*सबसे गहरा ज़ख्म अपने ही देते हैं* – प्रतिमा पाठक
“अरे कलमुही! क्या रोना-धोना लगा रखा है? रोज सुबह-सुबह शुरू हो जाती है। कुछ चाय-नाश्ता मिलेगा या तेरे आँसुओं से ही पेट भरना होगा?” रमा की सास आशा देवी की कड़वी आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी। रमा चुपचाप आँसू पोंछकर रसोई में चली गई। शरीर से वह बेहद कमजोर हो चुकी थी। अभी एक … Read more