भला कर दिया – रश्मि झा मिश्रा : Moral Stories in Hindi

“…सच कहती हूं अम्मा… आज सवेरे भी जब मैं अपने आंगन से फूल तोड़ती आई हूं, तो मंझले काका आपके आंगन से ही निकल रहे थे…!”

” पर बिन्नी बहू… उनको भला मेरे आंगन से क्या काम है री…!”

” यह तो अम्मा मैं क्या जानूं… मैंने तो जो देखा वह बता रही हूं…!”

 एक दिन का रोग तो रहा नहीं… अम्मा अकेली ही रहती थी… बड़े से घर द्वार में… बेटे बहू कभी साल दो साल में मुंह दिखा जाते थे… यह बड़े काका की छोटी बहू बिन्नी ही थी जो सांझ सवेरे अम्मा का हाल-चाल लेने चली आती थी… अम्मा को उस पर भरोसा भी था… लेकिन आंखों देखी ना हो, तो रोज-रोज भरोसा थोड़े ही कोई करता है…

 बिन्नी बहू हर दूसरे तीसरे दिन… कभी रात, तो कभी दिन में… मंझले काका या काकी, तो कभी दोनों को साथ में, अम्मा के आंगन से निकलते देखती थी… अम्मा हां ना में टाल जाती…

 कल अम्मा की तबीयत अचानक बिगड़ गई… बिन्नी बहू के साथ ही अस्पताल गई, तो दो दिन रुकना हो गया… पानी की बोतल चढ़ाकर, दूसरे दिन सूरज ढलने के बाद रात चढ़े आंगन में घुसी… 

अम्मा देखती क्या है, मंझले काका और काकी तुलसी मंदिर के पास की जमीन पर कुछ कर रहे थे… जल्दी-जल्दी दोनों के हाथ चल रहे थे… किसी ने अम्मा को नहीं देखा… 

अम्मा पूरी ताकत समेट कर गरज पड़ी…” क्या है छोटे देवर जी… क्या कर रहे हैं…?”

” नहीं नहीं भाभी कुछ नहीं…!” दोनों सकपका गए… “कुछ नहीं भाभी… बस यूं ही थोड़ी मिट्टी लेनी थी…!” ‘और तुलसी भी… आपके आंगन की बहुत अच्छी है… हमारे आंगन में ऐसी मिट्टी नहीं… तुलसी के पौधे के साथ थोड़ी सी ले रहे थे…!” छोटी जल्दी से हाथ में लिए एक टोकरी में मिट्टी डालने लगी…

 अम्मा के अंदर उतनी ताकत भी नहीं थी… अभी-अभी तो अस्पताल से आई थी… भरोसा तो नहीं कर पाई… लेकिन उलझन में चुप रह गई… छोटी हाथ धोकर उनके पास आ गई…

” भाभी आप बैठो… मैं दो रोटियां सेक लाती हूं…!” अम्मा बैठ गई, लेकिन दिमाग चलने लगा… इसका मतलब बिन्नी बहु जो इतने दिनों से कह रही थी वह ठीक ही था… कुछ तो खिचड़ी पक रही है… मेरे आंगन में कोई साजिश तो नहीं कर रहे दोनों… मुझ अकेली बुढ़िया को कमजोर समझ कर फायदा उठाना चाह रहे हैं क्या…

 अम्मा की आंखों से नींद उड़ गई थी… रात जैसे तैसे बीती… सुबह अम्मा अपने आंगन की मिट्टी ध्यान से देखने लगी, तो उसके होश उड़ गए… कई जगह नई मिट्टी थी, खुदी हुई… आखिर माजरा क्या है…

 अम्मा ने खुद मिट्टी खोदना शुरू किया… तीन जगह तो कुछ नहीं था… हां तुलसी के पास जहां कल दोनों दिखे थे… वहां मिट्टी हटाते ही अम्मा की आंख फैल गई…’ शराब की बोतल’ एक दो नहीं पूरे दस… छोटी-छोटी बोतलों में भरा शराब, मिट्टी के भीतर दबाया हुआ था… और दो-चार जगह खोदने पर और भी कोई 50 बोतल इकट्ठी हो गई…

 यह कहानी है बिहार की… जहां शराब बंदी हो रक्खी है… सरकार की नाक के नीचे बेखौफ पीने वाले और पिलाने वाले मौजूद हैं…

 अम्मा ने बिना देरी किए थाने में फोन घुमा दिया… पुलिस आई… अम्मा ने और साथ में बिन्नी बहू ने भी मंझले काका के खिलाफ गवाही दी… मगर उनके घर की तलाशी में एक भी बोतल हाथ नहीं आया…

 अम्मा साथ ही थी… मंझले काका के आंगन की जमीन पूरी उबड़-खाबड़ हो रखी थी… अम्मा के आग्रह पर जमीन खोदी गई…

 पूरे दो सौ के लगभग बोतल निकले, जमीन के नीचे से… काका ने पूरा इल्जाम अपने सर ले लिया…पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर शराब के सारे बोतलों की खेप को साथ लेकर चली गई… काकी बस रोती रही… 

अम्मा को दुख भी हो रहा था… मगर वह मन ही मन एक जिम्मेदार नागरिक होने के गर्व में भी थी…

 तीन दिन बाद सुबह-सुबह मंझले काका आंगन में दातून करते दिखे, तो बिन्नी दौड़कर अम्मा को बताने चली आई…

” अम्मा मंझले काका आ गए… जेल से छूटकर… मजे से दातुन कर रहे हैं…!”

 अम्मा को जैसे झटका लगा…” हैं… इतनी जल्दी छूट कर आ गया…!”

 अम्मा सीधी भागती हुई उसके आंगन गई… जाते ही देवर जी दिख गए… हंसते हुए बोले…” भाभी प्रणाम… मुझे बुला लिया होता…!”

” आप छूट कैसे गए…?”

” अरे भाभी…आपने तो मेरा बड़ा भला कर दिया… जो काम मै इतने दिनों से नहीं कर पा रहा था… आपने एक ही दिन में कर दिया…!”

 अम्मा बस उसे ताके जा रही थी…

” नहीं समझी भाभी… बस पहले जो काम इतना छुपा कर करना पड़ता था… ग्राहक ढूंढने पड़ते थे… डीलर ढूंढना पड़ता था…बोतल को सबकी नजरों से बचाकर, यहां वहां जमीन के नीचे दबाना पड़ता था… पुलिस की नजर से बचना पड़ता था… अब सब खत्म हो गया…

 ग्राहकों को पता चल गया… डीलर को भी, और पुलिस के साथ सेटिंग हो गई… आधे बोतल अभी देने पड़ गए पुलिस को… लेकिन चिंता नहीं है… कमाई जोड़ों की होगी… 

कितने लोग मिल चुके हैं दो दिनों में… अब माल छुपाना भी नहीं पड़ेगा… आपने तो सचमुच मेरा भला कर दिया…!”

साप्ताहिक विषय… साजिश

रश्मि झा मिश्रा 

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