बहू सही है – गीता वाधवानी

 सुंदरलाल और कमला देवी के दो पुत्र थे। बड़ा बेटा नीरज जिसका विवाह हो चुका था और वह अपनी पत्नी राशि के साथ अलग-अलग रहता था। छोटा बेटा धीरज जिसका अभी कुछ दिन पहले ही सुगंधा के साथ विवाह हुआ था, वे दोनों सुंदरलाल और कमला के साथ रहते थे। 

 सुंदरलाल रोज पार्क में सैर करने जाते थे और अपने साथ रोज किसी न किसी दोस्त को साथ लेकर आते थे और बहू सुगंधा से कहते थे कि मेरे दोस्त के लिए चाय नाश्ता ले आओ। 

 सुगंधा स्कूल में दूसरी शिफ्ट में शिक्षिका थी इसीलिए उसे थोड़ा देर से जाना होता था। वह घर के सारे काम सुबह-सुबह उठकर निपटा लेती थी। ससुर जी के दोस्तों को वह चाय नाश्ता खिलाती थी तो वह लोग बहुत ही प्रशंसा करते थे और कहते थे कि बहुत स्वादिष्ट नाश्ता और चाय बहुत ही अच्छी बनी है। ससुर जी तब उनसे कहते कि ” देखा, मैंने कहा था ना कि मेरी बहु बहुत अच्छा खाना बनाती है और बहुत ही गुणी है। ” 

 सुगंध को अपनी प्रशंसा सुनकर बहुत ही अच्छा लगता था। एक बार सुंदर लाल को उनकी पत्नी कमला देवी ने कहा-” देखिये, मेरी बात सुनिए अब आप अपने दोस्तों को रोज-रोज घर पर लाना बंद कर दीजिए। ऐसा ना हो कि किसी दिन सुगंधा आपसे साफ-साफ कह दे कि मुझसे नहीं बनता नाश्ता,

आपके दोस्तों के लिए, आप जरा सोचिए घर का काम भी निपटा कर जाती है और स्कूल में जॉब करने के बाद घर पर आकर फिर से काम करती है,

आखिर वह भी तो थक जाती होगी। क्या आपको बड़ी बहू के बारे में कुछ याद नहीं है। उसने तो हम लोगों को ही नाश्ता बनाना बंद कर दिया था और दोस्तों की तो बात ही छोड़िए, उससे तो लाख गुना संस्कारी है हमारी सुगंधा। फिर हम उसे गलत कहने पर क्यों मजबूर करें। हमारे व्यवहार से ही हमारी इज्जत और सम्मान बनता है। ” 

 सुंदरलाल -” देखो तुम खुद कह रही हो कि हमारी बहू संस्कारी है, वह ऐसा कुछ नहीं कहेगी तुम चिंता मत करो। ” 

 थोड़ा समय बीतने के बाद, सुगंधा गर्भवती हुई और उसे काम करने में दिक्कत होने लगी। ज्यादा खड़े रहने पर उसके पैर सूज जाते थे। फिर भी वह दवाइयां खाकर अपने काम करती रही। अब उसे कभी-कभी अपने ससुर के दोस्तों के आने पर चिढ होने लगती थी, लेकिन उसने अभी कुछ नहीं कहा था। 

 जैसे-तैसे 9 महीने बीते और उसने प्यारी सी गुड़िया को जन्म दिया। तब उसकी सास ने सब कुछ संभाल लिया था। अब सुगंधा की छुट्टियां खत्म हो रही थी और उसे जॉब पर जाना आवश्यक था। बच्ची अभी छोटी थी उसकी देखरेख कमला देवी ही करती थी। 

     सुंदरलाल अभी भी अपने दोस्तों को लेकर आते थे। एक बार बच्ची बहुत रो रही थी उसे बुखार था। तब सुंदरलाल अपने दोस्त को लेकर आ गए और बहू नाश्ता बना कहने लगे। उस समय तो सुगंधा ने चुपचाप नाश्ता दे दिया, लेकिन बाद में उसने अपनी सास से कहा-” मम्मी जी, आप पापा जी को समझाती क्यों नहीं है, रोज किसी न किसी को ले आते हैं अपने साथ और कहते हैं नाश्ता बनाओ। गुड़िया इतनी बीमार है उसे बुखार है मैं उसको संभालू, स्कूल भी जाऊं और पापा जी के दोस्तों के लिए नाश्ता भी बनाऊं, सॉरी मम्मी जी मुझसे अब नहीं होगा। ” 

    कमला देवी ने अपने पति को पूरी बात बताई। सुंदरलाल ने बहु को बुलाया और पूछा-” सुगंधा, तुमने अपनी सास से मेरे दोस्तों के बारे में कुछ कहा है? ” 

 सुगंधा-” हां पापा जी, छोटी बच्ची है मुझे जॉब पर भी जाना होता है, आपको खुद सोचना चाहिए, आप रोज किसी ने किसी को ले आते हैं और कहते हैं कि नाश्ता बनाओ, मुझसे अब नहीं होगा। ” 

 सुंदरलाल -” तो क्या मैं अपने दोस्तों को घर पर ना बुलाऊं, उनसे ना मिलूँ, और वह नाश्ता खाकर तुम्हारी कितनी प्रशंसा करते हैं। ” 

 सुगंधा-” पापा जी, मिलने की कोई मना नहीं है, आप उनसे रोज़ मिलिए, लेकिन क्या उन सब में से आपको किसी ने कभी नाश्ते पर इनवाइट किया है और रही प्रशंसा की बात, मुझे पता है कि मैं खाना अच्छा बनाती हूं, फिर कोई प्रशंसा करें या ना करें, मुझे फर्क नहीं पड़ता। हां पहले मुझे बहुत खुशी होती थी, लेकिन अब मैं प्रशंसा को देखूं या अपनी बच्ची और नौकरी को संभालू। आप अगर अपने दोस्तों को बुलाना ही चाहते हैं, तो रोज किसी न किसी को मत बुलाइये बल्कि सब मिलकर हर महीने या दो महीने में किसी एक के घर इकट्ठे होकर नाश्ता कीजिए ताकि मुझे भी राहत मिल सके।” 

 सुंदरलाल सोच में पड़ गए थे। कमला देवी ने सच में डूबा देखकर उनसे कहा-” इतना क्या सोच रहे हो, बहुत सही है  ” 

 सुंदरलाल -” मैं यह सोच रहा हूं कमला की बहू ने तो सीमा बांध दी। ” 

 कमला देवी-” बहू ने सही कहा है, वह बिल्कुल गलत नहीं है, बड़ी बहू की हरकतें याद करो और फिर सुगंधा के बारे में कुछ कहो, बड़ी बहू को तो हमारा खाना बनाने में भी तकलीफ होती थी, यहां तक की नीरज को भी वह नूडल्स बनाकर खिलाती थी, नीरज उसे कहता था कि ऐसी चीजों से मेरा पेट नहीं भरता तब भी उसके कान पर जूँ  तक नहीं रेंगती थी। सुगंधा बहू तो फिर भी महीने में एक बार सबका नाश्ता बनाने के लिए सुझाव दे रही है। उसकी गोद में छोटी बच्ची है और उसे जॉब पर भी जाना होता है। अब आपको समझना ही होगा। ” 

 सुंदरलाल को भी बहू की बात सही लग रही थी और उन्होंने किसी न किसी दोस्त को रोज-रोज बुलाना छोड़ दिया। 

 अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली 

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