ़र्ज़ नहीं था, यह तुम्हारा ‘एहसान’ था मुझ पर, जिसे मैंने तुम्हारा ‘कर्तव्य’ समझ लिया।”

विहान ने अपनी जेब से दो लिफाफे निकाले।

“माँ, यह आपके लिए। हरिद्वार की टिकट है। आप हमेशा जाना चाहती थीं न? इस बार आप अपनी सहेलियों के साथ जाइये, सुकून से वक्त बिताइये।”

और दूसरा लिफाफा उसने ईशा को दिया। “और यह तुम्हारी फ्लाइट की टिकट है। शादी अटेंड करो, और उसके बाद चार दिन और रुको। अपने मम्मी-पापा के साथ वक्त बिताओ, अपनी सहेलियों से मिलो। फिर से वो ईशा बनकर लौटो जो तुम शादी से पहले थीं। मुझे घर वाली ईशा के साथ-साथ, वो ‘फैशन डिज़ाइनर’ ईशा भी चाहिए। मैंने तुम्हारे सपनों को इस घर की चारदीवारी में कैद कर दिया था।”

ईशा की आँखों में अविश्वास था। “लेकिन घर…?”

“घर मैं संभाल लूंगा,” विहान ने मुस्कुराते हुए कहा। “आखिर जिसने मुझे पाला है, उसका बेटा हूँ। इतना तो कर ही सकता हूँ।”

उस दिन घर से दो गाड़ियाँ निकलीं। एक माँ को लेकर तीर्थ की ओर, और दूसरी ईशा को लेकर उसके सपनों और यादों की ओर।

शाम को विहान अकेला घर में बैठा था। घर खाली था, सन्नाटा था। लेकिन आज उसे वो सन्नाटा काट नहीं रहा था। उसे सुकून था।

उसने अपनी डायरी उठाई और लिखा:

“हम पुरुष अक्सर सोचते हैं कि हम घर के मुखिया हैं, हम कमाते हैं, हम रक्षा करते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि हमारा वजूद इन दो औरतों पर टिका होता है। एक वो जो हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाती है, और दूसरी वो जो हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए अपने पैरों के छाले छुपा लेती है। माँ को इज़्ज़त इसलिए दो क्योंकि वो तुम्हारी ‘जड़’ है, और बीवी को इज़्ज़त इसलिए दो क्योंकि वो तुम्हारी ‘छांव’ है। जड़ के बिना पेड़ खड़ा नहीं हो सकता, और छांव के बिना पेड़ किसी को सुकून नहीं दे सकता।”

विहान ने महसूस किया कि आज उसका घर सच में पूरा हुआ है। क्योंकि आज उसने दीवारों को नहीं, दिलों को जोड़ा था। उसने सीख लिया था कि इज्ज़त का मतलब हुक्म चलाना नहीं, बल्कि सामने वाले के त्याग को पहचानना होता है।

जब एक हफ़्ते बाद माँ और ईशा वापस लौटीं, तो घर बदला हुआ था। पर्दे वही थे, दीवारें वही थीं, लेकिन हवा में एक नई ताजगी थी। ईशा के चेहरे पर चमक थी और माँ के चेहरे पर संतोष। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुरा दीं। उन्हें पता था कि अब उन्हें अपने हक़ के लिए लड़ना नहीं पड़ेगा, क्योंकि उनके घर के पुरुष ने ‘तराजू’ फेंक दिया था और ‘दिल’ अपना लिया था।


मित्रों, यह कहानी सिर्फ़ विहान की नहीं, हर उस घर की है जहाँ अक्सर ‘फ़र्ज़’ और ‘अधिकार’ की लड़ाई में ‘भावनाएं’ हार जाती हैं।

याद रखिये, माँ का स्थान स्वर्ग से ऊँचा है, लेकिन पत्नी का स्थान भी हृदय के सबसे करीब है। दोनों की तुलना मत कीजिये। माँ ने आपको जीवन दिया, तो पत्नी ने आपको अपना जीवन दे दिया। दोनों का सम्मान ही एक पुरुष को ‘पूर्ण पुरुष’ बनाता है।

क्या आप भी मानते हैं कि रिश्तों को तोलना नहीं, समझना चाहिए? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।

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धन्यवाद!

लेखक : मुकेश पटेल 

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