छत वाला कमरा – गीता वाधवानी : Moral Stories in Hindi

मैं नेहा, पापा ने मेरा विवाह बहुत धूमधाम से करवाया। मेरे बड़े भाई विजय की शादी हो चुकी थी, उसकी पत्नी नैना, बहुत तेज स्वभाव की थी। उनके दो बच्चे थे, एक बेटा और एक बेटी। 

 मेरी मम्मी की मृत्यु हो चुकी थी। मम्मी के जाने के बाद पापा बिल्कुल अकेले हो गए थे। जब मेरा विवाह हुआ उसके बाद तो पापा और भी अकेले हो गए। मेरा पति करन एक धोखेबाज इंसान

निकला। विवाह के बाद मुझे पता चला कि उसका किसी निशा नाम की लड़की से अफेयर चल रहा है। मैंने उसे छोड़ने का निर्णय कर लिया था। पापा को भी मेरी बात सही लगी। उन्होंने मेरा हर तरह से पूरा साथ दिया। 

      तलाक लेने के बाद, मैंने एक जॉब ढूंढ ली और किराए का एक कमरा लेकर रहने लगी। पापा ने बोला था कि हमारे साथ रह लो,अकेली कैसे रहोगी, लेकिन मेरी भाभी को यह बिलकुल गवारा नहीं था और मैं भी उनका एहसान नहीं लेना चाहती थी। मेरा किराए वाला कैमरा मायके से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए मैं अक्सर पापा से मिलने चली जाती थी। 

 मेरे भाई विजय की बहुत अच्छी नौकरी थी। घर तो पापा ने बना ही रखा था। मम्मी के गहने भाभी ने ले लिए थे। घर पापा के नाम पर ही था और यही बात मेरे भाई भाभी को हजम नहीं हो रही थी। वे लोग जल्द से जल्द मकान को अपने नाम करवाना चाहते थे, लेकिन पापा ने कभी भी हस्ताक्षर करने के लिए हां नहीं किया। 

 जब भी विजय उन्हें कोई कागज साइन करने के लिए देता था, तब वह उसे बहुत ध्यान से पढ़ने के बाद ही साइन करते थे। पापा को हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी थी और साथ ही डायबिटीज भी। 

 मेरी भाभी मीठी छुरी थी। बाहरी दिखावा करती थी। ऐसा महसूस करवाती थी जैसे वह पापा का बहुत ध्यान रखती है। उनकी दवाइयों का,खाने-पीने का, कपड़ों का, हर चीज का।  

    एक बार में पापा से मिलने गई, तो पापा ने बताया कि” तेरी भाभी ने न जाने कौन सी दवा देकर, मुझे गहरी नींद में सुला दिया और मेरे अंगूठे के निशान किसी कागज पर ले लिए। मैं जब नींद से जागा तो मेरे अंगूठे पर स्याही लगी हुई थी। और नेहा, तू यहां मुझसे मिलने रोज रोज मत आया कर बिटिया, मुझे ऐसा लग रहा है कि कोई साजिश हो रही है। तेरे जाने के बाद तेरी भाभी बहुत कुछ उल्टा सीधा बोलती है। ” 

 मैंने कहा-” पापा, मैं तो आपसे मिलने आऊँगी, चाहे किसी को बुरा लगे या भला। ” 

      फिर मुझे ऑफिस के काम से चार दिनों के लिए किसी दूसरे शहर जाना पड़ा, वापस आने पर देखा तो पापा घर पर नहीं थे, भाभी से पूछने पर उन्होंने बताया कि पापा ऊपर हैं। मैं छत पर चली गई और देखा कि पापा एक टूटी फूटी चारपाई पर लेटे हुए हैं और खांस रहे हैं। इतनी भयानक गर्मी में एक मर -मर कर चलने वाले पंखे के साथ भाभी ने उन्हें यहां रहने के लिए बोला था, भाई भी उसकी हां में हां मिलाई थी। 

 मैंने पापा से पूछा-” अपने यहां रहने के लिए हां क्यों की। ” 

 पापा-” क्या करता  बिटिया, शरीर कमजोर हो गया है, और फिर मुझे भी यही लगा कि मुझे खांसी हो रही है तो मुझे बच्चों से दूर रहना चाहिए, बहू सही कह रही है और फिर विजय भी बहुत चिल्ला रहा था। ” 

      मैं रोज पापा से मिलने आती थी और उनके लिए कुछ ना कुछ उनकी पसंद का खाना बनाकर लाती थी। यह सब देखकर मेरी भाभी बहुत चिढती थी। 

 एक बार मुझे तेज बुखार आ गया, मैं चार-पांच दिन तक पापा से मिलने जा ना सकी। ठीक होने पर जब मैं पापा से मिलने गई तो भाभी ने मुझे कहा ” पापा तो दो दिन के लिए अपने दोस्त से मिलने गए हैं और वहीं पर रहेंगे। ” 

 यह जानकर मुझे अच्छा लगा कि पापा अपना जीवन ठीक से जी रहे हैं। मैं वापस चली गई और फिर दो दिन तक नहीं आई। 

 तीन दिन बाद वापस आने पर, पापा मुझे नहीं मिले। भाभी ने टका सा जवाब दिया। वापस नहीं आए हैं तो इसमें मैं क्या कर सकती हूं। मैं घर से निकलने लगी, तभी मुझे सामने वाली आंटी ने आंखों से इशारा करके कुछ कहने की कोशिश की। 

 मैं तुरंत सीढीयों से ऊपर की तरफ भागी। वहां जाकर जो मैंने देखा, वह सब देखकर मैं स्तब्ध रह गई। छत वाले कमरे में पापा अपनी खटिया पर रस्सी से बंधे हुए थे। मैंने तुरंत पापा को खोला। वे बच्चों की तरह बिलख बिलख कर रोने लगे। 

 मैंने गुस्से में भाभी को आवाज़ लगाई। वह ऊपर आई और बेशर्मी से बोली, ” क्या है क्यों चिल्ला रही हो? ” 

 मैंने पूछा -” अपने पापा को बांधा क्यों है आपकी हिम्मत कैसे हुई? मैं अभी भाई को आपके बारे में सब बताती हूं। ” 

 भाभी-” उनसे कुछ छुपा नहीं है, उन्होंने ही कहा था बांधनेके लिए। ससुर जी का दिमाग खराब हो गया है। कभी मुझे गंदी नजरों से देखते हैं, तो कभी कहते हैं खाना दे दो। खाना खाने के बाद भूल जाते हैं और कहते हैं कि मैंने उन्हें खाना दिया ही नहीं है। और अब देखो सारा कैमरा कैसे गंदा कर रखा है। वहीं पर पॉटी और सुसु करते हैं। क्या तुम साफ करोगी आकर। ” 

       भाभी नीचे जा चुकी थी। पापा ने कहा-” नेहा, मेरा दिमाग खराब नहीं हुआ है, मैं ठीक हूं, बहू झूठ बोल रही है, इसने मुझे पूरे दिन खाना नहीं दिया था और जब मैं भूख में तड़पते तड़पते बेहोश हो गया, तो इसने मुझे बांध दिया। मैंने इसे आवाज लगा कर बोला कि मुझे टॉयलेट जाना है मुझे खोल दो। इसने नहीं खोला और मेरा टॉयलेट वहीं पर निकल गया। मुझे तो लग रहा है की साजिश करके इसने प्रॉपर्टी के कागज बनवाकर मेरे अंगूठे की छाप ले ली है और अब यह मुझे मारना चाहती है ताकि यह पूरे मकान पर कब्जा कर सके। ” 

 पापा की ऐसी हालत मुझसे देखी नहीं जा रही थी और मन कह रहा था कि भाभी और भाई, तुम्हें अपनी करनी का फल भुगतना होगा। एक न एक दिन तुम्हारी साजिश का फल तुम्हें जरूर मिलेगा। 

 मैं पापा को अपने घर ले आई। मेरे ऑफिस जाने के बाद पापा ने न जाने किस दिन वकील को बुलाकर अपनी विल बनवा ली और अपने दो दोस्तों को गवाह के तौर पर साइन करने के लिए बुलाया। 

 पापा मेरे सामने मुस्कुराते रहते थे, लेकिन वह भीतर ही भीतर टूट रहे थे। उसके बाद पापा कुछ ज्यादा दिन नहीं जी सके, और एक दिन मुझे छोड़कर चले गए। उनके जाने के बाद, भाई और भाभी एक दिन भी मुझसे मिलने नहीं आए। 

 पापा ने मेरे नाम एक पत्र लिखकर रखा था। उन्होंने लिखा था कि नेहा, छत वाले कमरे में मेरी एक डायरी है, उसे ले आना और मकान मैं तुम्हारे नाम कर दिया है। इस सफेद लिफाफे में उसके कागजात हैं। ” 

      उधर पापा के गुजर जाने के बाद भाई और भाभी ने मकान को हथियाने की योजना शुरू कर दी थी। पापा की इच्छा का मान रखते हुए मैंने भी ठान लिया था कि यह मकान मैं तुम्हें झूठ कागजात द्वारा हड़पने नहीं दूंगी। मैंने वकील से बात की और उन्हें कागजात दिखाएं। उन्होंने बोला कि हम उनके कागजों को बड़ी आसानी से झूठा साबित कर सकते हैं। 

     जज ने मेरे भाई से पूछा कि” आपके पापा इतने पढ़े लिखे थे तो कागजों पर उनके अंगूठे की छाप है, पर साइन क्यों नहीं है? ” मेरे भाई के पास कोई जवाब नहीं था। मेरे पास जो कागजात थे उसमें पापा की अंगूठे के निशान के साथ-साथ उनके हस्ताक्षर भी थे। बड़ी सरलता से मकान मुझे मिल गया और इधर मेरी भाभी पापा के कमरे में न जाने क्या ढूंढने गई थी, वहां से उतरते समय उसका पैर फिसल गया और सीढीयों से गिरने के कारण उसे लकवा मार गया। 

 इसका सीधा हाथ और सीधा पर चलना बंद हो गए थे और मुंह टेढ़ा हो गया था। कुछ कहना चाहती थी पर का नहीं पा रही थी सिर्फ आंसू बह रहे थे। मेरे भाई ने उनका इलाज शुरू करवाया, शुरू शुरू में वह रोज अस्पताल के दो चक्कर काटता था। धीरे-धीरे उसने अस्पताल में आना कम कर दिया और मेरी भाभी के अस्पताल से आने के बाद, मेरे भाई ने उसे टूटी-फूटी खटिया पर छत वाले कमरे में रहने भेज दिया। 

 मैं एक बार भाभी से मिलने गई, तो उन्हें देखकर पापा की हालत याद आ गई। भाभी को शायद अपनी करनी पर अफसोस था, इसीलिए आंखों से आंसू बह रहे थे। जिस जायदाद के लिए उसने इतनी बड़ी साजिश रची, उसका सुख वह नहीं उठा पा रही थी। 

 बच्चे अपने पापा के साथ आराम से रह रहे थे और सब कामों के लिए मेड रखी हुई थी लेकिन अभी भगवान का इंसाफ बाकी था। भाई ने गलत काम में भाभी का साथ दिया था और अपने पापा की परवाह भी नहीं की थी। अपने घमंड में वह, हर किसी से लड़ता रहता था। इसी व्यवहार के कारण एक दिन उसकी नौकरी  चली गई। अब वह दर-दर की ठोकरे खा रहा था। मैंने दोनों बच्चों को हॉस्टल भिजवा दिया था। 

 और पापा वाला घर जो उन्होंने मेरे नाम किया था उसे बेचकर मैंने सारे पैसे वृद्ध आश्रम में दान कर दिए थे। भाभी का देहांत हो चुका था। लालच के कारण की गई साजिश ने पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया था। मैं पापा की तस्वीर के सामने बैठी थी, पापा तस्वीर में मुस्कुरा रहे थे मानो कह रहे हो, नेहा तुमने सही किया है। 

कहानी का शीर्षक- छत वाला कमरा  

 अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली

साप्ताहिक प्रतियोगिता विषय #साजिश

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