बेटा हो तो ऐसा – लतिका श्रीवास्तव 

जब दोनों बड़े बेटों के बाद सबसे छोटे बेटे ने भी माता पिता से अलग होने का फैसला ले लिया..

शाम की आरती का वक़्त हो चला था, लेकिन ‘रघुनाथ विला’ के बड़े से हॉल में अगरबत्ती की खुशबू के बजाय एक भारी मनहूसियत तैर रही थी। दीवार घड़ी की टिक-टिक हथौड़े जैसी लग रही थी। सोफे के एक कोने पर रघुनाथ जी सिर पकड़े बैठे थे और दूसरे कोने पर उनकी पत्नी, जानकी देवी, साड़ी के पल्लू से बार-बार अपनी नाक पोंछ रही थीं।

उनके सामने उनका सबसे छोटा बेटा, कबीर, खड़ा था। उसके पैरों के पास दो बड़े सूटकेस रखे थे। यह दृश्य इस घर के लिए नया नहीं था, लेकिन इस बार इसका दर्द पिछले दो बार से कहीं ज्यादा गहरा और अलग था।

पाँच साल पहले बड़ा बेटा, अर्नव, अमेरिका जाने के नाम पर घर छोड़ गया था। तब रघुनाथ जी ने गर्व से सीना चौड़ा किया था।

तीन साल पहले मंझला बेटा, विवान, अपनी पत्नी के साथ मुंबई शिफ्ट हो गया था क्योंकि उसे अपनी ‘प्राइवेसी’ चाहिए थी। तब जानकी देवी बहुत रोई थीं, लेकिन रघुनाथ जी ने उन्हें यह कहकर चुप करा दिया था—”कोई बात नहीं जानकी, कबीर तो है। यह हमारा श्रवण कुमार है। यह कहीं नहीं जाएगा।”

और आज… आज वही कबीर, उनका ‘श्रवण कुमार’, उनके सामने खड़ा होकर कह रहा था, “पापा, मैंने बैंगलोर में जॉब ज्वाइन कर ली है। मेरी फ्लाइट आज रात की है।”

रघुनाथ जी ने धीरे से सिर उठाया। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक टूटे हुए विश्वास की किरचें थीं।

“कबीर… तू भी? बेटा, हमें लगा था कि अर्नव और विवान के जाने के बाद कम से कम तू इस बूढ़े घर की लाठी बनेगा। तुझे किस चीज़ की कमी थी यहाँ? हमारा व्यापार अच्छा चल रहा है, घर इतना बड़ा है… तुझे नौकरी करने की क्या ज़रूरत आ पड़ी वो भी इतनी दूर?”

कबीर ने अपनी मुट्ठियाँ भींचीं। उसे पता था कि यह पल आसान नहीं होगा।

“पापा, बात नौकरी की नहीं है। बात सांस लेने की है,” कबीर ने बहुत धीमे स्वर में कहा।

जानकी देवी तड़प उठीं, “सांस लेने की? क्या हम तेरा गला घोंट रहे थे बेटा? मैंने तो कभी तुझे एक गिलास पानी उठाने को नहीं कहा। तेरी पसंद का खाना, तेरे कपड़े, तेरी हर ज़रूरत का ख्याल मैं अपनी बीमारी में भी रखती आई हूँ। क्या इसी दिन के लिए?”

कबीर घुटनों के बल अपनी माँ के पास बैठ गया। उसने माँ के झुर्रियों भरे हाथ अपने हाथों में लिए।

“माँ, यही तो समस्या है। आप अपनी बीमारी में भी मेरा ख्याल रखती हैं, लेकिन अपना ख्याल कब रखेंगी? पापा व्यापार छोड़कर घर में बैठे रहते हैं सिर्फ इसलिए कि मैं घर पर हूँ और मुझे ‘कंपनी’ चाहिए। आप दोनों ने अपनी ज़िंदगी जीना छोड़ दिया है, सिर्फ मेरे लिए।”

रघुनाथ जी कड़ककर बोले, “ये कैसी बेतुकी बातें कर रहा है? माता-पिता बच्चों के लिए ही तो जीते हैं। यही तो हमारा धर्म है।”

“नहीं पापा,” कबीर खड़ा हो गया। उसकी आवाज़ में अब एक दृढ़ता थी। “यह धर्म नहीं, यह एक ‘सुरक्षित जेल’ है। जब तक भैया लोग यहाँ थे, घर में शोर था, ज़िंदगी थी। उनके जाने के बाद, आप दोनों ने मुझे अपनी जीने की वजह बना लिया। आप दोनों मुझसे प्यार नहीं करते, आप दोनों अपने अकेलेपन से डरते हैं और मुझे उस डर के आगे ढाल बनाकर खड़ा कर दिया है।”

कबीर की बातें कड़वी थीं, किसी तेज़ दवा की तरह। रघुनाथ जी सन्न रह गए।

कबीर ने दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर की ओर इशारा किया। तस्वीर में रघुनाथ जी हाथ में वायलिन लिए हुए थे और जानकी देवी तानपूरा।

“पापा, याद है आखिरी बार आपने वायलिन कब बजाया था? पंद्रह साल हो गए। क्यों? क्योंकि बच्चों की पढ़ाई थी, फिर बच्चों की शादी थी, फिर बच्चों का करियर था। और माँ… आपको पेंटिंग का शौक था न? पिछले दस सालों में आपने ब्रश नहीं उठाया क्योंकि ‘कबीर को समय पर खाना देना है’।”

कबीर की आवाज़ भारी हो गई। “मैं देख रहा हूँ कि मैं आप दोनों के बीच की कड़ी नहीं, बल्कि दीवार बन गया हूँ। जब तक मैं इस घर में हूँ, आप दोनों पति-पत्नी नहीं, सिर्फ ‘कबीर के मम्मी-पापा’ बनकर रह जाएंगे। माँ दिन भर रसोई में खटेंगी और आप दिन भर मेरी भविष्य की चिंता में घुलेंगे। मैं आप दोनों को और बूढ़ा होते हुए नहीं देख सकता।”

जानकी देवी रो रही थीं, लेकिन अब उनके आंसुओं में सवाल थे। क्या कबीर सच कह रहा था?

“तो तू हमें अकेला छोड़ देगा? मरने के लिए?” रघुनाथ जी ने कांपते स्वर में पूछा।

“नहीं पापा, मैं आपको ‘जीने’ के लिए छोड़ रहा हूँ,” कबीर ने अपना बैग उठाया। “मैं जा रहा हूँ ताकि आप दोनों एक-दूसरे को वापस पा सकें। उस समय को पा सकें जो आपने हम तीन भाइयों को बड़ा करने में खर्च कर दिया। यह घर बहुत बड़ा है पापा, इसे आदमियों से नहीं, यादों और संगीत से भरने की ज़रूरत है।”

कबीर ने झुककर दोनों के पैर छुए। रघुनाथ जी ने हाथ नहीं उठाया, वे पत्थरवत बैठे रहे। जानकी देवी ने उसे रोकने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन फिर खींच लिया। शायद कबीर की बातों ने उनके अंतर्मन के किसी सोए हुए तार को छेड़ दिया था।

कबीर चला गया। टैक्सी की आवाज़ दूर होती गई और फिर सन्नाटा छा गया।

रघुनाथ विला अब वाकई खाली था।

अगले एक हफ्ते तक घर में मातम जैसा माहौल रहा। जानकी देवी ने खाना बनाना कम कर दिया, रघुनाथ जी बरामदे में बैठकर अखबार को घूरते रहते। दोनों एक-दूसरे से बात करने से कतराते थे, क्योंकि अब उनके पास बात करने का कोई ‘कॉमन टॉपिक’ (कबीर) नहीं बचा था।

दसवें दिन की शाम, बिजली चली गई। इन्वर्टर खराब था। पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

रघुनाथ जी ने अपनी आदत के अनुसार आवाज़ लगाई, “कबीर, ज़रा टॉर्च तो…” और फिर चुप हो गए। कबीर नहीं था।

जानकी देवी रसोई से मोमबत्ती लेकर आईं और सेंटर टेबल पर रख दी।

दोनों मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में सोफे पर आमने-सामने बैठे थे। सन्नाटा काटने को दौड़ रहा था।

अचानक रघुनाथ जी बोले, “जानकी, तुम्हें याद है हमारी शादी के बाद पहली बार जब हम नैनीताल गए थे, तो वहां भी ऐसे ही लाइट चली गई थी?”

जानकी देवी ने चौंककर पति को देखा। सालों बाद उन्होंने ‘बच्चों’ के अलावा किसी और विषय पर बात छेड़ी थी।

एक हल्की सी मुस्कान जानकी के होठों पर आई। “हाँ, याद है। तब आपने मुझे भूत की कहानियां सुनाकर डरा दिया था।”

“और तुम डर के मारे मेरा हाथ पकड़कर बैठ गई थी,” रघुनाथ जी हंसे। उनकी हंसी में जंग लगी हुई थी, पर वह निकली ज़रूर।

“मुझे डर नहीं लगा था,” जानकी देवी ने अपनी साड़ी ठीक करते हुए कहा, “मैं तो बस देखना चाहती थी कि आप मुझे बचाते हैं या खुद भाग जाते हैं।”

उस रात मोमबत्ती बुझने तक वे दोनों बातें करते रहे। कबीर के बारे में नहीं, अर्नव या विवान के बारे में नहीं। बल्कि अपने बारे में।

अगले दिन सुबह, रघुनाथ जी ने एक अजीब काम किया। वे स्टोर रूम में गए और धूल से भरा वायलिन केस निकाल लाए। उन्होंने उसे साफ किया और तार कसने लगे।

जानकी देवी ने देखा, तो हैरान रह गईं। “ये क्या कर रहे हैं?”

“कबीर कह रहा था कि मैंने पंद्रह साल से इसे नहीं छुआ। सोच रहा हूँ देखूँ कि उंगलियाँ अभी भी चलती हैं या नहीं। और सुनो… तुम वो कैनवास और रंग मंगवा लो। यह घर बहुत सफ़ेद और फीका लग रहा है।”

महीने बीतते गए। रघुनाथ विला का स्वरूप बदलने लगा। जिस घर में पहले सिर्फ बर्तनों की खड़खड़ाहट और टीवी की आवाज़ गूंजती थी, अब वहां शाम को वायलिन की धुन सुनाई देती थी। दीवारों पर जानकी देवी की बनाई हुई पेंटिंग्स टंगने लगी थीं।

वे दोनों अब सुबह की सैर पर साथ जाते, पार्क में बैठते और घंटों बातें करते। उन्होंने पाया कि कबीर सही था। बच्चों की जिम्मेदारी ने उन्हें एक-दूसरे से दूर कर दिया था। वे एक मशीन बन गए थे जिनका काम सिर्फ ‘देना’ था। अब जब लेने वाला कोई नहीं था, तो उन्होंने खुद को देना शुरू किया।

छह महीने बाद कबीर घर आया। वह थोड़ा डरा हुआ था। उसे लगा था कि उसे माता-पिता का उतरा हुआ चेहरा और ताने मिलेंगे।

लेकिन जब उसने गेट खोला, तो वह दंग रह गया।

बरामदे में जानकी देवी एक कैनवास पर रंग भर रही थीं और रघुनाथ जी पास बैठकर उन्हें चाय पिला रहे थे—अपने हाथ से बनी चाय। दोनों हंस रहे थे। उनके चेहरों पर वो झुर्रियां तो थीं, लेकिन उनमें अब चिंता की लकीरें नहीं, सुकून की चमक थी।

कबीर को देखते ही जानकी देवी दौड़ीं, “अरे मेरा बच्चा आ गया!”

रघुनाथ जी भी मुस्कुराए। उन्होंने कबीर को गले लगाया।

“कैसा है तू?”

“मैं ठीक हूँ पापा। आप दोनों…?” कबीर ने आश्चर्य से पूछा।

“हम? हम बहुत बढ़िया हैं,” रघुनाथ जी ने पत्नी की ओर देखकर आँख मारी। “तेरी माँ अब इतना अच्छा पेंट करती है कि कल इसकी एक पेंटिंग पड़ोस के शर्मा जी ने खरीद ली। और मैंने अगले महीने कश्मीर ट्रिप प्लान की है, सिर्फ हम दोनों के लिए।”

कबीर की आँखों में आंसू आ गए। उसने देखा कि ‘रघुनाथ विला’ अब ‘वृद्धाश्रम’ जैसा नहीं लग रहा था, बल्कि एक ‘हनीमून कॉटेज’ जैसा लग रहा था।

रात के खाने पर, कबीर ने देखा कि माँ ने खाना बनाया था, लेकिन परोसने का काम पापा कर रहे थे।

“पापा, आप?” कबीर ने पूछा।

“हाँ बेटा, तेरी माँ थक जाती है। और वैसे भी, अब हम ‘पार्टनर्स’ हैं, सिर्फ पति-पत्नी नहीं,” रघुनाथ जी ने गर्व से कहा।

खाना खाते हुए कबीर ने कहा, “पापा, बैंगलोर में मेरा प्रोजेक्ट खत्म होने वाला है। मैं सोच रहा था कि वापस यहीं शिफ्ट हो जाऊँ…”

कमरे में सन्नाटा छा गया। कबीर ने सोचा था कि वे खुशी से उछल पड़ेंगे।

लेकिन रघुनाथ जी और जानकी देवी ने एक-दूसरे को देखा। फिर रघुनाथ जी ने गला खंखारा।

“बेटा कबीर,” उन्होंने प्यार से लेकिन दृढ़ता से कहा, “तू यहाँ जब चाहे आ सकता है, यह तेरा घर है। छुट्टियां बिता, त्योहार मना। लेकिन… वापस शिफ्ट मत होना।”

“क्यों?” कबीर हैरान था।

“क्योंकि,” जानकी देवी ने मुस्कुराते हुए कबीर का हाथ थाम लिया, “क्योंकि अगर तू वापस आ गया, तो मैं फिर से सिर्फ ‘माँ’ बन जाऊँगी और ये सिर्फ ‘पापा’। हम फिर से तेरी थाली परोसने और तेरे कपड़े धोने में लग जाएंगे। हम भूल जाएंगे कि हम ‘रघुनाथ और जानकी’ भी हैं। हमें हमारी यह नई आज़ादी और यह नया रिश्ता बहुत प्यारा है बेटा। तू अपनी दुनिया में उड़, हमें हमारी दुनिया में उड़ने दे।”

कबीर हंस पड़ा। उसकी हंसी में एक संतोष था। उसने जो जुआ खेला था, वह जीत गया था। उसने अपने माता-पिता से अलग होने का फैसला इसलिए नहीं लिया था कि वह उनसे दूर होना चाहता था, बल्कि इसलिए लिया था ताकि वे एक-दूसरे के करीब आ सकें।

“ठीक है पापा, ठीक है माँ,” कबीर ने कहा। “मैं मेहमान बनकर ही आऊँगा।”

अगली सुबह जब कबीर वापस जा रहा था, तो उसे विदा करने के लिए रघुनाथ जी और जानकी देवी गेट तक आए। उनकी आँखों में अब बिछड़ने का गम नहीं था, बल्कि एक आत्मनिर्भरता का तेज था।

कबीर ने गाड़ी के शीशे से पीछे देखा। गेट पर खड़े वो दो बुजुर्ग अब ‘बेचारे’ नहीं लग रहे थे। वे एक सम्पूर्ण इकाई लग रहे थे।

उसने मन ही मन सोचा, “अक्सर बच्चे घर छोड़ते हैं तो घर टूट जाते हैं। लेकिन कभी-कभी घर छोड़ने से ही घर बसते हैं।”

गाड़ी मोड़ पर मुड़ गई, लेकिन पीछे वायलिन की एक मीठी धुन हवा में तैर रही थी, जो बता रही थी कि जीवन का असली संगीत जिम्मेदारियां खत्म होने के बाद ही शुरू होता है।

मूल लेखिका 

लतिका श्रीवास्तव 

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