भजन संध्या बनाम किटी पार्टी – शुभ्रा बैनर्जी 

महिमा की अनुशासन प्रियता व चुगली ना करने की आदत का परिणाम ही था कि,अधिकतर महिलाओं के सामूहिक आयोजनों में उसे बुलाया नहीं जाता था। ऊपर से स्पष्ट वादी शिक्षिका की साफ- सुथरी छवि का कवच भी था महिमा के साथ।

अक्सर मोहल्ले की तथाकथित सहेलियां पिकनिक पर जाती रहती थीं,और महिमा को बाद में पता चलता। गलती उनकी भी नहीं थी, क्योंकि महिमा को अपनी बुजुर्ग सास को हर समय अकेले छोड़कर घूमना पसंद भी नहीं था।तन्वी भाभी ने जोर देकर एक किटी में नाम लिख दिया था।

मना करने पर सुनाने लगीं” एक आप ही के किटी ज्वाइन करने से, कौन सा पाप हो जाएगा? अरे! महीने में एक बार मिलते हैं।हाउजी खेलते हैं, थोड़े बहुत गेम्स भी खेल लेतें हैं बस।इसमें क्या बुराई है भाभी? आप तो ऐसे मना कर रहीं हैं , मानो हम कोई गैरकानूनी काम करने वाले हैं।

” महिमा को भी ग्लानि सी हुई।क्यों ख़ुद ही सभी से कटी-कटी रहती है? क्यों सहज हो नहीं पाती इनके साथ? सच ही तो है, महीने में एक बार एक-आधे घंटे साथ में बैठने से कौन सा नुकसान हो जाएगा?

इसी बहाने एकमुश्त पैसे भी मिल जातें हैं आवश्यकता पड़ने पर।अपने ही मोहल्ले में अलग-थलग रहना क्या अच्छा है? उसने तुरंत हां कह दिया तन्वी भाभी को।बड़ी थीं उम्र में वो।

पहली किटी उन्हीं के यहां थी।महिमा के पंहुचते ही हम उम्र महिलाएं लगीं छेड़ने “अरे भाभी जी,आप तो ऐसे किनारा करती हैं किटी से,जैसे गलत काम हो यह।बहुत अच्छा लगा आप को देखकर।आया कीजिए ना,थोड़ा घर से बाहर निकल लिया कीजिए।

मनोरंजन भी हो जाता है।” तभी दूसरी ने ताने का एक तीर फेंका”आप तो सुबह निकल जातीं हैं घर से।स्कूल में सहकर्मियों के साथ गप-शप हो जाती है।हम तो दिन भर घर में रहकर गुलामी करते रहते हैं।

अरे, हमें भी खुश होने का अधिकार है,जब सभी की खुशियों का ख्याल रखते हैं।क्यों भाभी जी?” महिमा को कोई जवाब ना सूझा।ऐसा लगा मानो नौकरी कर के किटी का बहिष्कार करना अनैतिक हो।

किटी का एक ग्रुप बनाया गया उसी दिन।नाम रखा गया”भजन संध्या” किटी की शुरुआत भजन गायन से ही होगी,ऐसा बताया गया। महिलाओं में से एक दो महिलाओं ने इस पुण्य काम का आरंभ किया।अनूप जलोटा जी के भजन उनके मुंह से सुनकर अपराध बोध होने लगा।भजन गाना नितांत ही श्रेष्ठ कला है,

पर तब जब आप गा पाएं सटीक सुर ताल के साथ।दो -तीन भजनों के बाद किटी शुरू हुई।अभी तक जो सहेलियां कह रहीं थीं एक दूसरे को, अब हाऊजी के समय कट्टर दुश्मनों की तरह दूर-दूर बैठ गईं।किसी एक ने जैसे ही नंबर काटते हुए”  यस “बोला, बाकी की महिलाएं लगीं‌ घूरने।

रोमांच को बढ़ाते हुए एक ही प्राइज को दो -चार सदस्यों में भी बांटा जाने लगा। अर्थात् बीस रुपये की ईनामी राशि चार सदस्यों में बराबर बांटी गई।

पांच रुपये पाकर जो खुशी दिखी उनके चेहरों पर, महिमा सोचने पर विवश हो गई।सच में कितनी भोली हैं ये औरतें।थोड़े समय के लिए एकदम बच्ची बन जातीं हैं।हर बात में कमी निकालना उसकी भी गंदी आदत है।

तभी दो पड़ोसिनों में कहासुनी होने लगी।सुशीला जी ने हर्षा जी को घूरते हुए कहा”आपने देरी से कॉल किया भाभी।मैं पहले ही हांथ उठाकर यस बोल चुकी थी।” झट से त्वरित उत्तर आया”अरे,कैसी देरी?अभी हाऊजी का दूसरा नंबर कहां निकाला गया है भाभी?” 

सुशीला जी ने नाक भौं चढ़ाते हुए कहा “अरे वाह!बबली के घर वाली किटी में तो आपने अपनी देवरानी को भी ग़लत तरीके से जितवा दिया था।ये अच्छी बात नहीं।

” अचानक ही यह कहासुनी रौद्र रूप लेने लगी।तन्वी भाभी ने बीच-बचाव कर मामला सुलझाया।गेम्स शुरू होते ही सभी महिलाएं प्रतियोगिता दे रही सदस्य को बड़े मनोयोग से देखने लगीं।जैसे ही किसी के ज्यादा अंक आते, इधर-उधर से “ओह नो!”  की आवाज भी आने लगती।महिमा की व्याकुलता अब बढ़ रही थी या सहनशीलता जवाब दे रही थी, समझ नहीं पा रही थी।

तभी नाश्ते की प्लेटें आने लगीं।सारे सदस्य हाल ही में हुई झड़प भुलाकर एकजुट हो गए खाने के लिए।स्वाद ले-लेकर व्यंजनों की तारीफ करने में किसी से कोई चूक भी नहीं हुई।

लगभग दो घंटे तक चली किटी।इसी बीच कई रील्स भी बनाए लोगों ने।महिमा ने पहले ही बोल दिया था कि उसका वीडियो ना बनाया जाए,तो मान रखा गया महिमा की बात का।

बीच ब्रेक में तीर्थ स्थल घूमने जाने की योजना भी बनाई जाने लगी।ठंड में दीन-दुखियों को चंदा करके कंबल वितरण करने की पेशकश भी की कुछ औरतों ने। महिमा को लगा,सच में बदल रहा है समाज।बदलाव ला रहीं हैं महिलाएं।अब वे घर पर रहकर सिर्फ घरेलू काम ही नहीं करतीं,बल्कि समाज में नई चेतना का प्रसार भी कर रहीं हैं।सच बोल रहीं थीं ये,कम से कम खुश रहना तो सीख ही रहीं हैं औरतें।

हाऊजी में अनिता भाभी को कुछ भी ईनाम नहीं‌ मिला ,तो उनका लटका मुंह देखकर महिमा ने पूछ ही लिया”क्या हुआ अनिता भाभी आपको?इतनी शांत क्यों हो गईं आप?” उन्होंने बहुत ही गंभीर होकर कहा”अरे भाभी,अभी पंडिताइन आने वाली हैं घर पर।पंडित जी को हर महीने जबलपुर ले जाना पड़ता है ना, डॉक्टर को दिखाने।मैं भी मदद कर देतीं हूं।आज सोची थी,जो भी जीतूंगी उन्हें दे दूंगी।पर एक पैसा भी नहीं मिला।” 

उनकी बात सुनकर महिमा के अलावा सभी औरतें हंसने लगीं।साथ ही अब पंडिताइन को लेकर टिप्पणियां शुरू हो गई “बहुत गन्दी आदत है उनकी।ना समय देखती हैं ना जगह,बस पैसा मांगने लगती हैं।ठीक है अपने पति के लिए चिंतित हैं,पर हमारे ऊपर दवाब बनाना भी तो ठीक नहीं।” सीमा भाभी ने अपना वक्तव्य रखा”मैंने तो कह दिया है उनसे,यदि ऐसे ही हर महीने पैसे लेती रहेंगी,तो भंडारे में कुछ नहीं दे पाऊंगी मैं।”

बड़ी ही असहज अनुभव कर रही थी महिमा,तभी मीना भाभी ने अपने यहां भजन कीर्तन का न्यौता देकर कहा”आप सभी को पहले से बता दे रहीं हूं।मेरे नाती का नामकरण होना है अगले सप्ताह।महिलाओं का भजन गायन कार्यक्रम रखी हूं। सभी को आना है।” महिमा ने उत्सुकता वश पूछ ही लिया”सभी मोहल्ले वालों को बुला रहीं हैं क्या भाभी?दो सौ से ज्यादा परिवार तो हो ही जाएंगे” उन्होंने कहा”अरे नहीं-नहीं,आपके भाई साहब के ऑफिस के कुछ लोग रहेंगे और किटी की सहेलियां(वो चार किटी में शामिल थीं)

महिमा को घोर आश्चर्य हुआ।एक पारिवारिक अनुष्ठान को भी भजन का नाम देना उचित है क्या?मोहल्ले के लोगों को छोड़कर किटी की सदस्यों को बुलाने का क्या औचित्य है?तभी सुशीला भाभी ने धीरे से कहा”अच्छा,इसीलिए पैसा लिया आपने इस बार।भाई साहब की तो अच्छी खासी तन्खवाह है,फिर आपको अलग से पैसों की क्या ज़रूरत पड़ गई?” 

मीना भाभी ने झट से उत्तर दिया”अरे!बेटी के ससुराल वाले भी आएंगे,तो देखेंगे।मैं अपने पैसों से नाती को कुछ उपहार दूंगी।मेरी सहेलियों से मिलकर उन्हें पता चलेगा कि जिस मीना की बेटी को अपने बेटे संग ब्याहा है उन्होंने,उसका ख़ुद का भी एक वजूद है।” इस उत्तर को सुनकर रहा सहा धीरज भी जाता रहा महिमा का।”मां को चाय देनी है, संध्या आरती का समय हो गया।” कहकर भागने का बंदोबस्त कर लिया था उसने।तभी रीता भाभी की आवाज बाहर जाते-जाते सुनाई दी”चलो

अच्छा हुआ।महिमा दीदी के आगे वीडियो और फोटो लेने में थोड़ी झिझक होती है।टीचर थीं वो हमारे बच्चों की भी।चलिए पोज़ दीजिए।मैं गाना बाद में डाल दूंगीं।अभी तो समय है बहुत, क्यों ना एक हाऊजी और खेल लें हम? चलिए सुशीला दी, आप पैसे इकट्ठे करिये।अरे जब नहीं होंगे हम घर पर, तो घर वाले एक दिन खुद चाय भी बनाकर पी सकते हैं, और संध्या आरती भी कर ही सकते हैं।घर तो उनका भी है।

“महिमा समझ गई कि महिला सशक्तीकरण का भूत इन हाऊस वाइफ कहलाने वाली औरतों पर तेजी से चढ़ा है।अरे, हाउसवाइफ होना जीवन का सबसे कठिन काम होता है।हर औरत नौकरी कर नहीं सकती।कुछ भी मजबूरी हो सकती है।पर पति के पैसों से ही किटी खेलकर उन्हीं का मज़ाक़ उड़ाना क्या ठीक है? अपनी -अपनी सासों की बेवजह बुराई करने से क्या शान बढ़ती है

हम महिलाओं की?किटी पार्टी में कोई बुराई नहीं है जब तक सभ्यता का दायरा बना रहे।अपने कपड़ों, गहनों और डांस की नुमाइश करने से मान बढ़ता नहीं, घटता है।पूजा और तीर्थ को भी अछूता नहीं छोड़ा इन्होंने। पद-प्रतिष्ठा और पैसों का दिखावा करना धर्म नहीं। दीन-दुखियों की मदद करना चाहिए पर बिना पब्लिसिटी के।औरतों के बीच हंसी-मजाक को रील्स बनाकर पोस्ट करने वाले ये क्यों नहीं समझते कि देखने वाले उनके स्वयं के पति,

बच्चे और रिश्तेदार भी देखकर मजाक ही बनाते हैं।आपस में मिलना, एक दूसरे के सुख-दुख बांटना, सामाजिक धर्म है।परंतु जब हम स्वतंत्रता की लक्ष्मण रेखा पार कर देतें हैं, तो हमारे स्वाभिमान का हरण होता है।हमारी गरिमा कम होती है।हम अबला होने का रोना क्यों रोएं, जब हम अबला हैं ही नहीं।

आते समय तन्वी भाभी ने समझाया कि देख थोड़ा बहुत ऐसी बातें बर्दाश्त करना सीख।हमेशा मत दूरियां बना लिया कर।कम से कम तेरे रहते तो सभ्यता का जामा पहने रहतीं हैं ये।तू अच्छी बातें बताया कर इन्हें।इनकी खूबियों को निखारना तुझे ही पड़ेगा।कोई सिलती अच्छी है,कोई खाना अच्छा बनाती है,कोई ढोलक बजाती है सुरीला।जैसे तू कविता लिखती हैं ना नियमित,इन्हें भी कुछ करने के लिए हौसला दिया कर। मिला कर सबसे।समझी ना।तेरी अच्छी आदतें तो सिखा ही सकती है इन्हें?”

महिमा तन्वी भाभी की बात कभी काट नहीं पाती थी।” आऊंगी अगली बार पक्का।रहूंगी इस किटी में।ख़ुश अब।”तन्वी भाभी ने हंसकर उसे जल्दी विदा किया।घर जाकर मां को भी तो बताना है, इस भजन संध्या किटी के बारे में। हंसते-हंसते वो भी लोट-पोट हो जाएंगी।महिमा अपने घर के लिए निकल पड़ी थी।

शुभ्रा बैनर्जी 

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