बहु तुम्हारी ननद ही तो ले गई है तुम्हारी साड़ी, कोई गैर नहीं.. – निभा राजीव

बहु तुम्हारी ननद ही तो ले गई है तुम्हारी साड़ी, कोई गैर नहीं..

कमरे में फैली मिट्टी की सोंधी खुशबू और फैब्रिक कलर्स की महक रोली के लिए किसी इत्र से कम नहीं थी। वह पिछले पंद्रह दिनों से तसर सिल्क की उस साड़ी पर बारीक मधुबनी पेंटिंग कर रही थी। यह केवल एक साड़ी नहीं थी, बल्कि रोली के बुटीक ‘सृजन’ का अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट था। शहर की मेयर की पत्नी ने इसे विशेष ऑर्डर पर बनवाया था, जिसे कल सुबह डिलीवर करना था।

रोली ने अपनी कमर सीधी की और ब्रश को पानी में डुबोया। साड़ी के पल्लू पर बना मयूर अब जीवंत हो उठा था। बस अंतिम आउटलाइन बाकी थी। उसने घड़ी देखी, शाम के चार बज रहे थे।

“रोली! अरे ओ रोली!” सासू माँ, विमला देवी की आवाज़ नीचे हॉल से आई।

रोली ने सावधानी से साड़ी को सूखने के लिए टेबल पर फैलाया, उस पर एक हल्का मलमल का कपड़ा डाला ताकि धूल न लगे, और कमरे का दरवाज़ा सटाकर नीचे चली गई।

नीचे हॉल में उसकी ननद, शिखा दीदी बैठी थीं। शिखा पास ही की कॉलोनी में रहती थीं और अक्सर शाम की चाय यहीं पीती थीं।

“नमस्ते दीदी,” रोली ने मुस्कुराते हुए कहा।

“नमस्ते भाभी। अरे, तुम तो आजकल ईद का चाँद हो गई हो। ऊपर कमरे से निकलती ही नहीं,” शिखा ने हँसते हुए उलाहना दिया।

“वो दीदी, कुछ ऑर्डर्स पेंडिंग थे, बस उसी में लगी हूँ,” रोली ने सफाई दी और रसोई की तरफ मुड़ गई चाय बनाने के लिए।

चाय बनाते वक्त रोली को ध्यान आया कि उसके पास साड़ी की पैकिंग के लिए गोल्डन रिबन खत्म हो गया है। उसने सोचा चाय देकर वह पास के बाज़ार से रिबन ले आएगी, तब तक साड़ी का रंग भी पक्का हो जाएगा।

चाय और नाश्ता परोसने के बाद, रोली ने विमला देवी से कहा, “माँ जी, मैं ज़रा नुक्कड़ वाली दुकान से रिबन लेकर आती हूँ। दस मिनट में आ जाऊँगी।”

“हाँ-हाँ, जा। शिखा तो बैठी है अभी,” विमला देवी ने बेपरवाही से कहा।

रोली आश्वस्त होकर चली गई। उसे क्या पता था कि ये दस मिनट उसके धैर्य और आत्मसम्मान की परीक्षा बनने वाले हैं।

जब रोली बाज़ार से लौटी, तो उसे घर के बाहर शिखा दीदी की कार नहीं दिखी। ‘शायद जल्दी चली गईं होंगी,’ उसने सोचा। वह गुनगुनाते हुए सीढ़ियां चढ़कर अपने वर्क-स्टूडियो (जो उसका बेडरूम भी था) में पहुंची।

दरवाज़ा खोलते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

टेबल खाली थी। वह मलमल का कपड़ा ज़मीन पर गिरा हुआ था। पेंट की डिब्बियां खुली पड़ी थीं, और वह साड़ी… वह ‘नीलकमल’ साड़ी वहां नहीं थी।

रोली का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसने इधर-उधर देखा। कहीं हवा से उड़ गई हो? नहीं, भारी सिल्क की साड़ी थी। उसने बाथरूम, अलमारी, सब देख लिया। साड़ी गायब थी।

वह बदहवास होकर नीचे भागी।

“माँ जी! माँ जी!”

विमला देवी टीवी पर भजन सुन रही थीं। “क्या हुआ बहू? क्यों चिल्ला रही है?”

“माँ जी, मेरी साड़ी… वो जो टेबल पर रखी थी। नीले रंग की पेंटिंग वाली। वो कहाँ है? आपने देखी?” रोली की आवाज़ कांप रही थी।

विमला देवी ने बहुत ही सहजता से रिमोट से टीवी की आवाज़ कम की और बोलीं, “अच्छा, वो मोर वाली साड़ी? वो तो शिखा ले गई।”

रोली को लगा जैसे किसी ने उसे धक्का दे दिया हो। “शिखा दीदी? पर… पर क्यों?”

विमला देवी ने माथे पर शिकन लाते हुए कहा, “अरे, आज शाम को उसके पति के बॉस की पार्टी है। बेचारी कह रही थी कि उसके पास पहनने को कुछ नया नहीं है। जब मैं उसे ऊपर तेरे कमरे में पानी की बोतल रखने के लिए ले गई, तो उसकी नज़र उस साड़ी पर पड़ी। उसे बहुत पसंद आई। उसने कहा- भाभी के पास तो ऐसी बहुत हैं, यह मैं पहन लेती हूँ। तो मैंने दे दी।”

रोली का गला सूख गया। “माँ जी, आपने दे दी? मुझसे बिना पूछे? माँ जी, वो मेरी पहनने वाली साड़ी नहीं थी। वो एक क्लाइंट का ऑर्डर था। पचास हज़ार रुपये की साड़ी थी वो, जिसे मुझे कल सुबह डिलीवर करना है। और सबसे बड़ी बात, वो अभी पूरी तरह सूखी भी नहीं थी!”

रोली की आँखों में आंसू आ गए।

विमला देवी का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया। अपनी गलती मानने के बजाय, उन्होंने वही पुराना तर्क दिया जो सदियों से इस देश की बहुओं को चुप कराने के लिए इस्तेमाल होता आया है।

उन्होंने मुंह बनाकर कहा, “अरे तो क्या हो गया? बहू, तुम्हारी ननद ही तो ले गई है तुम्हारी साड़ी, कोई गैर नहीं। घर की बात घर में ही है। अब क्या एक साड़ी के लिए अपनी ननद से लड़ोगी? बना देना उस क्लाइंट के लिए दूसरी।”

“दूसरी? माँ जी, उसे बनाने में पंद्रह दिन लगे हैं! और वो अभी गीली थी। अगर शिखा दीदी ने उसे पहना और रंग फैल गया तो? मेरी मेहनत, मेरा पैसा, मेरी साख… सब बर्बाद हो जाएगा!” रोली अब रो रही थी।

“तू तो राई का पहाड़ बना रही है। वो पहनकर पार्टी में ही तो जा रही है, कौन सा युद्ध लड़ने जा रही है। कल सुबह वापस कर देगी, प्रेस करके दे देना अपने ग्राहक को,” विमला देवी ने बात खत्म करनी चाही और फिर से टीवी की आवाज़ तेज़ कर दी।

रोली वहीं सीढ़ियों पर बैठ गई। यह केवल साड़ी की बात नहीं थी। यह ‘बाउंड्री’ की बात थी। यह उस सोच की बात थी जो मानती है कि बहू की हर चीज़—उसका समय, उसका हुनर, उसकी संपत्ति—ससुराल वालों की सार्वजनिक जागीर है। अगर वह साड़ी रोली की अपनी होती, तो शायद वह एक बार को बर्दाश्त कर लेती। लेकिन वह उसका ‘काम’ था, उसका ‘प्रोफेशन’ था।

उसने घड़ी देखी। शाम के छह बज रहे थे। पार्टी आठ बजे शुरू होनी थी। शिखा दीदी का घर आधे घंटे की दूरी पर था।

रोली ने अपने आंसू पोंछे। उसने फोन निकाला और शिखा को कॉल किया।

घंटी बजती रही, लेकिन फोन नहीं उठा। दो बार, तीन बार।

विमला देवी ने उसे घूरकर देखा। “क्यों परेशान कर रही है उसे? तैयार हो रही होगी बच्ची।”

रोली ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपना पर्स उठाया और स्कूटी की चाबी ली।

“कहाँ जा रही है इस वक्त?” विमला देवी ने कड़ककर पूछा।

“अपनी साड़ी लाने,” रोली की आवाज़ में अब कंपन नहीं, एक अजीब सी दृढ़ता थी।

“पागल हो गई है क्या? घर जाकर साड़ी मांगेगी? मेरी नाक कटवाएगी समधियों के सामने? खबरदार जो कदम बाहर निकाला,” विमला देवी सोफे से उठ खड़ी हुईं।

रोली रुकी। उसने पलटकर अपनी सास को देखा।

“माँ जी, अगर यह साड़ी मेरी होती, तो मैं आपकी नाक के लिए अपनी खुशी कुर्बान कर देती। लेकिन यह साड़ी मेरी ‘ज़िम्मेदारी’ है। मैंने किसी से वादा किया है। और व्यापार में ज़बान की कीमत, रिश्तों के लिहाज से ज्यादा होती है। अगर शिखा दीदी ने वो गीली साड़ी पहन ली, तो वो खराब हो जाएगी। तब आपकी नाक बचे न बचे, मेरा करियर ज़रूर खत्म हो जाएगा।”

रोली तेज़ कदमों से बाहर निकल गई। विमला देवी पीछे से चिल्लाती रहीं, लेकिन रोली ने स्कूटी स्टार्ट की और हवा से बातें करने लगी।

रास्ते भर उसका दिमाग भन्ना रहा था। उसे याद आ रहा था कि कैसे शादी के बाद उसकी हर चीज़ पर शिखा का अधिकार जमाया जाता था। उसकी नई लिपस्टिक, उसके गहने, उसके महंगे शॉल—’अरे, ननद ही तो है’ कहकर ले लिए जाते थे और फिर या तो वापस नहीं आते थे या खराब हालत में मिलते थे। रोली चुप रहती थी, संस्कार के नाम पर। लेकिन आज… आज बात उसके अस्तित्व की थी।

आधे घंटे बाद वह शिखा के घर के बाहर थी। उसने घंटी बजाई। शिखा की सास ने दरवाज़ा खोला।

“अरे रोली? तुम इस वक्त? सब ठीक तो है?”

“नमस्ते आंटी, जी सब ठीक है। शिखा दीदी हैं?”

“हाँ, ऊपर अपने कमरे में तैयार हो रही है। जाओ,” उन्होंने कहा।

रोली सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंची। दरवाज़ा आधा खुला था। शिखा आईने के सामने खड़ी थी। उसने वही ‘नीलकमल’ साड़ी पहन रखी थी। वह पल्लू की प्लीट्स बना रही थी।

रोली की सांस अटक गई। उसने गौर से देखा। शुक्र है, पेंट सूखा नहीं था, पर शिखा के हाथ पर हल्का नीला रंग लग गया था जिसे शिखा ने अभी नोटिस नहीं किया था।

“दीदी!” रोली ने हाफते हुए पुकारा।

शिखा चौंक कर मुड़ी। “अरे भाभी? तुम यहाँ? देखो न, कितनी सुंदर लग रही है यह साड़ी। फिटिंग भी गजब की आई है। माँ ने बताया नहीं तुम्हें?”

रोली कमरे में दाखिल हुई और सीधे शिखा के पास गई।

“दीदी, प्लीज इसे अभी उतार दीजिए।”

शिखा का चेहरा उतर गया। “क्या? भाभी, तुम साड़ी वापस लेने आई हो? इतनी छोटी सी बात के लिए? मुझे लगा तुम मुझे तैयार करने आई हो।”

“दीदी, यह मेरी साड़ी नहीं है। यह एक क्लाइंट का ऑर्डर है। इस पर पेंट अभी गीला है। देखिए अपने हाथ,” रोली ने इशारा किया।

शिखा ने अपने हाथ देखे। उंगलियों पर नीला रंग लगा था। “ओह! यह तो कच्चा रंग है। तुमने बताया क्यों नहीं?”

“बताने का मौका ही कहाँ दिया आपने या माँ जी ने? आपने बिना पूछे उठा ली,” रोली ने सपाट स्वर में कहा। “दीदी, प्लीज इसे उतारिए। अगर इस पर एक भी दाग लग गया या सिलवट गलत पड़ गई, तो मैं इसे बेच नहीं पाऊँगी। पचास हज़ार का नुकसान होगा मेरा।”

शिखा ने मुंह फुला लिया। “तो क्या हुआ? पचास हज़ार मैं दे दूँगी। अब मैं इसे पहन चुकी हूँ, अब मैं इसे नहीं उतारूँगी। मेरे पास और कोई मैचिंग ड्रेस नहीं है। और भैया से कह दूँगी, वो तुम्हें पैसे दे देंगे।”

रोली को विश्वास नहीं हुआ। “दीदी, बात पैसों की नहीं है। यह एक आर्ट पीस है, जो किसी और की अमानत है। क्या आप किसी और की अमानत पहनकर पार्टी में शान दिखाएंगी? और भैया क्यों पैसे देंगे? मेरी मेहनत की कीमत आप भैया की जेब से क्यों लगाएंगी?”

शिखा गुस्से में आ गई। “भाभी, तुम बहुत रूड हो रही हो। एक साड़ी के लिए घर पर तमाशा करने आ गईं। ठीक है, ले जाओ अपनी साड़ी। आज के बाद मैं तुम्हारे घर से पानी भी नहीं पियूँगी।”

शिखा गुस्से में वॉशरूम गई और पांच मिनट में साड़ी उतारकर, उसे बेतरतीब ढंग से मोड़कर रोली के हाथ में थमा दिया। “लो, और खुश रहो। बता दूँगी माँ को कि उनकी बहू कितनी कंजूस है।”

रोली ने साड़ी को बहुत प्यार से खोला, चेक किया। शुक्र है, कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ था, बस एक जगह हल्का सा धब्बा था जिसे वह ठीक कर सकती थी। उसने साड़ी को सलीके से तह किया।

“दीदी,” रोली ने जाने से पहले कहा, “आप मुझे कंजूस कहिए या रूड, मुझे फर्क नहीं पड़ता। लेकिन एक बात याद रखिएगा। मेरा बुटीक मेरी पूजा की जगह है। वहाँ रखा सामान प्रसाद नहीं है कि कोई भी उठा ले जाए। अगली बार अगर आपको कुछ चाहिए हो, तो प्लीज मुझसे मांगिएगा, मेरे काम को चोरी मत कीजिएगा।”

रोली वहां से निकल आई। शिखा पीछे सन्न रह गई। उसे पहली बार अपनी शांत और दब्बू भाभी का यह रूप देखने को मिला था।

जब रोली घर पहुंची, तो रात के आठ बज चुके थे। उसके पति, मयंक भी ऑफिस से आ चुके थे। घर का माहौल तनावपूर्ण था। विमला देवी ने मयंक को ‘नमक-मिर्च’ लगाकर सारी बात बता दी थी कि कैसे रोली ने शिखा के घर जाकर बेइज्जती की।

मयंक सोफे पर बैठा था, चेहरा गंभीर था। रोली अंदर आई, हाथ में साड़ी का पैकेट था।

“रोली, यह क्या तमाशा है?” मयंक ने पूछा। “माँ कह रही हैं तुम शिखा के घर गई थीं साड़ी छीनने? क्या कमी रखी है मैंने जो तुम्हें चंद रुपयों के लिए रिश्तों की धज्जियां उड़ानी पड़ीं?”

रोली ने पैकेट टेबल पर रखा। वह थकी हुई थी, लेकिन हारी हुई नहीं।

“मयंक, यह साड़ी पचास हज़ार की है,” रोली ने शांत स्वर में कहा।

“तो? मैं दे देता पचास हज़ार! शिखा को रोते हुए छोड़ आई तुम,” मयंक चिल्लाया।

रोली ने एक गहरी सांस ली। “मयंक, अगर कल तुम्हारे ऑफिस से कोई फाइल तुम्हारा जीजाजी उठाकर ले जाएं और कहें कि ‘साले की ही तो है’, तो क्या तुम उन्हें ले जाने दोगे? क्या तुम कहोगे कि ‘अरे फाइल ही तो है, दूसरी बना लूँगा’?”

मयंक चुप हो गया।

“नहीं न? क्योंकि वह तुम्हारा ‘काम’ है। यह साड़ी मेरा ‘काम’ है मयंक। यह मेरा प्रोफेशन है। माँ जी और शिखा दीदी को लगता है कि मैं घर में बैठकर टाइम पास करती हूँ, इसलिए मेरे काम की कोई इज़्ज़त नहीं है। अगर यह मेरी अलमारी की साड़ी होती, तो मैं हंसकर दे देती। पर उन्होंने मेरे ‘क्लाइंट’ का सामान उठाया। यह चोरी है मयंक, हक नहीं।”

विमला देवी बीच में बोलीं, “देख रहा है मयंक? कैसे ज़बान लड़ा रही है। अरे, ननद का हक़ होता है भाभी के सब कुछ पर।”

“हक़ प्रेम पर होता है माँ जी, शोषण पर नहीं,” रोली ने पहली बार विमला देवी की आँखों में आँखें डालकर कहा। “आप चाहती थीं कि मैं एक ‘आदर्श बहू’ बनकर चुप रहूँ और अपना नुकसान करवा लूँ। लेकिन आज अगर मैं चुप रहती, तो कल शिखा दीदी मेरे बुटीक से गल्ले के पैसे भी उठा ले जातीं और आप कहतीं कि ‘ननद ही तो है’। कहीं न कहीं तो लकीर खींचनी पड़ती न? मैंने आज खींच दी।”

मयंक ने साड़ी की तरफ देखा, फिर रोली के चेहरे की तरफ। उसे रोली की आंखों में वह थकान और अपमान दिखा जो उसने पिछले कुछ घंटों में झेला था। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह भूल गया था कि रोली सिर्फ उसकी पत्नी नहीं, एक बिज़नेसवुमन भी है।

मयंक उठा और अपनी माँ के पास गया। “माँ, रोली सही कह रही है। हम उसके काम को ‘घर का काम’ समझकर हल्के में लेते रहे हैं। यह प्रोफेशनल मामला था। शिखा की गलती है कि उसने बिना पूछे किसी और का ऑर्डर उठाया। और आपकी गलती है कि आपने उसे बढ़ावा दिया।”

विमला देवी अवाक रह गईं। बेटा भी बहू की बोली बोल रहा था।

“और रोली,” मयंक ने मुड़कर कहा, “सॉरी। मुझे पहले पूरी बात समझनी चाहिए थी। तुमने सही किया। अपनी मेहनत की कमाई और अपनी प्रोफेशनल इज़्ज़त के लिए खड़ा होना गलत नहीं है।”

रोली की आँखों से एक आंसू लुढ़क गया, जिसे उसने तुरंत पोंछ लिया।

उस रात, रोली ने देर रात तक जागकर उस साड़ी के हल्के धब्बे को ठीक किया। अगली सुबह जब उसने मेयर की पत्नी को साड़ी सौंपी और उन्होंने उसकी तारीफ की, तो रोली को लगा जैसे उसने कोई जंग जीत ली हो।

शाम को शिखा का फोन आया। रोली ने झिझकते हुए उठाया।

“भाभी…” शिखा की आवाज़ धीमी थी। “पार्टी में कल मेरी एक दोस्त ने वैसी ही हैंड-पेंटेड साड़ी पहनी थी। सब उसकी बहुत तारीफ कर रहे थे। उसने बताया कि वो कितनी महंगी और नाजुक होती है। मुझे… मुझे अहसास हुआ कि मैंने कल बचपना किया था। आई एम सॉरी।”

रोली मुस्कुरा दी। “कोई बात नहीं दीदी। अगली बार आपको चाहिए हो तो बता दीजिएगा, मैं आपके लिए अलग से डिज़ाइन कर दूँगी। बस, ‘ऑर्डर’ वाली अलमारी को हाथ मत लगाइएगा।”

शिखा हंस पड़ी।

हॉल में बैठी विमला देवी ने यह बातचीत सुनी। वह समझ गई थीं कि अब वह पुराना जमाना नहीं रहा जहाँ “ननद की खुशी” के लिए बहू की “अस्मिता” की बलि दी जा सके। बहू अब केवल बहू नहीं थी, वह एक व्यक्ति थी जिसका अपना दायरा, अपना काम और अपना सम्मान था। और उस दायरे में घुसने के लिए ‘रिश्ते’ का पास नहीं, बल्कि ‘इज़्ज़त’ की अनुमति चाहिए थी।

उस दिन के बाद से, रोली के स्टूडियो का दरवाज़ा कभी भी बिना खटखटाए नहीं खुला। क्योंकि उस दिन रोली ने अपनी साड़ी ही नहीं, अपना खोया हुआ आत्मसम्मान भी वापस पा लिया था।

मूल लेखिका : निभा राजीव

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