मेघना ने आग में घी डालने का काम किया, “रवि भैया, बुरा मत मानिएगा, लेकिन विकास अकेले कितना करेंगे? अभी हमने नई कार बुक की है, घर की ईएमआई है, हमारे बंटी की कोचिंग फीस है। आप तो जानते हैं महंगाई कितनी है। आप थोड़ा हाथ-पैर मारिये, छोटी-मोटी कोई भी नौकरी कर लीजिये। अब हर महीने हम आपको पालेंगे तो हमारा बजट तो बिगड़ जाएगा ना।”
शाम का धुंधलका गहरा रहा था, बिल्कुल वैसे ही जैसे रवि के मन में निराशा का अंधेरा छा रहा था। लखनऊ के गोमती नगर में बना वह दो मंजिला मकान बाहर से जितना खूबसूरत था, अंदर रिश्तों की सीलन उतनी ही गहरी थी। रवि अपने कमरे में बिस्तर के किनारे बैठा था। उसके हाथ में बेटी, आरोही की स्कूल फीस का नोटिस था। कल आखिरी तारीख थी। अगर फीस जमा नहीं हुई, तो आरोही का नाम कट सकता था।
रवि की पत्नी, अंजलि, उसके पास आई और उसके कंधे पर हाथ रखा। “रवि, आप चिंता मत कीजिये। मेरे पास जो शादी की चेन है, उसे गिरवी रख देते हैं। भाई साहब से मत मांगिए।”
रवि ने अंजलि की ओर देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी। “अंजलि, यह घर मेरा भी है। भैया मेरे सगे भाई हैं। पापा के जाने के बाद मैंने ही तो सब संभाला था। आज अगर मेरा वक्त थोड़ा खराब है, तो क्या वो इतना भी नहीं करेंगे? यह कोई भीख नहीं, मेरा हक़ है। मैं उनसे उधार ही तो मांग रहा हूँ।”
अंजलि कुछ नहीं बोली, बस उसने अपनी नज़रें झुका लीं। वह जानती थी कि इस घर की हकीकत क्या है, जिसे रवि अपनी भावुकता के चश्मे से देख नहीं पा रहा था।
रवि उठा और भारी कदमों से सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर वाले फ्लोर पर गया, जहाँ उसके बड़े भाई, विकास और भाभी, मेघना का आलीशान लिविंग रूम था। विकास सोफे पर बैठकर अपनी नई कार की ब्रोशर देख रहा था और मेघना फ़ोन पर किसी से हंस-हंसकर बात कर रही थी।
रवि ने गला खंखारा। “भैया…”
विकास ने ब्रोशर से नज़रें हटाईं। “अरे रवि? आ, बैठ। क्या हुआ? चेहरा क्यों लटका है?”
रवि सोफे के किनारे पर बैठ गया। उसे शब्द नहीं मिल रहे थे। जिस भाई के लिए उसने अपनी जवानी के पाँच साल दुबई की तपती गर्मी में लेबर कैंप में बिताए थे, आज उसी से पैसे मांगने में उसे संकोच हो रहा था।
“भैया, वो आरोही की स्कूल फीस जमा करनी है। कल आखिरी डेट है। पंद्रह हज़ार रुपये कम पड़ रहे हैं। अगर आप दे देते, तो मैं… मैं जैसे ही नई नौकरी लगती है, लौटा दूंगा।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। मेघना ने फ़ोन रख दिया और तिरछी नज़रों से रवि को देखा। विकास के चेहरे के भाव बदल गए। वह जो अभी कार के रंगों पर चर्चा कर रहा था, अब उसके माथे पर लकीरें उभर आईं।
विकास ने एक गहरी सांस ली और कड़े शब्दों में बोला, **”दो महीने हुए नहीं तुम्हारी नौकरी छूटे और तुम्हें हाथ भी फैलाने पड़ गए?”**
यह वाक्य रवि के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा। उसे लगा जैसे किसी ने उसे थप्पड़ मार दिया हो।
मेघना ने आग में घी डालने का काम किया, “रवि भैया, बुरा मत मानिएगा, लेकिन विकास अकेले कितना करेंगे? अभी हमने नई कार बुक की है, घर की ईएमआई है, हमारे बंटी की कोचिंग फीस है। आप तो जानते हैं महंगाई कितनी है। आप थोड़ा हाथ-पैर मारिये, छोटी-मोटी कोई भी नौकरी कर लीजिये। अब हर महीने हम आपको पालेंगे तो हमारा बजट तो बिगड़ जाएगा ना।”
रवि सन्न रह गया। “भाभी, पालने की बात? मैंने सिर्फ उधार माँगा है। और यह घर… यह घर तो पापा का है ना? इसमें मेरा भी तो हिस्सा है।”
विकास खड़ा हो गया। “हिस्सा? कौन सा हिस्सा रवि? पिछले दस सालों से इस घर की मरम्मत, बिजली का बिल, टैक्स सब मैं भर रहा हूँ। तुम तो दुबई से आकर यहाँ राजा बाबू बनकर बैठ गए। दो महीने से तुम घर में एक रुपया नहीं दे रहे, ऊपर से पंद्रह हज़ार मांग रहे हो? देखो, मेरे पास अभी फालतू पैसा नहीं है।”
रवि की आँखों में आंसू आ गए। अपमान का घूंट पीकर वह चुपचाप नीचे उतर आया। उसे विकास की कही बातें नहीं, बल्कि अपना अतीत याद आ रहा था।
दस साल पहले जब पिता जी का देहांत हुआ था, तब घर पर बैंक का कर्ज़ था। विकास ने अभी-अभी अपनी वकालत शुरू की थी और उसकी कमाई न के बराबर थी। तब रवि, जो पढ़ने में बहुत होशियार था, ने अपनी पढ़ाई छोड़कर दुबई जाने का फैसला किया था।
उसने वहां कड़ी धूप में वेल्डिंग का काम किया। हर महीने अपनी तनख्वाह का 90 प्रतिशत हिस्सा वह विकास को भेजता था। उसी पैसे से विकास की वकालत जमी, उसी पैसे से यह घर कर्ज़ मुक्त हुआ, और उसी पैसे से विकास की शादी मेघना से धूमधाम से हुई।
रवि जब दो साल पहले हमेशा के लिए वापस आया, तो उसके पास बैंक बैलेंस के नाम पर कुछ नहीं था, क्योंकि उसने सब कुछ परिवार पर लुटा दिया था। उसने यहाँ एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी शुरू की थी, जो मंदी के कारण दो महीने पहले छूट गई।
नीचे कमरे में आकर रवि अंजलि के गले लगकर रो पड़ा। “अंजलि, तुम सही थीं। खून के रिश्ते भी हैसियत देखकर बदलते हैं। भैया भूल गए कि उनकी वकालत की डिग्री में मेरी पसीने की कमाई लगी है।”
अंजलि ने चुपचाप अपनी सोने की चेन उतारकर रवि के हाथ में रख दी। “रवि, स्वाभिमान से बड़ा कोई गहना नहीं होता। इसे बेच दीजिये, फीस भर दीजिये। कल से मैं ट्यूशन पढ़ाना शुरू करूँगी। हम किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे।”
अगली सुबह, घर का माहौल तनावपूर्ण था। रवि बिना नाश्ता किये चेन बेचने सुनार की दुकान पर जाने के लिए निकल रहा था। लिविंग रूम में उनकी बूढ़ी माँ, सुमित्रा देवी, अपनी कुर्सी पर बैठी माला जप रही थीं। वे अक्सर चुप रहती थीं, लेकिन घर की हर आहट को पहचानती थीं।
विकास और मेघना तैयार होकर नीचे उतर रहे थे। विकास को कोर्ट जाना था।
“माँ, मैं जा रहा हूँ,” विकास ने जल्दबाजी में कहा।
सुमित्रा देवी ने माला रोक दी। “रुक जा विकास।”
उनकी आवाज़ में एक ऐसी कड़काई थी जो आमतौर पर नहीं होती थी।
“जी माँ?” विकास रुका।
“रवि कहाँ जा रहा है?” सुमित्रा देवी ने पूछा।
रवि दरवाज़े पर ठिठक गया। “माँ, वो… एक दोस्त से मिलने जा रहा हूँ।”
“झूठ मत बोल,” सुमित्रा देवी अपनी कुर्सी से उठीं। वे लड़खड़ाते कदमों से रवि के पास गईं और उसकी मुट्ठी खोल दी। हथेली में अंजलि की सोने की चेन चमक रही थी।
सुमित्रा देवी की आँखों में ज्वाला धधक उठी। उन्होंने विकास की तरफ देखा। “तो बात यहाँ तक आ गई? घर की बहू के जेवर बिकने की नौबत आ गई और बड़ा भाई नई कार खरीद रहा है?”
विकास झेंप गया। “माँ, आपको नहीं पता। रवि ने कल पैसे मांगे थे। अब मैं हर रोज़ इसे पैसे कैसे दूँ? इसे भी तो ज़िम्मेदार होना पड़ेगा। मैंने बस उसे समझाया था।”
“समझाया था?” सुमित्रा देवी चिल्लाईं। “तूने उसे ताना मारा कि दो महीने में उसने हाथ फैला दिए? तुझे याद है विकास, जब तेरे पापा गए थे, तब घर में राशन लाने के पैसे नहीं थे? तब रवि की उम्र क्या थी? मात्र 19 साल। यह लड़का अपनी स्कॉलरशिप के पैसे तुझे देकर खुद खाली पेट सोता था ताकि तेरी लॉ की किताबें आ सकें।”
मेघना ने बीच में बोलने की कोशिश की, “मम्मी जी, वो पुरानी बातें हैं। अब तो विकास जी ही घर चला रहे हैं ना?”
सुमित्रा देवी ने मेघना को हाथ के इशारे से चुप रहने को कहा। “चुप रहो बहू। तुम्हें इस घर का इतिहास नहीं पता। आओ मेरे साथ।”
सुमित्रा देवी सबको अपने कमरे में ले गईं। उन्होंने अलमारी के ऊपर से एक पुराना, धूल जमा लोहे का संदूक उतारा। उसे खोला। उसमें से कुछ पुरानी डायरियां और बैंक की पासबुक निकलीं।
उन्होंने एक डायरी विकास के हाथ में थमा दी। “पढ़ इसे। यह तेरे पापा की डायरी नहीं, मेरी डायरी है। इसमें मैंने रवि के भेजे हुए एक-एक पैसे का हिसाब लिखा है।”
विकास ने डायरी खोली। पन्नों पर तारीखों के साथ रकम लिखी थी।
*जनवरी 2015: 20,000 (दुबई से रवि ने भेजे – विकास की कोर्ट फीस के लिए)*
*मार्च 2016: 50,000 (घर की छत की मरम्मत के लिए)*
*फरवरी 2017: 1,00,000 (विकास की शादी के लिए मेघना के गहने)*
विकास पन्ने पलटता गया। रकम बढ़ती गई। अंत में कुल जोड़ लिखा था— *25 लाख रुपये।*
सुमित्रा देवी की आँखों से आंसू बह रहे थे। “विकास, यह दो मंजिला मकान जो तुझे अपना लगता है, इसकी ईंटें रवि की जवानी और उसके सपनों की राख से बनी हैं। जब यह दुबई में 50 डिग्री तापमान में लोहा गला रहा था, तब तू यहाँ एसी कमरे में बैठकर वकालत की तैयारी कर रहा था। इसने कभी तुझसे हिसाब नहीं माँगा क्योंकि यह तुझे राम मानता था। और तू? तूने इसे ‘हाथ फैलाने वाला’ कह दिया?”
कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि सांसों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी। विकास के हाथ से डायरी छूटकर ज़मीन पर गिर गई। उसका सर शर्म से झुक गया। मेघना, जो अब तक अपने पति की कमाई पर इतरा रही थी, यह जानकर सन्न रह गई कि उसकी शादी के गहने भी रवि के भेजे पैसों से आए थे।
रवि एक कोने में खड़ा रो रहा था। उसे पैसों का दुःख नहीं था, उसे इस बात का दुःख था कि माँ को आज यह कड़वा सच बोलना पड़ा।
सुमित्रा देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से चाबियों का गुच्छा निकाला और रवि के हाथ में रख दिया। “रवि, यह इस घर की तिजोरी की चाबी है। आज से घर का हिसाब तू रखेगा। और सुन, अगर तुझे लगता है कि यहाँ तेरा सम्मान नहीं है, तो यह घर बेचकर हम अपना हिस्सा ले लेंगे। मैं तेरे साथ रहूँगी, चाहे झोपड़ी में रहना पड़े।”
विकास दौड़कर माँ के पैरों में गिर पड़ा। “माँ, मुझे माफ़ कर दो। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। दौलत ने मेरी आँखों पर पट्टी बांध दी थी। मैं भूल गया था कि मैं आज जो भी हूँ, रवि की बदौलत हूँ।”
वह उठा और रवि के पास गया। रवि ने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। विकास ने रवि के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “रवि, मुझे माड़ कर दे छोटे। मैं भाई नहीं, व्यापारी बन गया था। यह पंद्रह हज़ार नहीं, यह मेरा अहंकार था जो बोल रहा था। यह चेन वापस रख ले। आरोही मेरी भी बेटी है। उसकी फीस आज ही जमा होगी और वह भी साल भर की एडवांस।”
रवि ने भाई को गले लगा लिया। दोनों भाई फूट-फूट कर रोए। उस आंसुओं की बारिश में ईर्ष्या, अहंकार और गलतफहमियां धुल गईं।
मेघना भी सर झुकाए खड़ी थी। वह अंजलि के पास गई। “अंजलि दीदी, मुझे माफ़ कर दीजिये। मैंने आपको और रवि भैया को हमेशा बोझ समझा। मुझे नहीं पता था कि यह छत आप लोगों की ही दी हुई है।”
शाम को घर का नज़ारा बदला हुआ था। डाइनिंग टेबल पर सब साथ बैठे थे।
विकास ने एक फैसला लिया। “रवि, कल से तू नौकरी नहीं ढूंढेगा।”
रवि ने चौंक कर देखा। “क्या मतलब भैया?”
“मतलब यह कि मेरी लॉ फर्म को एक मैनेजर की ज़रूरत है जो खातों का हिसाब रख सके। और माँ की इस डायरी ने बता दिया है कि तुझसे बेहतर हिसाब और तुझसे ज्यादा ईमानदार कोई नहीं हो सकता। हम दोनों भाई मिलकर काम करेंगे। तू मेरा पार्टनर होगा, कर्मचारी नहीं।”
रवि मुस्कुराया। सुमित्रा देवी ने चैन की सांस ली। उन्होंने मन ही मन अपने स्वर्गीय पति को याद किया। घर बंटने से बच गया था। दीवारें तो ईंट-पत्थर की होती हैं, लेकिन उन्हें जोड़े रखने वाला सीमेंट ‘प्रेम’ और ‘त्याग’ ही होता है। जब तक रवि जैसा त्याग और माँ जैसा न्याय घर में ज़िंदा है, तब तक कोई भी ‘मंदी’ रिश्तों को कंगाल नहीं कर सकती।
उस रात रवि ने अंजलि से कहा, “आज मुझे मेरी नौकरी वापस नहीं मिली, लेकिन मेरा भाई वापस मिल गया। और सच कहूँ अंजलि, दुनिया की किसी भी सैलरी से ज़्यादा कीमती यह सुकून है।”
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**कहानी का निष्कर्ष:**
वक्त सबका बदलता है। जो आज देने वाला है, कल उसे मांगने की ज़रूरत पड़ सकती है। रिश्तों में कभी भी अहसानों का हिसाब नहीं रखना चाहिए, लेकिन जब बात आत्मसम्मान की आए, तो सच का आईना दिखाना भी ज़रूरी हो जाता है। एक माँ ने सही समय पर बोलकर अपने दोनों बेटों को खोने से बचा लिया।
**क्या विकास की माफ़ी जायज़ थी? क्या रवि को उसे माफ़ कर देना चाहिए था?**
दोस्तों, आज के दौर में ऐसे कितने ही भाई हैं जो पैसों के लिए खून के रिश्तों को भूल जाते हैं। यह कहानी उन सभी के लिए एक सबक है।
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मूल लेखिका : हेमलता गुप्ता