“जिस इंसान ने अपनी पूरी ज़िंदगी एक-एक पैसा जोड़ने में लगा दी, उसने अपने बुढ़ापे का इकलौता सहारा अपनी बहू के नाम क्यों कर दिया? यह कहानी उस ‘खाली हाथ’ की है, जिसने पूरी दुनिया की खुशियां समेट लीं।”
लेकिन जब वकील ने कागज़ात पढ़े, तो पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। कैलाशनाथ जी ने अपनी कंपनी का सत्तर प्रतिशत शेयर, एमडी का पद और घर की सारी वित्तीय ज़िम्मेदारी कानूनी तौर पर काव्या के नाम कर दी थी। सुमित के नाम पर उन्होंने एक अच्छी खासी रकम फिक्स कर दी थी और उससे कहा था, “तुझे वो कपड़े की गद्दी नहीं चाहिए थी ना? आज से तू आज़ाद है।
सुबह के छह बज रहे थे। शहर के सबसे बड़े पार्क में ‘लाफिंग क्लब’ के बुजुर्गों का ठहाका गूंज रहा था। पर इस ठहाके के पीछे की हकीकत कुछ और ही थी। जैसे ही योग का सत्र खत्म होता, ये सभी बुजुर्ग गोल घेरा बनाकर बैठ जाते और फिर शुरू होती अपने-अपने घरों की शिकायतें। किसी को बहू के देर से उठने से परेशानी थी, तो किसी को बेटे के बात न सुनने से। दीनानाथ जी अपनी पेंशन का रोना रो रहे थे कि कैसे उनका बेटा हर महीने उनकी पेंशन पर नज़र गड़ाए रहता है।
उसी घेरे में एक और बुज़ुर्ग बैठे थे— कैलाशनाथ जी। शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी। साठ के दशक में एक छोटी सी दुकान से शुरुआत करके उन्होंने करोड़ों का टेक्सटाइल का कारोबार खड़ा किया था। पर आज उनके चेहरे पर जो गज़ब की शांति थी, वह उनके रुतबे से मेल नहीं खाती थी।
“कैलाश भाई, आप कुछ नहीं बोलते? आपका बेटा भी तो आजकल आपकी सुनता नहीं होगा। सुना है आपने तो गद्दी भी छोड़ दी है। कहीं बुढ़ापे में मोहताज तो नहीं हो गए?” दीनानाथ जी ने तंज कसते हुए पूछा।
कैलाशनाथ जी ने एक गहरी और शांत सांस ली, अपनी सफेद मूंछों पर हाथ फेरा और मुस्कुराते हुए बोले, “दीनानाथ जी, मुझे तो अब कोई कमाई नहीं होती। मेरे बैंक खाते में मेरे नाम पर अब कुछ ख़ास बचा भी नहीं है। लेकिन यकीन मानिए, मेरे पास जितना सुकून है, उतना शायद ही किसी तिजोरी वाले के पास होगा।”
यह सुनकर वहाँ बैठे सभी लोगों के कान खड़े हो गए। करोड़पति कैलाशनाथ के पास बैंक बैलेंस नहीं है? यह कैसे हो सकता है!
कहानी कुछ साल पीछे जाती है। कैलाशनाथ जी का एक ही उसूल था— ‘जो मेरे पैसे से चलेगा, वो मेरे इशारे पर चलेगा।’ उनका बेटा, सुमित, स्वभाव से बहुत ही शांत और कलात्मक था। उसे व्यापार के दांव-पेंच में कोई दिलचस्पी नहीं थी; वह एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर बनना चाहता था। पर कैलाशनाथ जी की ज़िद्द के आगे उसकी एक न चली। सुमित को ज़बरदस्ती दुकान की गद्दी पर बैठा दिया गया। घर में हर रोज़ एक अनकहा तनाव रहता। बाप-बेटे के बीच बातचीत ना के बराबर थी। सुमित ने पिता के पैसों के दबाव में अपने सपने तो मार दिए, लेकिन वह अंदर ही अंदर घुटने लगा।
फिर सुमित की शादी हुई। घर में काव्या आई। काव्या एक पढ़ी-लिखी, सुलझी हुई और आज़ाद ख्यालों वाली लड़की थी। उसने आते ही घर का माहौल भांप लिया। उसने देखा कि इस विशाल और आलीशान घर में सब कुछ है, बस ‘घर’ वाली बात नहीं है। कैलाशनाथ जी काव्या से भी यही उम्मीद करते थे कि वह एक पारंपरिक बहू की तरह रहे, घर संभाले और उनके बनाए नियमों पर चले। काव्या सम्मान तो पूरा करती थी, लेकिन जब बात सुमित के घुटन की आती, तो वह चुप नहीं रहती थी।
तनाव तब और बढ़ गया जब व्यापार में मंदी आई। सुमित जो पहले से ही व्यापार में मन नहीं लगा पा रहा था, इस दबाव में और बिखर गया। कैलाशनाथ जी को लगने लगा कि उनका बेटा नालायक है और उनकी बहू उसे उनके खिलाफ भड़का रही है। घर में पैसों की और अधिकारों की धौंस दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। कैलाशनाथ जी अक्सर ताना मारते, “मेरे ही टुकड़ों पर पल रहे हो और मेरी ही बात नहीं मानते!”
यह वाक्य सुमित के दिल में किसी खंजर की तरह उतर जाता। घर एक कुरुक्षेत्र बन गया था, जहाँ हथियार तलवारें नहीं, बल्कि उम्मीदें और ताने थे।
फिर एक दिन वो हुआ जिसने कैलाशनाथ जी की पूरी दुनिया पलट कर रख दी। फैक्ट्री में एक बड़ी मशीन में खराबी आने के कारण भारी नुकसान हुआ और बैंक का कर्ज चुकाने का नोटिस आ गया। इस सदमे को कैलाशनाथ जी बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्हें सीवियर हार्ट अटैक आ गया।
अस्पताल के आईसीयू में जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने देखा कि उनके वो व्यापारिक मित्र, जो कल तक उनके साथ उठते-बैठते थे, बाहर खड़े होकर उनके व्यापार के टुकड़े करने की बातें कर रहे थे। सुमित एक कोने में डरा और सहमा हुआ खड़ा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतनी बड़ी विपत्ति को कैसे संभाले।
लेकिन उस कठिन घड़ी में एक इंसान था जो चट्टान की तरह खड़ा था— काव्या। काव्या ने बिना किसी घबराहट के न सिर्फ अस्पताल का सारा प्रबंधन संभाला, बल्कि पिता जी के पुराने वकीलों और मैनेजरों के साथ मीटिंग करके बैंक के अधिकारियों से मोहलत भी मांगी। उसने रात-दिन एक कर दिया। चार दिन तक काव्या आईसीयू के बाहर एक कुर्सी पर ही सोई।
आईसीयू के शीशे से कैलाशनाथ जी यह सब देख रहे थे। उनके पास वाले बेड पर एक और बुज़ुर्ग भर्ती थे, जो एक रिटायर्ड अधिकारी थे। उनकी अच्छी-खासी पेंशन थी और कई प्रॉपर्टीज़ थीं। पर उनके बेड के पास उनके दोनों बेटे लड़ रहे थे। एक कह रहा था, “पापा के साइन इस पेपर पर करवा लो, वरना इलाज का पैसा मैं नहीं दूंगा।” दूसरा कह रहा था, “पेंशन तेरे पास आती है, तू भर बिल।” उन बुज़ुर्ग की आँखों से बेबसी के आंसू बह रहे थे। उन्होंने मुट्ठी में अपनी प्रॉपर्टी के कागज़ जकड़े हुए थे, लेकिन उनका कोई अपना उनके आँसू पोंछने वाला नहीं था।
यह नज़ारा कैलाशनाथ जी के लिए किसी ज्ञानोदय (एन्लाइटनमेंट) से कम नहीं था। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी जिस ‘पैसे’ और ‘नियंत्रण’ को अहमियत दी थी, आज वही उन्हें कितना खोखला लग रहा था। उन्होंने सोचा कि मैं भी तो यही कर रहा हूँ। मैं अपने बेटे पर अपने पैसे और रुतबे की धौंस जमा रहा हूँ। मैं उससे वो बनने की उम्मीद कर रहा हूँ जो वो है ही नहीं।
“अपेक्षा”— यही वो शब्द था जो उनके दिमाग में गूंजने लगा। मैं अपने बेटे से मेरे जैसा बनने की अपेक्षा करता हूँ। मैं अपनी बहू से मेरी परछाई बनने की अपेक्षा करता हूँ। और जब ये अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो मैं क्रोधित होता हूँ, उन्हें पैसों का ताना देता हूँ। क्या मैं भी उसी बुज़ुर्ग की तरह अपने अंतिम दिनों में अपनी तिजोरी की चाबी सीने से लगाए, अपनों के प्यार के लिए तरसता हुआ मरूंगा?
अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद कैलाशनाथ जी एक बिल्कुल ही बदले हुए इंसान थे। घर लौटते ही उन्होंने सबसे पहले अपने वकील को बुलाया। सुमित और काव्या को लगा कि शायद बापूजी अब व्यापार में और सख्ती करेंगे।
लेकिन जब वकील ने कागज़ात पढ़े, तो पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। कैलाशनाथ जी ने अपनी कंपनी का सत्तर प्रतिशत शेयर, एमडी का पद और घर की सारी वित्तीय ज़िम्मेदारी कानूनी तौर पर काव्या के नाम कर दी थी। सुमित के नाम पर उन्होंने एक अच्छी खासी रकम फिक्स कर दी थी और उससे कहा था, “तुझे वो कपड़े की गद्दी नहीं चाहिए थी ना? आज से तू आज़ाद है। जा, जो कैमरा तुझे पसंद है वो ले और दुनिया घूमकर तस्वीरें खींच। मेरी ज़िद्द ने तेरे कई साल बर्बाद कर दिए, पर अब और नहीं।”
सुमित फूट-फूटकर रोने लगा और अपने पिता के पैरों में गिर पड़ा। काव्या भी अवाक थी। “बापूजी, यह आप क्या कर रहे हैं? मैं यह सब कैसे… और आप अपना सारा अधिकार मेरे नाम क्यों कर रहे हैं?”
कैलाशनाथ जी ने काव्या के सिर पर हाथ रखा और कहा, “अधिकार तो मैंने अब तक रखा था बेटा, और बदले में क्या मिला? सिर्फ दूरियां और कलह। अस्पताल में मैंने देखा कि कैसे पैसा खून के रिश्तों को पानी कर देता है। अगर मैं इन कागज़ों से चिपका रहा, तो शायद तुम लोग मजबूरी में मेरी सेवा तो कर लोगे, पर मन से कभी मुझे अपना नहीं मानोगे। यह पैसा ही सभी फ़साद की जड़ है। इस उम्र में ना मुझे अपने हाथ में ज्यादा पैसे रखने चाहिए और ना ही तुम बच्चों से कोई अनावश्यक अपेक्षा करनी चाहिए।”
उन्होंने गहरी सांस लेते हुए आगे कहा, “काव्या, मैंने तुझे हमेशा एक ‘पराए घर से आई लड़की’ समझा, जो मेरे घर पर राज़ करना चाहती है। पर अस्पताल में जब मैं मौत से लड़ रहा था, तब तू ‘बहू’ नहीं, एक ढाल बनकर खड़ी थी। मुझे समझ आ गया कि पराए घर से आई लड़की को अगर मैं दिल से बेटी मान लूँ, तो तू भी मेरी माँ बनकर मेरा ख्याल रखेगी। आज से यह कारोबार तेरा है, क्योंकि तू इसे सुमित से बेहतर समझती है और संभाल सकती है।”
पार्क में बैठे सभी बुज़ुर्ग कैलाशनाथ जी की यह कहानी सुनकर स्तब्ध थे। दीनानाथ जी का मुँह खुला का खुला रह गया था।
“तो कैलाश भाई,” एक अन्य बुज़ुर्ग ने हिचकिचाते हुए पूछा, “क्या आपको अब डर नहीं लगता? सारी दौलत बहू के नाम कर दी। कल को अगर उसने आपको घर से निकाल दिया या आपको पैसे नहीं दिए तो? आप तो पूरी तरह से उसके मोहताज हो गए न?”
कैलाशनाथ जी ज़ोर से हँसे। उनकी हँसी में गज़ब की आज़ादी थी। “शर्मा जी, यही तो हम बुज़ुर्गों की सबसे बड़ी ग़लती है। हम ‘नियंत्रण’ को ही ‘सम्मान’ समझ बैठते हैं। मैंने उस दिन जो सीखा, वह हर पिता को सीखना चाहिए। जब तक हम बच्चों से अपेक्षा रखते हैं, हमें उपेक्षित होने का डर सताता है। यदि ‘अपेक्षा’ ही नहीं रहेगी, तो ‘उपेक्षित’ होने का डर अपने आप ही चला जाएगा!”
वे थोड़ा आगे खिसके और अपनी बात जारी रखी, “मैं आज कोई उम्मीद नहीं रखता। पर जानते हैं इसका परिणाम क्या हुआ? मैंने अपना अधिकार छोड़ा, और उन्होंने मुझे अपना भगवान बना लिया। मुझे आज किसी पेंशन या बैंक बैलेंस की ज़रूरत नहीं है। मेरी काव्या हर महीने की पहली तारीख को मेरी बिना मांगे मेरी ज़रूरतों से कहीं ज़्यादा रुपये मेरे बटुए में रख देती है। मुझे तीर्थ पर जाना हो, या अपने दोस्तों को दावत देनी हो, मुझे माँगना नहीं पड़ता। सुमित आज एक नामी फोटोग्राफर बन गया है। जब भी उसकी कोई तस्वीर किसी मैगज़ीन में छपती है, तो वो सबसे पहले आकर मेरे पैर छूता है। पैसों की धौंस से रिश्ते टूट जाते हैं मेरे दोस्तों, पर त्याग और विश्वास से रिश्ते अमर हो जाते हैं।”
कैलाशनाथ जी अपनी छड़ी उठाते हुए खड़े हुए। “मैंने तिजोरी की चाबी ज़रूर छोड़ दी है, पर मैंने अपने बच्चों के दिलों की चाबी पा ली है। पैसा तो कभी भी कमाया जा सकता है, पर बुढ़ापे का सुकून और बच्चों की आँखों में अपने लिए सच्चा प्यार… यह दौलत हर किसी को नसीब नहीं होती।”
पार्क में छाए कोहरे के बीच कैलाशनाथ जी अपने घर की ओर चल पड़े। पीछे मुड़कर देखने पर उन्होंने पाया कि वहाँ बैठे सभी बुज़ुर्ग अपनी-अपनी सोच में डूबे हुए थे। शायद आज उन्हें अपने घर के क्लेशों का सही कारण और निवारण दोनों मिल गए थे।
कैलाशनाथ जी घर पहुँचे। दरवाज़ा खोलते ही सुमित ने उनके गले में हाथ डाल दिया, “बापूजी, आज मेरी फोटो एक्सहिबिशन है, आपको फीता काटने चलना है।” वहीं रसोई से काव्या की आवाज़ आई, “बापूजी, आपकी शुगर-फ्री चाय और नाश्ता तैयार है, और हाँ, आपके कोट की जेब में मैंने इस महीने का खर्च रख दिया है, शाम को आपके दोस्त घर आ रहे हैं ना!”
कैलाशनाथ जी ने अपनी जेब पर हाथ रखा और मुस्कुरा दिए। उनके पास सच में कोई बैंक बैलेंस नहीं था, पर वे इस दुनिया के सबसे अमीर इंसान थे।
क्या हम सब भी अपने जीवन में ‘नियंत्रण’ और ‘अपेक्षाओं’ का बोझ ढोकर अपने ही रिश्तों में दरार नहीं डाल रहे हैं? कभी-कभी मुट्ठी खोलने से जो हाथ से छूटता है, उससे कहीं ज़्यादा अनमोल चीज़ हमारी झोली में आ गिरती है।
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