बहती गंगा में हाथ धोना – शनाया अहम 

बात उन दिनों की है जब राधिका कॉलेज में पढ़ रही थी, ये उसका कॉलेज का पहला ही साल था। राधिका पढ़ाई में तो होशियार थी ही, वो पाक कला में भी निपुण थी। उसके हाथ में जादू था और हर तरह का खाना वो मिनटों–सेकेंडों में बना देती थी। जो भी उसका बनाया खाना खाता था, अपनी उँगलियाँ चाटता रह जाता था। सारे खानदान में उसके बनाए खाने की तारीफें होती थीं।

हालाँकि राधिका के पिता उसे रसोई से ज़्यादा पढ़ाई में समय देने की हिदायत देते थे, इसलिए राधिका अपना ज़्यादा समय तो पढ़ाई में ही लगाती थी, पर बीच–बीच में वो नए–नए देसी–विदेशी पकवान बनाती रहती थी। कभी संडे को वो पास्ता की नई रेसिपी ट्राय करती, तो कभी किसी त्योहार पर अपने हाथों के लड्डू और गुझिया से घर महका देती। पड़ोस की आंटियाँ भी कहतीं, “अरे त्रिशला जी, आपकी बेटी तो सच में अन्नपूर्णा है!” और त्रिशला जी मुस्कुराकर बेटी का माथा चूम लेतीं।

माता–पिता की एकलौती संतान राधिका का सपना पढ़–लिखकर कुछ बनने का था, इसलिए वो पढ़ाई में जी–तोड़ मेहनत करती थी। सुबह कॉलेज, शाम को लाइब्रेरी, और रात को नोट्स—यही उसका रूटीन था। फिर भी जब मन हल्का करना होता, वो किचन में चली जाती। मसालों की खुशबू, तवे की सोंधी आवाज़, और चम्मच की खनक उसे सुकून देती। जैसे किचन उसके लिए सिर्फ खाना बनाने की जगह नहीं, एक छोटा-सा संसार था जहाँ वो अपने मन की थकान उतार देती थी।

सब कुछ सही चल रहा था लेकिन अचानक राधिका के पिता अजय जी को मेजर हार्ट अटैक आने से सब कुछ बिखर गया। मुश्किल से अजय जी की जान बच पाई लेकिन अजय जी बिस्तर से लग गए। उस दिन घर में जैसे समय थम गया था। एम्बुलेंस की सायरन, अस्पताल के कॉरिडोर की दौड़, डॉक्टरों के चेहरे की गंभीरता—ये सब दृश्य राधिका के दिमाग में बार-बार घूमने लगे। त्रिशला जी का हाथ काँप रहा था, राधिका की आँखें डर से सूख गई थीं।

अजय जी के बिस्तर से लगते ही उनके बिज़नेस में घाटा होना शुरू हो गया और उनका पार्टनर भी उन्हें धोखा दे गया। जो हिसाब-किताब अजय जी खुद संभालते थे, अब वह सब कागजों में उलझने लगा। कुछ पेमेंट रुक गए, कुछ क्लाइंट्स पीछे हट गए, और फिर खबर आई कि पार्टनर ने अपना हिस्सा निकालकर अलग रास्ता चुन लिया है।

इधर वो नाते–रिश्तेदार जो अजय जी के अच्छे वक़्त में उनके आगे–पीछे घूमते थे, वही सब आज उनके बुरे वक़्त में उनसे पल्ला झाड़ने लगे। कोई फोन उठाकर कह देता, “अभी मैं बाहर हूँ, बाद में बात करेंगे,” और बाद में फोन कभी नहीं आता। कोई मिलने आता भी तो औपचारिक दो शब्द बोलकर जल्दी निकल लेता, जैसे ज्यादा देर रुक गया तो जिम्मेदारी उसके सिर पर न आ जाए।

घर की आर्थिक हालत दिन–ब–दिन कमज़ोर होती जा रही थी और अजय जी का इलाज भी काफ़ी महंगा था। दवाइयाँ, टेस्ट, फॉलो-अप, और घर का खर्च—सब मिलकर त्रिशला जी के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर रहे थे। राधिका ने देखा कि माँ अब हर खर्च सोच–समझकर करती हैं। दूध वाला आता तो माँ हिसाब करतीं, सब्जीवाला आता तो माँ मोल-भाव और ज्यादा करने लगीं।

राधिका और उसकी माँ त्रिशला अपने घर की इस हालत से बेहद दुखी हो गए, लेकिन अजय जी के सामने वो कुछ भी ज़ाहिर नहीं करते थे। अजय जी बिस्तर पर थे, उनका मन पहले ही टूट रहा था। ऐसे में त्रिशला और राधिका मुस्कान ओढ़कर उनके सामने बैठतीं, जैसे सब सामान्य हो। पर रात में जब अजय जी सो जाते, तब राधिका माँ के पास बैठकर धीरे से कहती, “माँ, हम कुछ न कुछ कर लेंगे… आप घबराइए मत।” और त्रिशला जी बेटी को सीने से लगा लेतीं।

एक दिन अजय जी ने जैसे मन की बात खोल ही दी। बिस्तर पर लेटे-लेटे उन्होंने भारी आवाज़ में कहा—
“राधिका, त्रिशला… मैं जानता हूँ कि मैंने जबसे बिस्तर पकड़ लिया है, क्या कुछ हुआ है और हमारे घर के हालात ख़राब होते जा रहे हैं, ऊपर से मेरे इलाज पर भी एक मोटी रकम ख़र्च हो रही है। इससे तो अच्छा होता मैं न रहता, कम से कम मुझ पर इतने पैसे तो न लगते।”

उनकी आँखें भर आईं। शब्द दर्द में डूबे हुए थे।

“नहीं,” त्रिशला जी तुरंत उनके पास झुक गईं, “ये आप क्या कह रहे हैं, आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं? भगवान ने अच्छे दिन वापस ले लिए तो बुरे दिन भी वापस ले लेगा।” त्रिशला जी अपने पति का हाथ थामकर बोलीं।

राधिका भी अपने माँ–पापा का हौसला बढ़ाते हुए बोली, “जो होता है अच्छे के लिए होता है। हमारे बुरे वक़्त में कम से कम हमें ये तो पता चल गया कि सब मतलब के रिश्ते थे, मतलब के लोग थे। सब बहती गंगा में हाथ धोने वाले थे और हमें ऐसे रिश्ते, ऐसे लोग नहीं चाहिए।”

राधिका की आवाज़ में दृढ़ता थी। उसने आगे कहा, “हमारा बुरा वक़्त हमें ख़ुद ही दूर करना होगा।” इतना कहकर राधिका ने मन ही मन कुछ सोचा और उठ खड़ी हुई।

उस रात राधिका देर तक जागती रही। उसे याद आया कि उसके पिता हमेशा कहते थे—“बेटी, मेहनत कभी खाली नहीं जाती।” और उसे यह भी याद आया कि लोग उसके हाथ के खाने की कितनी तारीफ करते हैं। वह सोचने लगी—“अगर मैं अपने हाथ के हुनर को एक काम में बदल दूँ… तो?”

सुबह होते ही उसने पापा से वादा किया कि वह पढ़ाई को अनदेखा नहीं करेगी। फिर उसने वही बात जो मन में ठानी थी, माँ से साझा की। त्रिशला जी ने पहले तो चिंता जताई—“बेटा, ये सब संभाल पाएगी?” मगर राधिका के चेहरे की दृढ़ता देखकर उन्हें भी विश्वास होने लगा।

अपने पिता से पढ़ाई को अनदेखा न करने का वादा करके राधिका ने अपने घर से ही खाने के टिफ़िन का कारोबार शुरू किया, इस काम में उसकी माँ ने भी उसका साथ दिया। शुरुआत छोटी थी—बस दो-तीन टिफिन। राधिका ने तय किया कि खाना ऐसा होगा जैसे घर में बनता है—साफ, स्वादिष्ट और प्यार से भरा।

राधिका खाना बनाने में अन्नपूर्णा तो थी ही, उसके हाथ का टिफ़िन लोगों को बहुत पसंद आया। नित नए व्यंजनों से सजा टिफ़िन धीरे–धीरे हर जगह फेमस होने लगा। उसने किसी दिन राजमा–चावल के साथ खास सलाद भेजा, किसी दिन कढ़ी–खिचड़ी में स्वाद का अलग तड़का लगाया, तो किसी दिन पुलाव के साथ रaita की ऐसी तैयारी की कि लोगों ने तारीफों के पुल बांध दिए।

ऑफिसों, हॉस्टलों, PG आदि में उसके टिफ़िन की डिमांड लगातार बढ़नी शुरू हो गई। पहले तो राधिका ख़ुद ही स्कूटी से टिफ़िन डिलीवर करती थी। सुबह कॉलेज जाने से पहले कुछ टिफिन दे आती, शाम को बाकी डिलीवरी करती। कई बार तो थककर उसके हाथ काँपने लगते, पर मन नहीं हारता।

लेकिन अब बढ़े हुए काम को देखकर उसने 2 डिलिवरी बॉय भी रख लिए और घर के पीछे की जगह में एक छोटा सा ढाबा खोल लिया, जहाँ टिफ़िन के साथ-साथ राहगीरों को भी स्वादिष्ट खाना मिलने लगा। ढाबा छोटा था, लेकिन साफ-सुथरा। बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लग गया—“राधिका का घर जैसा खाना।”

धीरे-धीरे ढाबे पर भीड़ होने लगी। लोगों को स्वाद पसंद आता, और उससे ज्यादा पसंद आता राधिका का अपनापन। वह हर ग्राहक से मुस्कुराकर बात करती, पूछती—“खाना कैसा लगा?” और कोई कह देता, “बिटिया, आज दाल में वही घर वाला स्वाद था।” तो राधिका का मन भर आता।

कुछ और वक़्त बीता और अब ढाबे ने एक रेस्टॉरेंट का रूप लिया। ढाबे में जो लोग आते, वे दूसरों को लाते। टिफिन वाले ग्राहक अब ढाबे में बैठकर खाना खाने लगे। राधिका ने मेहनत करके अपनी कमाई बचाई और फिर बड़े कदम का फैसला किया।

राधिका ने शहर में एक जगह लेकर अपने रेस्टॉरेंट की नींव रखी। यह उसके लिए सपना था—पर अब सपना सच बनता दिख रहा था। वह दिन भी आया जब नए रेस्टॉरेंट की दीवारों पर पेंट हुआ, कुर्सियाँ लगीं, किचन सेट हुआ।

अब तक उसके पास काफ़ी पैसे भी जमा हो चुके थे और पापा की हालत में भी सुधार होने लगा था। अजय जी की आँखों में फिर से चमक लौटने लगी। वे बिस्तर से उठकर बैठने लगे, फिर धीरे-धीरे चलने भी लगे। एक दिन उन्होंने राधिका को काम करते देखा तो उनकी आँखें नम हो गईं।

आज अपने माँ–पापा के हाथों राधिका ने अपने रेस्टॉरेंट का उद्घाटन कराया। उद्घाटन के दिन राधिका ने एक नई साड़ी पहनी, माँ ने आरती की थाली सजाई, और पापा ने काँपते हाथों से नारियल फोड़ा। अपनी बेटी की लगन और मेहनत को देखकर माँ–पापा की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए।

राधिका की मेहनत और खाने के स्वाद से लोगों में राधिका के रेस्टॉरेंट की लोकप्रियता बढ़ती चली गई और पढ़ाई पूरी होने से पहले ही राधिका की गिनती एक सफ़ल बिज़नेस वीमेन के रूप में होने लगी। अखबार में छोटी-सी खबर भी छपी—“कॉलेज स्टूडेंट ने खड़ा किया सफल रेस्टॉरेंट।” पड़ोस और रिश्तेदारों में चर्चा होने लगी—“देखो, अजय जी की बेटी ने कमाल कर दिया।”

घर के हालात सुधर चुके थे। अजय जी भी पूरी तरह स्वस्थ होकर रेस्टॉरेंट में बैठने लगे थे। वे अब काउंटर पर बैठकर हिसाब देखते, कभी-कभी ग्राहकों से बात करते। राधिका की पढ़ाई भी पूरी हो गई। उसने कॉलेज में टॉप किया। कुल मिलाकर राधिका ने अपने परिवार पर छाये बुरे वक़्त के बादलों को अपनी लगन और मेहनत के बलबूते छांट दिया था।

लेकिन ज़िंदगी का एक और रंग बाकी था। बुरे वक़्त में जो नाते रिश्तेदार मुँह मोड़ने लगे थे, वो आज फिर से आना-जाना शुरू करने लगे थे। कोई मिठाई लेकर आता, कोई कहता—“हम तो शुरू से जानते थे ये लड़की कुछ करेगी।” किसी की बातें सुनकर राधिका के भीतर गुस्सा भी आता और हँसी भी।

इतना ही नहीं, एक रिश्तेदार तो राधिका के लिए अपने बेटे का रिश्ता भी ले आया। अब वही लोग जिनका फोन बुरे वक्त में नहीं उठता था, वे रिश्तेदारी का दम भरने लगे थे। राधिका से इन रिश्तेदारों का ये चरित्र बर्दाश्त नहीं हो रहा था, पर वो कुछ सोचकर चुप थी। वह जानती थी—सिर्फ नाराज होने से कुछ नहीं बदलता, उन्हें आईना दिखाना जरूरी है।

राधिका ने कुछ सोचकर कुछ दिनों बाद रेस्टॉरेंट खुलने की ख़ुशी में एक पार्टी रखी और सारे रिश्तेदारों, मिलने-जुलने वालों को बुलाया। निमंत्रण सुनकर सब खुशी-खुशी आ गए। कुछ ने सोचा—“अब तो पहचान बढ़ेगी।” कुछ ने सोचा—“अजय जी के घर से जुड़ना फायदे का है।”

पार्टी चल रही थी। रेस्टॉरेंट सजा हुआ था, टेबल पर स्वादिष्ट व्यंजन थे, और लोग खाते हुए तारीफ कर रहे थे। तभी कुछ देर बाद राधिका स्टेज पर गई और उसने माइक लेकर बोलना शुरू किया—

“मेरे प्यारे रिश्तेदारों, जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि मेरे मम्मी पापा के आशीर्वाद से मैंने ये रेस्टॉरेंट खोला है जिसकी लोकप्रियता आप हर जगह देख ही रहे हो, और साथ ही मैंने अपने कॉलेज में भी टॉप किया है। ये सब मुमकिन हो सका है मम्मी पापा के मुझ पर विश्वास और हर क़दम पर मेरा सहयोग करने से।”

हॉल में तालियाँ बजने लगीं। लेकिन राधिका रुकी नहीं। उसकी आवाज़ अब गंभीर हो गई।

“हमारा बुरा वक़्त आया और चला गया, लेकिन हमें ये दिखा गया कि कौन हमारा अपना है और कौन पराया। हमारा बुरा वक़्त हमारे अच्छे वक़्त के समय बहती गंगा में हाथ धोने वालों के चेहरे हमें दिखा गया।”

अब हॉल में सन्नाटा छाने लगा। लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। राधिका ने आगे कहा—

“हमने कभी किसी से मदद नहीं मांगी थी लेकिन लोगों ने ऐसा मुंह मोड़ा जैसे वो सब भूल ही गए थे कि पापा ने उनकी कितनी मदद की है। सबसे पहले इन लोगों की परेशानी में पापा ही साथ देने आगे आते थे।”

कई रिश्तेदारों की नजरें नीचे झुक गईं। कुछ के चेहरे सफेद पड़ गए।

“लेकिन अब ऐसा नहीं होगा,” राधिका ने स्पष्ट कहा, “अब मेरे घर की गंगा में दोगले लोगों के हाथ नहीं धुलेंगे। .. आप सबका धन्यवाद यहां आने के लिए, खाना खाकर जाइएगा।”

इतना कहकर राधिका स्टेज से नीचे उतरी और माँ–पापा का हाथ थामकर रेस्टॉरेंट से घर के लिए अपनी नई गाड़ी में रवाना हो गई।

पीछे से सभी उसका मुँह ताकते रह गए। अब सभी को समझ आ चुका था कि अब बहती गंगा में हाथ नहीं धुलने वाले।

राधिका की नई गाड़ी आगे बढ़ रही थी और पीछे रेस्टॉरेंट की रोशनियाँ दूर होती जा रही थीं। कार के अंदर अजय जी ने बेटी का हाथ थामकर बस इतना कहा—“बेटी, तूने आज सिर्फ अपना सम्मान नहीं बचाया… मेरे आत्मसम्मान को भी वापस ला दिया।” त्रिशला जी की आँखों से चुपचाप आँसू बह रहे थे—पर ये आँसू दुख के नहीं, गर्व के थे।

और राधिका… राधिका के चेहरे पर वही शांत-सी मुस्कान थी—जिस मुस्कान में उसके संघर्ष की कहानी भी थी और उसकी जीत की चमक भी।

शनाया अहम

error: Content is protected !!