दिवाकर बाबू अपने ड्राइंग रूम में बेचैनी से टहल रहे थे। उनके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें थीं, जबकि कमरे का एसी पूरी ठंडक दे रहा था। सोफे के एक कोने में उनकी पत्नी, सुमति जी, सिर पकड़े बैठी थीं। घर में एक अजीब-सा भारीपन था, जैसा अक्सर तूफ़ान आने से पहले होता है।
यह सब उनके इकलौते बेटे, आर्यन की वजह से था। आर्यन, जो उनकी आँखों का तारा था, जिसने आज तक उनकी हर बात मानी थी, अपनी शादी के फैसले पर आकर अड़ गया था।
आर्यन ने जिस लड़की को चुना था, उसका नाम मीरा था। मीरा देखने में बेहद खूबसूरत, संस्कारी और पढ़ी-लिखी थी। उसने एक प्रतिष्ठित कॉलेज से पीएचडी की थी और एक कॉलेज में प्रोफेसर थी। दिवाकर बाबू और सुमति जी ने मीरा को पहले भी देखा था, एक-दो बार सामाजिक कार्यक्रमों में। तब उन्हें मीरा बहुत पसंद आई थी। सुमति जी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि “ऐसी बहू जिस घर में जाएगी, वह घर स्वर्ग बन जाएगा।”
लेकिन तब उन्हें मीरा के जीवन का वह सच नहीं पता था, जो अब आर्यन ने उनके सामने रखा था।
मीरा एक ‘तलाकशुदा’ महिला थी। और सिर्फ तलाकशुदा ही नहीं, वह एक चार साल के बेटे, ‘कबीर’ की माँ भी थी।
जब आर्यन ने पहली बार अपने माता-पिता को बताया कि वह मीरा से शादी करना चाहता है, तो घर में भूचाल आ गया था। दिवाकर बाबू ने साफ़ मना कर दिया था। “समाज क्या कहेगा? हमारा इकलौता बेटा, इंजीनियर, खानदानी परिवार… और बहू एक टूटे हुए घर से? और वो बच्चा? क्या तुम दूसरों का खून पालोगे?”
सुमति जी ने भी रो-रोकर घर सिर पर उठा लिया था। “आर्यन, तुझे कुंवारी लड़कियों की कमी है क्या? क्यों हमारी नाक कटवाने पर तुला है?”
लेकिन आर्यन अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। उसने बहुत ही शांत स्वर में कहा था, “पापा, माँ… आप लोगों ने ही मुझे सिखाया है कि इंसान के गुण देखो, उसका अतीत नहीं। मीरा की गलती क्या थी? यही कि उसकी शादी एक शराबी और हिंसक आदमी से हुई थी? उसने हिम्मत दिखाकर उस नर्क से खुद को और अपने बच्चे को निकाला। यह उसकी कमज़ोरी नहीं, उसकी ताकत है। और रही बात कबीर की, तो यशोदा ने भी तो कृष्ण को पाला था, क्या उनका प्रेम कम हो गया था?”
आर्यन ने खाना-पीना नहीं छोड़ा, न ही घर छोड़कर जाने की धमकी दी। उसने बस मौन धारण कर लिया। उसकी उदासी दिवाकर बाबू और सुमति जी से देखी नहीं गई। एक महीना बीत गया। घर का सन्नाटा काटने को दौड़ता था।
अंततः, हारकर, पुत्र मोह के आगे झुकते हुए, दिवाकर बाबू ने हामी भर दी। लेकिन मन में एक कसक, एक हार का भाव था। उन्होंने मीरा के माता-पिता, कर्नल (रिटायर्ड) वर्मा और उनकी पत्नी को आज शाम चाय पर बुलाया था ताकि “आगे की बात” की जा सके।
शाम के पांच बज चुके थे। डोरबेल बजी।
दिवाकर बाबू ने एक गहरी सांस ली और खुद को संयत किया। सुमति जी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और चेहरे पर एक औपचारिक मुस्कान ओढ़ ली।
दरवाजा खुला। सामने कर्नल वर्मा और उनकी पत्नी खड़े थे। उनके साथ मीरा नहीं थी, लेकिन उनकी गरिमा और व्यक्तित्व में एक अलग ही तेज था।
“नमस्ते, आइए,” दिवाकर बाबू ने हाथ जोड़कर स्वागत किया।
औपचारिकताओं के बाद सब ड्राइंग रूम में बैठ गए। नौकर ने चाय और नाश्ता परोसा। शुरुआत में मौसम और राजनीति की बातें हुईं, लेकिन कमरे में तनाव साफ़ महसूस किया जा सकता था। हर कोई असल मुद्दे पर आने से कतरा रहा था।
आखिरकार, कर्नल वर्मा ने चाय का कप मेज पर रखा और गला खंखारा।
“दिवाकर जी, सुमति जी,” कर्नल वर्मा की आवाज़ में फौजी अनुशासन के साथ-साथ एक पिता की विनम्रता भी थी। “हम जानते हैं कि यह निर्णय आपके लिए आसान नहीं रहा होगा। आर्यन एक हीरा है। और हम आपके आभारी हैं कि आपने हमारी बेटी को अपने घर की लक्ष्मी बनाने के बारे में सोचा।”
दिवाकर बाबू ने नज़रें नीची कर लीं। “कर्नल साहब, सच कहें तो हम पुराने ख्यालों के लोग हैं। हमारे लिए यह स्वीकार करना मुश्किल था। लेकिन आर्यन की खुशी के आगे हम झुक गए। वह मीरा के बिना जीवन बिताने को तैयार नहीं था।”
“हम समझते हैं,” मीरा की माँ ने धीरे से कहा। “मीरा का अतीत… उसके लिए एक गहरा घाव रहा है। लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, नौकरी की और अपने बेटे को अकेले पाला। हमें अपनी बेटी पर गर्व है।”
सुमति जी, जो अब तक चुप थीं, अचानक बोल पड़ीं, “गर्व तो ठीक है बहन जी, लेकिन समाज को तो जवाब हमें देना होगा न? और… और वो बच्चा? कबीर?”
यही वह प्रश्न था जो इस रिश्ते की सबसे बड़ी बाधा था।
कर्नल वर्मा ने एक पल के लिए अपनी पत्नी को देखा, फिर अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और मेज पर रख दिया।
“यह क्या है?” दिवाकर बाबू ने पूछा।
“यह कबीर के लीगल पेपर्स हैं और साथ में एक एफिडेविट है,” कर्नल वर्मा ने भारी मन से कहा। “हमने और मीरा ने इस पर बहुत विचार किया है। हम जानते हैं कि आर्यन की यह पहली शादी है। उसे अपना परिवार शुरू करने का हक़ है। कबीर… कबीर आपके लिए बोझ न बने, इसलिए मीरा ने फैसला किया है कि कबीर फिलहाल हमारे साथ, यानी नाना-नानी के पास रहेगा। आर्यन और मीरा अपनी नई शुरुआत करें। जब आप लोग सहज हो जाएंगे, तब देखा जाएगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। आर्यन, जो सीढ़ियों के पास खड़ा होकर यह सब सुन रहा था, तेजी से नीचे आया।
“यह आप क्या कह रहे हैं अंकल?” आर्यन की आवाज़ में आश्चर्य और दुख दोनों थे।
दिवाकर बाबू और सुमति जी ने एक-दूसरे को देखा। उनके मन में एक पल के लिए राहत आई थी। अगर बच्चा साथ नहीं आएगा, तो शायद समाज में बातें कम बनेंगी। शायद यह एक अच्छा समाधान था।
कर्नल वर्मा ने आर्यन की ओर देखा। “बेटा, यह मीरा का ही सुझाव था। वह नहीं चाहती कि उसके अतीत की परछाई तुम्हारे भविष्य पर पड़े। वह तुम्हारे माता-पिता का सम्मान करती है और नहीं चाहती कि उन्हें किसी भी तरह की असहजता हो।”
सुमति जी के चेहरे पर एक चमक आ गई। “यह तो… यह तो बहुत समझदारी वाली बात है। अगर ऐसा हो जाए, तो शायद रिश्तेदार भी कुछ नहीं कहेंगे। हम कह सकते हैं कि बच्चा ननिहाल में ही पलेगा।”
दिवाकर बाबू भी सिर हिलाने ही वाले थे कि तभी घर का मुख्य दरवाजा फिर से खुला।
वहाँ मीरा खड़ी थी। और उसकी उंगली थामे एक छोटा सा, गोल-मटोल बच्चा खड़ा था—कबीर।
मीरा ने एक साधारण सी सूती साड़ी पहन रखी थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक गजब का आत्मविश्वास था। कर्नल वर्मा और उनकी पत्नी हैरान रह गए। मीरा को आज नहीं आना था।
“माफ़ कीजियेगा, मैंने दरवाजा खुला देखा तो अंदर आ गई,” मीरा ने विनम्रता से कहा, फिर अपने माता-पिता की ओर मुड़ी। “पापा, मैंने आपसे कहा था न कि मैं आर्यन के घर झूठ या शर्तों की बुनियाद पर प्रवेश नहीं करूँगी।”
मीरा आगे बढ़ी और दिवाकर बाबू और सुमति जी के सामने आकर खड़ी हो गई। उसने कबीर का हाथ नहीं छोड़ा था।
“अंकल, आंटी,” मीरा की आवाज़ में कंपन नहीं, स्पष्टता थी। “मैं आर्यन से बहुत प्यार करती हूँ। मैं उनका और आप दोनों का बहुत सम्मान करती हूँ। लेकिन मैं एक माँ भी हूँ। कबीर कोई सामान नहीं है जिसे मैं अपनी सुविधा के अनुसार कहीं छोड़ दूँ या बाद में ले लूँ। वह मेरा हिस्सा है।”
सुमति जी ने मुंह फेर लिया। दिवाकर बाबू असहज हो गए।
मीरा ने आगे कहा, “मैंने आर्यन से शादी करने के लिए हाँ इसलिए नहीं कहा कि मुझे ‘सहारे’ की ज़रूरत है। मैं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हूँ। मैंने हाँ इसलिए कहा क्योंकि आर्यन ने मेरे बेटे को भी उतना ही प्यार दिया जितना मुझे। लेकिन अगर इस घर में मेरे बेटे के लिए जगह नहीं है, तो अफ़सोस… मेरे लिए भी जगह नहीं हो सकती। मैं अपने बेटे को अनाथ महसूस कराकर सुहागन नहीं बन सकती।”
आर्यन मीरा के बगल में आकर खड़ा हो गया और उसने कबीर का दूसरा हाथ थाम लिया। “पापा, माँ… मैंने आपसे कहा था कि मैं मीरा को अपनाना चाहता हूँ। और मीरा का मतलब है—मीरा और कबीर। ये दोनों एक पैकेज हैं। आप आधे को स्वीकार नहीं कर सकते।”
माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। कर्नल वर्मा अपनी बेटी की दृष्टता के लिए माफ़ी मांगने ही वाले थे कि तभी एक छोटी सी घटना घटी।
कबीर, जो अब तक चुपचाप सब देख रहा था, अचानक सुमति जी की ओर बढ़ा। सुमति जी के हाथ में एक रुमाल था जो गिर गया था। कबीर ने उसे उठाया और अपनी तोतली आवाज़ में बोला, “दादी, आपका रुमाल।”
‘दादी’।
यह शब्द सुमति जी के कानों में पिघले हुए शहद की तरह उतरा। उन्होंने कबीर को देखा। उसकी बड़ी-बड़ी मासूम आँखें, घुंघराले बाल… सुमति जी को अचानक आर्यन का बचपन याद आ गया। आर्यन भी बचपन में बिल्कुल ऐसा ही दिखता था। वही आँखें, वही मासूमियत।
सुमति जी का हाथ अपने आप आगे बढ़ा और उन्होंने रुमाल ले लिया। कबीर मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में कोई छल नहीं था, कोई अतीत नहीं था, कोई ‘तलाक’ का ठप्पा नहीं था। बस एक निश्छल प्रेम था।
“तुम्हारा नाम कबीर है?” सुमति जी ने अनजाने में ही पूछ लिया।
“जी, और मुझे पेंटिंग करना पसंद है,” कबीर ने उत्साह से बताया। “मैंने आपके लिए एक कार्ड बनाया है। माँ ने कहा था हम आज दादा-दादी के घर जा रहे हैं।”
कबीर ने अपनी छोटी सी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ निकाला और सुमति जी की गोद में रख दिया। उस पर टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों से तीन लोग बने थे और लिखा था – ‘हैप्पी फैमिली’।
दिवाकर बाबू भी यह सब देख रहे थे। उनकी नज़र उस कागज़ पर पड़ी। उनका कठोर दिल, जो समाज के डर से पत्थर हो गया था, इस निश्छलता के आगे पिघलने लगा। उन्होंने सोचा, “हम किस समाज से डर रहे हैं? वो समाज जो मुसीबत में कभी साथ नहीं देता? या हम अपनी खुशियों का गला घोंट रहे हैं?”
उन्होंने आर्यन की तरफ देखा। आर्यन की आँखों में एक याचना थी, लेकिन साथ ही एक दृढ़ता भी थी कि वह सही कर रहा है।
दिवाकर बाबू अपनी जगह से उठे। उन्होंने कर्नल वर्मा के सामने रखे उस ‘लीगल पेपर्स’ वाले लिफाफे को उठाया।
सबकी सांसें थम गईं। मीरा को लगा कि अब उन्हें जाने को कह दिया जाएगा।
दिवाकर बाबू ने उस लिफाफे को धीरे-धीरे फाड़ दिया।
“दिवाकर जी?” कर्नल वर्मा चौंक गए।
दिवाकर बाबू मुस्कुराए, एक बोझ मुक्त मुस्कान। “कर्नल साहब, जब हम दुकान से कोई कीमती चीज़ लाते हैं, तो उसके साथ मिलने वाले उपहार को दुकान पर नहीं छोड़ते। कबीर कोई शर्त नहीं है, वह तो ईश्वर का दिया हुआ बोनस है।”
सुमति जी की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने कबीर को अपनी गोद में उठा लिया। “अरे, यह तो बिल्कुल आर्यन जैसा भारी है। इसे तो बहुत खिलाना-पिलाना पड़ेगा।”
मीरा रो पड़ी। उसने झुककर दिवाकर बाबू और सुमति जी के पैर छुए। सुमति जी ने उसे उठाया और गले लगा लिया।
“पगली,” सुमति जी ने आंसू पोंछते हुए कहा, “माँ अपने बच्चे को छोड़ सकती है क्या? तूने सही कहा, जो माँ अपने बच्चे की नहीं हो सकती, वो अच्छी बहू क्या बनेगी? हमें गर्व है कि हमारी बहू में इतनी ममता और स्वाभिमान है।”
आर्यन ने राहत की सांस ली। घर का वह भारीपन, वह तनाव, सब खिड़की से बाहर उड़ गया था।
दिवाकर बाबू ने कर्नल वर्मा से कहा, “वर्मा जी, शादी की तारीख पक्की कीजिये। और हाँ, कार्ड पर कबीर का नाम भी पोते के रूप में छपेगा। दुनिया को जो कहना है कहने दीजिये। आज मुझे समझ आ गया है कि परिवार खून से नहीं, बल्कि एहसास और अपनापन से बनता है।”
उस शाम ड्राइंग रूम में फिर से चाय का दौर चला, लेकिन इस बार खामोशी नहीं थी। कबीर की खिलखिलाहट थी, सुमति जी की हिदायतें थीं कि “बच्चे को क्या खिलाना है,” और दिवाकर बाबू और कर्नल वर्मा के बीच पुरानी फौजी कहानियों का दौर था।
मीरा ने आर्यन की तरफ देखा और आँखों ही आँखों में शुक्रिया कहा। आर्यन मुस्कुराया। उसने न केवल अपना प्यार पाया था, बल्कि अपने माता-पिता को भी एक पुरानी, रूढ़िवादी सोच से आज़ाद कर दिया था।
उस दिन उस घर में सिर्फ एक बहू का ही नहीं, एक नन्हे पोते का भी गृह-प्रवेश हुआ था, जिसने अपनी मासूमियत से रिश्तों की एक नई परिभाषा लिख दी थी। और कहानी पढ़ने पर लगता है कि कभी-कभी बच्चों की छोटी सी मुस्कान बड़ों के बड़े-बड़े अहंकार को हराने के लिए काफी होती है।
लेखक : मुकेश पटेल