बटवारा – एम. पी. सिंह 

सोहन के गुज़र जाने के बाद उसकी पत्नी कमला ने अकेले दोनों बेटों राम और मोहन क़ो सम्भला. उस समय राम 10 और मोहन 8 साल का था. कमला ने बच्चों की परवरिश में खुद क़ो पूरी तरह समर्पित कर दिया. सुबह 10 से शाम 5 बजे तक स्कूल में पढ़ाती ओर रात 8 से 11 बजे तक घर पर टूशन लेती. कमला की

जिन्दगी स्कूल ओर घर तक सिमट कर रह गई थीं. लव मैरिज होने की वजह से ससुराल ओर मायके दोनों से दूरियां बन गई थी ओर सोहन के जाने के बाद भी कुछ नहीं बदला. कमला के भाई भाभी ने कभी बुलाया नहीं ओर ससुराल वो गई नहीं. सोहन अपने जीते जी एक मकान बनवा गया था जिसने कमला क़ो रहने के लिए एक छत दे दी थीं.

कमला क़ो आज 15 साल की तपस्या का फल मिलने वाला था जब छोटे बेटे मोहन की भी पढ़ाई पूरी हों गई और इसी शहर में नौकरी भी लग गई. राम पहले से ही दिल्ली में नौकरी कर रहा था. कमला ने बारी बारी से बेटों की शादी करदी. राम की लव मैरिज थीं ओर परिवार भी हाई फाई था. मोहन की शादी अपनी जात मैं गरीब घर की लड़की से हुई थीं,

जो बहुत पारिवारिक ओर ग्रह कार्य मैं दक्ष थीं. शादी के बाद राम अपनी बीवी तो अपने साथ ले गया. मोहन अपनी पत्नी और माँ के साथ ही रहता था. राम कभी कभी आता था ओर एक दो दिन में लोट जाता था. अब दोनों का परिवार बड़ा हों गया था.

कुछ साल आराम से निकल गये फिर एक दिन राम ने मोहन से पूछा की पिताजी के मकान की क्या क़ीमत होती? मोहन बोला, पिछले महीने इसी लाइन मैं आखिरी वाला मकान 50 लाख मैं बिका था, अपना भी लगभग यही होगा.

बात आई गई हों गई. राम जब अगली बार आया तो माँ से बोला मुझे पिताजी के मकान मैं आधा हिस्सा मुझे देदो, मैं इसे बेचकर

शहर मैं बड़ा मकान लेना है, माँ बोली बेटा, 2 कमरे तो सारे है अगर आधा मकान बेच देंगे तो 1 कमरे मैं हम सब रहेंगे कैसे? राम बोला, ठीक है, मकान मत बेचो मुझे 25 लाख देदो और मकान मोहन रख लें. तभी मोहन भी बाजार से आया और माँ क़ो राम पर चिल्लाते सुना. मोहन ने माँ से गुस्सा होने का कारण पूछा. माँ की बात सुनकर मोहन बोला, राम भईया, आधा नहीं, आप पूरा घर समान सहित लेलो. राम क़ो मोहन की बात पर विश्वास नहीं हुआ. राम ने पूछा, तो तुम सब कहाँ रहोगे. मोहन बोला, तुम्हे मंजूर हों तो बताओ, मैं अपना देख लूंगा. 

राम बहुत खुश था, माँ जोर जोर से राम क़ो डांट रही थीं और मोहन मुस्कुराते हुए बोल रहा था, माँ चिंता मत कर सब ठीक हों जायेगा. 

जाते हुए राम बोला मैं एक महीने बाद आकर सारा सामान ले जाऊगा ओर इस बीच मकान का सौदा भी कर लूँगा, तब तक तुम यही रहो. 

राम के जाने के बाद मोहन ने माँ क़ो समझा कर शांत कराया अपना और आगे का प्लान बताया.

एक महीने बाद राम परिवार के साथ कार पर आया ओर साथ  मे मकान का खरीदार भी लेकर आया. थोड़ी देर मैं पैकिंग / लोडिंग वालो का ट्रक भी आ गया. सारा सामान पैक करके लोड कर दिया. अब चलने का समय आया तो माँ कार मैं बैठ गई. राम ने बीवी बच्चों क़ो कार मैं वेठने के बुलाया ओर माँ क़ो कार से उतरने के लिए बोला. मोहन बोला, माँ नहीं उतरेगी, वो साथ मैं जाएगी. राम की पत्नी बोली, ये हमारे साथ नहीं जाएगी. मोहन बोला, भईया,  आपने मकान ओर सारा सामान लेने के लिए सहमति दी थीं, तो माँ क़ो भी साथ मैं लेकर जाओ.

राम की बीवी बोली, पहले माँ क़ो यही छोड़ो, तब मैं तुम्हारे साथ जाऊगी . राम दुविधा मैं पढ़ गया, उसकी बीवी कार मैं बैठती नहीं ओर माँ कार से उतरती नहीं. राम की हालत देखकर मोहन मुस्कुरा रहा था. काफ़ी देर तक ये ड्रामा चलता रहा आखिर राम के कहने पर ट्रक से सारा सामान वापस उतारा गया, मोहन ने राम से स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर लिए की भविष्य मैं मकान पर कोई हक नहीं जमायेगा ओर उसके बाद माँ कार से उतरी 

माँ के उतरते ही राम के बीवी बच्चे कार मैं बैठ कर वापस चले गये.

साथिओं, औलाद क़ो माँ बाप की संपत्ति तो चाहिए लेकिन माँ बाप नहीं चाहिए. बेटा बहु ये भूल जाते है की कल उनकी अपनी ओलाद भी उनके साथ यही सलूक करेगी 

आपकी राय मैं मोहन ने जो किया, क्या वो सही था?

धन्यवाद 

लेखक 

एम. पी. सिंह 

(Mohindra Singh )

स्वरचित, अप्रकाशित 

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