अनन्या अपने घर के आंगन की वह गौरैया थी, जिसके चहकने से ही सुबह होती थी। घर की सबसे छोटी संतान होने के नाते, उसे कभी ज़मीन पर पैर रखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। पिता हरिशंकर जी शहर के नामी व्यापारी थे, और उन्होंने अपनी इस लाडली को दुनिया की हर धूप-छांव से बचाकर रखा था।
अनन्या एम.बी.ए. के अंतिम वर्ष में थी। उसका सपना था कि वह एक दिन पिता के कंधे से कंधा मिलाकर उनका व्यापार संभाले। लेकिन नियति और समाज की रीत, दोनों ही अक्सर सपनों से अलग रास्ते चुनते हैं। अनन्या की माँ, सुमित्रा जी, पिछले कुछ समय से गठिया और हृदय रोग से जूझ रही थीं। उनकी ज़िद थी कि अपनी आँखों के सामने बेटी के हाथ पीले कर दें।
“माँ, मेरी पढ़ाई…” अनन्या ने एक दिन दबी आवाज़ में कहा था।
“पढ़ाई तो ससुराल में भी हो जाएगी, बेटा। विहान बहुत अच्छा लड़का है। खानदानी रईस हैं, महलों जैसा घर है। तुझे वहाँ रानी बनाकर रखेंगे,” माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था।
विहान वास्तव में एक आदर्श वर प्रतीत होता था। शांत, मृदुभाषी और ‘रघुवंशी टेक्सटाइल्स’ का इकलौता वारिस। सगाई हुई, और फिर चट मंगनी, पट ब्याह। अनन्या के पिता और भाइयों को बस एक ही चिंता खाए जा रही थी—”हमारी फूल सी बच्ची, जिसने कभी खुद पानी का गिलास भी नहीं भरा, वह ससुराल की ज़िम्मेदारियाँ कैसे उठाएगी?”
विदाई के समय अनन्या के पिता ने विहान के पिता, रघुवीर जी, के हाथ जोड़कर कहा था, “समधी जी, यह कांच की गुड़िया है। अगर इससे कोई गलती हो जाए, तो अपनी बेटी समझकर माफ़ कर दीजिएगा।”
अनन्या ससुराल पहुंची। स्वागत भव्य था। हवेली वाकई किसी महल से कम नहीं थी। लेकिन अनन्या, जिसके पास प्रबंधन (Management) की डिग्री थी और चीज़ों को परखने की एक स्वाभाविक नज़रिया था, उसने पहले ही दिन कुछ अजीब महसूस किया।
हवेली की दीवारों पर पपड़ियाँ जमी थीं, जिन्हें ताज़े पेंट और फूलों की लड़ियों से छिपाने की कोशिश की गई थी। नौकरों की संख्या उतनी नहीं थी जितनी बताई गई थी, और जो थे, उनके चेहरों पर एक अजीब सी बेरुखी थी, जैसे उन्हें महीनों से वेतन न मिला हो। सबसे बड़ी बात, विहान की आँखों में एक स्थाई तनाव था, जिसे वह अपनी मुस्कान के पीछे छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहा था।
शादी के तीन दिन बाद ही वह ‘कांच की गुड़िया’ वाला भ्रम टूटने लगा।
अनन्या अपने कमरे में बैठी थी जब उसे बाहर ससुर जी के चिल्लाने की आवाज़ आई। वह सहम गई। वह धीरे से दरवाज़े की ओट में आई। हॉल में रघुवीर जी किसी से फोन पर बात कर रहे थे।
“सेठ जी, थोड़ा समय और दे दीजिये। मेरा बेटा विहान नई डील करने वाला है। आपका एक-एक पैसा चुका देंगे… नहीं-नहीं, नीलामी की नौबत नहीं आएगी।”
फोन रखते ही रघुवीर जी सोफे पर ढह गए। विहान पास ही खड़ा था, सिर झुकाए।
“पापा, अब और झूठ नहीं बोला जाता,” विहान की आवाज़ टूटी हुई थी। “बाज़ार में हमारी साख खत्म हो चुकी है। मजदूरों ने हड़ताल कर दी है क्योंकि पिछले तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली। यह शादी… यह दिखावा… यह सब करके हमने खुद को और गहरे गड्ढे में डाल दिया है।”
अनन्या सन्न रह गई। तो यह सच था? वह रईसी, वह शान-ओ-शौकत सब एक छलावा था? उसे एक डूबते हुए जहाज़ का मुसाफिर बना दिया गया था?
उसका पहला विचार वही था जो उसके माता-पिता ने सोचा होगा—भाग जाना। अपने पिता को फोन करना और कहना कि उसे यहाँ से ले जाएं। वह रो सकती थी, हंगामा कर सकती थी कि उसके साथ धोखा हुआ है।
लेकिन तभी उसकी नज़र विहान पर पड़ी, जो अब अपने बूढ़े पिता को पानी पिला रहा था। उस लड़के में ईमानदारी थी, बस परिस्थितियाँ उसके खिलाफ थीं। और अनन्या ने तो एम.बी.ए. में यही सीखा था—’संकट प्रबंधन’ (Crisis Management)।
उस रात अनन्या सो नहीं पाई। अगली सुबह, जब सब नाश्ते की मेज़ पर उदास बैठे थे, अनन्या वहां पहुंची। उसने साड़ी का पल्लू कमर में कस रखा था।
“पापा जी,” अनन्या ने ससुर जी को संबोधित किया।
सब चौंक गए। नई बहू से घूंघट और खामोशी की उम्मीद थी।
“मुझे फैक्ट्री देखनी है,” उसने सपाट आवाज़ में कहा।
रघुवीर जी ने कप नीचे रखा। “बहू, यह मर्दों का काम है। तुम घर पर आराम करो। और वैसे भी… अब देखने लायक कुछ बचा नहीं है।”
“जब तक ताला नहीं लगता, तब तक उम्मीद बची रहती है,” अनन्या ने दृढ़ता से कहा। “मैंने बिजनेस मैनेजमेंट पढ़ा है पापा जी। मुझे सिर्फ एक मौका दीजिये। अगर मैं कुछ नहीं कर पाई, तो मैं वापस अपने कमरे में आ जाऊंगी और वही कांच की गुड़िया बन जाऊंगी जो आप सब मुझे समझते हैं।”
विहान ने पिता की ओर देखा और फिर अनन्या की ओर। उसे अनन्या की आँखों में एक नई चमक दिखी। “पापा, उसे जाने देते हैं। वैसे भी अब खोने को क्या है?”
अनन्या जब फैक्ट्री पहुंची, तो हालात उससे भी बदतर थे जितना उसने सोचा था। मशीनें पुरानी थीं, काम बंद था, और यूनियन का नेता गेट पर अड़ा था। अनन्या ने विहान से कहा, “मुझे बही-खाते (Accounts) देखने हैं।”
अगले तीन दिन तक अनन्या ने घर के काम नहीं किए। वह धूल भरी फाइलों में सिर खपाए बैठी रही। उसे समझ आ गया कि समस्या कहाँ थी। कंपनी पुराने ढर्रे पर चल रही थी। वे वो कपड़ा बना रहे थे जिसकी मांग अब बाज़ार में नहीं थी, और बिचौलिए (middlemen) उनका मुनाफा खा रहे थे।
चौथे दिन, अनन्या ने अपने गहनों का डिब्बा लाकर रघुवीर जी के सामने रख दिया।
“यह क्या है बहू?” रघुवीर जी घबरा गए। “क्या हम इतने गिर गए हैं कि घर की लक्ष्मी के गहने बेचेंगे?”
“यह गहने नहीं, ‘सीड कैपिटल’ (Seed Capital) है पापा जी,” अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा। “मैंने मजदूरों से बात की है। अगर हम उनका आधा बकाया भी दे दें, तो वे काम शुरू कर देंगे। और विहान, हमें अब साड़ियां नहीं, बल्कि ‘एक्सपोर्ट क्वालिटी’ के डेनिम (जींस का कपड़ा) बनाने होंगे। मैंने अपने कॉलेज के एक दोस्त से बात की है जो गार्मेंट एक्सपोर्टर है। उसे अर्जेंट ऑर्डर चाहिए।”
रघुवीर जी की आँखों में आंसू आ गए। उन्हें लगा था कि जिस बहू को वे नाज़ों से पालने की चिंता कर रहे थे, वह तो उनके बुढ़ापे की लाठी बन गई थी।
लेकिन रास्ता आसान नहीं था। अनन्या को सुबह 6 बजे उठना पड़ता, घर का थोड़ा बहुत काम निपटाकर वह विहान के साथ फैक्ट्री भागती। वह लड़की जिसने कभी अपनी चाय खुद नहीं बनाई थी, अब मजदूरों के साथ बैठकर कैंटीन की सूखी रोटियां खा रही थी। धूल और मशीनों के शोर के बीच उसका गोरा रंग तपने लगा था, लेकिन उसका आत्मविशवास निखर रहा था।
विहान, जो पहले अकेला पड़ गया था, उसे अब एक साथी मिल गया था। अनन्या सिर्फ ऑर्डर नहीं देती थी, वह रणनीति बनाती थी। उसने बिचौलियों को हटाया और सीधा बाज़ार से संपर्क किया।
छह महीने बीत गए।
अनन्या के पिता, हरिशंकर जी, बहुत चिंतित थे। बेटी का फोन कम आता था। और जब भी वे मिलने की बात करते, वह टाल देती। उन्हें लगा शायद ससुराल वाले उसे परेशान कर रहे हैं या वह घर के काम में दब गई है।
एक दिन, बिना बताए, हरिशंकर जी और सुमित्रा जी अपनी बेटी के ससुराल आ धमके।
हवेली का गेट खुला, तो उन्होंने देखा कि लॉन में घास कटी हुई थी और घर पर नया पेंट हो रहा था। उन्हें लगा शायद अनन्या के दहेज के पैसों से यह सब हो रहा है। वे गुस्से में अंदर दाखिल हुए।
अंदर का नज़ारा देखकर वे ठिठक गए।
हॉल में एक बड़ी मेज़ लगी थी। उस पर कपड़ों के ढेर सारे नमूने (samples) बिखरे पड़े थे। रघुवीर जी एक तरफ बैठे फोन पर किसी विदेशी ग्राहक से टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में बात करने की कोशिश कर रहे थे, और विहान कैलकुलेटर पर हिसाब लगा रहा था।
और बीच में खड़ी थी अनन्या। वह किसी डिज़ाइनर साड़ी में नहीं, बल्कि एक साधारण सूती कुर्ते में थी, हाथ में फाइल और कान पर फोन लगा हुआ था।
“मिस्टर थॉमस, शिपमेंट कल निकल जाएगी। क्वालिटी से कोई समझौता नहीं होगा। और हाँ, पेमेंट एडवांस चाहिए,” अनन्या की आवाज़ में वह अधिकार था जो हरिशंकर जी ने पहले कभी नहीं सुना था।
फोन रखकर अनन्या मुड़ी और अपने माता-पिता को खड़ा पाया। वह दौड़कर उनके पास आई और उनके पैर छुए।
“माँ! बाबूजी! आप लोग कब आए?”
हरिशंकर जी ने विहान को घूरकर देखा। “यह सब क्या है? मेरी बेटी से तुम लोग काम करवा रहे हो? मैंने इसे रानी बनाने के लिए भेजा था, मुनीम बनाने के लिए नहीं।”
इससे पहले कि विहान कुछ बोलता, रघुवीर जी अपनी जगह से उठे। उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी और अनन्या के सिर पर रख दी।
हरिशंकर जी हैरान रह गए।
“समधी जी,” रघुवीर जी का गला भर आया। “आप ने हमें बेटी नहीं, बेटा दिया है। जब मेरा अपना बेटा हार मान गया था, तब आपकी इस ‘कांच की गुड़िया’ ने हमारे खानदान की इज़्ज़त बचाई। आज यह फैक्ट्री, यह घर, और हम सब… इसी की बदौलत खड़े हैं। यह इस घर की रानी नहीं है, यह इस घर की मालिक है।”
विहान ने मुस्कुराते हुए कहा, “पापा जी, अनन्या ने सिर्फ बिजनेस नहीं संभाला, उसने मुझे संभाला है। इसने साबित कर दिया कि संस्कार और शिक्षा जब मिलते हैं, तो कोई भी मुसीबत बड़ी नहीं होती।”
अनन्या की माँ, जो हमेशा सोचती थीं कि उनकी बेटी चूल्हा-चौका कैसे करेगी, गर्व से रो पड़ीं। उन्होंने देखा कि उनकी बेटी के चेहरे पर अब वह शर्मीली मुस्कान नहीं थी, बल्कि एक संतोषजनक चमक थी—आत्मनिर्भरता की चमक।
अनन्या ने पिता का हाथ थाम कर कहा, “बाबूजी, आपने मुझे लाड़-प्यार दिया, लेकिन साथ ही पढ़ने का मौका भी दिया। अगर आपने मुझे एम.बी.ए. न कराया होता, तो शायद आज मैं रो रही होती। आपने मुझे ‘नाजुक’ समझा था, पर आपकी परवरिश ने मुझे ‘मज़बूत’ बनाया था। बस मुझे खुद यह पता नहीं था।”
हरिशंकर जी ने अपनी बेटी को गले लगा लिया। उन्हें समझ आ गया कि उनकी चिंता व्यर्थ थी। उनकी बेटी को किसी की सुरक्षा की ज़रूरत नहीं थी; वह खुद एक सुरक्षा कवच बन चुकी थी।
उस शाम, हवेली में सचमुच का जश्न हुआ। अनन्या ने सबको चाय पिलाई—वही चाय जो उसने शायद पहली बार अच्छी बनाई थी, लेकिन उसका स्वाद उस जीत से भी मीठा था जो उसने अपने दम पर हासिल की थी।
मुस्कान (यानी अनन्या) की कहानी यह नहीं थी कि वह ससुराल में कैसे ‘एडजस्ट’ हुई, बल्कि यह थी कि उसने ससुराल को कैसे ‘बदल’ दिया।
लेखक : नरेंद्र चावला