बेटी की उड़ान – सीमा अग्रवाल ‘जागृति’ 

उस सुबह आसमान कुछ ज्यादा बोझिल था, जैसे बादल मेरे भीतर उठती बेचैनी को समझकर ही ठहर गए हों। घर के आँगन में एक अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी। माँ चौका-चूल्हा करते हुए भी किसी गहरी चिंता में खोई लग रही थीं। पिताजी चाय का कप हाथ में लिए बैठे थे, और उनकी आँखों में … Read more

मैं भी किसी की बेटी हूं – डोली पाठक

बहू ये कैसी चाय बनाई है तूने??? ना चीनी है ना चायपत्ती…  बिल्कुल पतली सी…  शालू के ससुर का हर दिन का एक हीं ड्रामा था..  कभी चाय पतली तो कभी दाल…  कितना भी दिल से वो खाना बना दे उसमें मीन-मेख निकालते रहते थे…  शालू ने कहा – बाबूजी!! कल आपने हीं तो कहा … Read more

मैं भी तो आपकी बेटी हूं ना – नीलम गुप्ता 

विदा के समय जब मेरी सासू मां सविता जी ने मेरी मम्मी को दिलासा देते हुए कहा की बहन जी आप बिल्कुल चिंता ना करें मैं नेहा को अपनी बेटी की तरह रखूंगी । मेरी बेटी तो 2 साल पहले शादी करके ससुराल चली गई तब से मैं बहुत अकेली हो गई थी अब मैं … Read more

डिंपल – गीता वाधवानी

 बार में नाचती डिंपल को जैसे ही वहां बैठे एक शराबी ने छुआ और अपनी तरफ खींचा, सूरज सिंह बौखला गया और उसे आदमी को घूंसा मार कर कुर्सी से गिरा दिया। उसकी कनपटी पर रिवाल्वर तानकर बोला, फौरन चला जा यहां से वरना ठोक दूंगा। वह आदमी गिरता पड़ता अपनी जान बचाकर भागा।   सूरज … Read more

बदलती सोच – निशा जैन

अरे रश्मि बेटा आज भी इतनी जल्दी उठ गई, आज तो रविवार है , आराम से उठ जाती। रोज़ तो पांच बजे उठती हो बच्चों के स्कूल की वजह से, रश्मि की सास आशा जी बोली मम्मी आपको और पापाजी को उठते ही चाय और गर्म पानी चाहिए इसलिए मैं उठ गई । आज सर्दी … Read more

#मैं भी तो एक बेटी हूं – वीणा सिंह

शुभा फोन है सिया का रोहित ने किचेन में मोबाईल ला के दिया… सिया खुशी से चहकती शुभा  से बातें करने लगी…     शादी के बाद  सिया अपना पहला वट सावित्री व्रत करने मायके आ रही थी और मनुहार कर रही थी बुआ तुम आओ ना साथ में व्रत करेंगे खूब मजा आयेगा… शुभा सिया की … Read more

बेटी – खुशी

सावित्री एक भरे पूरे परिवार का हिस्सा थी पति राघव तीन बेटे विवेक, विनय और मौलिक तीनों बेटों पर सावित्री को बड़ा गर्व था ।वो सबसे यही कहती मेरे बेटे तो राम लक्ष्मण है तीनों  एक दूसरे के पूरक है। मैं कौशल्या बच्चे फर्माबदार है ये सोच राघव और सावित्री खुश रहते। सावित्री गाहे बगाहे … Read more

मैं भी तो एक बेटी हूं – सुदर्शन सचदेवा

शाम के पाँच बज रहे थे। बारिश की हल्की-हल्की बूँदें छत पर पड़ते हुए एक अजीब-सी बेचैनी पैदा कर रही थीं। डोरबेल बजी, और गीता ने दरवाज़ा खोला। सामने एक लड़की खड़ी थी—भीगी हुई, डर से कांपती, और आँखों में अजीब-सा दर्द। “आंटी… क्या मैं अंदर आ सकती हूँ? मैं… मैं और कहीं नहीं जा … Read more

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