“मुझे पता है, यदि एक बार कामवाली लगा ली या तुम पर छोड़ दिया, तो इन बर्तनों की चमक चली जाएगी। कामवाली तो बस ऊपर-ऊपर से कपड़ा मारती है। ये पूजा के बर्तन हैं, इनमें मेरी आत्मा बसती है। और रही बात मेरे दर्द की, तो शरीर चलता रहे तभी तक ठीक है। किसी पर आश्रित रहने से अच्छा है खुद ही काम करते रहो… अपना हाथ जगन्नाथ।”
रसोई घर के कोने से बर्तनों के खड़कने और पानी के गिरने की आवाज़ आ रही थी। सुबह के साढ़े छह बज रहे थे। रिया अभी-अभी सोकर उठी थी और अपनी आँखों को मलते हुए ड्राइंग रूम में आई। उसने देखा कि उसकी सास, सावित्री देवी, पीतल के भारी-भरकम कलश और पूजा के बर्तनों को ज़मीन पर बैठकर राख और नींबू से रगड़ रही थीं।
रिया ने घड़ी देखी। इतनी सुबह, इतनी ठंड में, और वो भी ठंडे पानी से?
“माँजी,” रिया ने पास जाकर कहा, “आप इतनी सुबह-सुबह ये क्या कर रही हैं? मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि मैं शाम को कामवाली बाई से कह दूंगी, वो इन्हें मांज देगी। या फिर मैं खुद कर दूंगी। आपके घुटनों में दर्द रहता है, डॉक्टर ने ज़मीन पर बैठने से मना किया है।”
सावित्री देवी ने बिना ऊपर देखे, बर्तन रगड़ना जारी रखा। उनकी सांस फूल रही थी और माथे पर पसीने की बूंदें थीं, लेकिन चेहरे पर एक ज़िद्दी भाव था।
“बहू, ये सब तो चोचले हैं,” सावित्री देवी ने अपनी पुरानी आदत के अनुसार जवाब दिया। “मुझे पता है, यदि एक बार कामवाली लगा ली या तुम पर छोड़ दिया, तो इन बर्तनों की चमक चली जाएगी। कामवाली तो बस ऊपर-ऊपर से कपड़ा मारती है। ये पूजा के बर्तन हैं, इनमें मेरी आत्मा बसती है। और रही बात मेरे दर्द की, तो शरीर चलता रहे तभी तक ठीक है। किसी पर आश्रित रहने से अच्छा है खुद ही काम करते रहो… अपना हाथ जगन्नाथ।”
कहते हुए सावित्री देवी ने अपना बायां हाथ अपनी कमर पर रखा और चेहरे पर दर्द की एक लकीर उभर आई, जिसे उन्होंने तुरंत छिपा लिया।
रिया ने एक गहरी सांस ली। यह रोज़ की कहानी थी। सावित्री देवी उस पीढ़ी की महिला थीं जो आराम को ‘हराम’ और मदद लेने को ‘कमज़ोरी’ समझती थीं। उनके लिए मशीनें और नौकर आलस्य की निशानी थे। घर में वॉशिंग मशीन थी, पर वे अपने सूती कपड़े हाथ से धोती थीं। मिक्सी थी, पर मसाले सिलबट्टे पर पीसती थीं।
रिया ने चाय बनाई और सास को दी। चाय पीते वक्त उसने देखा कि सावित्री देवी का हाथ कांप रहा था। उनकी उंगलियां सूजी हुई थीं। गठिया (Arthritis) अपना असर दिखा रहा था, लेकिन सावित्री देवी का अहंकार उस दर्द से कहीं बड़ा था।
“माँजी,” रिया ने नरमी से कहा, “आत्मनिर्भर होना अच्छी बात है, पर शरीर की भी एक सीमा होती है। कल रात मैंने देखा था आप करवट बदलते हुए कराह रही थीं।”
“अरे कुछ नहीं, वो तो ठंड की वजह से थोड़ी जकड़न थी,” सावित्री देवी ने बात टाल दी। “तू तैयार हो जा, तुझे ऑफिस नहीं जाना क्या?”
रिया चुपचाप तैयार होने चली गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सास को कैसे समझाए कि ‘आराम करना’ पाप नहीं है।
शाम को जब रिया और उसका पति, अनिकेत, घर लौटे, तो घर में सन्नाटा था। अक्सर इस वक्त सावित्री देवी रसोई में कुछ न कुछ खटपट करती रहती थीं। रिया ने माँजी के कमरे में झांका। सावित्री देवी बिस्तर पर लेटी थीं।
“माँजी?” रिया ने पुकारा।
सावित्री देवी ने आँखें नहीं खोलीं। रिया ने पास जाकर उनका माथा हुआ। वे तप रही थीं। बुखार तेज़ था।
“अनिकेत! जल्दी आओ, माँ को बहुत तेज़ बुखार है!”
डॉक्टर को बुलाया गया। चेकअप के बाद डॉक्टर ने जो बताया, उसने अनिकेत और रिया को चिंता में डाल दिया।
“इन्हें वायरल तो है ही, लेकिन असली समस्या ‘एक्सट्रीम एग्जॉशन’ (अत्यधिक थकान) है। इनकी उम्र में शरीर को जितना आराम चाहिए, ये उससे तीन गुना काम कर रही हैं। कलाई की नसें सूज गई हैं। अगर इन्होंने अब भी भारी काम बंद नहीं किया, तो शायद सर्जरी की नौबत आ जाए।”
डॉक्टर के जाने के बाद अनिकेत गुस्से में माँ के पास बैठा।
“माँ, क्यों करती हो आप ये सब? मेरे पास पैसे की कमी है क्या? हम दो-दो नौकर रख सकते हैं। पर आप हैं कि सुनती ही नहीं। ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ का मतलब ये नहीं होता कि शरीर को तोड़ लो।”
सावित्री देवी कमज़ोर आवाज़ में बोलीं, “बेटा, जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, चलने दे। जिस दिन खटिया पकड़ ली, उस दिन तो तुम लोगों पर बोझ बन ही जाऊंगी। मुझे नकारा होकर नहीं जीना।”
रिया दरवाजे पर खड़ी सुन रही थी। उसे आज सास के उस ज़िद्दीपन की असली वजह समझ आई। बात ‘बर्तनों की चमक’ की नहीं थी, बात ‘वजूद’ की थी। सावित्री देवी को डर था कि अगर उन्होंने काम करना छोड़ दिया, तो घर में उनकी उपयोगिता खत्म हो जाएगी। उन्हें लगता था कि उनका महत्व उनके ‘काम’ से है, उनके ‘होने’ से नहीं।
अगले दो दिन तक रिया ने छुट्टी ले ली। उसने सावित्री देवी को बिस्तर से उठने नहीं दिया। सारा काम खुद किया या कामवाली से करवाया।
तीसरे दिन, सावित्री देवी थोड़ी ठीक महसूस कर रही थीं। रिया उनके लिए खिचड़ी लेकर आई।
“माँजी, आज आपसे कुछ मांगना है,” रिया ने बिस्तर के किनारे बैठते हुए कहा।
सावित्री देवी ने चश्मा ठीक किया। “क्या चाहिए बहू? मेरी कंगन या साड़ियां? अब तो वैसे भी मेरे किसी काम की नहीं।”
“नहीं माँजी,” रिया ने उनका हाथ थामा। “मुझे आपका ‘समय’ चाहिए।”
“समय?” सावित्री देवी हैरान थीं।
“हाँ,” रिया ने कहा। “माँजी, आप दिन भर घर के कामों में, बर्तन मांजने में, कपड़े धोने में लगी रहती हैं। जब मैं शाम को ऑफिस से आती हूँ, तो आप थक कर सो जाती हैं। मुझे आपसे बातें करने का, आपसे कुछ सीखने का वक्त ही नहीं मिलता। मेरी माँ बचपन में ही गुज़र गई थीं, मुझे लगा था कि ससुराल में माँ मिलेगी जिससे मैं अपने दिल की बात कह सकूं, अपनी उलझनें सुलझा सकूं। पर यहाँ तो मुझे एक ‘मशीन’ मिली जो बस काम करना जानती है।”
सावित्री देवी सन्न रह गईं। ‘मशीन’?
रिया की आँखों में नमी थी। “माँजी, घर साफ़ रखने के लिए हम पैसे देकर किसी को भी रख सकते हैं। बर्तन मांजने वाली मिल जाएगी, कपड़े धोने वाली मिल जाएगी। पर मेरे सर पर हाथ फेरने के लिए, मुझे सही सलाह देने के लिए, या अनिकेत को डांटने के लिए मैं बाज़ार से ‘माँ’ नहीं खरीद सकती। वो काम सिर्फ़ आप कर सकती हैं।”
उसने सावित्री देवी के सूजे हुए हाथों को अपने गालों से लगाया।
“ये हाथ जगन्नाथ तब हैं जब ये हमें आशीर्वाद दें, न कि जब ये पीतल रगड़ें। अगर आप इन हाथों को बर्तनों में घिस देंगी, तो मेरे बच्चों को लोरी कौन सुनाएगा? मुझे आपकी ‘काम’ की नहीं, आपके ‘साथ’ की ज़रूरत है। क्या आप मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकतीं? क्या आप अपनी बहू के लिए ‘कामवाली’ बनना छोड़कर ‘माँ’ नहीं बन सकतीं?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सावित्री देवी की आँखों से आंसू बह निकले और तकिए में समा गए। पूरी ज़िंदगी उन्होंने यही सोचा था कि परिवार की सेवा करना ही उनका धर्म है। उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था कि परिवार को उनकी ‘सेवा’ से ज़्यादा उनके ‘प्यार’ और ‘सेहत’ की ज़रूरत है।
उन्होंने कांपते हाथों से रिया के आँसू पोंछे। “पगली लड़की… मुझे मशीन बोलती है?”
रिया मुस्कुरा दी, आंसू अभी भी बह रहे थे। “तो और क्या बोलूं? सुबह 5 बजे से शुरू हो जाती हैं।”
सावित्री देवी ने एक गहरी सांस ली, जैसे बरसों का बोझ उतर गया हो। “ठीक है बाबा। हार गई मैं। अब से बर्तन कामवाली मांजेगी। पर खाना… खाना तो मैं ही देखूंगी, तुझे तो दाल में तड़का लगाना भी ठीक से नहीं आता।”
“मंजूर है,” रिया ने हंसते हुए कहा। “आप बस रसोई में कुर्सी पर बैठकर मुझे निर्देश दीजियेगा। मैं आपकी ‘हाथ’ बनूंगी, और आप मेरा ‘दिमाग’।”
उस शाम, घर का नज़ारा बदला हुआ था। कामवाली बाई बर्तन मांज रही थी। सावित्री देवी ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी थीं, लेकिन उनके हाथ खाली नहीं थे। वे रिया के साथ बैठकर पुरानी एल्बम देख रही थीं और ठहाके लगा रही थीं।
अनिकेत जब ऑफिस से आया, तो उसे घर में फिनाइल की नहीं, खुशियों की महक आई। उसने देखा कि उसकी माँ, जो हमेशा काम के बोझ तले दबी और चिड़चिड़ी रहती थीं, आज सुकून से चाय की चुस्की ले रही हैं। उनके चेहरे पर आज दर्द की लकीरें नहीं, बल्कि एक नई चमक थी—वो चमक जो पीतल के बर्तनों से नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट से आती है।
सावित्री देवी ने समझ लिया था कि ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ का असली मतलब अकेले बोझ उठाना नहीं, बल्कि समय आने पर उन हाथों को अपनों के हाथों में सौंप देना है।
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सवाल: क्या आपको लगता है कि सावित्री देवी का सोचना सही था या रिया का तरीका? क्या बुजुर्गों को काम छोड़ने में वाकई अपना वजूद खत्म होने का डर लगता है? अपने अनुभव कमेंट में ज़रूर साझा करें।
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मूल लेखिका :रीमा ठाकुर