इस गुनाह की माफी नहीं – दीपा माथुर
रीवा स्टेशन पर उतरी तो धुंध अभी टूटी नहीं थी। रात की ठंड जैसे लोहे की पटरियों में छिपकर उसके कपड़ों में उतर रही थी। उसके एक हाथ में छोटा-सा सूटकेस था, दूसरे हाथ में पाँच बरस का आरव— कभी कोट का सिरा पकड़ता, कभी उंगली कसकर थाम लेता, जैसे दुनिया एक अजगर है जो … Read more