बेटियां पराई होकर भी अपनी होती है – डॉ बीना कुण्डलिया : Moral Stories in Hindi

रमा देवी और कैलाश जी दोपहर बाद घर के सामने बने पार्क में टहलने निकले तभी रमादेवी लड़खड़ाती गिरने ही वाली थी अगर कैलाश जी ने आगे बढ़कर उनको तुरंत थामा न होता। रमा जी बोली इतनी फिसलन है की आज आप ने थामा न होता तो हाथ या पैर में से कुछ टूट ही जाना था। कैलाश जी जो इस एकाएक घटना से घबरा ही गये थे रमा देवी को सही सलामत देख चैन की सांस

लेते हुए बोले शुक्रिया भगवान अनहोनी होने से बच गई अरेऽऽ हम दोनों ही एक दूसरे का सहारा है इस उम्र में, अब सारी जिंदगी तो बच्चों की परवरिश घर गृहस्थी को संभालने भाग दौड़ में निकाल दी अब रिटायरमेन्ट क्या हुआ बच्चों के लिए रिटायर फालतू इंसान ही बन कर रह गये हम तो ?

“ बस आजकल के बच्चों ने दसवीं पास की नहीं माता-पिता को तो बेवकूफ समझने लगते हैं। और रिटायर पिता को बेकार समझ अवहेलना तिरस्कार अनदेखा करने लगते हैं “ ।

 रमा देवी लम्बी आहें भरती बोली हाँऽऽ आप सही कह रहे सोचा था दो दो बेटे एक बेटी,अब बेटी तो पराई हो जायेगी बेटों के साथ आराम से जीवन काटेंगे पोते पोतियों संग अपना बचपन दुबारा जी लेंगे…मगर वाह री किस्मत कुछ और ही रंग दिखा दिये इसने तो एक बड़ा बेटा रवि बीवी बच्चों सहित

विदेश बस गया जाकर उसकी बीवी के भाई जो विदेश में बसे ले गये सिखा पढ़ा लालच देकर दूसरा बेटा बहु साथ ही रहते मगर उसके लिए तो हमारा साथ होना न होना सब बराबर हैं साथ रहते हुए भी पराया ही है बाल बच्चे बहु ने अपने मायके रख छोड़े वहीं पढ़ रहे इसी बहाने जब मौका मिलता खुद

भी पहुंच जाती वहीं…बेटी की शादी को सात बर्ष हो गये पराये घर चली गई लेकिन कभी भी परायेपन का अहसास नहीं होने दिया उसने, कैसे दौड़ी चली आती है..। जरा सी भी बीमारी की खबर सुनकर ।

अब मैं तो उसे कुछ बताती नहीं ज्यादा, सोचती हूँ घर परिवार बच्चों वाली है चिंतित न हो जाए मगर वो है कि फोन में बतियाते बतियाते ही महसूस कर लेती है हम अस्वस्थ्य हैं तुरन्त रात ट्रेन पकड़कर

सुबह सुबह पहुंच भागी चली आती है देखने,उसका पति रेलवे में नौकरी करता तो आसानी से आने जाने का प्रबंध हो जाता…पता नहीं कैसे कहतें है लोग बेटियां पराई होती रमा जी बड़बड़ाती है ।

तभी कैलाश जी बोले चलो वापस घर चलते हैं अब धूप तो चली गई ठंडी हवा चल रही अब इस उम्र में सर्दी बर्दाश्त नहीं होती आज कुछ छाती में जकड़न सी भी महसूस हो रही है। 

देर रात कैलाश जी की तबीयत खराब हो जाती है उनको बहुत तेज खांसी का दौरा पड़ता है। काफी घरेलू प्रयास बाद रमा जी बेटे का दरवाजा खटखटाती हैं बहु खोलती है क्या बात है ‘मांजी ये आधी रात को भी आपको चैन नहीं है दिनभर के हम ऑफिस में थके मांदे आते हैं। अरे रात तो चैन से सोने दें हमें, 

रमाजी बोलती है- बहु तेरे ससुरजी की तबीयत ठीक नहीं बहुत खांसी आ रही सांस लेने में भी तकलीफ़ हो रही हमारे बेटे से बोलो डाक्टर के पास ले चलें । 

सुनकर बहु उमा लापरवाही से बोली इस आधी रात में कौन सा डाक्टर आपके लिए बैठा होगा सुबह देखते हैं कहकर दरवाजा बन्द कर लेती है।

रमादेवी परेशान, करें तो क्या करें पहचान के पड़ोसी, मित्र भी मिलकर हफ्ते भर के लिए सभी यात्रा पर गये हुए हैं ‌। अब वो घरेलू उपचार गर्म पानी शहद वगैरा खिला काम चलाती जिससे थोड़ी बहुत राहत मिल जाती है। सुबह वो बेटे को घर में ढूंढती जो मिलता नहीं तब बहु यह कहकर ऑफिस के

लिए निकल जाती है वो जल्दी चले गए जरूरी मीटिंग है रमा जी कहती हैं तुमने बताया नहीं उसके पिता बीमार है उनको अस्पताल इलाज के लिए ले जाना है। बहु लापरवाही से जवाब देती है समय ही किसके पास है । शाम को देखते है कहकर दरवाजे से बाहर चली जाती है।

कैलाश जी की हालत अधिक खराब हो जाती है। तब रमा देवी एक पड़ोसी की मदद से उनको निकट के प्राइवेट क्लीनिक में दिखा दवाई दिला लाती हैं। लेकिन कैलाश जी की हालत में खास सुधार नहीं होता है। रहरह कर खांसी का दौरा चालू ही रहता है। शाम बहु बेटे आते हैं बेटा फोन करने में इतना

व्यस्त माँ को ही अनदेखा कर देता है वो बहु से कहतीं हैं अस्पताल ले चलो। बहु काम की व्यस्तता सुबह पति को टूर पर जाना कहकर बहाने बना तीन दिन बाद सन्डे की छुट्टी में ले जाने का कहकर अपने कमरे में चली जाती है।

रमा जी को जब कुछ नहीं सूझता तो वह मजबूर होकर बेटी संध्या को फोन में सारी बातें उसके पिता की हालत की जानकारी दें देती है संध्या कहती हैं पापा की तबीयत इतनी खराब और आप अब बता रहीं हैं मुझे… मैं, आती हूँ आप बिल्कुल चिंता न करें पापा ठीक हो जायेंगे । रात की ट्रेन पकड़कर

संध्या सुबह सुबह मायके पहुंच जाती है। फिर पापा को लेकर अच्छे अस्पताल में दिखाती है डाक्टर चैक कर बताता है समय से ले आये आप वरना कुछ भी हो सकता था। इनकी छाती में गम्भीर संक्रमण हो गया है ।

अगर लापरवाही करी तो गम्भीर निमोनिया भी होने में देर नहीं होगी। खान-पान पर भी सुधार करना होगा उचित देखभाल की जरूरत है। डाक्टर कुछ घंटे अपनी निगरानी में रखकर इलाज कर दवाईयां लिखकर अस्पताल से छुट्टी दे देता है। 

बेटी संध्या दो तीन दिन रूककर पिता की खूब देखभाल करती है उचित देखभाल से कैलाश जी काफी स्वस्थ हो जाते हैं तभी शाम में बेटा ऑफिस टूर से लौट आता है और बहु भी जो पति के जाते ही ऑफिस से सीधे मायके चली गई थी वो भी लौट आती है । संध्या भाई को बताती है भाई  पापा

इतने सीरियस हो गये थे क्या आपका फर्ज नहीं बनता उनकी देखभाल करने उनके स्वास्थ्य की जानकारी रखने का ? आपको पता भी नहीं उनको कितना गम्भीर इ़ंफैक्शन हो गया था। डाक्टर बता रहा था जरा भी देर होती तो उनकी जान को खतरा था। भाई नीरज बताता है वो पिछले दिनों कितना व्यस्त रहा काम का बहुत प्रेशर रहा । 

संध्या कहती हैं भाई माना की काम जरूरी है मगर माता-पिता के प्रति भी तो आपका कुछ फर्ज बनता है। उनका सम्मान उनकी जरूरतों का ध्यान रखना बुढ़ापे में आप ध्यान नहीं रखेंगे तो फिर और कौन रखेगा ? आप भूले नहीं उन्होंने बचपन में किस तरह हमारी देखभाल की है। हमारी जरूरतों का ख्याल रखा है।आज वो बुढ़ापे की तरफ बढ़ गये तो उनकी शारीरिक मानसिक देखभाल करना हमारी जिम्मेदारी बनती है।

“ भाई आज जिस छाया में हम बैठे हैं वो सब एक समय पहले माता-पिता के द्वारा किए गये प्रयास ही है “ !

फिर संध्या, भाभी उमा की तरफ देखकर बोलती है भाभी सास ससुर के साथ कम से कम बातचीत करके समय बिताना उनकी सुनना आपका फर्ज नहीं है क्या ? 

कल आपके बच्चे आपसे क्या सीखेंगे जैसा आप करेंगे ठीक वैसा ही वो आपके साथ करेंगे इंसान जैसा करता है वैसा ही उसके साथ लौटकर आता है। 

भाभी इस दुनिया में माता-पिता का प्यार ही है जो मुफ्त में मिलता है। माँ की ममता पिता का साया जिसका इस दुनिया में कोई मोल नहीं है।

संध्या कहती हैं… भाई, “ माता-पिता सास ससुर के प्रति अपना फर्ज निभाना जिम्मेदारी ही नहीं है बल्कि यह उपकारों को चुकाने उन्हें यह अहसास दिलाने का तरीका है वे हमारे जीवन में कितने महत्वपूर्ण हैं “ ।

तभी रूपा जी बेटे की तरफ देखकर बोलती है “  बेटा क्या कमी रह गई हमारी परवरिश में कम से कम इतना तो बता दो हमें  हमने तो अपनी छोटी छोटी जीत हर खास पलों का तुम्हारे साथ आनन्द लिया “ !

बेटा बच्चों की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी माता-पिता की सकारात्मकता और नजरिया है हमने तो खुले दिमाग से सदा तुमको प्रोत्साहित किया । 

तुम तीनों बच्चों की परवरिश समान रूप से ही की है। लोग कहते हैं बेटी शादी के बाद पराई हो जाती है लेकिन मैं कहुंगीं बेटी नहीं बेटे शादी के बाद पराये हो जाते हैं। जो पास रहकर भी माता-पिता से दूरी बनाए रखते हैं। बेटी दूर ससुराल में रहकर भी उनके दुख दर्द को समझती है महसूस करती है। बेटियां विनम्रता शालीनता उच्च कोटि के विचारों वाली होती है। आज मेरी बेटी न होती तो तुम्हारे पापा… कहकर रूपा देवी फूट-फूट कर रोने लगीं ।

तभी कैलाश जी जो बहुत  देर से सबको सुन रहे होते हैं, कहते है…आज बेटी ने पराई होकर भी वह कितनी अपनी है यह उसने साबित कर दिया और बेटा तुम पास होकर भी कितने पराये रहे ये तुमने साबित कर दिया।

माता-पिता की बातें सुनकर बेटा नीरज और बहु उमा काफी लज्जित होते हैं दोनों सबसे माफी मांगते हैं। नीरज पत्नी को कहता है आज के बाद माँ पापा के साथ किसी प्रकार की लापरवाही वो बर्दाश्त नहीं करेगा ‌। कैलाश जी और रूपा जी की आंखों में बेटे में सुधार देखने की लालसा साक्षात नजर आने लगती है। संध्या भी खुश होती है वो कहती हैं भाई मुझ बहन पर एक उपकार करोगे।

भाई नीरज कहता है बोल बहन कैसा उपकार मैं जरूर करूंगा तू निसंकोच बोल ।

संध्या कहती हैं आप वचन दीजिए… –

अब से माँ पापा को आप कोई शिकायत का मौका नहीं देंगे मै उनको आपके भरोसे छोड़ कर रात की ट्रेन से वापस जा रही हूँ इनका अच्छे से ध्यान रखिएगा भाई  नीरज हाँ कहते हुए बहन को गले लगा लेता है ।

कहानी का संदेशात्मक पक्ष… दुनिया में सबसे बड़ी उपाधियों में से एक है माता-पिता होना और दुनिया में सबसे बड़े आशीर्वादों में से एक है माता-पिता का होना । इसलिए जब माता-पिता जीवन के अन्तिम पड़ाव में जब वो आस भरी नजरों से अपने बच्चों की तरफ देखते हैं ऐसे में बच्चों का कर्तव्य है उनको निराश न करें आर्थिक रूप से ही नहीं शारीरिक मानसिक रूप से भरपूर सहयोग प्रदान करें पूरा पूरा आदर सम्मान दें । फिर देखना उनका वात्सल्य बच्चों के जीवन में सुरक्षा आत्मविश्वास प्रेम का कैसा आधार बनेगा ।

 लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया 

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