** क्या अपनी बहू की बुराई करके एक सास अपना मन हल्का करती है, या अपने ही घर की नींव में बारूद भर रही होती है? पढ़िए, कैसे एक सास की जुबान ने उसकी अपनी ही बेटी की खुशियों में आग लगा दी।
समीर गुस्से में चिल्लाया, “माँ! मैंने अनिका को हजार बार कहा था कि आपकी बातें इग्नोर करे, लेकिन आज आपकी इन बातों ने निशा की जिंदगी खराब कर दी। आपको कितनी बार समझाया था कि घर की बात घर में रखा करो!”
कल्याणी रोने लगीं। “मुझे क्या पता था कि चड्ढा ऐसी निकलेगी… मैं तो बस अपना दुख…”
शाम के पाँच बजते ही कल्याणी देवी की बेचैनी बढ़ने लगती थी। यह वह समय था जब सोसायटी के पार्क वाली बेंच पर ‘दुख-सुख निवारण समिति’ की बैठक जमती थी। वैसे तो यह नाम किसी ने आधिकारिक तौर पर नहीं रखा था, लेकिन कल्याणी और उनकी तीन-चार सहेलियों—मिसेज चड्ढा, विमला जी और सरोज—के लिए यह समय संजीवनी बूटी जैसा था। यहाँ देश-दुनिया की बातें कम और घर की बहुओं की ‘सीआईडी’ रिपोर्ट ज्यादा पेश की जाती थी।
कल्याणी देवी ने अपनी शॉल ठीक की और तेज कदमों से पार्क की ओर बढ़ गईं। उनके मन में आज बहुत कुछ था जिसे बाहर उगलना जरूरी था। आज सुबह ही उनकी बहू, अनिका ने नाश्ते में पोहा बनाया था, जबकि कल्याणी को आलू के पराठे खाने थे। बस, इतनी सी बात उनके लिए ‘विश्व युद्ध’ का कारण बन गई थी।
पार्क पहुँचते ही मिसेज चड्ढा ने मोर्चा सँभाला, “आओ कल्याणी बहन, आज तो चेहरा उतरा हुआ है। फिर कोई नया ड्रामा हुआ क्या महारानी का?”
कल्याणी ने बैठते ही एक लंबी साँस छोड़ी, “अरे क्या बताऊँ चड्ढा बहन! मेरी किस्मत ही फूटी है। लोग बहू लाते हैं बुढ़ापे की लाठी के लिए, मैं लाई हूँ छाती पर मूंग दलने के लिए। आज सुबह की ही बात ले लो, मैंने कहा पराठे बना दे, तो मैडम ने पोहा बना कर रख दिया। कहती है— ‘मम्मी जी, पराठे से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है।’ अरे, मुझे तो लगता है मेरा बीपी और कोलेस्ट्रॉल उसके इन नखरों से ही बढ़ेगा। बस अपनी मनमानी करनी है, सास की तो कोई इज्जत ही नहीं है।”
विमला जी ने तुरंत आग में घी डाला, “सच में बहन! आज कल की लड़कियाँ आती ही हैं घर तोड़ने। मेरी वाली को देख लो, कल ऑनलाइन दस हजार के कपड़े मंगवा लिए। पति का पैसा ऐसे उड़ाती है जैसे पेड़ पर उगता हो। और हम? हम तो एक साड़ी खरीदने से पहले दस बार सोचते थे।”
कल्याणी का हौसला और बढ़ गया, “कपड़ों की बात तो करो ही मत। मेरी बहू तो ऐसे कपड़े पहनकर ऑफिस जाती है कि मुझे पड़ोसियों से नज़रें मिलानी भारी पड़ जाती हैं। और ऊपर से गुरूर इतना कि कुछ कहो तो मुँह फुलाकर कमरे में बंद हो जाती है। मैं तो कहती हूँ, ऐसी बहू भगवान दुश्मन को भी न दे।”
वहाँ बैठी सभी महिलाएं रस ले-लेकर कल्याणी की बातों पर सहमति जता रही थीं। कल्याणी को बड़ा सुकून मिल रहा था। उन्हें लग रहा था कि उनका मन हल्का हो गया है। उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि वो अपना मन हल्का नहीं कर रही हैं, बल्कि अपने ही घर की दीवारों पर कालिख पोत रही हैं।
घर पर अनिका सब जानती थी। वह ऑफिस से लौटते वक्त अक्सर पार्क के पास से गुजरती थी और उसे अपनी सास की ऊंची आवाज़ सुनाई दे जाती थी। वह जानती थी कि चर्चा का विषय वही है। उसे दुख होता था। वह आईटी कंपनी में मैनेजर थी, घर और ऑफिस दोनों सँभालने की पूरी कोशिश करती थी। सुबह जल्दी उठकर खाना बनाती, शाम को आकर फिर रसोई में जुट जाती। ‘कोलेस्ट्रॉल’ वाली बात उसने सच में कल्याणी के स्वास्थ्य की चिंता में कही थी, लेकिन उसका अर्थ का अनर्थ बना दिया गया।
उस रात अनिका ने अपने पति, समीर से बात करने की कोशिश की।
“समीर, माँ जी रोज पार्क में आंटी लोगों के सामने मेरी बुराई करती हैं। मुझे बहुत बुरा लगता है। जो बातें घर की हैं, वो बाहर क्यों जानी चाहिए?”
समीर, जो दिन भर की थकान के बाद लेटा था, झुंझला गया। “अनिका, तुम भी किन छोटी बातों में पड़ रही हो? माँ बुजुर्ग हैं, उनका स्वभाव है थोड़ा बोलना। तुम इग्नोर किया करो। वो अपने मन की भड़ास निकाल लेती हैं, इसमें तुम्हारा क्या बिगड़ रहा है?”
“बिगड़ रहा है समीर,” अनिका की आवाज़ में एक अनकहा दर्द था। “समाज में हमारी छवि बिगड़ रही है। वो औरतें सिर्फ सुनती नहीं हैं, वो नमक-मिर्च लगाकर आगे फैलाती हैं। कल को यह हमारे परिवार पर भारी पड़ सकता है।”
समीर ने करवट बदल ली। “तुम ज्यादा सोचती हो। सो जाओ।”
अनिका चुप हो गई, लेकिन उसका मन अशांत था। उसे आने वाले तूफान का आभास हो रहा था।
कल्याणी देवी की एक बेटी भी थी—निशा। निशा 24 साल की थी और उसके लिए पिछले एक साल से रिश्ता ढूंढा जा रहा था। निशा बहुत ही सुलझी हुई और सुंदर लड़की थी। कल्याणी चाहती थीं कि उनकी बेटी किसी बड़े और प्रतिष्ठित घर में जाए।
किस्मत से, शहर के मशहूर बिजनेसमैन खन्ना साहब के बेटे, रोहन का रिश्ता आया। खन्ना परिवार बहुत ही रसूखदार और संस्कारी माना जाता था। कल्याणी की खुशी का ठिकाना नहीं था। पहली मुलाकात बहुत अच्छी रही। खन्ना परिवार को निशा बहुत पसंद आई। बात लगभग पक्की हो गई थी। सगाई की तारीख तय करने के लिए अगले रविवार खन्ना परिवार को कल्याणी के घर आना था।
कल्याणी ने पूरे हफ्ते घर को चमकाया। अनिका ने भी अपनी सास का पूरा साथ दिया। उसने ऑफिस से छुट्टी ली, घर की सजावट की, तरह-तरह के पकवानों की लिस्ट बनाई। कल्याणी खुश थीं, लेकिन उनकी आदत नहीं गई थी। वो शाम को पार्क में जाकर अपनी सहेलियों को डींगे हांकना नहीं भूलती थीं।
“अरे, खन्ना परिवार तो हमारे पैरों में बिछा जा रहा है। लड़का लाखों कमाता है। मेरी निशा तो राज करेगी राज। वैसे भी मेरी बेटी को तो राज ही करना चाहिए, वो मेरी बहू जैसी थोड़ी है जो घर में कलह मचाए रखे।”
रविवार का दिन आ गया। घर फूलों से सजा था। तरह-तरह के व्यंजनों की खुशबू उड़ रही थी। कल्याणी, समीर, अनिका और निशा सब तैयार होकर मेहमानों का इंतज़ार कर रहे थे। समय 11 बजे का था।
11:30 बज गए, मेहमान नहीं आए। 12 बज गए। कल्याणी ने समीर को इशारा किया। समीर ने खन्ना साहब को फोन मिलाया। फोन नहीं उठा।
थोड़ी देर बाद, लैंडलाइन की घंटी बजी। कल्याणी ने लपककर फोन उठाया।
“नमस्ते खन्ना भाई साहब! हम सब इंतज़ार कर रहे हैं, आप लोग निकले नहीं क्या?” कल्याणी ने अत्यधिक मिठास के साथ पूछा।
उधर से खन्ना साहब की आवाज़ नहीं, बल्कि उनकी पत्नी, श्रीमती खन्ना की आवाज़ आई। आवाज़ में बर्फ जैसी ठंडक थी।
“माफ़ कीजियेगा कल्याणी जी, हम नहीं आ रहे हैं। और न ही हम यह रिश्ता आगे बढ़ा सकते हैं।”
कल्याणी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “क्या? पर… पर क्यों बहन जी? कल तक तो सब ठीक था। निशा में कोई कमी…”
“निशा में कोई कमी नहीं है,” श्रीमती खन्ना ने कड़काई से कहा। “कमी आपके घर के माहौल में है। हम अपनी बेटी नहीं ब्याह रहे, बहू ला रहे हैं। और हमें पता चला है कि आपके घर की औरतें क्लेशप्रिय हैं। जहाँ सास अपनी बहू को पानी पी-पीकर कोसती हो, उस घर की बेटी को हम अपने घर लाकर अपनी शांति भंग नहीं करना चाहते।”
कल्याणी हक्की-बक्की रह गईं। “आपको… आपको किसने कहा? यह सब झूठ है!”
“झूठ?” श्रीमती खन्ना हँसीं, एक व्यंग्यात्मक हँसी। “कल्याणी जी, जिस मिसेज चड्ढा के साथ बैठकर आप रोज अपनी बहू की धज्जियां उड़ाती हैं, वो मेरी दूर की ननद लगती हैं। उन्होंने मुझे कल ही फोन करके आगाह कर दिया। उन्होंने बताया कि कैसे आपकी बहू आपको खाना नहीं देती, कैसे आप पर चिल्लाती है। अब आप ही सोचिये, जिस लड़की ने अपनी माँ को अपनी भाभी के साथ ऐसे बदतमीजी करते देखा हो, या जिस माँ ने अपनी बहू की इज्जत दो कौड़ी की कर रखी हो, उस घर से हम रिश्ता कैसे जोड़ें? संस्कार माँ से बेटी में ही आते हैं न? हमें माफ़ करें।”
फोन कट गया।
हॉल में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा सन्नाटा कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी। कल्याणी के हाथ से रिसीवर छूटकर लटक गया।
निशा, जो पास ही खड़ी सब सुन रही थी, रोते हुए अपने कमरे की ओर भागी। समीर ने सिर पकड़ लिया। अनिका कोठरी के दरवाजे पर खड़ी थी, उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन हैरानी नहीं थी। उसे इसी बात का डर था।
कल्याणी सोफे पर धप्प से बैठ गईं। जिन शब्दों को वो ‘मन हल्का करना’ कहती थीं, आज उन्हीं शब्दों ने उनकी बेटी की किस्मत पर ताला लगा दिया था। मिसेज चड्ढा… उनकी वो ‘सहेली’ जो उनके हर दुख में ‘हाँ में हाँ’ मिलाती थीं, उसने ही उनकी पीठ में छुरा घोंपा था। उसने कल्याणी की ही बातों को मसाला लगाकर खन्ना परिवार तक पहुँचाया था—कि *“उस घर की सास-बहू में तो कुत्ते-बिल्ली वाली लड़ाई है, बेटी भी वैसी ही होगी।”*
समीर गुस्से में चिल्लाया, “माँ! मैंने अनिका को हजार बार कहा था कि आपकी बातें इग्नोर करे, लेकिन आज आपकी इन बातों ने निशा की जिंदगी खराब कर दी। आपको कितनी बार समझाया था कि घर की बात घर में रखा करो!”
कल्याणी रोने लगीं। “मुझे क्या पता था कि चड्ढा ऐसी निकलेगी… मैं तो बस अपना दुख…”
तभी अनिका आगे आई। उसने समीर के कंधे पर हाथ रखकर उसे शांत रहने का इशारा किया और पानी का गिलास लेकर कल्याणी के पास गई।
“पानी पीजिये माँ जी।”
कल्याणी ने शर्मिंदगी से सिर झुका लिया। जिस बहू की वो बुराई करती नहीं थकती थीं, आज वही बहू उनके पास खड़ी थी, जबकि उनकी ‘खास सहेलियाँ’ तमाशा देख रही थीं।
“माँ जी,” अनिका ने बहुत धीमे और सधे हुए स्वर में कहा। “मैं जानती हूँ मुझसे गलतियाँ होती हैं। मैं शायद वैसी बहू नहीं बन पाई जैसी आप चाहती थीं। लेकिन क्या मेरी कमियाँ इतनी बड़ी थीं कि उन्हें जग-जाहिर करना जरूरी था? देखिए, मैं बुरी हूँ या अच्छी, हूँ तो इस घर का हिस्सा न? अगर मेरे दामन पर दाग लगेगा, तो छींटे पूरे परिवार पर आएंगे। आज वही हुआ।”
कल्याणी सुबक रही थीं। “अनिका… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैंने अपनी ही बेटी का घर उजाड़ दिया।”
अनिका ने उनके घुटनों पर हाथ रखा। “नहीं माँ जी, अभी कुछ नहीं उजड़ा है। निशा बहुत होनहार है, उसके लिए इससे भी अच्छा रिश्ता आएगा। लेकिन यह हादसा हमें एक सबक देने आया था। माँ जी, दुनिया वाले कभी हमारे सगे नहीं होते। जब आप मिसेज चड्ढा को मेरी बुराई बता रही थीं, तो वो आपके साथ सहानुभूति नहीं दिखा रही थीं, वो मजे ले रही थीं। उन्हें गॉसिप का मसाला मिल रहा था। हमारे घर की लड़ाई उनके लिए शाम की चाय का नाश्ता थी।”
कल्याणी को आज अनिका की हर बात ब्रह्मवाक्य जैसी लग रही थी। उसे याद आया कि कैसे मिसेज चड्ढा कुरेद-कुरेद कर पूछती थीं— *“और क्या किया बहू ने? फिर तुमने क्या कहा?”* और कल्याणी बेवकूफों की तरह सब उगल देती थीं।
अगले कुछ दिन घर का माहौल गमगीन रहा। कल्याणी पार्क नहीं गईं। वो अपने कमरे में ही रहीं। उन्हें अपनी गलती का अहसास हड्डियों तक हो रहा था। निशा भी चुप-चुप थी।
एक हफ्ते बाद, अनिका ने एक पहल की। उसने समीर के एक दूर के रिश्तेदार के जरिए निशा के लिए एक और लड़के की जानकारी निकलवाई। लड़का बैंक में ऑफिसर था और परिवार बहुत ही साधारण और सुलझा हुआ था।
अनिका ने कल्याणी से कहा, “माँ जी, यह रिश्ता अच्छा लग रहा है। क्या हम बात करें?”
कल्याणी ने नम आँखों से अनिका को देखा। “तू… तू अभी भी हम सबके लिए इतना सोच रही है? जबकि मैंने…”
“माँ जी, आप मेरी सास हैं, माँ समान हैं,” अनिका ने मुस्कुराते हुए कहा। “माँ अगर बच्चों को डांट दे या चार बातें सुना दे, तो बच्चे माँ बदलना नहीं शुरू कर देते। और फिर, यह घर मेरा भी तो है। निशा मेरी भी तो बहन जैसी है।”
कल्याणी उठ खड़ी हुईं। उन्होंने अनिका को गले लगा लिया। सालों बाद, या शायद पहली बार, उस गले मिलने में औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सच्चा पछतावा और अपनापन था।
“अनिका, मुझे माफ़ कर दे। मैं बाहर वालों के बहकावे में आकर अपने ही घर में आग लगा रही थी। मुझे समझ आ गया है कि घाव पर मरहम घर वाले ही लगाते हैं, बाहर वाले तो सिर्फ उसे कुरेद कर नासूर बनाते हैं।”
कुछ महीनों बाद, निशा की शादी उसी बैंक ऑफिसर लड़के से तय हो गई। शादी का समारोह धूम-धाम से हुआ।
विदाई के वक्त, मिसेज चड्ढा और बाकी सहेलियाँ भी आई थीं। मिसेज चड्ढा ने फिर से वही पुराना राग छेड़ने की कोशिश की। वो कल्याणी के पास आईं और कान में फुसफुसायीं, “अरे कल्याणी, सुना तेरी बहू ने इस शादी में भी अपनी मनमानी चलाई है? साड़ियां अपनी पसंद की ले आई?”
इस बार कल्याणी का चेहरा नहीं उतरा। उन्होंने तनकर मिसेज चड्ढा की आँखों में देखा और ऊँची आवाज़ में कहा, ताकि आसपास खड़े लोग भी सुन सकें।
“चड्ढा बहन, मेरी बहू ने जो किया, बहुत अच्छा किया। उसकी पसंद मुझसे भी बेहतर है। और सुनिए, मेरी बहू मेरी बेटी जैसी है। घर में बर्तन तो खटकते ही हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं उन्हें सड़क पर फेंक दूँ। मेरी बहू लाखों में एक है, और अगर किसी को उसमें कोई कमी दिखती है, तो वो अपनी नजर का इलाज कराए, मेरे घर की चिंता न करे।”
मिसेज चड्ढा का चेहरा देखने लायक था। वो खिसियाकर वहाँ से चली गईं। अनिका, जो थोड़ी दूर खड़ी यह सब सुन रही थी, उसकी आँखों में सम्मान के आँसू तैर आए। उसने अपनी सास की तरफ देखा और मुस्कुरा दी। कल्याणी ने भी आँखों ही आँखों में उसे आशीर्वाद दिया।
उस दिन के बाद से कल्याणी पार्क तो जाती थीं, लेकिन अब वहाँ ‘शिकायतें’ नहीं होती थीं। अब अगर कोई दूसरी महिला अपनी बहू की बुराई शुरू करती, तो कल्याणी उसे बीच में ही टोक देतीं— *“बहन, घर की बात घर में सुलझाओ। बाहर थूकोगी, तो वो अपने ही मुँह पर गिरेगा।”*
रायजादा परिवार ने एक बहुत बड़ी कीमत चुकाकर यह सबक सीखा था, लेकिन अंततः उन्होंने सीख लिया था कि परिवार की मजबूती ‘बंद मुट्ठी’ में होती है। जब मुट्ठी खुल जाती है, तो लकीरें सब पढ़ लेते हैं और उनका फायदा उठाते हैं।
**समापन:**
दोस्तों, यह कहानी हर उस घर का आईना है जहाँ आपसी मनमुटाव को बाहर वालों के सामने तमाशा बना दिया जाता है। याद रखिये, आपका दुख सुनने वाला हर इंसान आपका शुभचिंतक नहीं होता। अधिकतर लोग सिर्फ ‘मसाले’ की तलाश में होते हैं। बहू, बेटा, सास या पति—कोई भी दूध का धुला नहीं होता, गलतियाँ सबसे होती हैं। लेकिन समझदारी इसमें है कि कमरे का झगड़ा कमरे में ही खत्म हो जाए। जिस दिन घर की बुराई घर की दहलीज पार कर जाती है, उस दिन घर की इज्जत भी नीलाम हो जाती है। दूसरे आपकी समस्या सुलझाएंगे नहीं, बल्कि उस आग में हाथ सेकेंगे। अपने परिवार को अपनी ताकत बनाइये, जग-हँसाई का पात्र नहीं।
**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके आसपास भी ऐसे लोग हैं जो आपके घर की बातें कुरेदकर पूछते हैं? और क्या आप भी कल्याणी देवी जैसी गलती कर रहे हैं? हमें कमेंट में जरूर बताएं।
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लेखिका : आरती देवी