बंटवारा या बचाव – अर्चना झा

“आजकल की बहुएं तो ब्याहकर आते ही… अलग रहने की फरमाइशें शुरू कर देती हैं। न बड़ों का लिहाज, न घर की परंपरा की चिंता। बस अपनी आज़ादी चाहिए इन्हें।”

कमला बुआ ने पान चबाते हुए पीकदान की तरफ मुँह किया और फिर बड़े ही व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा। आंगन में बैठी सावित्री देवी का चेहरा यह सुनकर और भी बुझ गया। उनकी आँखों में एक अनजाना डर तैर गया। अभी तो बेटे रवि की शादी को जुम्मा-जुम्मा आठ दिन ही हुए थे। घर में शहनाई की गूंज अभी ठीक से थमी भी नहीं थी कि मोहल्ले की औरतों ने कानाफूसी शुरू कर दी थी।

सावित्री देवी ने अपनी नई बहू, अवनि, की तरफ कनखियों से देखा जो रसोई में चाय बना रही थी। अवनि शहर की पढ़ी-लिखी लड़की थी। देखने में सौम्य, लेकिन आँखों में एक गज़ब की चमक और आत्मविश्वास था। सावित्री देवी को अंदर ही अंदर डर सता रहा था कि कहीं कमला बुआ की बात सच न हो जाए। उनका बड़ा बेटा, मुकेश और बड़ी बहू, सरिता, पहले ही घर में अपनी मनमानी चलाते थे। अब अगर रवि भी अलग हो गया, तो बुढ़ापे में उनका और उनके पति दीनानाथ जी का क्या होगा?

दीनानाथ जी सरकारी बाबू थे, रिटायर हो चुके थे। अपनी पूरी पेंशन और जमा-पूंजी लगाकर उन्होंने यह दो मंज़िला मकान बनवाया था। सोचा था कि पूरा परिवार एक साथ रहेगा। बड़ा बेटा मुकेश, जो एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था, और बड़ी बहू सरिता ऊपर वाले फ्लोर पर रहते थे। रवि और अवनि के लिए नीचे का कमरा तय किया गया था।

शादी के शुरुआती दिन बीत गए। अवनि ने घर के माहौल को बहुत बारीकी से भांपना शुरू किया। उसने देखा कि घर ‘संयुक्त’ तो है, लेकिन ‘जुड़ा’ हुआ नहीं है।

सुबह के छह बजते ही सावित्री देवी उठ जाती थीं। दमा की मरीज़ होने के बावजूद वह झाड़ू-पोछा करतीं, फिर सबके लिए नाश्ता बनातीं। बड़ी बहू सरिता नौ बजे सोकर उठती और सीधे डाइनिंग टेबल पर आकर हुक्म चलाती—”मम्मी जी, चाय में चीनी कम है,” या “मेरे परांठे में घी ज़्यादा मत लगाया कीजिये।”

मुकेश भी अपने पिता दीनानाथ जी से सीधे मुंह बात नहीं करता था। अगर दीनानाथ जी कभी कह देते—”बेटा, बिजली का बिल आ गया है, जमा कर देना,” तो मुकेश झुंझलाकर कहता—”पापा, आपकी पेंशन आती तो है, उसी से कर दीजिये न। मेरे पास और भी खर्चे हैं।”

अवनि यह सब देख रही थी। उसे सबसे ज़्यादा दुःख तब हुआ जब उसने देखा कि दीनानाथ जी को अपनी दवाइयों के लिए भी मुकेश के आगे हाथ फैलाना पड़ता था, क्योंकि उनकी पेंशन का ज़्यादातर हिस्सा घर के राशन और सरिता की शॉपिंग में खर्च हो जाता था। रवि, जो अभी नया-नया नौकरी में लगा था, वह स्वभाव से बहुत सीधा था और बड़े भाई के सामने बोल नहीं पाता था।

एक रात, अवनि रवि के पास आई।

“रवि, मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी है,” अवनि ने गंभीरता से कहा।

रवि ने मुस्कुराते हुए कहा, “कहो अवनि, क्या बात है? कोई चीज़ चाहिए?”

“हाँ, मुझे सुकून चाहिए,” अवनि ने सीधे रवि की आँखों में देखा। “रवि, मैं इस घर में नहीं रह सकती। मुझे अलग घर चाहिए। हम कल ही किराये का मकान ढूंढेंगे।”

रवि सन्न रह गया। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे कमला बुआ की वही बात याद आ गई—*आजकल की बहुएं आते ही अलग होने की बात करती हैं।*

“अवनि, तुम यह क्या कह रही हो? माँ-बाबूजी क्या सोचेंगे? अभी तो शादी को महीना भी नहीं हुआ। और भैया-भाभी… समाज क्या कहेगा?” रवि ने हड़बड़ाते हुए कहा।

“मुझे समाज की परवाह नहीं है रवि। और न ही मैं आपकी कोई दलील सुनना चाहती हूँ। अगर आप मेरे साथ नहीं चलेंगे, तो मैं अकेले चली जाऊंगी। लेकिन मैं इस घुटते हुए माहौल में नहीं रह सकती,” अवनि की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी जिसने रवि को चुप करा दिया।

अगली सुबह नाश्ते की मेज़ पर बम फूटा।

रवि ने डरते-डरते कहा, “पापा, माँ… अवनि और मैं अलग रहना चाहते हैं। हमने पास ही की कॉलोनी में एक फ्लैट देख लिया है।”

सावित्री देवी के हाथ से चाय का कप छूटकर गिर गया। दीनानाथ जी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। सरिता और मुकेश ने एक-दूसरे को देखा और मन ही मन खुश हुए, लेकिन चेहरे पर बनावटी दुःख ले आए।

“देखा माँ?” सरिता ने तुरंत आग में घी डाला। “मैं तो पहले ही कहती थी कि शहर की लड़की है, टिकेगी नहीं। आते ही हमारे रवि को हमसे दूर कर दिया। कैसी ‘कलयुगी’ बहू है।”

सावित्री देवी फूट-फूट कर रोने लगीं। “बेटा रवि, तू भी जोरू का गुलाम बन गया? हमने तुझे इसीलिए पाल-पोस कर बड़ा किया था कि बुढ़ापे में तू हमें छोड़कर चला जाए?”

अवनि चुपचाप खड़ी रही। उसने कोई सफाई नहीं दी। उसने सरिता के ताने सुने, मुकेश की व्यंग्यात्मक हंसी सुनी और सास-ससुर का विलाप देखा। लेकिन उसका इरादा नहीं बदला।

मोहल्ले में खबर आग की तरह फैल गई। “दीनानाथ जी की छोटी बहू ने घर फोड़ दिया,” “बेचारे बूढ़े माँ-बाप,” “रवि तो बीवी के इशारों पर नाच रहा है”—तरह-तरह की बातें होने लगीं।

तीन दिन बाद, रविवार का दिन था। सामान पैक हो चुका था। एक छोटा टेम्पो बाहर खड़ा था। रवि का मन बहुत भारी था। वह माता-पिता की नज़रों का सामना नहीं कर पा रहा था।

सावित्री देवी अपने कमरे में पलंग पर लेटी रो रही थीं। दीनानाथ जी बरामदे में शून्य में ताक रहे थे।

अवनि अपना सूटकेस लेकर बाहर आई। उसने सरिता और मुकेश को देखा जो बालकनी से खड़े होकर तमाशा देख रहे थे।

अवनि सीधे दीनानाथ जी के पास गई।

“बाबूजी,” अवनि ने आवाज़ दी।

दीनानाथ जी ने मुँह फेर लिया। “जाओ बहू। अब और क्या सुनना बाकी रह गया है? तुम लोग खुश रहो। हमारा क्या है, जैसे बड़े बेटे के टुकड़ों पर जी रहे थे, वैसे ही जी लेंगे।”

“बाबूजी, आप अपना सामान पैक क्यों नहीं कर रहे?” अवनि ने शांत स्वर में पूछा।

दीनानाथ जी चौंके। “क्या मतलब?”

सावित्री देवी भी दरवाज़े पर आ खड़ी हुईं। “क्या कह रही है तू?”

अवनि ने आगे बढ़कर सावित्री देवी के हाथ थाम लिए। “माँ जी, मैंने रवि से कहा था कि मुझे ‘अलग’ घर चाहिए। मैंने यह कब कहा कि मुझे ‘आपसे अलग’ होना है?”

वहां सन्नाटा छा गया। बालकनी पर खड़े मुकेश और सरिता के चेहरों से हंसी गायब हो गई।

अवनि ने ऊंची आवाज़ में कहा, ताकि ऊपर भी सुनाई दे, “माँ जी, मैंने देखा है कि इस घर में ‘संयुक्त परिवार’ के नाम पर सिर्फ़ आपका शोषण हो रहा है। आप दमा की मरीज़ होकर भी सुबह छह बजे से रात तक खटती हैं, जबकि घर की दूसरी बहुएं दस बजे सोकर उठती हैं। बाबूजी अपनी ही पेंशन के लिए तरसते हैं। यह घर नहीं, यह एक ऐसा ढांचा है जहाँ दो बूढ़े इंसानों की हड्डियों का चूरा बनाया जा रहा है ताकि बाकी लोग आराम कर सकें।”

अवनि की आँखों में आंसू थे, लेकिन आवाज़ में आग थी।

“मैं एक नई गृहस्थी शुरू करने जा रही हूँ माँ जी, और मेरी गृहस्थी की नींव आप दोनों के बिना नहीं रखी जा सकती। मैंने रवि से साफ़ कह दिया था कि हम अलग रहेंगे, लेकिन माँ-बाबूजी हमारे साथ चलेंगे। उस छोटे फ्लैट में आप दोनों को किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। वहां आपकी पेंशन आपकी होगी, और वहां आपको रोटियां नहीं बेलनी पड़ेंगी। वहां मैं नौकरी भी करूँगी और घर भी संभालूंगी, बस मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए।”

दीनानाथ जी कांपते हुए खड़े हो गए। उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। “बहू… तू… तू हमें अपने साथ ले जाना चाहती है?”

“हक़ है मेरा बाबूजी,” अवनि ने उनके पैर छुए। “क्या आप अपनी बेटी के घर नहीं चलेंगे?”

सावित्री देवी दौड़कर आईं और अवनि को गले लगा लिया। उनका रोना अब विलाप नहीं, बल्कि सुकून का सैलाब था। “मेरी बच्ची… मैंने तुझे क्या समझा था और तू क्या निकली। लोग कहते थे बहुएं घर तोड़ती हैं, तूने तो आज इंसानियत को जोड़ दिया।”

ऊपर खड़ी सरिता चिल्लाई, “यह नहीं हो सकता! अगर माँ-बाबूजी चले गए तो इस घर का काम कौन करेगा? और… और राशन-पानी?” सरिता की जुबान फिसल गई।

अवनि ने ऊपर देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, अब आप घर की मालकिन हैं। पूरा घर आपका है। अब आप जी भर कर राज कीजिये। बस अब ‘प्रजा’ (माँ-बाबूजी) वहां नहीं रहेगी। अब आपको अपनी चाय खुद बनानी होगी।”

रवि, जो अब तक चुप था, उसका सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उसने आगे बढ़कर अपने पिता का सूटकेस उठाया।

“चलो पापा। गाड़ी तैयार है।”

मुकेश नीचे भागा आया। “पापा, आप ऐसे नहीं जा सकते। लोग क्या कहेंगे कि बड़ा बेटा ज़िंदा है और बाप छोटे के साथ किराए के मकान में रह रहा है? मेरी इज़्ज़त का क्या होगा?”

दीनानाथ जी ने पहली बार अपनी नज़रें उठाईं और बेटे की आँखों में देखा।

“इज़्ज़त कमाई जाती है मुकेश, मांगी नहीं जाती। पिछले दस सालों में तूने मुझे यह महसूस करा दिया कि मैं इस घर में एक बोझ हूँ। आज मेरी इस छोटी बहू ने मुझे एहसास दिलाया है कि मैं ‘बाप’ हूँ। मैं जा रहा हूँ बेटा। यह मकान तेरा, पर मेरा ‘घर’ अब वहां है जहाँ सम्मान है।”

दीनानाथ जी और सावित्री देवी टेम्पो में बैठ गए। अवनि उनके साथ बैठी। टेम्पो चल पड़ा।

पीछे छूट गया वह बड़ा सा दो मंज़िला मकान, जो अब वाकई बहुत खाली और बड़ा लगने वाला था। सरिता और मुकेश गेट पर खड़े रह गए। उन्हें समझ आ गया था कि उन्होंने सिर्फ़ काम करने वाले हाथ नहीं खोए, बल्कि घर की ‘बरकत’ को विदा कर दिया था।

नए फ्लैट में पहुंचकर अवनि ने सबसे पहले तुलसी का पौधा लगाया। वह फ्लैट छोटा था—सिर्फ़ दो कमरे थे। एक कमरे में रवि और अवनि, और दूसरे में माँ-बाबूजी।

शाम को जब अवनि ने चाय बनाई और दीनानाथ जी के हाथ में दी, तो उन्होंने एक घूंट भरा और आँखों में पानी भरकर बोले, “सावित्री, आज चाय में स्वाद कुछ अलग है।”

सावित्री जी, जो अब आराम से सोफे पर बैठी थीं, मुस्कुराईं। “हाँ, यह आज़ादी और सम्मान का स्वाद है।”

दिन बीतते गए। अवनि सुबह ऑफिस जाती, लेकिन जाने से पहले नाश्ता और दोपहर का खाना तैयार करके जाती। शाम को आकर वह और रवि मिलकर खाना बनाते। सावित्री देवी अब रसोई में नहीं जाती थीं, बस बैठकर सब्ज़ी काट देतीं या चावल बीन देतीं। उनकी सेहत में जादुई सुधार आने लगा। जो खांसी सालों से नहीं जा रही थी, वह अब कम हो गई थी। दीनानाथ जी शाम को पार्क में दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाते और गर्व से कहते—”मेरी बहू नहीं, बेटी है वो।”

उधर, बड़े घर का हाल बुरा था। सरिता को अब सुबह छह बजे उठना पड़ता था। घर का काम, बच्चों की ज़िम्मेदारी और ऊपर से आर्थिक तंगी। मुकेश की सैलरी अकेले घर चलाने के लिए कम पड़ने लगी थी, क्योंकि अब पिता की पेंशन का सहारा नहीं था। घर में रोज़ झगड़े होने लगे। वो मकान अब ईंट-पत्थर का ढांचा बनकर रह गया था, जहाँ शोर तो था पर सुकून नहीं।

छह महीने बाद, होली का त्यौहार था। अवनि के छोटे से फ्लैट में गुझिया की महक थी। रवि, अवनि, सावित्री जी और दीनानाथ जी हंसी-मज़ाक कर रहे थे। तभी डोरबेल बजी।

दरवाज़े पर मुकेश और सरिता खड़े थे। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा था और नज़रों में शर्मिंदगी।

“अंदर आ सकते हैं?” मुकेश ने धीमे स्वर में पूछा।

दीनानाथ जी ने अवनि की तरफ देखा। अवनि ने मुस्कुराकर दरवाज़ा पूरा खोल दिया। “आइये भैया, भाभी। त्यौहार के दिन कोई पराया नहीं होता।”

वे अंदर आए। घर छोटा था, लेकिन उसमें जो अपनापन था, उसने मुकेश को रुला दिया। उसने पिता के पैर पकड़े। “पापा, हमसे गलती हो गई। घर… घर नहीं लगता आपके बिना। माफ़ कर दीजिये। वापस चलिए।”

सरिता भी सावित्री देवी के पास बैठकर रोने लगी। “मम्मी जी, मुझसे घर नहीं संभलता। मुझे आपकी कद्र अब समझ आ रही है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सब दीनानाथ जी के फैसले का इंतज़ार कर रहे थे।

दीनानाथ जी ने मुकेश के सिर पर हाथ रखा। “बेटा, माफ़ी मांग ली, दिल हल्का हो गया, अच्छी बात है। हम त्यौहार मनाने ज़रूर आएंगे। लेकिन अब ‘वापस’ नहीं आएंगे।”

“क्यों पापा?” मुकेश ने पूछा।

“क्योंकि यहाँ मुझे नींद अच्छी आती है,” दीनानाथ जी ने अवनि की तरफ स्नेह से देखते हुए कहा। “इस घर में जगह कम है, लेकिन दिल बहुत बड़े हैं। वहां हम ‘ज़िम्मेदारी’ थे, यहाँ हम ‘ज़रूरत’ हैं। और बुढ़ापे में इंसान को सिर्फ प्यार और सम्मान की भूख होती है।”

अवनि ने सरिता के हाथ में गुझिया की प्लेट थमाई। “भाभी, खाइए। और अब से त्यौहार मिल-जुलकर मनाएंगे। दूरियां मकानों में होती हैं, दिलों में नहीं होनी चाहिए।”

उस दिन सबको समझ आ गया कि अवनि ने बंटवारा नहीं किया था, उसने तो बस ‘छंटाई’ की थी। उसने दुःख, अपमान और शोषण को छांटकर अलग कर दिया था और प्यार को बचा लिया था।

मोहल्ले वाले, जो कभी ताने मारते थे, अब अपनी बहुओं को अवनि की मिसाल देते थे।

सच ही कहा है, घर दीवारों से नहीं, उसमें रहने वाले लोगों की नीयत से बनता है। कभी-कभी रिश्तों को बचाने के लिए, और बुज़ुर्गों को सम्मान देने के लिए, एक ‘बंटवारा’ ज़रूरी हो जाता है—बशर्ते वह बंटवारा अवनि जैसी सोच के साथ किया गया हो।

**क्या इस कहानी ने आपके दिल को छुआ?**

अक्सर हम समाज के डर से गलत परंपराओं को ढोते रहते हैं। अवनि ने साबित कर दिया कि बड़ों का सम्मान सिर्फ़ उनके साथ एक छत के नीचे रहने में नहीं, बल्कि उन्हें वो सुकून देने में है जिसके वो हकदार हैं—चाहे उसके लिए अलग ही क्यों न रहना पड़े। **एक बहू का असली धर्म घर को जोड़ना है, और कभी-कभी जोड़ने के लिए धागों को सुलझाना पड़ता है, चाहे वो अलग करके ही क्यों न हो।**

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मूल लेखिका : अर्चना झा

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