कार की खिड़की से पीछे छूटते पेड़ों को देखते हुए सुमन के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थमी हुई थी जिसे दुनिया की कोई भी चिंता मिटा नहीं सकती थी। शादी के पूरे चार महीने बाद वह अपने मायके जा रही थी। बगल में ड्राइविंग सीट पर बैठे उसके पति, रजत, बार-बार उसे कनखियों से देख रहे थे और मुस्कुरा रहे थे।
“मैडम, थोड़ा धीरे मुस्कुराइए, वरना गाल दुखने लगेंगे,” रजत ने छेड़ते हुए कहा। “वैसे, एक बात बताऊँ? अब तुम वह सुमन नहीं रही जो चार महीने पहले इस घर से विदा हुई थी। देखना, तुम्हें अपना ही घर बदला-बदला सा लगेगा।”
सुमन ने हँसते हुए जवाब दिया, “रजत, आप कुछ भी कह लीजिए। वो मेरा घर है, मेरा मायका। वहां की हर ईंट मुझे पहचानती है। वहां कुछ नहीं बदल सकता। माँ के हाथ की अदरक वाली चाय और पापा का वो पुराना रेडियो… सब वैसा ही होगा। मैं वहां आज भी वही जिद्दी सुमन हूँ।”
रजत ने गियर बदलते हुए कहा, “हम्म… देखते हैं। सुना है शादी के बाद लड़कियों के लिए मायका एक ‘हॉलिडे डेस्टिनेशन’ बन जाता है, जहां वे रिलैक्स करने जाती हैं, लेकिन घर वाला अधिकार धीरे-धीरे कम हो जाता है।”
सुमन ने इस बात को हवा में उड़ा दिया। उसे पूरा यकीन था कि जैसे ही वह घर पहुंचेगी, वह अपना बैग सोफे पर फेंकेगी और माँ की गोद में सिर रखकर लेट जाएगी। उसे कोई काम नहीं करना होगा, बस हुक्म चलाना होगा—बिल्कुल वैसे ही जैसे वह शादी से पहले करती थी।
गाड़ी सुमन के बचपन के घर, ‘शांति कुंज’ के लोहे वाले गेट पर रुकी। गेट की आवाज़ सुनते ही सुमन का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
अंदर का नज़ारा वही था, लेकिन कुछ अलग भी था। बरामदे में लगी तुलसी थोड़ी सूख गई थी, और पापा की आराम कुर्सी पर एक नई गद्दी बिछी थी। सुमन गाड़ी से उतरी और दौड़कर अंदर भागी।
“माँ! पापा!”
सामने उसकी माँ, सावित्री जी, और पापा, रमेश बाबू खड़े थे। सावित्री जी ने आरती की थाली सजा रखी थी। सुमन को यह थोड़ा औपचारिक लगा। पहले जब वह कॉलेज या ट्रिप से आती थी, तो माँ सीधे गले लगाती थीं, आरती नहीं उतारती थीं। पर शायद नई-नई शादी का शगुन था।
आरती के बाद सुमन ने माँ को कसकर गले लगा लिया। उस गंध को—हल्दी और पुराने इत्र की मिली-जुली गंध को—उसने अपनी सांसों में भर लिया।
“कैसी है मेरी गुड़िया?” सावित्री जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“बहुत अच्छी हूँ माँ। आपकी बहुत याद आती थी,” सुमन की आँखें भर आईं।
अंदर ड्राइंग रूम में बैठते ही सुमन ने अपनी आदत के अनुसार ज़ोर से आवाज़ लगाई, “भाभी! एक गिलास ठंडा पानी लाना, बहुत प्यास लगी है।”
उसकी भाभी, कविता, जो किचन में थीं, तुरंत पानी लेकर आईं। लेकिन पानी स्टील के गिलास में नहीं, बल्कि ट्रे में सजे कांच के गिलास में था, साथ में बिस्कुट भी थे।
सुमन ने पानी पिया और हँसते हुए कहा, “अरे भाभी, ये कांच का गिलास क्यों? मैं कोई मेहमान हूँ क्या? वो मेरा स्टील वाला लोटा कहाँ गया?”
कविता ने मुस्कुराते हुए कहा, “दीदी, अब आप मेहमान ही तो हैं। और वैसे भी, वो स्टील वाला लोटा तो अब स्टोर रूम में रख दिया है, आपकी शादी के बाद रसोई की सफाई की थी न, तो पुराने बर्तन हटा दिए।”
सुमन को हल्का सा धक्का लगा। उसका लोटा… ‘पुराना बर्तन’ हो गया?
थोड़ी देर बाद सुमन अपने कमरे की तरफ बढ़ी। “मैं ज़रा फ्रेश हो लूँ, फिर गप्पे मारेंगे।”
जैसे ही उसने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला, वह ठिठक गई। वह कमरा, जिसकी दीवारों पर कभी उसके बनाए पेंटिंग्स और कोलाज टंगे रहते थे, अब पूरी तरह बदल चुका था। दीवारें नई पुत चुकी थीं। उसका स्टडी टेबल वहां से गायब था और उसकी जगह एक सिलाई मशीन रखी थी। बेड पर नई चादर थी और अलमारी में—जहाँ उसके कपड़े ठुंसे रहते थे—अब सर्दियों के रज़ाइयां और कंबल रखे थे।
सुमन का कमरा अब ‘सुमन का कमरा’ नहीं, बल्कि एक ‘गेस्ट रूम’ या ‘स्टोर रूम’ जैसा लग रहा था। उसे रजत की बात याद आ गई—”देखना, तुम्हें अपना ही घर बदला-बदला सा लगेगा।”
उसने अपना बैग एक कोने में रखा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपना सामान कहाँ निकाले। अलमारी तो भरी हुई थी। उसे पहली बार अपने ही घर में संकोच हुआ।
दोपहर के खाने पर सावित्री जी ने सुमन की पसंद का राजमा-चावल बनाया था। सुमन डाइनिंग टेबल पर बैठी। उसे उम्मीद थी कि माँ उसे अपने हाथों से खिलाएंगी। लेकिन सावित्री जी मेहमानों की तरह रजत की प्लेट में बार-बार खाना परोस रही थीं और सुमन से पूछ रही थीं, “बेटा, नमक ठीक है न? ससुराल में जैसा खाती हो, वैसा बना है या नहीं?”
सुमन का निवाला गले में अटक गया। माँ को कब से उसके स्वाद पर शक होने लगा?
“माँ, आपके हाथ का स्वाद दुनिया में सबसे बेस्ट है, आप क्यों पूछ रही हो?” सुमन ने कहा।
सावित्री जी फीका सा मुस्कुरा दीं। “पता नहीं बेटा, चार महीने हो गए। अब तो तुझे वहां के मसालों की आदत हो गई होगी।”
खाना खाने के बाद रजत को थोड़ा काम था, तो वह अपने लैपटॉप पर व्यस्त हो गए। सुमन को लगा कि यही सही वक्त है माँ के साथ अकेले बैठकर बातें करने का। वह रसोई में गई।
सावित्री जी बर्तन धो रही थीं। सुमन ने देखा कि माँ की चाल थोड़ी धीमी हो गई है। वह सिंक के पास खड़ी होकर बर्तनों को बहुत धीरे-धीरे मांज रही थीं।
“माँ, लाओ मैं कर देती हूँ,” सुमन ने आगे बढ़कर कहा।
“अरे नहीं-नहीं!” सावित्री जी ने लगभग हाथ झटक दिया। “तू क्यों करेगी? तू मायके आई है, आराम कर। मेहमानों से काम थोड़ी करवाते हैं। जा, अपने कमरे में एसी चलाकर सो जा।”
‘मेहमान’। यह शब्द आज दूसरी बार सुमन के कानों में चुभा।
सुमन जिद करके वहीं स्लैब पर बैठ गई। “माँ, मुझे नींद नहीं आ रही। मुझे आपसे बातें करनी हैं। अच्छा सुनो, शाम को गाजर का हलवा बनाओगी? बहुत मन कर रहा है।”
सावित्री जी का चेहरा एक पल के लिए बुझ गया, फिर तुरंत चमक आया। “हाँ-हाँ, क्यों नहीं? मेरी गुड़िया को गाजर का हलवा पसंद है, तो ज़रूर बनेगा। मैं अभी गाजर घिसने बैठ जाती हूँ।”
शाम को सुमन हॉल में टीवी देख रही थी। उसे रसोई से ‘घिस-घिस’ की आवाज़ आ रही थी। उसे लगा माँ गाजर घिस रही हैं। अचानक आवाज़ बंद हो गई और एक हल्की सी कराहने की आवाज़ आई—”आह!”
सुमन चौंक गई। वह दबे पाँव रसोई की तरफ गई। दरवाज़े की ओट से उसने जो देखा, उससे उसका दिल पसीज गया।
सावित्री जी ज़मीन पर बैठी थीं। कद्दूकस उनके सामने रखा था। वे अपना बायां हाथ अपने दाहिने घुटने पर रखकर उसे ज़ोर-ज़ोर से दबा रही थीं। उनके चेहरे पर दर्द की लकीरें उभरी हुई थीं। वे बड़ी मुश्किल से सांस ले रही थीं।
थोड़ी देर बाद, उन्होंने दीवार का सहारा लिया, बड़ी कठिनाई से खड़ी हुईं, एक दर्द निवारक बाम (balm) अपने घुटनों पर मला, और फिर से कुर्सी पर बैठकर गाजर घिसने लगीं। उनके हाथ कांप रहे थे, लेकिन वे रुके नहीं।
सुमन की आँखों में आंसू आ गए। उसे याद आया कि शादी से पहले भी माँ को गठिया की हल्की शिकायत थी, लेकिन तब सुमन अपनी कॉलेज और दोस्तों की मस्ती में इतनी व्यस्त रहती थी कि उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया। और आज… आज माँ इस दर्द में भी सिर्फ इसलिए काम कर रही थीं क्योंकि उनकी ‘बेटी’ मेहमान बनकर आई थी और उसने फरमाइश की थी।
सुमन को रजत की कही बात का असली मतलब अब समझ आ रहा था। मायका बदलता नहीं है, बस वहां हमारा किरदार बदल जाता है। हम वहां से ‘लेने’ वाले नहीं, बल्कि ‘देने’ वाले बनने चाहिए, यह उसे आज समझ आया।
सुमन ने अपनी आँखों से आंसू पोंछे और चेहरे पर मुस्कान लाकर रसोई में दाखिल हुई।
“अरे माँ! यह क्या कर रही हो? अभी तक घिस ही रही हो?” सुमन ने जानबूझकर थोड़ी मज़बूती से कहा।
सावित्री जी ने हड़बड़ाकर दर्द छिपाने की कोशिश की। “बस बेटा, हो गया। तू जा, अभी बनाती हूँ।”
सुमन ने सावित्री जी के हाथ से कद्दूकस छीन लिया।
“रहने दो माँ। मेरा मन बदल गया है।”
सावित्री जी हैरान रह गईं। “क्या हुआ? तुझे तो बहुत पसंद था न?”
सुमन ने माँ को पकड़कर कुर्सी से उठाया और डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बिठाया। फिर उसने एक गिलास पानी दिया।
“पसंद तो है, लेकिन आज मैं बनाऊँगी। मुझे ससुराल में एक नई रेसिपी सीखी है गाजर के हलवे की। मैं चाहती हूँ कि आप और पापा उसे टेस्ट करो और बताओ कि मैं पास हुई या फेल।”
“लेकिन बेटा, तू थक जाएगी…”
“माँ!” सुमन ने थोड़ा अधिकार जताते हुए कहा। “मैं आपकी बेटी हूँ, कोई महारानी नहीं। और आप… आप बूढ़ी हो रही हो, यह बात आपने मुझसे क्यों छिपाई? आपके घुटनों में इतना दर्द है, फिर भी आप लगी हुई हो?”
सावित्री जी की आँखें भर आईं। “छिपाया नहीं बेटा। बस सोचा कि तू इतने दिनों बाद आई है, तुझे क्या अपनी बीमारियों का रोना रोऊँ? तुझे खुश देखना चाहती थी।”
सुमन ने माँ के घुटनों पर हाथ रखा। “माँ, मेरी खुशी आपके हाथ के हलवे में नहीं, आपके आराम में है। मैं यहाँ सिर्फ बचपन जीने नहीं आई हूँ, मैं यह देखने आई हूँ कि मेरे जाने के बाद आप अपना ख्याल रख रही हो या नहीं।”
सुमन ने भाभी को आवाज़ दी। “भाभी! प्लीज आप माँ के पास बैठो। आज किचन मेरी ज़िम्मेदारी।”
उस शाम, रसोई में सुमन थी। उसने गाजर घिसी, दूध उबाला और हलवा बनाया। पसीना उसकी माथे पर था, थकान उसके पैरों में थी, लेकिन मन में एक अजीब सा सुकून था। उसे आज महसूस हो रहा था कि वह अब ‘बच्ची’ नहीं रही। वह अब एक ऐसी औरत बन गई थी जो दो घरों की धुरी है।
रात को खाने की मेज़ पर जब सुमन ने हलवा परोसा, तो पापा ने पहली चम्मच खाते ही कहा, “अरे वाह! यह तो बिल्कुल सावित्री के हाथ जैसा स्वाद है। पता ही नहीं चल रहा कि हमारी बिटिया ने बनाया है।”
रजत ने सुमन की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक नया सम्मान था। वह समझ गया था कि सुमन ने आज क्या महसूस किया है।
सोने से पहले, सुमन अपने ‘गेस्ट रूम’ में गई। अब उसे वह कमरा पराया नहीं लग रहा था। उसे समझ आ गया था कि कमरे बदलते हैं, जगहें बदलती हैं, लेकिन प्यार नहीं बदलता। बस उस प्यार को जताने का तरीका बदल जाता है।
सावित्री जी धीरे-धीरे चलकर सुमन के कमरे में आईं। उनके हाथ में एक पुराना संदूक था।
“बेटा, सो गई क्या?”
“नहीं माँ, आइए न।”
सावित्री जी बिस्तर के किनारे बैठ गईं। उन्होंने संदूक खोला। उसमें सुमन की बचपन की कुछ चीज़ें थीं—उसका पहला स्कूल रिपोर्ट कार्ड, एक टूटी हुई गुड़िया, और वह ‘स्टील का लोटा’ जिसके लिए सुमन दोपहर में पूछ रही थी।
“यह ले,” सावित्री जी ने वह लोटा सुमन के हाथ में थमा दिया। “मैंने इसे स्टोर रूम से निकलवा लिया। मुझे लगा था कि तू अब बड़ी हो गई है, शहर में रहती है, तो तुझे ये सब पुराने ढर्रे पसंद नहीं आएंगे। मुझे लगा तू बदल गई होगी।”
सुमन ने उस लोटे को सीने से लगा लिया। “माँ, लड़कियां ससुराल जाकर तौर-तरीके बदल लेती हैं, पर अपनी जड़ें नहीं बदलतीं। मैं आपके लिए हमेशा वही जिद्दी सुमन रहूँगी।”
सावित्री जी ने सुमन का माथा चूमा। “जानती हूँ। पर आज तुझे रसोई में काम करते देख, और मेरी तकलीफ समझते देख, मुझे यकीन हो गया कि मेरी बेटी अब सचमुच ‘बड़ी’ हो गई है। तूने आज मुझे आराम देकर जो खुशी दी, वो उस हलवे से कहीं ज़्यादा मीठी थी।”
अगले दिन जब सुमन वापस जाने के लिए गाड़ी में बैठी, तो उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन यह बिछड़ने का गम नहीं था। यह एक संतोष था।
रजत ने गाड़ी स्टार्ट की और पूछा, “तो, कैसा लगा मायका? बदला-बदला सा?”
सुमन मुस्कुराई। उसने पीछे मुड़कर देखा जहाँ माँ और पापा गेट पर खड़े हाथ हिला रहे थे।
“घर तो वही था रजत, बस देखने वाली नज़र बदल गई थी। पहले मैं वहां हक़ जताने जाती थी, इस बार मैं वहां फ़र्ज़ निभाने गई थी। और सच कहूँ? यह वाला सुकून बचपन वाली ज़िद से कहीं ज़्यादा बड़ा है।”
गाड़ी आगे बढ़ गई, लेकिन सुमन जानती थी कि अब उसे मायके जाने के लिए किसी ‘मुहूर्त’ या ‘ज़रूरत’ का इंतज़ार नहीं करना होगा। अब वह वहां अपनी माँ की लाठी बनने जाएगी, मेहमान बनने नहीं। क्योंकि बेटियां पराई होकर भी कभी पराई नहीं होतीं, वे बस प्यार के एक नए रूप में ढल जाती हैं।
मूल लेखिका : विभा गुप्ता