भाई जैसा मित्र नहीं और भाई जैसा शत्रु नहीं दोनों ही देखने को मिल जाएंगे – मंजू ओमर 

भइया आप हमारे घर क्यों आए हैं ,जरूर पैसे मांगने आए होंगे।आप तो हम लोगों को सुकून से रहने ही नहीं देते।जब देखो तब चले आते हैं मुंह उठाकर।हमें नहीं रखना आप लोगों से कोई मतलब आप समझते क्यों नहीं।अरे नेहा मैं तो बस छोटे से मिलने आया था बहुत दिन हो गए थे उससे मिले मन कर रहा था मिलने को बस इस लिए आ गया ।

हम दोनों भाई कभी रहे नहीं है न अलग-अलग बस इस लिए आ गया था। हां तो अभी शिखर घर पर नहीं है ,आप जाइए यहां से जब वो आएंगे तो फिर मिल लेना। तभी दरवाजे से शिखर अंदर आया तो देखा भइया खड़े हैं ।अरे भइया आप ,आप खड़े क्यों है आइये बैठिए । नेहा मुंह बिचका कर चली गई।शिखर और शिवम् दोनों सोफे पर बैठ गए।

नेहा जरा चाय बनाना और कुछ नाश्ता भी ले आना , हां बनाती हूं । लेकिन एक मिनट इधर आना जरा शिखर,हां आता हूं ।शिखर अंदर रसोई में गया हां क्या बात है नेहा ये रोज रोज तुम्हारे भईया क्यों आए रहते हैं ।अरे क्या हो गया है तुम्हें बड़े भइया है हमारे।इतने दिनों का साथ रहा है हमारा।अब हम लोग अलग-अलग रहने लगे हैं तो सिर्फ तुम्हारी वजह से ।

क्या मेरा भाई मिलने भी नहीं आ सकता क्या।जरूर पैसे मांगने आए होंगे अच्छा चुप रहो तुम और चाय लेकर आओ ।

              शिखर आकर सोफे पर बैठा तो बड़े भाई से पूछा क्या बात है भइया आप कुछ परेशान लग रहें हों । कुछ नहीं छोटे नहीं कोई बात तो है। क्या बताऊं छोटे सोनू को इंजीनियरिंग में दाखिला दिलवाना है और उसकी फीस भरनी है और मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं । कितने पैसे लगेंगे भाई लाख ,पैसों का इंतजाम नहीं हो पा रहा है ।

मैं सोच रहा था थोड़ा बहुत तू मदद कर दें थोड़े है मेरे पास  मैं तुम्हारे सारे पैसे लौटा दूंगा। तभी नेहा चाय लेकर आ गई और उसने शिखर को आंख दिखाई। शिखर नेहा से थोड़ा डरता था फिर पीछे घर में क्लेश करेगी नैहा।तो उसके सामने शिखर ने साफ साफ कह दिया अरे भइया मेरे पास कहा पैसे हैं मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता।

अच्छा ठीक है छोटे कोई बात नहीं।मैं कहीं और से इंतजाम करता हूं ‌, अच्छा चलता हूं मैं ।अरे भइया जरा रूकिए मैं और नेहा कहीं घूमने गए थे और वहां से एक साड़ी खरीद कर लाए हैं वो भाभी के लिए ले जाइयेगा । नेहा तो साड़ी पहनती नहीं है इसलिए।अरे नेहा वो साड़ी लाना जरा और नेहा ने वो साड़ी लाकर टेबल पर पटक दी।

अरे ये क्या नेहा इसे डिब्बे में रखकर लाती न ।अरे डिब्बे का क्या करना । अच्छा छोड़ो मैं ही रख देता हूं इसे डिब्बे में।और शिखर साड़ी को डिब्बे में रख कर भाई को दे दिया। अच्छा छोटे मैं चलता हूं ।

             बड़ा मायूस होकर शिवम सोच में पड़ा हुआ बिल्डिंग की सीढ़िया से उतर रहा था, पता नहीं कहां ध्यान था उसका और सीढ़ियों से उतरते समय एक  की जगह दो सिढिया पार  कर गया ,और झटका लगने से उसके हाथसे डिब्बा नीचे गिर गया।ऐसे ही बंद था डिब्बा ।

शिवम क्या देखता है  कि साड़ी के  साथ कुछ नोट भी फर्श पर बिखर गए हैं उसने उठाया तो देखा ₹50000 थे ।और एक नोट भी था  भैया बाकी ₹50000 मैं  एकाउंट में डलवा दूंगा। शिवम की आंखें खुशी से छलक आई  जिस  भाई को शत्रु जैसा समझने लगा था उस पर गर्व होने लगा उसको। 

                शिवम और शिखर दो भाई थे ।शिवम के पिताजी जब दोनों भाई छोटे थे तभी उनकी किसी दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। मां टीचर थी और घर का एक हिस्सा किराए पर उठा था तो घर खर्च चल जाता  था।शिखर और शिवम दो बेटे थे जिसमें शिखर शिवम से 6 साल छोटा था।

कम उम्र में पिता का देहांत हो जाने से छोटे भाई का ऐसे ख्याल रखता था जैसे पिता  रखते हो । दोनों भाइयों में आपस में बहुत पटती थी।और  कम उम में पिता का साया उठ जाने से शिवम समय से पहले ही  अपनी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी ।

और ग्रेजुएशन करने के बाद एक किराने की  छोटी सी माल जैसी दुकान खोल ली थी।इसी बीच शिवम की  कामिनी से शादी  हो गई। कामिनी स्वभावसे बहुत अच्छी थी ।

घर की  सारी जिम्मेदारी उसने उठा ली थी ।छोटे देवर को भी बहुत स्नेह करती थी ।इसी बीच एक हादसा हो गया शिखर की मां को गर्भाशय का कैंसर हो गया इलाज करने के बावजूद भी उनकी मृत्यु हो गयी।

             अब शिवम छोटे भाई शिखर को और भी ज्यादा प्यार करने लगा। शिवम की पत्नी कामिनी भी शिखर को बहुत प्यार करती थी ।उसकी पढ़ाई लिखाई से कोई भी  समझौता नहीं किया जो भी पैसा लगा उसको लगाकर शिखर  की पढ़ाई को पूरा  किया।इस बीच शिवम के भी दो बच्चे  हो गए एक बेटा और एक बेटी ।

शिखर पढ़ लिखकर  इंजीनियर बन गया। और नौकरी करने लगा शिखर अपने ऑफिस में  साथ काम करने वाली नेहा को पसंद करने लगा।

         एक दिन शिखर ने अपनी भाभी को बता दिया कि भाभी मैं नेहा को पसंद करता हूं ।वो मेरे आफिस में मेरे साथ काम करती है शादी करना चाहता हूं । कामिनी ने शिवम से बात की और दोनों तैयार हो गए और शिखर और नेहा की शादी हो गई।

             नेहा शादी के बाद जब घर आई तो देखा पूरे घर में जेठानी का दबदबा है ।हर कोई उनकी ही बात मानता है । शिखर तो जैसे दीवाना था हर वक्त भाभी, भाभी ।

नेहा चिढ़ने लगी कामिनी से ।मैं तो अपनी भाभी के खाने का व्यवहार कुशलता का दीवाना हूं मैं नेहा तुम्हें भी कुछ सीखना चाहिए भाभी से ।ये हर समय भाभी भाभी की बातें सुनकर नेहा परेशान हो गई थी वो इससे छुटकारा पाना चाहती थी।ये क्या हैं शिखर तुम हर वक्त भाभी की ही तारीफ़ करने में लगे रहते हो तुम्हें मैं तो कहीं दीखती नहीं हूं।

अरे यार नेहा पहले मां थी और उसके बाद भाभी ने ही तो संभाला है , भाभी ही तो मेरी सबकुछ हैं।तुम नाराज़ क्यों होती हो यदि मैं भाभी की तारीफ करता हूं तो । नेहा तुम्हारी मेरी जिंदगी में अलग जगह है और भाभी की अलग ।

          नेहा सोचने लगी इस भाभी के पीछलग्गू को भाभी से दूर करना ही पड़ेगा । नेहा ने घर से दूर किसी दूसरे आफिस में नौकरी के लिए अप्लाई कर दिया और शिखर को भी जबरदस्ती करवा दिया ये लालच देकर की वहां सैलरी ज्यादा है । शिखर नहीं चाहता था घर से दूर जाना लेकिन नेहा के आगे मजबूर हो रहा था।

        अब नई कंपनी में जगह थी तो मिल गई नौकरी और आखिर शिखर को लैकर नेहा चली गई। नेहा सोचने लगी चलो भाभी भइया से पीछा छूटा । लेकिन शिखर उदास था वह सोच रहा था भाभी भइया से बढ़कर तो कोई मित्र नहीं हो सकता और नेहा सोच रही थी कि भाभी भइया से बड़ा उनका कोई शत्रु नहीं हो सकता।

       शिखर को भाभी भइया की याद तो आती थी लेकिन व्यस्तता के कारण और दूरी के कारण जल्दी मिलना नहीं हो पाता था।आज शिवम को कुछ ज़रूरत आन पड़ी तो वो शिखर के पास जा पहुंचा आखिर हर वक्त वे वक्त शिखर का साथ दिया है शिवम ने।और सोचा छोटा जरूर मदद करेगा।

और जब शिवम खाली हाथ लौट रहा था तो शिखर में उसको शत्रु दिखाई पड़ रहा था। लेकिन क्षण भर में शिवम का सारा भ्रम टूट गया।और सोचने लगा भाई ही भाई के काम आता है ।और कोई भी नहीं ।

मंजू ओमर 

झांसी उत्तर प्रदेश 

29 जनवरी

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